🙇♀️🙇♀️🙇♀️🙇♀️
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 43 !!
महाकाल का प्रेमरूप – “गोपेश्वर महादेव”
भाग 1
प्रेम में अहंकार का प्रवेश कहाँ ? क्या ये बात सच नही है कि पुरुष का अर्थ ही अहंकार होता है ?
प्रेम की धरातल पर पुरुष का प्रवेश कहाँ है…….वहाँ तो सब गोपी हैं …..
हाँ पुरुष है भी तो एक ही …….वो है कृष्ण ।
दिव्य सरोवर है एक…….इसका दर्शन भी आज ही हुआ है ….
ये सरोवर बड़ा अद्भुत लग रहा है……क्या इस सरोवर का भी कोई इतिहास है ? अगर मैं वज्रनाभ अधिकारी हूँ ….तो मुझे बताइये ।
वज्रनाभ नें हाथ जोड़कर महर्षि शाण्डिल्य से प्रार्थना की ।
हे यदुवीर वज्रनाभ ! जिस सरोवर का तुम दर्शन कर रहे हो ……इस सरोवर का नाम है “मान सरोवर”………महर्षि नें बताया ।
हाँ ……….देखो ! इसमें नाना प्रकार के हंस आते हैं…….और यहाँ विहार करते हैं……..हे वज्रनाभ ! उन पँक्ति बद्ध होकर आरहे हँसों को देखो……….ये सप्त ऋषि हैं……….जो रात्रि में यहाँ आते हैं….और विहार करते हैं……..
आकाश में देखा वज्रनाभ नें ……..तो दिव्य सात हंस उड़ते हुए आरहे थे आकाश मार्ग से……….वो बड़े ही दिव्य लग रहे थे ……..
आते ही उन सबनें मानसरोवर में स्नान किया …………….फिर उसी में किलोल करनें लगे थे …………..
महर्षि उठ गए ………और उठकर उन्होंने ऋषियों को प्रणाम किया ।
चलो वज्रनाभ ! तुमको आज मंगलों का भी मंगल करनें वाली स्थली के दर्शन कराता हूँ …….इतना कहकर उस मान सरोवर से उठकर कुछ कदम ही आगे गए थे ……वहाँ एक कुञ्ज था ………..लताओं का प्राकृतिक बना हुआ कुञ्ज …………उस कुञ्ज के बीचो बीच ……एक अत्यन्त प्रकाश पुञ्ज शिव लिंग था ………..वज्रनाभ नें देखा ………तुरन्त भागे हुए सरोवर में गए ………कमल के पत्र में जल भरकर ले आये ……और महादेव को जल चढानें लगे ।
पता है इन महादेव का नाम क्या है ?
महर्षि नें वहीँ आसन जमाते हुये पूछा ।
वज्रनाभ भी वहीँ बैठ गए………नही गुरुदेव ! मुझे नही पता ।
“गोपेश्वर”…….इनका नाम है “गोपेश्वर महादेव”……नेत्रों को बन्दकर बड़ी श्रद्धा से इस नाम का उच्चारण किया था महर्षि नें ।
गोपेश्वर ? प्रश्न किया वज्रनाभ नें ।
हाँ …….प्रेम का यही तो चमत्कार है वत्स ! कि देखो ! काल, कराल, महाकाल , मृत्युंजय, प्रलयंकर ऐसे भयानक नाम वाले …….ऐसे भयानक रूप वाले रूप वाले, यहाँ प्रेम नें उन्हें गोपी बना दिया …….आहा ! महर्षि आनन्दित हो गए थे ।
हाँ ………यहाँ रास में नाचे हैं ये महादेव……..यहाँ गोपीयों के ताल में ताल मिलाये हैं……..यहाँ लंहगा फरिया सब पहन लिया है महादेव नें…….आँखें बन्द हैं महर्षि की……और उन्हीं गोपेश्वर महादेव का ध्यान करते हुये बोले जा रहे हैं ।
मुझे इस दिव्य कथा को सुनना है ……वज्रनाभ नें जिज्ञासा प्रकट की ।
हाँ ……..ये तो प्रेम की महिमा है……….कि मृत्यु के देवता को भी कोमल हृदय वाली……एक गोपी बना दिया ।
इतना कहकर महर्षि इस प्रसंग को बड़े चाव से सुनानें लगे थे ।
शून्यब्रह्म ……निराकार के ध्यान में लीन थे उस दिन महादेव ।
पर ये क्या ! कैलाश पर्वत में, उनके ध्यान में आज निराकार ब्रह्म आकार ले रहा था …………..तरंगें एकत्रित हो रही थीं ………..और वही एकत्रित तरंगें आकार लेती जा रही थीं ……………आँखें खोलनी पडीं शिव को ………..ये क्या हो रहा है !
पर आश्चर्य तब हुआ शिव शंकर को ………….जब वह तरंगें नील वर्ण ……और त्रिभंगी हो गयी थी ……..यानि वह नीला आकार तीन जगह से टेढ़ा होकर वंशी वाद्य करनें लगा था ……….हजारों हजार सुन्दरियां, समस्त प्रकृतियाँ दौड़ी चली आयी थीं उसके पास ।
आश्चर्य चकित हो उठे थे महादेव …………..ये निराकार ब्रह्म !
पर और आश्चर्य तब हुआ महादेव को …….जब यह नील ब्रह्म अपनी ही उन अंश भूता गोपियों के साथ नाचनें लगा था …………
ओह ! इस दृश्य को देखते ही उछल पड़े थे भगवान त्रिपुरारी ।
उनके पास में रखा डमरू अपनें आप बज उठा था ।
पार्वती दौड़ी दौड़ी आईँ …………आप समाधि से उठ गए नाथ !
पार्वती नें आकर हाथ जोड़ प्रार्थना करी ।
हाँ …………पर पार्वती तुम इतना तैयार होकर कहाँ जा रही हो ?
वो……..देवि लक्ष्मी आयी थीं …………ब्रह्माणी भी आयी थीं ……कह रही थीं …….कि श्रीधाम वृन्दावन में महारास होनें वाला है …………तो अंतरिक्ष से हम सब देखेंगी …………….पार्वती नें कहा ।
मैं भी चलूँगा ……और मैं भी दर्शन करूँगा ……महादेव नें कहा ……और चल पड़े …..।
अरे ! ऐसे कैसे चल रहे हो……..उस महारास का दर्शन कोई पुरुष नही कर सकता ……..पुरुष को दर्शन का भी अधिकार नही है ।
मुस्कुराये महादेव …………………
देवि ! उन ब्रह्म नें मोहिनी का रूप धारण कर मुझे मोहित किया था ….आज मेरी बारी है …………………
क्रमशः …
शेष चरित्र कल…🙏
✒️ राधे राधे✒️


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877