!! दोउ लालन ब्याह लड़ावौ री !!
( श्रीमहावाणी में ब्याहुला उत्सव )
!! लै आई दोउ लाल कौ !!
गतांक से आगे –
!! दोहा !!
बलि जाऊँ या रूप की भाँवरि लेहु फिराय।
साहौ सुभग सुहावनौ सबहीं को सुखदाय ॥
सबहीं के सुखदा दोऊ महा मनोहर मीत।
चौंरी लै कर चालिये मंगल गावत गीत ॥
गावत गीत सुहावने आगे है सहचारि ।
लै आई दोउ लाल कौं चौंरी चतुर बिचारि ॥
!! पद !!
चारुमति चंदनी रची चौंरी।
लूमि रही ललित छबि झूमि झौंरी ॥
मधि बिराजै दोऊ बनाऽरु बनी।
देखि छबि छकि रही सुरति सजनी ॥
आस पासनि बिलासनि उलासनि।
गावैं मिलि गीत मंगल हुलासनि ॥
करसों कर जोरि कर हियें सिरावैं।
लाड़लड़े दोउन कों लाड़ लड़ावैं ॥
ब्याह की सकल रसरीति नीकी ।
करत भई भाँवती भाँवती की ॥
आरती साजि श्रीरंगभीनी ।
जुगलपर बारि बलिहारि कीनी ॥
मंद मुसक्यात भुज अंस धारें।
अहल सुखगहल श्रीहरिप्रिया निहारें ॥
आज लताओं ने पुष्प बरसाने आरम्भ कर दिए हैं …सुगन्धित धूम्र को भी जलाया गया है …रंग विरंगे ध्वज पताका से निकुँज की शोभा और बढ़ा दी है । कमलों ने खिलना आरम्भ कर दिया ….पक्षियों के कलरव से तो निकुँज गूँजित था ही, कोयली ने स्वर संधान और कर दिया ।
निकुँज की अवनी आज मणियों से खचित है …..नए नए रत्न , मणि आदि से सज्जित किये जा रहे हैं स्तम्भ । अब सखियों को देखो …कितनी सुन्दर लग रही हैं ….कोई लाल साड़ी में है तो कोई पीली साड़ी में ….कोई नीली साड़ी पहन कर श्यामसुन्दर को दिखा रही है तो कोई चटक गुलाबी साड़ी पहन कर प्रिया जू के आगे नाच रही है …..एक ओर सखियाँ नाच रहीं हैं तो दूसरी ओर मोर आदि पक्षी अपने पंख फैलाकर अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं । फूलों के फुब्बारे छूट रहे हैं …चारों ओर अब फूल ही फूल दिखाई दे रहे हैं । ब्याह मण्डप के पास दाहिनी ओर वाद्य यन्त्र वाली सखियाँ बैठी हैं ….वो सब मंद स्वर में शहनाई आदि बजा रही हैं …जिससे निकुँज में शुभ-मंगल का सबको भान हो । अरी सखी ! यहाँ तो नित्य ही मंगल है ….यहाँ मंगल के दोनों रूप कितने सुन्दर सज धज कर बैठे हैं …फिर कैसा और कहाँ का मंगल ? एक सखी के मुख से ये सुनकर हरिप्रिया हंसी हैं । श्रीरंगदेवि जू अति प्रसन्न हैं ….उनके पीछे श्रीहितू सखी जू ….वो शान्त हो बस …युगलवर को ही निहार रहीं हैं । तभी हरिप्रिया सखी अपनी सखियों को कहने लगीं – अरी सखियों ! अब समय होता जा रहा है इसलिए विलम्ब न करते हुए इन युगल को मण्डप से उठाओ ….और भाँवरि लेने को कहो । हरिप्रिया की बात सुनकर सब सखियाँ ब्याह मण्डप की ओर आईँ …..श्रीरंगदेवि जू ने जाकर नवल किशोरी ओर नवल किशोर को हाथ जोड़कर उठाया ….दोनों उठे हैं ….तभी अनन्त सखियों ने उनके ऊपर पुष्प बरसाना आरम्भ कर दिया था ।
अरी ! देखो तो कितने सुन्दर लग रहे हैं ये युगल दम्पति , भाँवरि लेते हुए …..हरिप्रिया सबको कह रहीं हैं …..मध्य में एक बड़ा सा दीया रखा है ….उसी की ये भाँवरि ले रहे हैं । राजसी पोशाक धारण करके ये जब चलते हैं तब इनकी सुन्दरता कितनी खिल उठती है । ये दोनों ही हम सबके मीत हैं ….परम प्रिय मीत । इसलिए तुम सब सखियों ! इनके साथ साथ भाँवरि में चलो …चँवरी लेकर …चँवर को ढुराते हुये इनके साथ साथ चलो …..और पुष्प वर्षा निरन्तर होते रहना चाहिए …..हरिप्रिया के मुख से ये बात जैसे ही निकली …सारी सखियाँ भागीं ब्याह मण्डप की ओर …..और चँवर लेकर युगल के साथ साथ ही चलने लगीं ….इनके ऊपर पुष्प बरसाए जा रहे थे …..कुछ सखियाँ उन्मद हो उठीं ….और जयजयकार करने लगीं ….तो कुछ मंगल गीत गाती हुई चल रही हैं ।
ये ब्याह उत्सव है …इसमें पूरा निकुँज ही उत्साह से भर गया है….सखियाँ ही इस विवाह उत्सव को सुन्दर से सुन्दर बनाने के प्रयास में जुटी हुई हैं …आज इनका प्रयास सफल हो गया । मंगल गीत गा रही हैं सखियाँ । यहाँ भाँवरि हो रही हैं ….तो सखियाँ रस रीति को जानने वाली हैं ….इसलिए उस समय वो अपने तन मन प्राण को इन नव दम्पति पर वार देती हैं ।
दुलहा सरकार अपनी दुलहन महारानी के साथ भाँवरि लेते हुए ….मुस्कुरा रहे हैं …मणि खम्भ में इन युगल की छबि जो दिखाई दे रही हैं …..वो अनेक रूपों में विलक्षण प्रतीत हो रहा है ।
कोई कोई सखियाँ आरती लेकर भी खड़ी हैं ताकि इस भाँवरि ले रहे वर वधू को नज़र ना लगे …..सखियाँ इस भाँवरि ले रहे वर वधू को निहार कर अपना हृदय शीतल कर रही हैं …चारों ओर से जय जयकार की ध्वनि गूंज उठी थी …पूरा निकुँज प्रेममय हो उठा था । हरिप्रिया सखी इस उत्सव को देख देखकर कर बलि जा रही हैं ….भाँवरि की विधि जैसे ही पूरी हुयी तो लाल जू ने तुरन्त अपनी प्यारी के गले में अपना हाथ रख दिया …..अब गलवैयाँ दिये मण्डप में ही खड़े हैं दोनों …..तभी सखियों ने पुष्प बरसाने शुरू कर दिए थे ….शहनाई तो बज ही रही थी ।
ये झाँकी देखकर श्रीहरिप्रिया अपने आपको इन युगल चरणों में वार देती है ।
क्रमशः….


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