!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( त्रिचत्वारिंशत् अध्याय : )
गतांक से आगे –
कान्चना! देख ….मेरी सासु माँ आईं हैं ………
विष्णुप्रिया के ऐसा कहने पर कान्चना द्वार पर गयी किन्तु शचि देवि नही आईं थीं ।
आज तीन दिन दो गये माँ अभी तक नही आईं ……विष्णुप्रिया उठ कर बैठ गयी है ….किन्तु सासु माँ के आने की इतनी प्रतीक्षा क्यों ? कान्चना जानना चाहती है ….कि प्रिया के मन में इस समय क्या चल रहा है ।
देख कान्चना! मेरी सासु माँ मुझे बहुत स्नेह करती हैं ….उन्हें अपने पुत्र से भी ज़्यादा मुझ से स्नेह है …..इसलिये वो एक बार भी हो स्वामी को यहाँ तक ले आयेंगी । मुझे एक बार दिखाने के लिये …मेरी प्रसन्नता के लिये । हाँ , मेरे स्वामी नही मांगेंगे ….वो जिद्दी हैं ….पर मेरी सासु माँ उनके कान भी पकड़ कर ले आयेगी ……ये कहते हुए विष्णुप्रिया के मुखमण्डल में कुछ आशा की किरणें दिखाई दी थीं । अरे धर्म , शास्त्र , विधि , निषेध ….माता की आज्ञा के आगे कुछ मायने नही रखते ….माता कह देगी …चल एक बार मेरे द्वार पर चलकर मेरी बहु को अपना मुख दिखा दे …फिर जहां जाना हो जाना । कान्चना मौन हो कर सब सुन रही है ….उसको प्रिया की बातें सुनकर रोना आरहा है …खूब रोना आरहा है ….पर उसने अपने आपको रोक लिया है ….उस रुदन को रोके हुये है कान्चना …..क्यों की इसके नेत्र से एक बुंद भी गिरा तो जल प्रलय आने वाला है अब ।
पता है …एक दिन की बात ….मेरे स्वामी बिना भोजन किए चले गये दो दिन तक श्रीवास पण्डित जी के यहाँ ही रहे थे …..मैंने जल भी नही ग्रहण किया था , उनके बिना खाये मैं कहाँ कुछ खाती ।
मेरी सासु माँ परेशान रही ….बहुत परेशान ..उसने पता करवाया कि मेरे स्वामी कहाँ हैं …श्रीवास पण्डित जी के यहाँ …माँ जाकर मेरे स्वामी को पकड़ ले आई और बहुत डाँटा ….मुझे दिखाकर कहा ….इसने दो दिन से जल भी नही पीया है ….दुःख देता है मेरी बहु को ! विष्णुप्रिया कहती है – स्वामी को बहुत डाँट पड़ी थी । आज भी देखना सखी ! मेरी सासु माँ जैसे भी हो लेकर आयेंगी मेरे स्वामी को ….तभी तो तीन दिन लग गये …..नही तो पहले दिन ही आजातीं ना ।
नही ,ऐसा कुछ नही होने वाला प्रिया ! अब रहा नही गया कान्चना से वो बोल उठी थी ।
तुम को वहाँ की बात तो मैंने बताई नही …वहाँ क्या क्या हो गया ….और तुम अभी भी आस लगाये बैठी हो ! सत्य का सामना करो विष्णुप्रिया ! सत्य ये है कि इस समय कोई तुम्हारे साथ नही है …न तुम्हारा स्वामी जो सन्यास ले चुका न तुम्हारी सासु माँ ! रो गयी हिलकियों से कान्चना…..बैठ कर रोई ….क्रन्दन था उसका ।
क्या हुआ कान्चना! तू ऐसे क्यों रो रही है …..तू कोई बात छुपा रही है मुझ से ? बता तू तो वहाँ गयी थी ….वहाँ की बातें भी सुनीं होंगी ना ! क्या बात है ।
मेरी सखी प्रिया ! गले लगकर कान्चना रो रही है ।
कुछ बता , क्या वहाँ कोई बात हुई है ? मुझ से कुछ मत छुपा …तुझे मेरी सौगन्ध है ।
कान्चना का हाथ अपने सिर में रख लिया था विष्णुप्रिया ने ।
नही , नही बता पाऊँगी वो बात । तुझे मेरी सौगन्ध है ….तुझे बताना होगा । बता सखी ! बता ….अब क्या डर …सब कुछ तो मेरा छिन चुका है …मेरे स्वामी ने ही मुझे त्याग दिया है …अब क्या होगा ? तू बता । विष्णुप्रिया की जिद्द के कारण कान्चना को बताना पड़ा ।
धर्म , धर्म , धर्म ….
कभी सोचती हूँ सखी ! क्या धर्म को नारी की आवश्यकता नही है ? नारी के बिना धर्म अपने आप को बढ़ा लेगा ? कभी कभी तो मेरे मन में आता है …अगर धर्म में नारी बाधक है तो विधि ने नारी सृजी ही क्यों ? क्या दुःख देने के लिये …सिर्फ उसके भाग्य में दुःख ही लिखकर धकेल दिया इस जगत में …क्यों ? क्यों ? हम नारियों की गलती क्या थी ? कान्चना चीखती है ….फिर कुछ देर मौन रहने के बाद बोलना शुरू करती है –
बहुत भीड़ थी प्रिया! वहाँ ….माता शचि बैठी हुई थीं ….सबकी दृष्टि गौरांग देव पर थी कि वो अब क्या कहेंगे ….मैं भी सुनने के लिए रुक गयी ।
प्रभु ! सब दुखी हैं …..पूरा नवद्वीप रुदन कर रहा है ….आप नवद्वीप में ही रहिये यहीं रहकर सन्यास धर्म का पालन कीजिये …..हम सब की यही प्रार्थना है …आचार्य अद्वैत ने कहा था ।
तब गौरांग देव ने अपनी माता को देखा और देखकर उनके चरणों में बैठ गये ….मेरी माता जो कहेगी मैं वही मानूँगा ! गौरांग देव ने स्पष्ट कहा था । फिर ? फिर क्या कहा माता ने ?
विष्णुप्रिया पूछ रही है । गौरांग तो सबके सामने बोले थे …मेरी माता अगर मुझे आज्ञा दे कि तू छोड़ सन्यास और चल मेरे साथ घर तो मैं ये भी करने के लिए तैयार हूँ । कान्चना! फिर सासु माँ ने क्या कहा ? प्रिया को बात जल्दी सुननी है । क्या कहेंगीं माँ भी …..धर्म , शास्त्र ये सब बीच में आगये …..कान्चना ने ये कहते हुए रोष व्यक्त किया था । हाँ , सारे धर्म पुरुषों के लिए ही तो हैं …नारी के लिए तो बस एक धर्म – पति , पति , सिर्फ पति ।
डर गयी वो बेचारी माता ….अपने पुत्र के अनिष्ट की आशंका से ….ये धर्म भ्रष्ट हो गया और इनका अमंगल हो गया तो ? सन्यास धर्म ले चुका है पुत्र ….उससे हटना या उसे हटाना दोनों धर्म विरुद्ध है …..ओह ! शचि माता कह देतीं ‘चल’………..
हाँ , मैं नही कह पाई काँचना ! मैं नही कह पाई …..द्वार पर शचि देवि खड़ी हैं और उन्होंने सब सुन लिया है …प्रिया दौड़कर हृदय से चिपक गयी अपनी सासु माँ के , और रोने लगी । शचि देवि का क्रन्दन ……कान्चना का हृदय अपनी सखी प्रिया को देखकर फटा जा रहा है ।
कान्चना! तू बता मैं क्या कहती …..निमाई को कहती कि तू चल और रह घर में ….नवद्वीप के लोग क्या कहते उसे …क्या उसकी निन्दा नही होती ? इस लोक में निन्दा और परलोक में नर्क !
अपने धर्म का त्याग करने से हानि ही होती है ….धर्म शास्त्र यही कहते हैं ।
शचि देवि के मुख से ये सुनकर अट्टहास करके हंसी कान्चना ….धर्म , धर्म , और धर्म शास्त्र ! इस बेचारी विष्णुप्रिया के लिए उनका कोई धर्म नही है ? वाह ! इस बेचारी ने बारह दिनों से जल का एक बुंद अपने मुख में नही डाला है ….इसके लिए धर्म शास्त्र कुछ नही कहते …क्यों ? क्यों दिन रात रो रही है ये बेचारी ? किन्तु इसको त्यागने का विधान है धर्म में ….वाह ! तालियाँ बजाती है कान्चना ….अट्टहास करती है ….वाह रे सन्यास धर्म ! वाह रे वैराग्य ! सब धर्म के विषय में सोचो पर इसके विषय में कोई नही सोच रहा ….ये बेचारी मर जाये तो ? फिर हंसती है कान्चना ….स्वर्ग मिलेगा इसे । कान्चना आज मुखर है ….ये इसके हृदय की पीड़ा है ।
विष्णुप्रिया आगे आई ….अपनी सखी कान्चना का हाथ पकड़ा और बड़े स्नेह से बोली …..कान्चना! ये सारी बातें मेरे स्वामी को प्रिय नही हैं ….तू मत बोल । अभागी मैं ही हूँ तो इसमें धर्म और शास्त्रों का दोष ? किसी का कोई दोष नही है …दोष है तो मेरा …इस विष्णुप्रिया का ….मेरी सखी ! मेरे साथ मेरी सासु माँ हैं …तेरे जैसी सखी है …और मेरे स्वामी हैं जो मेरे हृदय में विराजे हैं ….उनमें इतनी हिम्मत नही हैं कि मेरे हृदय से निकल कर वो सन्यास ले सकें ।
इतना कहते हुए फिर विष्णुप्रिया फफक फफक रो पड़ी थी ।
हाय !
शेष कल –


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