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August 30, 2025 12:26 pm

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 121 !!-सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 121 !!-सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”भाग 1 : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 121 !!

सौन्दर्यबोध और संगीत – “निकुञ्ज लोक में”
भाग 1

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निकुञ्ज लोक –

वैकुण्ठ धाम के अंतर्गत आता है….साकेत धाम…..

साकेत धाम से आगे एक दिव्य द्वीप है……जिसे कई पुराणों नें “श्वेतद्वीप” भी कहा है……और इस द्वीप में, वही प्रवेश कर सकता है …..जो वैकुण्ठ का भी भेदन करके आगे जानें की सोचे ।

वैसे ये बहुत ही मुश्किल काम है…..क्यों की पूर्ण ऐश्वर्य का धाम है वैकुण्ठ ….जहाँ भगवान नारायण निवास करते हैं…..और महालक्ष्मी जिनके चरण दवाती हैं…..अनन्त भगवान शेषनाग के रूप में विराजे हैं ….विधाता ब्रह्मा वेद मन्त्रों को गान करते रहते हैं ।

समस्त रीद्धियाँ और सिद्धियाँ यहाँ सेवा में सदैव तत्पर रहती हैं ।

स्वाभाविक है…..ऐसे ऐश्वर्यमय धाम को छोड़कर कहीं ओर क्यों जाना चाहेगा उपासक …..पर जो ऐसे महाऐश्वर्य सम्पन्न वैकुण्ठ को भी छोड़कर जो आगे बढ़नें की हिम्मत करता है वही “प्रेमलोक” का अधिकारी है ।

वैकुण्ठ का भी भेदन करके…….जो माधुर्य और प्रेम रस का ही व्यसनी है……वो वैकुण्ठ में नही रह सकता ।

तो स्वभाविक है…….साधक के इच्छानुसार वैकुण्ठ से ऊपर के लोक में भी वह जानें लग जाता है ।

तब उसे “श्वेतद्वीप” दिखाई देता है…..इसी द्वीप में गोलोक खण्ड है ..आगे कुञ्ज खण्ड है …उसके और आगे निकुञ्ज खण्ड है….आदि ।

निकुञ्ज को ही “नित्य वृन्दावन” भी कहा जाता है ।

कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं ।

निकुञ्ज में काल की गति नही है……काल यानि समय , अचल है……निकुञ्ज की सहज सम्पत्ती है सौन्दर्य और संगीत ।

ये बात समझनी बहुत आवश्यक है ।

इस निकुञ्ज में सदा सर्वदा राग रागिनियाँ ही गूँजती रहती हैं……..

और ये राग रागिनियाँ स्वयं नही गूँजती……सखियों के भावानुसार …..और हाँ एक विचित्र बात और बता दूँ…….सखियों का अपना कोई “मन” नही है…….यहाँ मात्र आल्हादिनी और उनके सनातन प्रियतम श्याम सुन्दर इन्हीं की इच्छा से सबकुछ संचालित है ।

यानि – श्रीराधा और श्याम सुन्दर के भाव ही सखियों के भाव हैं ….और सखियों के जो भाव हैं ……वही भाव यहाँ के पक्षीयों के भी हैं …..
वृक्ष के भी हैं ….ऋतुओं के भी हैं……यानि एक ही भाव से सम्पूर्ण निकुञ्ज भावित रहता है………ये अद्भुत बात है ।

निकुञ्जउपासना एक दिव्य उपासना है ………और अत्यन्त प्राचीन उपासना है ………..इसकी कुछ ख़ास बातें मैं आपको बता दूँ ।

इस निकुञ्ज उपासना में………सौन्दर्य और संगीत का बड़ा ही सुन्दर प्रयोग किया गया है …………

“प्रेम साधना” आपको प्रथम “सौंदर्यबोध” प्राप्त करनें के लिये कहती है…………आपकी दृष्टि में सौन्दर्य होना चाहिये ………आपके मन में सौन्दर्य का बोध होना चाहिये……..जैसे – प्रेम में डूबे हुये किसी प्रेमी को आपनें देखा है ? उसे सर्वत्र सौन्दर्य ही दिखाई देता है ……

“चन्दा मुस्कुरा रहा है….कलियाँ मुस्कुराईं …फूलों नें कुछ कहा”

क्या ऐसी मनःस्थिति प्रेम में नही होती ?

जब प्रेमदेवता जाग जाता है ……तब उसमें स्वभाविक सौन्दर्य बोध प्रकट हो जाता है …….इसे समझनें की आवश्यकता है …..और उस बोध के जागनें पर …..उसे और विस्तार देनें की जरूरत है ।

यानि ऐसी स्थिति हो …….कि सर्वत्र सौन्दर्य ही सौन्दर्य लगे ।

अब इस “निकुञ्ज उपासना” में आप देखोगे कि……….सखियाँ सुन्दर हैं……..कुञ्ज सुन्दर हैं ……..सुन्दर श्याम को …..और सुन्दर बनाकर उनका दर्शन करती हैं सखियाँ………उनकी आल्हादिनी हैं …….वो वैसे ही सौन्दर्य की मूर्ति हैं ……पर उनको भी और सजा कर उनके पीया के पास ले जाती हैं ……..सजे धजे सब हैं इस निकुञ्ज में ………सब सुन्दरता की सीमा हैं ………हद्द है ।

है ना विचित्र उपासना ये निकुञ्ज की ।

अब इस उपासना में संगीत का भी बड़ा सुन्दर जोड़ है ………

राग रागिनियों के माध्यम से सेवा में लगी रहती हैं निकुञ्ज की सखियाँ……………

क्या सुननी आती है आपको संगीत ?

ये क्या बात हुयी……..मुझ से पूछा था तो मैने यही उत्तर दिया ।

वो बहुत बड़े संगीतकार थे…….शास्त्रीय संगीत के गायक……..

मुझ से बोले ……..संगीत को कैसे सुनना है ये आना आवश्यक है ।

संगीत तो सर्वत्र है………हवा में संगीत है …..बहती नदी में संगीत है ……आकाश में संगीत है ………….सुननी आती है संगीत है ?

बाँसुरी बज ही रही है ……………सुनो कभी ………..श्री आल्हादिनी की पायल बज ही रही है ……….सुनो कभी ।

प्रेम देवता तुम्हे पुकार रहा है …………सुनो कभी ।

कबीर दास नें लिखा है – गगन गरजें बरसे अमी, बादल गहन गम्भीर ।
चहुँ दिसि दमके दामिनी , भीजें दास कबीर ।।

ये है संगीत है ………….जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में बज ही रहा है ।

इस प्रेम साधना का की विचित्रता ये है कि संगीत के बिना शायद ये प्रेम साधना अपूर्ण ही रहेगी ।

अब संगीत का अर्थ ये नही ………कि हमें हारमोनियम नही आता ……हमें सितार नही आता …..हमें ख्याल नही आता …..छोटा बड़ा कुछ नही आता …….ध्रुपद धमार नही आता …………

कोई बात नही ……नही आता तो मत आने दो ……….यहाँ जिस संगीत की बात हो रही है ………….वो स्वयं में उठनें वाला संगीत है ।

जब प्रेम में कोई डूबा होता है …..तो वह गुनगुनाता है ….गाता है ……..भले ही उसे न आये ………..।

तो इस निकुंजोपासना में ……संगीत का बड़ा महत्व है ……….

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

🌸 राधे राधे🌸

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