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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 42 !!
ओये ! तुमसे बतियाएँगी …
भाग 3
“तुम बुद्धिमान हो……हम तो गंवारन हैं ……..अब हमें समझा दो क्यों की समझानें में भी तुम निपुण हो…….श्रीराधा रानी नयन मिलाकर कृष्ण से बतिया रही थीं ।
क्या पूछना है …….पूछो ! श्याम सुन्दर नें हँसकर कहा ।
श्याम सुन्दर ! तीन प्रकार के लोग होते हैं ……….एक प्रेम के बदले प्रेम करते हैं ……..एक वे होते हैं …..जो प्रेम न करनें वालों से भी प्रेम करते हैं ……और एक वे होते हैं ……जो प्रेम करनें वाले से प्रेम न करें ..उन्हें कष्ट और दुःख देकर स्वयं प्रसन्न हों …………इसमें श्रेष्ठ कौन है ?
श्रीराधा रानी नें ये प्रश्न किया श्याम सुन्दर से ।
गम्भीर हो गए थे श्याम …………फिर बोले – प्यारी ! प्रेम करनें के बदले प्रेम ? ये तो स्वार्थ हुआ ………है ना ?
हाँ …..प्रेम तो वो श्रेष्ठ हुआ….”जो प्रेम न करनें वाले से भी प्रेम करता हो”
पर ये जो तीसरे दर्जे के प्रेम के सम्बन्ध में तुमनें पूछा है …….कि प्रेम करनें वाले को भी दुःख दे ….या कष्ट दे ।
आज ये “बनमाली” गम्भीर होकर बोल रहे थे ।
जो प्रेम करनें पर भी प्रेम नही करते ……..तो इस प्रकार के दो लोग प्रसिद्ध हैं ………..एक आत्माराम और एक पूर्णकाम ………..
हे मेरी प्यारीयों ! आत्माराम तो वह है जो अपनी ही आत्मा में रमण करता हो …..यानि ऐसे सिद्ध महात्माओं से प्रेम करना ये तो जीवन की धन्यता है ……….चाहे वो प्रेम करें या न करें ……….पूर्णकाम से प्रेम करना ये भी उपलब्धि ही है ………क्यों की जिसकी कामनाएं पूर्ण हो चुकी हों ………..वह एक प्रकार से निस्वार्थी ही हुआ …….तो फिर ऐसे स्वार्थ रहित मनुष्य से प्रेम करना ……….ये उपलब्धि है जीवन की ।
पर …………इनके अलावा जो प्रेम करनें पर भी प्रेम नही करते ………वो या तो कृतध्नी हैं ।………कृष्ण गम्भीर ही बने रहे …..और बोलते रहे ।
ये “कृतघ्नी” क्या होता है मोहन ? …………प्रश्न है ।
कृतघ्नी उसे कहते हैं ………..जो किये हुए उपकार को न मानें…….
..कृष्ण का उत्तर ।
और एक निम्न श्रेणी और होती है ……………..
“द्रोही कुपुरुष”………..कृष्ण नें गम्भीरता के साथ ये बात कही ।
हे बृज गोपियों ! जो प्रेम का बदला प्रेम से न चुकाए …….वह अगर आत्माराम नही हैं …पूर्णकाम भी नही है ………..तो वह अवश्य कृतघ्नी है या “द्रोही कुपुरुष” है ।
तुम क्या हो ?
श्रीराधा रानी नें कृष्ण की आँखों में गहराई से देखा ....और पूछा ।
सकपका गए कृष्ण ……इधर उधर देखनें लगे …………..
बताओ ! तुम आत्माराम हो नही ! पूर्णकाम भी नही हो ………अगर आत्मा राम होते …..तो हमें क्यों बुलाते बाँसुरी बजाकर ……
पूर्णकाम नही हो ……पूर्णकाम भला माखन चुराएगा …..? चीर चुराएगा ?
तो क्या ये कृतघ्नी हैं ? चन्द्रावली नें श्रीराधा रानी से पूछा ।
नही ….कृतघ्नी तुम नही कह सकतीं इन्हें ……………क्यों की किये का उपकार ये मानते हैं…….हमनें रोते हुए गीत गाया ……ये आगये ……
फिर ये क्या हैं ? सब हँसनें लगीं……….द्रोही कुपुरुष ?
मैं तुम्हारे हास्य को समझता हूँ ………कृष्ण गम्भीर ही बने रहे ।
मैं तुम लोगों के प्रेम को नही समझता ऐसा नही है ………पर प्यारी ! मैं ये चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रेम बढ़ता रहे, बढ़ता रहे ……….इसलिये ही मैं अंतर्ध्यान हुआ था ……इस विरह से प्रेम बढ़ता है …….बढ़ा है ।
जैसे – हे प्यारी ! निर्धन को धन मिल जाए फिर वह धन खो जाए, तो उस निर्धन की समस्त वृत्तियाँ उस धन पर ही लग जाती हैं ।
हर समय वह धन का ही चिन्तन करता रहेगा ………ऐसे ही मैने सोचा था कि ………मैं तुम्हे मिल जाऊँ ………फिर विरह दे दूँ तो इससे प्रेम और बढ़ेगा ………..हाँ …….और मैं देख रहा हूँ कि पहले की अपेक्षा प्रेम और बढ़ा ही है ..।
हे प्यारी सखियों ! तुमनें जो त्याग किया है मेरे लिए .. …..ऐसा त्याग बड़े बड़े योगिन्द्र मुनींद्र भी नही कर सकते………जिस परिवार के राग और मोह को छोड़ पाना बड़े बड़े बैरागियों के लिये भी मुश्किल होता है ……..तुम नें उस राग , मोह, ममता की पक्की रस्सी को क्षण में ही तोड़ दिया …..और मेरे पास चली आईँ……….तुम्हारे जैसा त्याग ……किस त्यागी नें आज तक किया होगा ?
सजल नेत्र हो गए थे ये कहते हुए श्याम सुन्दर के ।
ये कृष्ण , स्वयं हजारों जन्म भी ले ले ….तो भी तुम लोगों नें जो प्रेम दिया है……हे गोपियों !……इसके आगे कृष्ण कुछ बोल नही पाये…..उनकी वाणी प्रेम से अवरुद्ध सी हो गयी ।
श्रीराधा रानी नें भी अपनी ऊँगली कृष्ण के मुख में रख दी थी ……..
नही श्याम ! ………..सिर हिलाया श्रीराधा रानी नें ।
बहुत कुछ बोलनें वाले थे श्याम सुन्दर ……पर श्रीराधा रानी नें मना कर दिया ………….वो तो चरणों में झुक गए थे …..पर श्रीराधा रानी नें उन्हें उठाकर अपनें हृदय से लगा लिया था।
शेष चरित्र कल…🙏
♥️ राधे राधे♥️


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