!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 7 !!
श्रीराधारानी का प्राकट्य
भाग 2
मैने देखा सपनें में कीर्तिरानी ! …..लोग जहाँ से धरती खोद रहे हैं …..वहीं से सोना रजत मणि इत्यादि प्रकट हो रहे हैं …………।
हे कीर्तिरानी ! मैं सपनें से जाग गया था ये सब देखते हुए …….मेरी नींद खुल गयी थी ……….मैं तुम्हारे पास आया …….तो क्या देखता हूँ मैं ……….तुम दिव्य तेज़ से आलोकित हो रही हो ………..तुम एक प्रकाश का पुञ्ज लग रही हो ……..और ये देखो ! तुम्ही देखो ……तुम्हारे उदर में ……..ऐसा प्रतीत हो रहा है कि …….भास्कर ही आगये हैं …….कितना तेज़ है ।
कीर्तिरानी नें अपनें पति बृषभान के हाथों को प्रेम से पकड़ा …………आराम से उठीं ….क्यों की अष्ट मास पूरे हो चुके थे ।
ये देखिये ! हे स्वामिन् ! ऐसे फूल आपनें कभी देखे थे ?
अपनें ऊपर बिखरे पुष्पों को दिखानें लगीं कीर्तिरानी…..बृषभान नें उन पुष्पों को लिया…..देखा और सूँघा….ये तो पृथ्वी के पुष्प नही हैं ।
हाँ …….और पता है ! ……मैने भी सपना देखा …..मेरा सपना भी बड़ा विलक्षण था….।
कीर्तिरानी भी अपना सपना सुनानें लगीं …………
हे स्वामिन् ! मैने देखा मुझे कोई कष्ट नही हुआ है और एक बालिका मेरे गर्भ से प्रकट हो गयी है ………और वो कन्या इतनी सुन्दर है जैसे तपाये हुए सुवर्ण के समान ……..उस कन्या की सब स्तुति कर रहे थे ……..यहाँ तक कि …….लक्ष्मी सरस्वती महाकाली अन्य समस्त देव गण …….सब हाथ जोड़े खड़े थे ……और ! हे राधे ! जय जय राधे ! यही पुकार सब लगा रहे थे ………पर वो कन्या मुझे ही देखे जा रही थी……….।
“मैया”
आहा ! उसके मुख से मैने ये सुना .......बस इतना सुनते ही मेरे वक्ष से दुग्ध की धारा बह चली......वो मेरे पास आयी .........मेरा दुग्ध पान करनें लगी.........मैं क्या बताऊँ उस दृश्य को देखते ही मैं देहातीत हो गयी थी ....।
“शायद अब उस कन्या के जन्म का समय आगया है”
इससे ज्यादा कहनें के लिये कुछ नही था बृषभान के पास ।
हे कीर्ति रानी ! समय बीतता जा रहा है…..ब्रह्ममुहूर्त का समय हो गया है ….मैं जाता हूँ यमुना स्नान करनें ……..इतना कहकर उठे बृषभान ।
अरे ! आप ? सामनें देखा “मुखरा मैया” खड़ी थीं ………
( ये कीर्तिरानी की माँ हैं )
कहाँ है मेरी बेटी कीर्ति ? आनन्दित होते हुए भीतर आगयीं ।
“ये रहीं आपकी पुत्री”………….बृषभान नें बड़ा आदर किया ।
सीधे जाकर मुखरा मैया नें अपनी बेटी की आँखें देखीं …….नाड़ी देखी ….उदर देखा …………..।
फिर आँखें बन्दकर खड़ी रहीं, कुछ बुदबुदाती भी रहीं …….।
“आज ही होगी लाली”
मुखरा मैया नें स्पष्ट कह दिया ………..हे वज्रनाभ ! कहते हैं इनकी वाणी कभी झूठी नही होती थी ।
बृषभान नें अपनें आनन्द को छूपाया ……और बोले …….इतनी सुबह आप आगयीं मैया ?
अरे ! मैने एक सपना देखा ………….बृषभान हँसे ………..अब सपना अपनी बेटी को सुनाओ ……मुझे देरी हो रही है ……मैं तो जाता हूँ स्नान करनें के लिए ……….इतना कहते हुये बृषभान जी चल पड़े ।
आज मन बहुत प्रसन्न है …….भादौं का महीना है…अष्टमी तिथि है ….रात भर रिमझिम बारिश हुयी है …….वातावरण शीतल है ……ठण्डी ठण्डी हवा चल रही है ……पर हवा में सुगन्ध है …..चले जा रहे हैं बृषभान ।
बीच बीच में ग्वाले मिल रहे हैं ………..वो सब भी आनन्दित हैं ।
एक कहता है …………हे भान महाराज ! कल शाम को मैनें गड्डा खोदा था ………..मुझे मिट्टी की जरूरत थी …….तो मैने खोदा …….पर मैं क्या बताऊँ ……मुझे तो चमकते हुए पत्थर मिले ……….मेरी पत्नी कह रही थी……ये हीरे हैं ……ये मणि हैं ।
.मार्ग के लोग बृषभान को अपनी अपनी बातें बताते हुए चल रहे हैं ………और क्यों न बताएं ……..पृथ्वी नें रत्नों को प्रकट करना शुरू कर दिया था ।
एक ग्वाला दौड़ा आया ………महाराज बृषभान की जय हो !
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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