उद्धव गोपी संवाद
( भ्रमर गीत)
७१ एवं ७२
करूनामई रसिकता है,तुम्हरी सब झूंठी।
तब हीं लों कहौ लाख,जभी लौं बंध रही मूठी।।
मैं जान्यौ ब्रज जाइकें,निरदै तुम्हारौ रूप।
जो तुम्ह कों अवलंब ही,तिन्ह को मेलौ कूप।।
– कौन यह धरम है?-
भावार्थ:
ऊधौ जी अब भगवान से कह रहे हैं कि तुम्हारी करूणा तुम्हारी दया,उन गोपियों के प्रति यह सब झूठ है। मुठ्ठी जब तक ही लाख की है जब तक वो ना खुले।हे श्रीकृष्ण,ब्रज जाकर के मैंने तुम्हारा निर्दयी रूप देखा है कि इस प्रकार तुम उन भोली भाली गोपियों को छोड़कर यहां आ बसे हो। वे गोपियां जो तुम्हें अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती हैं, जिन्होंने सिर्फ एक तुम्हारा ही आश्रय लिया, उन्हीं को तुम विरह रूपी कुंए में धकेल कर यहां आकर बस गए हो, क्या यही तुम्हारा धर्म है।
पुनि पुनि कहै अहो स्याम,चलौ वृंदावन रहिए।
परम प्रेम कौ पुंज जहां,गोपिन्ह संग लहिए।।
और संग सब छांड कें,उन्हं लोंगन्ह सुख देहु।
नातरू टूटयौ जात है,अब ही नेह सनेहु।।
– करौगे फिरि कहा?-
भावार्थ:
ऊधौ जी,बार बार श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि श्याम,चलो वृंदावन में चलकर वहीं रहते हैं और परम प्रेम को रसास्वाद, जहां गोपियां रहती हैं, उन्हीं से लेते हैं। अब आप और सभी का संग छोड़कर उन गोपियों को,उन ब्रजवासियों को सुख प्रदान करो, नहीं तो ये सब गोपियां आपके वियोग में अपने प्राणों को त्याग देंगी,तो फिर क्या करोगे।
अंतिम भाग कल 🙏🙏🙏🙏🙏


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