!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( एकचत्वारिंशत् अध्याय : )
गतांक से आगे –
गौरांग दौड़ रहे हैं ….नित्यानंद उनके पीछे हैं …..हे गौर ! रुक जाओ । हे गौर प्रभु , कहाँ जा रहे हैं आप ! रुक जाओ नाथ ! रुक जाओ । ये क्या हो गया था गौरांग को किसी को पता नही …वो दौड़ रहे थे ….बस दौड़े जा रहे थे । नित्यानंद ने उन्हें आगे जाकर पकड़ा …वो गिर गये …..क्या हुआ ? नित्यानंद ने सम्भाला । हे नित्यानंद ! माँ की याद आरही है । वो सब लोग मुझे पुकार रहे हैं …..सब लोग मेरे नाम का संकीर्तन कर रहे हैं …आज पाँच दिन होने को आये हैं …अन्न जल परित्याग करके सब मेरे नाम का जाप कर रहे हैं । मेरी माता ! उस बूढ़ी मैया ने जल भी नही पीया है ………..
तो आपने क्या सोचा ? नित्यानंद ने पूछा ।
मैं नवद्वीप की सीमा तक जाऊँगा ……गौरांग बोले । शान्तिपुर में आचार्य अद्वैत के यहाँ रुकूँगा ……जाओ , जाओ और जाकर कह दो कि मुझे देखना हो …मुझ से मिलना हो तो सब अद्वैत आचार्य के यहाँ आजायें । गौरांग ने स्पष्ट कह दिया था । नित्यानंद मुस्कुराये ….उन्होंने नाचते हुए कहा ….आहा ! भक्त जीत गया और भगवान हार गया । गौरांग गम्भीर ही बने रहे …..वो अब आगे बढ़ रहे हैं …उनके पद नवद्वीप की ओर बढ़े जा रहे हैं । अब ज़्यादा दूरी भी नही है नवद्वीप । हे गौर ! नवद्वीप वासी कितने प्रसन्न होंगे ….आहा ! प्रभु ! आपकी माता जी ….उनके तो प्राण ही वापस आजाएँगे …..आपने वापस नवद्वीप में जाने का विचार करके अपनी करुणा का ही परिचय दिया है ……और , और वो भोली भाली बेचारी विष्णुप्रिया !
ये नाम सुनते ही गौरांग रुक गए …..गम्भीर दृष्टि से नित्यानंद को उन्होंने देखा …..क्या हुआ ? नित्यानंद भी पूछने लगे ….मैंने कुछ अनुचित तो नही कहा ? सबको लेकर आना नित्यानंद …सबको निमन्त्रण देना ….किन्तु ……किन्तु क्या ? नित्यानंद ने फिर पूछा ….किन्तु विष्णुप्रिया मेरे सामने न आये …..इतना कहकर गौरांग फिर नवद्वीप की ओर बढ़ गए थे ।
ओह ! गौरांग इतने कठोर कैसे हो सकते हैं ! नित्यानंद को अब लग रहा है ….हे गौर ! मत जाओ नवद्वीप …उस बेचारी को आपके दर्शन भी नही होंगे ….क्यों ? क्यों ? नित्यानंद चीखे ।
गौरांग फिर रुक गये …क्या तुम्हें पता नही है नित्यानंद ! कि सन्यासी को स्त्री मुख नही देखना चाहिये ! गौरांग गम्भीर होकर बोल रहे थे ।
आपको तो मैं विधि निषेध से परे मानता था ….किन्तु आप भी सामान्य ही निकले । क्या सन्यास ? आप सन्यास लेकर जगत को ठग रहे हैं ….आप सन्यास के नाम पर विशुद्ध कृष्ण प्रेम फैलाना चाहते हैं ….मैं सब जानता हूँ ….फिर क्यों ये लीला ? उस बेचारी को अपना मुख दिखा दीजिये ….उसे सन्तोष होगा ….उसे कुछ तो सुख मिलेगा । नित्यानंद और भी बातें कह रहे थे ….पर गौरांग ने उन्हें रोक दिया और कहा …..अब तुम जाओ …और जाकर मेरे पूर्वाश्रम के घर से सबको निमन्त्रण दो ….मेरी माता को विशेष । इतना कहकर गौरांग शान्तिपुर में पहुँच गये ….जो नवद्वीप की सीमा पर ही था ।
गौर हरि , गौर हरि , गौर हरि बोल ….मुकुंद माधव गोविन्द बोल ….
सब गा रहे हैं …..सब पुकार कर रहे हैं शचि देवि के आँगन में ….विष्णुप्रिया अपने कक्ष में बैठ गयीं हैं ….नयन मुंद कर वो अपने स्वामी का नाम जाप कर रही हैं …..आज पाँच दिन से भी ज़्यादा हो गये हैं जल की एक बूँद भी मुख में नही गयी है ।
माता ! नित्यानंद आगये ……श्रीवास पण्डित जी ने ही द्वार पर देखा था …नित्यानंद उन्मत्त की भाँति घर में प्रवेश कर गये थे ….संकीर्तन रुक गया …मृदंग की थाप ठहर गयी …..माता शचि ने नित्यानंद को जब देखा तब उन्हें ऐसा लगा जैसे वर्षों से प्यासे किसी मनुष्य को कुछ जल की बूँदे मिल गयीं हो ।
मेरे निताई ! हृदय से लगा लिया शचिदेवि ने ।
बता ना , मेरा निमाई कहाँ है ! तू उसे भी ले आता …उसे क्यों छोड़ दिया । वो कहाँ है …मुझे ले चल …मुझे अपने लाल को देखना है …नित्यानंद ने माता को प्रणाम किया …फिर सब भक्तों को प्रणाम किया और कहा …..निमाई प्रभु ! करुणा करके आप लोगों के पास आ गये हैं ….ये सुनते ही सब नाचने लगे …जय जयकार करने लगे …आनन्द के अश्रु सबके नेत्रों से बहने लगे ।
नित्यानंद ने फिर कहा ….शान्ति पुर में अद्वैत आचार्य के यहाँ गौरांग रुके हुए हैं ….और सब लोगों को वहाँ प्रभु ने बुलवाया है ….ये सुनकर शचि देवि के आनन्द का पारावार नही था …उनकी शारीरिक अस्वस्थता भी समाप्त हो गयी थी …पाँच दिन से कुछ नही खाया …किन्तु इस सुखद सूचना ने उनको स्वस्थ बना दिया ।
माता ! अब तो अपने हाथ से भात बनाकर कृष्ण को भोग लगाओ हम सब को वो प्रसाद खिलाओ ……बहुत भूख लगी है माँ ! नित्यानंद के सहज वचनों से शचि देवि के मुखमण्डल पर किंचित मुस्कुराहट आई …..मैं विष्णुप्रिया को कहती हूँ …..वो कितनी प्रसन्न होगी । शचि देवि भीतर प्रिया के पास जाने लगीं ….तो हाथ पकड़ लिया नित्यानंद ने …..उनको रहने दो ….उनको ……क्यों ? शचि देवि ने नित्यानंद से पूछा । माता ! आप स्वयं विचार करो …क्या प्रिया जी को ये अच्छा लगेगा ….कि उनके प्राण सर्वस्व सन्यासी भेष में होंगे ?
फिर नेत्र से अश्रु बह चले शचि देवि के ….हाँ , मैं वही सोच रही थी कि निमाई को ये बच्ची कैसे सन्यासी भेष में देख पायेगी ! नित्यानंद बोले …इसलिये आप तुरन्त दाल भात बना दो …प्रसाद सब लोग पायेंगे …और माता! हम लोग चल देंगे गौरांग प्रभु के पास ।
ठीक है ….शचि देवि ने दाल भात बैठा दिया है ….और वो बन भी गया …कृष्ण को भोग लगाकर सबने प्रसाद ग्रहण किया …..अब चलना है गौरांग प्रभु के पास । पालकी भेज दी है माता के लिए अद्वैत आचार्य के यहाँ से …..और लोग पैदल ही चल दिये हैं …..पालकी आगयी है …माता आप बैठिये …..किन्तु माता को भीतर नाम जाप में बैठी वो विष्णुप्रिया याद आरही है ।
कान्चना! बाहर नाम संकीर्तन रुक गया है …देख तो क्या हुआ ? विष्णुप्रिया भीतर “गौर हरि” के नाम का जाप कर रही थीं ….बाहर से जब नाम उनके कान में आना बन्द हुआ तो उन्होंने अपनी सखी से कहा …….
कान्चना बाहर आई ….किन्तु बाहर तो सब लोग जा रहे हैं …शचि देवि पालकी में बैठने के लिए तैयार हैं ….कान्चना को शचि देवि ने देखा तो अपने पास बुलाया ….और कहा …निमाई आया है मैं उसे देखकर आ रही हूँ ….तू विष्णुप्रिया का ध्यान रखना । कान्चना ने जब ये सुना तो वो भागी भीतर विष्णुप्रिया के पास …और जाकर बोली …सखी ! तेरे नाम संकीर्तन के प्रभाव से निमाई आगये हैं …उनसे मिलने के लिए सब लोग जा रहे हैं …माता पालकी में बैठने के लिए तैयार ही हैं ..
ये जैसे ही सुना विष्णुप्रिया ने वो भागी बाहर …..हजारों लोग खड़े हैं बाहर …सब चर्चा कर रहे हैं …बड़े बड़े लोग हैं …नित्यानंद बारम्बार आग्रह कर रहे हैं ….”माता ,शीघ्र पालकी में बैठो “।
तभी मर्यादा को ताक में रखकर विष्णुप्रिया पागलों की तरह दौड़ पड़ी …..और अपनी सासु माँ के चरण पकड़ लिए …..माँ ! मैं भी जाऊँगी …माँ ! मुझे मत छोड़ो …मुझे भी एक बार उनके मुख चन्द्र को देखने दो ….मुझे ले चलो , मैं उनको एक बार निहारना चाहती हूँ । विष्णुप्रिया हिलकियों से रो रही थी …..लोग देख रहे हैं ….सब लोग विष्णु प्रिया की ये दशा देखकर रोने लगे थे ….शचि देवि ने नित्यानंद की ओर देखा ….नित्यानंद ने संकेत किया …नही । बेटी ! तू घर में रह …मैं जाकर आती हूँ …..इतना ही बोल सकी शचि देवि ।
माँ ! वही मेरे सब कुछ हैं …..उनको एक बार तो निहारने दो …एक बार माँ ! मुझे उन्हें देखना है ….मैं कुछ नही कहूँगी …कुछ नही ….बस एक बार माँ ! तेरे पाँव पड़ती हूँ ….मुझे छोड़कर मत जा …मत जा !
शचि देवि से रहा नही गया …विष्णुप्रिया का हाथ पकड़ा और कहा …चल पालकी में बैठ ।
“नही”……नित्यानंद बोल उठे । विष्णुप्रिया पालकी में बैठने के लिए तैयार थी ..रुक गयी ।
हजारो लोग देख रहे हैं ….डरी सी , सहमी सी ..विष्णुप्रिया नित्यानंद की ओर देखती है ।
आप नही जा सकतीं …..नित्यानंद ने दृष्टि नीचे करते हुये कहा ।
क्यों ? विष्णुप्रिया चीखी ।
“गौरांग ने कहा है ….सबको लाना पर विष्णुप्रिया नही आनी चाहिये” …नित्यानंद ने कहा ।
ये सुनते ही विष्णुप्रिया मूर्छित होकर गिर गयी ।
इतने कठोर क्यों ? और ये कठोरता केवल इस बेचारी विष्णुप्रिया के लिए ही ? क्यों ?
शेष कल –


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