!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 11 – “अब दिव्य गोपुर का वर्णन” )
गतांक से आगे –
यत्र शिखिरमणिशकलकलितललितोन्नतशिखर शेखर सहस्रसुन्दरं रुचिरारुणरुचितुन्दिलकुरुविंदमणिमयमेकमेव रागानुगमनं नाम रागामरमहीरुहांकुरुमिव गोपुरम् ।।
अर्थ – उस परकोटा में जो गोपुर का द्वार है …वह बहुत विशाल है । उस द्वार का नाम रखा गया है रागानुगमन । जिसमें मणि माणिक्य हैं वह अनार के दाने जैसे लाल हैं …उस के ही खन्डों से निर्मित ललित उन्नत शिखरों का समूह हजारों की संख्या में विद्यमान है । उसमें माणिक्य अनेक लगे हैं …और कुरकुंद नामके मणि विशेष से वह गोपुर युक्त है । राग से अमर बने वृक्ष के समान वह है …वस्तुतः उस नगर में प्रवेश वही कर सकता है जो राग का अनुगम करे ।
हे रसिकों ! ऐसा रस आज तक मिला नही होगा । काव्य बहुतलिखे गये प्रेम पर …किन्तु इस “प्रेम पत्तनम्” की बराबरी किसी से नही हो सकती । ये विलक्षण है ।
“अद्भुत” नामके कारीगर ने प्रेम नगर में अपनी कारीगरी दिखाना आरम्भ कर दिया था ….सर्वप्रथम उसने परकोटा बनाया …ताकि बाहरी शत्रु ( माया जनित अहंकार ) का उसमें आक्रमण ना हो परकोटा में ही उसने वेद शास्त्र आदि को रखा ….अब उसे गोपुर का निर्माण करना था ….जो मुख्य है ….उसमें ऊपर शिखर होते हैं ….अद्भुत कारीगरी होती है जो इसने की । उसका द्वार बनाया । वो द्वार और सुन्दर था …उस द्वार का नाम रखा …”रागानुगा” । “इस द्वार का नाम याद रहे । क्यों की इसी से प्रवेश है इस नगर में” ।
गोपुर में हजारों शिखर हैं …जो लाल वर्ण के हैं ।
आइये “प्रेम नगर” के इस मुख्य द्वार का कुछ चिन्तन किया जाये । ताकि हम भी कमर कस लें ।
गोपुर उसे कहते हैं …जो मन्दिर के बाहर स्थित होता है और बहुत विशाल होता है …उसके भीतर मंदिर होता है । वास्तव में गोपुर को देखना है तो दक्षिण भारत के मन्दिरों में देखें ….जिसमें कई शिखर होते हैं ..भव्य होता है …कारीगर ने अपनी सारी कला उसमें उढ़ेल दी होती है ।
दरवाज़ा ।
कैसे प्रवेश मिलेगा उस प्रेम नगर में ?
दरवाज़े से ।
अच्छा ! प्रेम नगर के दरवाज़े का नाम ? रागानुगा ।
जय हो !
ज्ञान कहता है …राग छोड़ो …जब तक राग है तब तक बंधन है । और जब तक बंधन है तब तक मुक्ति नही है । किन्तु ये मार्ग तो प्रेम का है …और बिना राग के ….राग का सरल भाषा में अर्थ होता है….किसी से चिपकना …अपना मन अपने प्रेमी में चिपका है …उसे छोड़ नही पा रहे तो उसे “राग” कहते हैं । प्रेम में राग आवश्यक है ….अजी ! अति आवश्यक है । राग नही होगा तो प्रेम कहाँ होगा ? कैसे होगा ? तुम्हारा राग ही तो प्रेमी से तुम्हें बाँधता है ।
हमारे रसिक सन्तों ने भक्ति की दो विधि बताई है …एक वैधी भक्ति और एक रागानुगा भक्ति । वैधी भक्ति …विधान से चलने वाली …..शास्त्र अनुसार ….और दूसरी भक्ति है रागानुगा भक्ति …..यानि कोई विधान नही । क्या तुम अपने प्रेमी से प्रेम करते हो तो क्या विधान से करते हो …उसको याद करते हो …तो क्या समय को देखते हो ? या याद आती ही है ? रागानुगा में तुम्हारा हृदय ही तुम्हें बार बार अपने प्रीतम की ओर खींचेगा …तब तुम कहाँ विधान में पड़ोगे ।
तुलसी ऐसी प्रीति कर , जैसे चंद चकोर ।
चोंच झुकी गरदन लगी , चितवन वाही ओर ।।
सारी रात प्रीतम की याद में तड़फ उठे ….तो क्या करें ? नही रात तो सोने के लिए है …भजन तो सुबह करना चाहिए ….शास्त्र कहते हैं ….अजी ! प्रीतम से हमारा राग हो गया है …अब उसकी याद हम करते नही है , “आती है”……हम क्या करें ?
अब सुनो , उस चकोरी का राग …उसका राग चन्द्रमा से लग गया है ….अब बेचारी क्या करे ? चन्द्रमा कहाँ है ? आकाश में …आकाश में देखकर वो बेचारी परेशान है ….पर किसी ने उसे कह दिया …अरे ! तुम्हारा प्रेमी चन्द्रमा तो भगवान शंकर के मस्तक में है ….बस ..उसी दिन से उसने सब कुछ छोड़ दिया और अंगार चबाने लगी , अंगार खाती है चकोरी । अरे ! पागल है क्या …अंगार क्यों खाती है ….सुनिए उस पगली चकोरी की ने क्या कहा ….
प्रिय सौं मिलौं भभूति बनि , ससि शेखर के गात ।
यहै बिचारि अंगार को , चाहि चकोर चबात ।।
ओह ! मेरे प्रिय शशि , भगवान शशि शेखर के मस्तक में हैं …और मैंने देख लिया वो अपने भाल में भस्म लगाकर रखते हैं …मैं अंगार इसलिए खाती हूँ कि अंगार खाकर मैं भस्म हो जाऊँ ..भस्म बन जाऊँ ….फिर भगवान शशि शेखर मुझे अपने भाल में लगा लें …..तो मैं अपने प्रेमी चन्द्रमा से मिल सकती हूँ । ओह ! ये राग है ।
इस प्रेम नगर में प्रवेश करने के लिए इस राग की आवश्यकता है ….ऐसा राग नही है …तो आपको इस दिव्य प्रेम नगर में प्रवेश ही नही मिलेगा । इसलिए तो बड़ा सोच समझ कर इस गोपुर के दरवाज़े का नाम “रागानुगा” रखा है ।
अजी ! थोड़ा मोर को भी देख लो ….उसका राग घनश्याम के प्रति अनुपम है । ऐसा राग है …तो इस राग के आगे बड़ा बड़ा विराग भी तुच्छ है । ओह क्या रागी है ये मोर ! ऐसे ही इसकी पाँख घनश्याम अपने सिर में धारण नही करते जी ।
मोर सदा पिउ पिउ करत , नाचत लखि घनश्याम ।
यासौं ताकी पाँखहूँ , सिर धारी घनश्याम ।।
जय हो ..इस मोर की …..इतना भजन तो कौन बैरागी भी नही करता होगा ..जितना ये रागी मोर करता है …दिन रात “पिउ पिउ” कहकर पुकारता रहता है …कितना भजन है इसका देखो ! और भजन ही नही है ..ध्यान भी उसी की ओर है …श्याम घन को देखकर उसी में त्राटक लगा जाता है ….और इतना ही कहाँ …..नाचता भी है …..किन्तु इस परम रागी को अपने प्रियतम मेघ श्याम से पुरस्कार क्या मिलता है …वज्रपात …किन्तु ये क्या छोड़ देता है अपने प्रेमी को …ना जी ये और नाचता है ….इसका प्रेमी इस पर बिजली गिराता है …पर ये मोर ! अपनी धुन नही छोड़ता …अब ऐसे ही तो घनश्याम ने इसे अपने सिर में धारण नही किया ! ये परम रागी है ।
चलिये एक चमत्कार सुनिए “राग” का । मैंने स्वयं देखा है ….मोर शिखा नामक एक बूटी होती है …उसमें जड़ नही होती ..पर वर्षा के आते ही वो पनप उठती है …ये चमत्कार क्या है ? ये प्रगाढ़ राग का चमत्कार है …..एक जड़ बूटी का ये हाल है ..तो फिर चैतन्य मोर की क्या बात होगी ।
ओह ! तो प्रेम नगर के गोपुर का जो दरवाज़ा है उसका नाम है “रागानुगा”……यानि राग के पीछे चलने वाला ही इसमें से भीतर नगर में जा सकता है …..जिसमें राग ही नही है उसका यहाँ कोई काम नही है ….आप जाओ , ज्ञान मार्ग खोज लो …वैरागी बन जाओ …नाक कान दबाओ …जोग सिद्ध करो …इस मार्ग में राग वाले ही आ सकते हैं ।
ये तो हो गया गोपुर का दरवाज़ा ….अब गोपुर कैसा है ? तो लिखा है ..उस गोपुर में कई शिखर हैं …और लाल रंग के मणि उसमें लगे हैं ।
लाल रंग राग का रंग है …अनुराग का रंग है ।
“लाली मेरे लाल की , जित देखूँ तित लाल ।
लालहिं देखन मैं गयी , तो मैं हूँ है गयी लाल ।।
लाल को खोजने लगे थे …पर स्वयं ही लाल हो गए ….ये बड़ी सुन्दर बात कही है ।
लालहिं लाल के लाल हिं लोचन , लालहिं के मुख लाल हिं बीरा ।
लाल बनी कटि काछनी लाल की , लाल के शीश मुके सोई चीरा ।
लालहिं बागों सोहत सुन्दर , लाल खड़े यमुना जी के तीरा ।
“गोविन्द प्रभु” की शोभा जो निरखों , लाल के कण्ठ विराजत हीरा ।।
अजी ! इस प्रेम नगर में लाल ही लाल तो है ….”लाल” के पीछे सब पड़े हैं और “लाल” ही हो गये हैं …..इसलिये लाल को ही अनुराग कहो या प्रेम कहो …ये लाल ही उसका रंग है ।
तो इस तरह “प्रेम नगर” का गोपुर भी तैयार हो गया है ।
अब आगे का वर्णन कल –
