महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (063)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
जो जैसेहि तैसेहि उठि धायीं-3
संसार के सब पुण्य इकट्ठे हुए, पहले के। अबके और आगे के, सब जीवों के सब पुण्य इकट्ठे हुए और उन्होंने देखा कि गोपी के सामने प्रकट होकर श्रीकृष्ण ने एकबार अपने दिव्य अंग की दिव्य गंध से उसकी नासिका भर दी, उसकी सारी इंद्रियाँ अपना काम छोड़कर नाक से चली आयीं। एक बार उन्होंने बाँसुरी पर धुन फूँक दी तो उसके कान भर गये प्रेम से, आनन्द से। एक बार उन्होंने दोनों हाथ से उसका आलिंगन किया मन ही मन और वह आनन्द से भर गयी-
पिबन्त्य इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त्य इव जिह्वया-
मानो आँखों से पी रही हो, मानो जीभ से चाट रही हों। जब श्रीकृष्ण के साथ मिलकर गोपी आनन्द में मगन हो गयी तो दुनिया भर के जितने त्रैकालिक पुण्य हैं- भूत के, वर्तमान के, भविष्य के- सब के सब छोटे पड़ गये।
क्षीणमंगला- क्षीणमंगला का अभिप्राय हुआ कि मंगल क्षीण हो गये। उन्होंने कहा- कि अगर हम सब पुण्य मिल जाते हैं और किसी एक व्यक्ति को चाहते कि फल दें, तो क्या इतना सुख हम दे सकते? बोले अरे नहीं, कृष्ण के ध्यान में इतना सुख मिला, इतन सुख मिला, कि सब के सब पुण्य क्षीण हो गये। गोपी के साथ पाप-पुण्य का संबंध नहीं है।
श्रीकृष्ण के संबध में रूप गोस्वामी का एक श्लोक है- वह कहते हैं: दुनिया में अब तक जितना सुख हुआ है- धर्म से, अर्थ से, काम से, मोक्ष से, समाधि से- जितना हो रहा है और जितना सुख आगे होगा, उन सबको इकट्ठा करके तराजू के एक पलड़े पर रख दें और दूसरे पलड़े पर भगवान् के विरहाभास के दुःख को रख दें, तो उस दुःख में जितना सुख है उतना सुख सृष्टि में न कभी था, न है, न होगा, क्योंकि यह भगवत संबंधी सुख है, भगवत संबंधी दुःख है। एक बार ललिता सखी जा रही थी यमुना जल भरने। वे तो बहाना बनाती थीं कृष्ण का दर्शन करने का; उनको पानी भरने की जरूरत नहीं थी, गोरस बेचने की जरूरत नहीं थी। तो जल भरने जा रही थी, इतने में क्या देखती हैं कि नारदजी वृक्ष के नीचे बैठे रो रहे हैं। वीणा एक ओर पड़ी है और बस झर-झर आँसू गिर रहे हैं। ललिताजी ने जाकर दण्डवत् प्रणाम किया; बोली- महाराज! आज आप क्यों रो रहे हैं? दुःख क्या है आपको। अच्छा क्या श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए रो रहे हैं?+
करवा दें दर्शन आपको? नारदजी बोले- न-न, हम अपने दर्शन के लिए नहीं रो रहे हैं, हम तो चाहे जब कर लें; हम उन लोगों के लिए रो रहे हैं जो तत्त्वज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो गये- क्योंकि उनको कृष्ण-दर्शन का यह सुख अब नहीं मिल सकता। हाय, हाय। यह सुख पाये बिना ही वे संसार से चले गये- इसलिए हमें रोना आता है।
नारायण। ये श्रीकृष्ण जो हैं- निवारण प्रकट परब्रह्म परमात्मा हैं। नेति-नेति जीवों के लिए हैं, परमात्मा के लिए नेति-नेति नहीं है। यह व्यतिरेकमुखी जो ज्ञान है कि निषेध करो फिर तुम ब्रह्म कहो, यह तो जिनमें अज्ञान का आवरण है उनके लिए है। परंतु जहाँ अज्ञान के आवरण का अत्यंताभाव है- अर्थात् पहले भी न कभी अज्ञा का आवरण था और न बाद में ज्ञान प्राप्त करके वह मिटाया गया, जहाँ अज्ञान का आवरण कभी आया ही नहीं, हुआ ही नहीं, जिनको कभी अज्ञान छुआ ही नहीं, वह श्रीकृष्ण- तमेव परमात्मानम्- वही है वही, दूसरा मत समझना। जिसका तीनों अवस्था में अन्वय है वह नहीं, जो तीनों अवस्था से व्यतिरिक्त है सो नहीं, जो सर्वत्म है- जिसमें तीन अवस्थाएं हैं जो हैं जिससे अलग नहीं हैं, तीन अवस्थाएँ जिसका स्वरूप हैं, ऐसा जो परमात्मा है- वह है श्रीकृष्ण। भले गोपी जारबुद्ध्यापि संगता- श्रीकृष्ण को पहचानती नहीं थी। परंतु व्यवहार में आप देखो नहि वस्तुशक्तिः बुद्धिमपेक्षते।
वस्तु- शक्ति को बुद्धि की अपेक्षा नहीं होती। अच्छा, अनजान में कोई नमक खावे, तो क्या उसकी जीभ पर नमकीन पानी नहीं बनेगा? अनजाने में कोई आग में हाथ डाल ते, तो आग क्या उसके हाथों को नहीं जलावेगी अनजान में कोई अमृत पी ले, तो क्या वह अमर नहीं हो जावेगा? अनजान में कोई विष पी ले, तो क्या नहीं मरेगा? तो जब वही निरावरण परमब्रह्म परमात्मा जीवों के कल्याण के लिए आया, यहाँ भी यदि बुद्धि की अपेक्षा होवे कि पहचानो कि ये परब्रह्म हैं तो अवतारकाल में और सामान्य काल में अन्तर ही क्या होगा? ये तो अवतीर्ण ही हुए हैं, इसलिए कि लोग बिना श्रवण-मनन-निधिध्यासन के भी अमरत्व प्राप्त हो जायँ। वह अवतीर्ण हो इसीलिए हुए हैं कि बिना माला फेरे, बिना मूर्ति-पूजा किए, कल्याण को प्राप्त हो जायँ। यह तो अहीर का छोरा है न-
देखो री, यह नन्द का छोरा बरछी मारे जाता है।
बरझी सी तिरछी चितवन से पैनी छुरी चलाता है।।
हमको घायल देख बेदर्दी, मन्द मन्द मुसकाता है।
ललित किशोरी जखम जिगर पै नौनपुरी भुरकाता है।। ++
जारबुद्ध्यापि संगताः- माना कि गोपी को यह नहीं मालूम था कि श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं; परंतु प्रेम से मोक्ष में इस बुद्धि की अपेक्षा नहीं है। कई लोग ऐसा मानते हैं कि कर्म से ही बंधन हैं और कर्म से ही मुक्ति है। यह पूर्वमीमांसा का सिद्धांत है। सकामता से बन्धन और निष्कामता से मुक्ति- यह कर्मयोग का पक्ष है। विक्षेप से बन्धन और समाधि से मुक्ति- यह योगियों का मत है। अविवेक से बन्धन और विवेक से मुक्ति- यह सांख्यों का मत है। और अज्ञान से बन्धन और ज्ञान से मुक्ति- यह वेदान्तियों का मत है। तो बन्धन का जैसा हेतु मनुष्य कल्पित करता है उसी के अनुरूप मुक्ति का हेतु उसको कल्पित करना पड़ता है। असल में बन्धन और मुक्ति दोनों कल्पित हैं। यह बन्ध जैसी अवस्था में कल्पित हुआ है। मुक्ति भी वैसी अवस्था में होगी। परंतु व्रज की बात विलक्षण है।
‘जार बुद्ध्यापि संगताः’ वृन्दावन में जितने सम्प्रदाय हैं उनमें निम्बार्क सम्प्रदाय और ‘राधा बल्लभ सम्प्रदाय’- ये दोनों गोपी के कृष्ण प्रेम के जार-भाव नहीं मानते हैं। श्रीचैतन्यसम्प्रदाय और श्रीवल्लभसम्प्रदाय में जार-भाव मानते हैं। रामानुज सम्प्रदाय में भी थोड़ा-थोड़ा मानते हैं। पर उनके यहाँ मुख्य रूप से नारायण की उपासना है, इसलिए वे ज्यादा इधर ध्यान नहीं देते। वहाँ तो राधिका रानी को, गोपियों को, दूसरे ढंग से माना गया है। वैसे श्रीमद्भागवत पर तो टीका सभी की है, सभी सम्प्रदाय की टीका है। निम्बार्क सम्प्रदाय का सिद्धांत प्रदीप है। गौडेश्वर सम्प्रदाय की गई टीकाएँ है- जीव गोस्वामी ने तीन-चार अवस्थाएँ लिखी हैं। सनातन गोस्वामी की है, विश्वनाथ चक्रवर्ती की है। राधावल्लभ सम्प्रदाय की विशुद्ध रस-दीपिका है, रसिक रञ्जनी है; कई छपी हैं, कई नहीं छपी हैं। रामानुज सम्प्रदाय में वीरराघवाचार्य की है, श्रीनिवासाचार्यजी की है, सुदर्शन श्री निवासाचार्य जी की है और सुदर्शन सूरी की है। मध्वाचार्य के सम्प्रदाय में विजयध्वजतीर्थ की है, स्वयं मध्वाचार्य ने ही भगवत-तात्पर्य निर्णय लिखा है। हनुमान की है, चित्सुखाचार्य की है। हम समझते हैं प्राचीन आचार्यों की कोई 35-40 संस्कृत की टीकाएँ आज भी उपलब्ध हैं।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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