उद्धव गोपी संवाद:
६५ एवं ६६
धन्न धन्न ए लोग,भजत जो हरि कों ऐसें।
और कोहू बिन रस हि,प्रेम पावत कहौ कैसे।।
मेरे वा लघु ज्ञान कौ,रह्रौ जु मद ह्वै व्याधि।
अब जान्यों ब्रज-प्रेम कौ,लहति न आधों -आधि।।
– वृथा श्रम करि मरयौ-
भावार्थ:
ऊधौ जी कह रहे हैं कि ये लोग धन्य धन्य हैं जो अपने हरि को इस प्रकार से भजते हैं अर्थात एक कृष्ण को ही मानते और भजते हैं। और कोई तो बिना प्रेम रस के इन्हें प्राप्त कर ही नहीं सकता।
मेरे सूक्ष्म ज्ञान का जो घमंड मेरे मन में भरा हुआ था वो आज ब्रज के प्रेम,इन गोपियों के प्रेम को देखकर दूर हो गया। मैं तो जीवन भर बेकार में ही ज्ञान की पोटली लेकर घूमता रहा।
पुनि कहै परसि जु पांइ,प्रथम जो इन्हें निवारयौ।
भृंग संग्या करि रहत,निंद सबहिंन तें डारयौ।।
अब ह्वै रहों ब्रज भूमि के,मारग में की धूरि।
विचरत पग मों पै परें,सब सुख जीवन मूरि।।
-मुनिन दुर्लभ अहै –
भावार्थ:
ऊधौ जी कह रहे हैं कि फिर फिर मैं इन ब्रज गोपियां के पांव परूं और अपने प्रेम को इन पर वारूं।
और भजन संध्या कर इन गोपिन के गुणों का व्याख्यान करता रहूं। मैं अब ब्रज भूमि में,ब्रज के मारग में धूर बनके पड़ा रहूं, ताकि वहां ब्रजरज में विचरण करते हुए लोगों के पांव मेरे ऊपर पड़ें,यही मेरे सुखी जीवन का मूल (उद्देश्य)बन जाये,जोकि बड़े बड़े मुनियों को भी दुर्लभ है।
शेष कल 🙏🙏🙏🙏🙏🙏


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