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“श्रीराधाचरितामृतम्” 122 !!
जय जय नित्यविहार
भाग 2
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पर श्रीराधा का प्रमाण कहाँ है ? मात्र सात सौ या कुछ और वर्ष पहले गीत गोविन्द जैसे काव्य में ? या हिन्दी साहित्य की नायिका के रूप में ? वेद में कहाँ ? उपनिषद् में कहाँ हैं श्रीराधा ?
“राधोपनिषद है” ………….श्रीराधा जी के नाम का उपनिषद् है ………..अगर समझ न आये तो ……..श्रीराम शर्मा जी के द्वारा व्याख्या की हुयी “राधोपनिषद” पढ़ लेना …..मैने पढ़ी है ।
उनको मैने समझाया…….फिर मैने उनसे कहा – “सत्यार्थ प्रकाश” से बाहर निकलो……और मैं जो जो कहता हूँ उन ग्रन्थों का अध्यन करो …….तब समझ में आएगा कि …….श्रीराधा क्या है ?
पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्तपुराण ………गर्ग संहिता …….पढ़िये इन्हें ….मैने कहा ।
हम नही मानते पदम् पुराण ……और इन ब्रह्म वैवर्त पुराण को ।
उनका उत्तर था ।
मैने कहा …….हाँ …..आप तो बस कुँए के मेढ़क हो ……पढ़ ली है “सत्यार्थ प्रकाश” और बस उसी चश्मे से सब कुछ देखते हो ।
कल वो “आज के विचार” पढ़कर कह रहे थे ……….ऐसे रहस्य हैं श्रीराधा में ? आप ऐसी गम्भीर बातें भी लिखें …….श्रीराधा के बारे में…..और ग्रन्थों का नाम भी उल्लेख करते जाएँ तो हमें लाभ होगा …….मैं सुबह आज प्रसन्न था ……….वो आर्यसमाजी भाई चार दिन से “श्रीराधाचरितामृतम्” पढ़कर बदल रहे थे ……वो प्रेमपूर्ण हो रहे थे ।
ये गम्भीर चर्चा शुरू में , मैं इन्हीं लोगों के लिये ही करता हूँ ।
साधकों ! श्रीराधा कृष्ण का नित्य विहार इसी निकुञ्ज में चलता ही रहता है ….अनादि काल से …..अनन्त काल तक ।
“अर्जुन आये हैं इसी निकुञ्ज में……सखी भाव से भावित होकर ।
आगे अब निकुञ्ज लीला का रसास्वादन कीजिये –
श्रृंगार कुञ्ज –
ये कुञ्ज बड़ा ही सुन्दर है……सुन्दर सुन्दर आईने लगे हैं……और उन आईने के चारों ओर बड़ी बारीकी से काम किया गया है ।
सुन्दर आसन हैं ……उच्च आसन है……कुञ्ज, श्रृंगार के लिये ही बनाया गया है ……..श्रीजी की सखियाँ ललितादि ले गयीं श्रीजी को और बड़े प्रेम से उनका श्रृंगार करनें लगीं ।
धूप, अगर धूप का, सुगन्धित धूआँ दिया श्रीजी के केशों में …….वो केशराशि और सुगन्धित हो उठी थी ।
अब सखियों नें सजाना शुरू किया श्रीजी को ।
श्याम सुन्दर देख रहे हैं !
…..विशाखादि सखियाँ श्याम सुन्दर को भी सजानें लगीं ।
ललिता सखी नें पहले “सोलह श्रृंगार” किये श्रीजी के ।
बेसर नाक में ……..जिसे बुलाक भी कहते हैं………वो लगा दिया ।
साड़ी नीली पहनाई …….कमर में करधनी ……..वेणी गूँथना …….कानों में कर्णफूल लगाना ….. .अंगों में चन्दनादि का लेप करना …….बालों में पुष्प लगाना ……..गले में फूलों का हार ………हाथ में कमल धारण कराना …….मुख में पान देना ……नेत्रों में काजल लगाना …….
अंगों में पत्रावली की रचना करना ……..चरणों में महावर लगा देना …..ललाट पर रोली का तिलक ……..इसके बाद सखियाँ नजर उतारती हैं श्रीजी की …………..
प्यारे का श्रृंगार भी सखियाँ ही कर रही हैं ……..
पीताम्बरी धोती पहनाई …….पीताम्बरी ही धारण कराई ……..गले में मोतिन की माला ………मोर मुकुट …….पर मुकुट ऐसा जो बाम भाग की ओर ही झुके ………..वनमाला ……….कानों में कुण्डल ………माथे में सुन्दर तिलक ……….नाक में बेसर ……बुलाक ।
तैयार हो गए दोनों युगलवर ………सज धज कर तैयार हो गए ।
सखियाँ सब नजर उतारती हैं ……….जल का पात्र घुमाकर खुद पी जाती हैं ………..ताकि नजर न लगे ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
🍁 राधे राधे🍁


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