उद्धव गोपी संवाद
(भ्रमर गीत)
६३ एवं ६४
पुनि पुनि कहि ‘हरि’ कहन बात एकांत पठायौ।
मैं इन कौ कछु मरम जानिं एकौ नहिं पायौ।।
हों कहों निज मरजाद की,ग्यानें करमनिं रोपें।
ए सब प्रेम असक्त ह्वै,रही लाज कुल लोपें।।
– धन्न ए गोपिका –
भावार्थ:
उद्धव जी बार बार अपने मन में कह रहे हैं कि हरि अर्थात भगवान ने तो मुझे इन गोपियों को एकांत में बात करने के लिए भेजा था लेकिन मैं इनके मरम को ही नहीं जान पाया। मैं तो निज मर्यादा से इनको ज्ञान, कर्म आदि सिखाने आया हूं लेकिन ये सब गोपियां प्रेम से ओतप्रोत हैं और इन्होंने अपनी कुल लज्जा भी प्रेम में गंवा दी है। ये सब गोपियां धन्य धन्य हैं।
जो ऐसें मरजाद मेंट,मोहन को ध्यावें।
क्यों न परम आनंद, प्रेम पदवी को पावैं।।
ग्यांन,जोग सब करम तें, प्रेम परे जोइ सांच।
हों इन्हें पटतर देति हों,हीरा आगे कांच।।
– विषमता बुद्धि की –
भावार्थ:
ये गोपियां ऐसे मर्यादा को ( लोक लाज की मर्यादा)मेंटकर मोहन का ध्यान करती हैं तो क्यों न इनको परम आनंद की पदवी मिले। अर्थात लोक की कुल लाज को छोड़कर इन्होंने मोहन में तन मन से ध्यान लगाया है तो ये गोपियां परमानंद की पदवी की उत्तराधिकारी हैं। प्रेम जो है वह ज्ञान योग और करम से बहुत ही ऊंचा और सच्चा है। मैं तो इनके आगे ऐसा हूं जैसे हीरे के आगे कांच।
शेष कल 🙏🙏🙏🙏🙏


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