!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!
( पंचचत्वारिंशत् अध्याय: )
गतांक से आगे –
आचार्य चन्द्रशेखर आज शचि देवि के यहाँ आये हैं …..वो जगन्नाथ पुरी गये थे ….वैसे प्रत्येक वर्ष ये जाते ही हैं पुरी ….लालच ये कि श्रीजगन्नाथ भगवान के साथ साथ गौरांग देव के भी दर्शन हो जायेंगे …ये प्रत्येक वर्ष जाकर वहाँ से कुछ न कुछ प्रसाद शचि देवि के लिए लेकर ही आते ……गौरांग देव अपनी माता के लिए भेजते प्रसाद …..वैसे पुरी के राजा रथयात्रा के समय गौरांग देव को सुन्दर क़ीमती वस्त्र ओढ़ा देते थे ….वही वस्त्र गौरांग बाद में अपनी माता को भेज देते ……शचि देवि उन सुन्दर वस्त्रों को अपनी बहु विष्णुप्रिया को जब देतीं …तब प्रिया उन वस्त्रों को माथे से लगाती और वापस अपनी माता को ही लौटा देती । बहु ! तू इसे धारण कर ….शचिदेवि कहतीं ….तो विष्णुप्रिया का उत्तर होता ….नाथ ने आपके लिए भेजा है …वो मना करतीं तो विष्णुप्रिया आचार्य महाशय से ही पूछतीं …..मैं सच कह रही हूँ ना ? वो मौन हो जाते ।
ये खाजा है …भगवान जगन्नाथ जी का प्रसाद……ये भी “मेरी माँ को देना” कहकर गौरांग देव ने भेजा है …..आचार्य उसे भी देते हैं …शचि देवि प्रिया को देती हैं तो प्रिया भी उस खाजा प्रसाद को अपने सिर से लगातीं.. …फिर अपनी माता को ही दे देतीं ।
कौन कहता है प्रेम में मर्यादा नही होती ….प्रेम की अपनी मर्यादा होती है …जिसे प्रेमी ही समझते हैं …..”जिस दिन मेरे नाथ मेरे लिए प्रसाद भेजेंगे ये दासी उसी दिन स्वीकार करेगी” ये प्रेम की मर्यादा है …..इसे आप लोग भले ही कहें कि अहंकार है ये तो …किन्तु अहंकार नही , ये तो उस प्रेम की अपनी ठसक है ….ये सब नही समझते ।
बेटी ! इधर आ ….आज आचार्य चन्द्रशेखर ने विष्णुप्रिया को ही बुलाया …..वो संकोचशीला आगे आई और दृष्टि नीचे करके बैठ गयी ।
बेटी ! गौरांग देव ने आज तेरे लिए भेजा है …..आचार्य अपने झोले से कुछ निकाल रहे हैं ।
मेरे लिए ?
विष्णुप्रिया प्रश्नवाचक दृष्टि से आचार्य की ओर देखती है …ये असम्भव है …मानों ये कहना चाहती है । नही , वो भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं …..ये वाक्य इस बेचारी को अपार सुख दे गया था ….विष्णुप्रिया के नेत्रों से सुख के अश्रु झरने लगे थे । वो जानना चाहती है …क्या कहा मेरे विषय में नाथ ने ? क्या मेरी चर्चा छिड़ी उनके सामने ? मेरा नाम उठा उनकी मण्डली में ? किस तरह से स्मरण किया गया इस अभागिनी का ? ओह ! कितने प्रश्न इसके हृदय में उमड़ घुमड़ रहे थे । मैं बताता हूँ ….झोले की वस्तु अभी बाहर नही निकाली …आचार्य ने जगन्नाथ पुरी की घटना पहले बतानी शुरू की ….एक एक शब्द विष्णुप्रिया सुन रही है ……
पुरी के राजा हैं ‘प्रताप रुद्र’ ….ये गौरांग देव के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं …इनमें वैराग्य भरा हुआ है ये बात राजा जानते हैं ….ये कुछ स्वीकार करते नहीं हैं किसी का …और राजा का तो बिल्कुल नही । इसलिये राजा को कुछ भेंट में वस्त्रादि देने होते हैं तो रथ यात्रा के समय ये देते हैं क्यों कि गौरांग देव भगवान जगन्नाथ की प्रसादी को इंकार नही कर सकते थे ।
हे विष्णुप्रिया ! प्रत्येक वर्ष राजा कुछ न कुछ रथयात्रा के समय ही वस्त्र आदि दे देता था …प्रसाद कहकर उनके अंग में ओढ़ा देता था …भाव में डूबे होते उस समय गौरांग देव तो उन्हें कुछ भान भी न होता और भान भी हो तो प्रसाद है ….प्रसाद को भक्त तो मना करेगा नही ।
आचार्य चन्द्रशेखर विष्णुप्रिया को बता रहे हैं ……इस बार राजा ने क़ीमती साड़ी और कुछ आभूषण गौरांग देव के ऊपर डाल दिये ….राजा को पता चला था कि इनकी पत्नी भी हैं ….माँ को ये भेजते रहते हैं किन्तु इस बार जगन्नाथ जी का प्रसाद इनकी पत्नी को भी मिले …इस भावना से राजा ने गौरांग देव को दिया था ….आभूषण भी थे और एक साड़ी भी थी ।
विष्णुप्रिया ध्यान से सुन रही है ….शचिदेवि भी सुन रही हैं ।
मैं रथयात्रा दर्शन के पश्चात गौरांग देव के दर्शन को गया तो वहाँ श्रीवास पण्डित जी भी बैठे थे …भक्त मण्डली चारों ओर बैठी थी मध्य में गौरांग देव ।
नवद्वीप के विषय में कुछ न कुछ सुनना चाहते हैं गौरांग ….नवद्वीप के लोगों से मिलते हैं तो पूछते हैं ….अपनी माता के विषय में पूछते हैं …..गंगा घाट के विषय में पूछते हैं …फिर कुछ स्मरण कर सजल नेत्र हो जाते हैं उनके ।
श्रीवास पण्डित जी बैठे हैं तब मैं भी वहाँ पहुँच गया …..नवद्वीप के बहुत लोग थे वहाँ आज …दामोदर पण्डित जी भी थे ……
मेरी माता कैसी हैं ? दामोदर पण्डित जी से पूछा था ।
दामोदर पण्डित जी इतना ही बोले ….आपके बिना कैसी होंगी ?
गौरांग देव इस पर कुछ नही बोले ।
श्रीवास पण्डित जी उसी समय बोल दिये …अपार दुःख सागर में डूबी तो बेचारी विष्णुप्रिया है ।
ये सुनते ही गौरांग देव ने अपना मस्तक नीचे कर लिया ….भक्त जनों को लगा था कि अब श्रीवास पण्डित जी को गौरांग देव चुप कराकर भेज देंगे….किन्तु आज ऐसा नही हुआ ….तो श्रीवास जी को भी अवसर मिल गया ।
विष्णुप्रिया आचार्य की बातें ध्यान से सुन रही है …..उसके नेत्र बन्द हैं …….
हे गौरांग ! तपस्या तो विष्णुप्रिया की है ….वो पर्यंक में नही सोती …वो धरती में सोती है …उससे कहो कि पर्यंक में सो …तो उसका उत्तर होता है …मेरे स्वामी धरती में सोते हैं तो मैं पर्यंक में कैसे सो सकती हूँ । वो आहार ग्रहण नही करती ….जल भी तब पीती है जब उसकी सासु माँ उससे कहती है कि बेटी ! तू मर गयी तो निमाई को अच्छा नही लगेगा …आपको अच्छा नही लगेगा इसलिए वो ज़िन्दा है ….वो महान तपस्विनी है …गंगा स्नान के लिए भी जाती है …तो कोई उसका मुख नही देख सकता ….वो घर में आती है …बिना खाये पीये वो सहस्त्र माला जाप करती है …और वो सिर्फ इसलिए करती है कि आपको नाम जाप करना अच्छा लगता है …जो नाम जापक है उसे आप प्रेम करते हो …आप उससे प्रेम करो इसलिये वो नाम जाप करती है । फिर आपकी बूढ़ी माता की सेवा ….भोजन बनाना …केवल भोग लगाकर आपकी माता को खिलाने के लिए ।
माता जिद्द करती है ….तो जीवन निर्वाह के लिए एक ग्रास मुँह में डाल लेती है । एक ही साड़ी है …उसे भी गैरिक रंग में रंग लिया है ….वही पहनती है ….केश जटा बन गये हैं ….पर उन शून्य नयनों में बस आपके दर्शन की आस है …..अभी भी आस है ।
श्रीवास बोल रहे थे ….तब गौरांग देव के नेत्रों से अश्रु गिरने लगे …..आचार्य ने कहा ।
तुरन्त अश्रुओं को पोंछ लिया उन्होंने ….संकोच हुआ उन्हें कि एक सन्यासी अपनी पत्नी को स्मरण करके रो रहा है ! इस दृष्य को देखकर सब भक्त रोने लगे थे …..हे गौरांग देव ! सन्यास धर्म भी कहता है सन्यासी को एक बार अपनी जन्म भूमि देखने के लिए जाना चाहिए ।
सजल नेत्रों से श्रीवास और मुझ को गौरांग ने देखा …..फिर कुछ देर रुक कर बोले …ये प्रसाद है …ये साड़ी प्रसाद …और ये आभूषण श्रीजगन्नाथ प्रभु की प्रसादी । गौरांग देव ने तुरन्त मुझे दिया । तब मैंने उनसे पूछा ….ये किसके लिए है ? मैंने स्पष्ट पूछा था । वो बोल न सके …कुछ क्षण के लिए मौन से हो गये …मैंने ही नही वहाँ उपस्थित समस्त भक्त जनों ने अनुभव किया था …कि उनके भीतर अपार करुणा भर गयी थी …वो रोते तो शायद सागर में जल और भर जाता ।
विष्णुप्रिया । गौरांग देव नेत्र बन्द करके बोले । आचार्य चन्द्रशेखर ने कहा ।
हे आचार्य जी ! अपराधिन तो मैं हूँ ….जो दोष देती रही अपने नाथ को – वो निष्ठुर हैं वो निष्ठुर हैं …..कितना कहा मैंने उन्हें ….पर नही …वो तो मुझ से बहुत प्रेम करते हैं ….बहुत प्रेम ….सुख के अश्रु बह चले थे विष्णुप्रिया के …..नाथ की कोई गलती नही है ….भाग्य मेरे ही खराब थे । विष्णु प्रिया रो रही है ।
“ये साड़ी भेजी है” …..आचार्य ने साड़ी दिए …..साड़ी को लेकर अपने माथे से लगाया विष्णुप्रिया ने ….ये आभूषण भी हैं ….उन्हें भी अपने सिर में रखा और गयी पूजा घर में वहाँ जाकर साड़ी और आभूषण रख दिये ….और प्रणाम करके बैठ गयी ।
विष्णुप्रिया ! एक और सुखद समाचार है ….आचार्य ने कहा ।
गौरांग देव बोले हैं ….”मैं नवद्वीप आने वाला हूँ” …ये सुनकर विष्णुप्रिया प्रसन्न तो हुई किन्तु …….
मैं तो उनकी पत्नी हूँ मेरा मुख क्या वे देखेंगे ? ओह ! इसका उत्तर नही था आचार्य के पास ।
विष्णुप्रिया ध्यान में बैठ गयी है ……उसके नयन बन्द हैं , नयनों के कोर से अश्रु गिर रहे हैं …………
शेष कल –


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