!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( द्विचत्वारिंशत् अध्याय : )
गतांक से आगे –
हे महामहिम !
क्या कहूँ आपको ? क्या सम्बोधन करूँ ? स्वामी ? नही , ये अधिकार मेरा छीन लिया है ।
मैं आपकी पत्नी आप मेरे स्वामी …ओह ! अच्छा होता ना , मैं आपकी पत्नी ही नही होती …हाँ , यही अच्छा होता कि विष्णुप्रिया आपकी पत्नी नही होती …..तो ये विष्णुप्रिया कम से कम अन्य नवद्वीप की आमनारियों की तरह आपके दर्शन तो कर सकती थी । सब गये हैं आपके पास ….पूरा नवद्वीप ही गया है किन्तु एक विष्णुप्रिया नही गयी ….उससे ये अधिकार छीन लिया गया ….”प्रिया ! वैराग्य का अपना नशा होता है”…..आपने ही उस दिन मुझ से कहा था । तो मैं क्या समझूँ कि आप पर वही नशा हावी है ……क्षमा कीजिएगा ….। मुझे आपसे कोई शिकायत नही है …दासी की क्या शिकायत ? दासी शिकायत कर भी नही सकती । किन्तु हाँ , दासी के मन में ये व्यथा तो रहेगी ही कि – उसे सेवा से वंचित किया गया । छोड़िये इन बातों को ….हाँ , मेरे पिता जी आए थे मुझे अपने घर ले जाने के लिये लेकिन मैंने मना कर दिया । मेरे पति जब शास्त्र मर्यादा का इतना पालन करते हैं तो मैं कैसे शास्त्र के विधि निषेध को त्याग दूँ । जब मैं पिता के घर से निकली थी तभी वो घर मेरे लिए पराया हो गया था ….मैं अब यहीं हूँ ….आपके यहाँ ..आपकी माता की सेवा में । हाँ , सब कुछ किया आपने किन्तु इस दासी को ये नही बताया कि – वो अन्न खाये या नही ? मुझे खाना नही है …किन्तु आपकी माता खाने के लिये जिद्द करती हैं …उस समय मैं क्या करूँ ? मुझे आज्ञा दीजिये । मेरे मन में आशा है कि आप अवश्य मुझे दर्शन देंगे । मैं पूछूँगी नही …कि देंगे या नही ? देंगे तो कब ? दासी के ये अधिकार क्षेत्र में नही आता ….स्वामी जब चाहे दर्शन दे …या ना भी दे । सन्यासी के नियम हैं ….जैसे स्त्री मुख नही देखना …..आप उसका अच्छे से पालन कर रहे हैं ….किन्तु सन्यासी की पत्नी के भी नियम तो होंगे ही ना ! मुझ अज्ञानी को वो भी बता दीजिए । आज ही मैंने अपने सारे गहने उतार कर फेंक दिए ….कंगन उतारने जा रही थी तो मन में आया इसके उतारने से कहीं आपका अनिष्ट तो नही होगा ? मैंने नही उतारा है ….उतारना है या नही बता देना । आपके वस्त्र हैं …पीताम्बरी रेशमी कुर्ते धोती उनका क्या करूँ ? क्या पता उसे भी मैं छू सकती हूँ या नही ….बात देना ।
आपकी बहुत वस्तुयें हैं …जैसे कण्ठहार …..कठूले ….अंगूठी …इनका क्या करूँ ?
हा हा हा हा……..आप भी कहेंगे ये पहले भी परेशान करती थी अभी भी कर रही है ….तो मैं किससे पूछूँ ये सब बातें ? कौन बतायेगा मुझे ? मैं तो स्वयं अज्ञानी हूँ ।
सुनिये , एक बात चाहती हूँ ….मैं समझ गयी सन्यासी स्त्री का त्याग करता है …और स्त्री यानी सिर्फ पत्नी ही होती है …माँ स्त्री नही है ….तो आप यहीं आकर रहिये ना ! मैं चली जाऊँगी गंगा के किनारे ….वहीं रहूँगी ….या मैं इस जीवन का ही परित्याग कर दूँगी ….आपके पास कभी नही आऊँगी …आपको कभी दुखी नही करूँगी …..आप आइये ना अपनी माता के साथ रहिये ना ।
मैंने आपको कभी दुःख दिया है क्या ? कभी मैंने आपको कुछ कहा है क्या ? आपके संकीर्तन में मैंने कभी बाधा पहुँचाई ? फिर क्यों ? क्यों ? क्यों त्याग कर चल दिये अपने इस घर को ? क्यों सन्यास लेना आपको अपरिहार्य हो गया ? क्यों क्यों क्यों ? ? ?
आपकी दासी - विष्णुप्रिया
कान्चना! क्या सब चले गये स्वामी के दर्शन करने ?
शचि देवि भी चली गयीं अपने पुत्र निमाई को देखने ….मूर्छित होकर पड़ी है विष्णुप्रिया , कुछ ही देर में जब मूर्च्छा खुली तब उसने अपनी सखी से पूछा । रोते हुए कान्चना ने कहा ….हाँ , सखी ! हाँ सब चले गये ।
उठ गयी प्रिया ……नयनों के काजल से एक पत्र लिख दिया कुछ ही देर में …..और अपनी सखी को देती हुयी बोली – कान्चना! तू जा …और जाकर मेरे स्वामी को ये पत्र दे आ ।
कान्चना अकेले कैसे छोड़ दे विष्णुप्रिया को …..किन्तु प्रिया की जिद्द …..कान्चना को वो पत्र लेकर जाना पड़ा ।
ओह ! भारी भीड़ है आचार्य अद्वैत के मकान में …पूरा नवद्वीप ही उमड़ पड़ा था ….शचि माता को आदर देकर गौरांग ने आसन में बिठाया था ….कान्चना गयी ….पहले तो उसे प्रवेश ही नही मिला ….क्यों की भीड़ इतनी थी …हाँ …चन्द्रशेखर आचार्य की पत्नी ने कान्चना को देख लिया तो उसे आगे बुला लिया था ।
भिक्षा लेंगे अब गौरांग ….शचि माता को भी परोसा गया ….शचि माता ने नही ग्रहण किया ….गौरांग बहुत जिद्द करते रहे …पर शचि देवि ने इतना ही कहा …निमाई ! तू जिद्दी है तो मैं तेरी माँ हूँ …निमाई ने प्रसाद की बात कही …तो शचिदेवि ने प्रसाद भाव से कण ही लेकर माथे से लगा अपने मुख में डाल लिया था । गौरांग ने भी ऐसा ही किया । हस्तप्रक्षालन के लिए बाहर गये गौरांग ….जल पात्र लेकर स्वयं अद्वैत आचार्य उपस्थित हैं ….उन्होंने जल डाला ….यही अवसर ठीक है ….यही ….कान्चना दौड़ी गौरांग के पास ….उनके पास किसी को जाने नही दिया जा रहा ….लोग जाना चाहते हैं …किन्तु भीड़ हो जाएगी …इसलिए लोगों को रोका जा रहा है ।
“ये पत्र” …..कान्चना वहाँ तक पहुँच गयी ….गौरांग ने दृष्टि उठाई ….कान्चना को देखा …नेत्र चमक गये ….कान्चना ! नाम भी पुकारा गौरांग ने । कान्चना ने फिर पत्र आगे किया ….नेत्रों से ही संकेत में प्रश्न किये ….ये क्या है ? ये पत्र है ….धीरे से बोली । किसने लिखा है ….ये स्पष्ट पूछा । विष्णुप्रिया ने ….कान्चना ने भी स्पष्ट उत्तर दिया । गौरांग के नेत्र सजल हो गये ….तुरन्त पत्र को खोला ….और एक ही साँस में पूरा पत्र पढ़ गये । पत्र पढ़ते हुए इनकी आँखें डबडबा गयीं थीं …..ये कान्चना ने देखा था ।
क्या कहा मेरे स्वामी ने ?
कान्चना गौरांग को पत्र पढ़ाकर वापस अपनी सखी के पास पहुँच गयी थी ।
प्रिया ने अपूर्व उत्सुकतावश पूछा था – क्या कहा मेरे स्वामी ने ?
उनके नेत्र बह चले थे पत्र पढ़कर …..कान्चना ने कहा ।
विष्णुप्रिया शून्य में तांकती रही …..फिर वापस वही क्रन्दन ।
मैं ही दुष्टा हूँ सखी ! मैं ही ….इसलिए मेरे स्वामी ने सन्यास लिया है …मुझे छोड़ा अपने घर को छोड़ा …..क्या आवश्यकता थी मुझे उन्हें शिकायत करके पत्र लिखने की …हाय ! मैं मूर्खा ! उन्हें और दुःख दिया मैंने …..ये मैंने क्या किया ? मैंने उन्हें आँसु दिये ? हाँ , मैंने उन्हें आँसु ही तो दिये हैं ….सिर्फ आँसु …..और अब सन्यास लेने के बाद भी मैं उन्हें दुखी करना नही छोड़ रही ।
विष्णुप्रिया धरती पर गिर गयी ……और उसका वो रुदन , क्रन्दन ….उफ़ !
सखी प्रिया ! इस तरह तुम व्यथित मत हो …..मत करो शोक ….मत रोओ ….तुम सच में अपने पति से प्रेम करती हो तो ……हाँ ! बता कान्चना! बता ….मैं क्या करूँ ? प्रिया ! तुम प्रसन्न रहो ….तुम हंसो …..इससे वो प्रसन्न होंगे !
कान्चना की बात सुनकर विष्णुप्रिया एकाएक हंसने लगी …..मैं प्रसन्न हूँ ….मेरे स्वामी मेरे प्रसन्न रहने से प्रसन्न होंगे ? तो मैं प्रसन्न हूँ …..देखो ! सब देखो …विष्णुप्रिया प्रसन्न है …प्रसन्न है ।
ये कहते हुए विष्णुप्रिया हंस रही थी …..पर नेत्रों से अश्रु रुक नही रहे ….वो बाहरी हंसी ….ओह ! पत्थर भी पिघल रहे थे….पंछी भी रो रहे थे ….विष्णुप्रिया का ये उन्माद देखकर ।
शेष कल –


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