Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख”- 11 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
बिबिधि सुरति संपति सहित, अति अद्भुत अभिराम ।
चिदानंदघन जयति जै, श्रीवृन्दावन धाम ॥
॥ पद ॥
जै जै श्रीवृन्दावन धाम। चिदानंदघन पूरन काम ॥
बहति बिमल कल केलि रूपिनी, श्रीजमुना कमना चहुँकोद ।
अति रस रंग तरंग उमंगनि, अँग अंगनि प्रति बढ़वनि मोद ॥
दिब्य कनकमय अवनि अखंडित, मृदुमनि मंडितमयी मनोज ।
बिबिधि भाँति तरु बेलिन झेली, रति-रेली अलबेली ओज ॥
महि महि चारु चंबेली चंदन, चंपक बकुल बरन बर बेस ।
पियवासें अनुकूल बसंती, सदा सेवती सुमन सुदेस ॥
*( मुझे आज्ञा है कि महावाणी जी के “सिद्धांत सुख” को मैं विस्तार से लिखूँ …. ये पद बहुत बड़ा है इसलिए मैं इसे दो दिन या तीन दिन में पूरा करूँगा , आप बस रसपान कीजिए और भावना से मेरे साथ निकुँज की यात्रा कीजिए – हरिशरण )
“मैं पूर्व में कह चुकी हूँ कि इस निकुँज ( दिव्य श्रीवृन्दावन ) में एक ही तत्व है , और वह है रस “।
हरिप्रिया जी मुझे ये बात बताने लगीं थीं …..उन्होंने दिव्य मोहन महल का दर्शन कराया था …फिर मोहन मण्डप का भी , उस रसार्णव मण्डल को देखकर मुझे भी रस मत्तता का भान होने लगा था ।
“क्यों न होगा ,सब रस का ही तो विस्तार है”…..हरिप्रिया जी ने मुझे कहा ।
फिर कुछ देर मौन रहने के बाद …..( मैंने अनुभव किया कि यहाँ सखी जू ज़्यादा बोल नही पा रहीं थीं , उनको रसावेश हो गया था )
“देखो , सब रस हैं …मूलतः यहाँ जो भी है …वो सब एक ही तत्व “रस” ही हैं ।
जैसे – युगलसरकार रस हैं ….आनन्द श्यामसुन्दर हैं तो आह्लाद उनकी प्यारी श्रीराधारानी हैं …हम सब सखियाँ उनकी इच्छा शक्ति हैं तो ये श्रीवृन्दावन आल्हादिनी प्रिया जी का देह है ।
हरिप्रिया नेत्रों को बन्द करके बोल रहीं थीं उनको ये सब कहते हुए रोमांच हो रहा था । मूल में सब एक हैं, यहाँ सब रस ही रस है ….भाव में भींज कर सखी मुझे बता रहीं थीं ।
किन्तु अब एकाएक उनको पूर्ण आवेश आगया था …रस का आवेश । हरिप्रिया जी वर्तुल घूमने लगीं थीं ….वो नभ में दृष्टि किए धीरे धीरे अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाये घूम रहीं थीं …..उसी समय शीतल हवा भी चल पड़ी ….सुवास वातावरण में फैल गया था । मुझे ये देखकर बार बार रोमांच होने लगा ।
श्रीवृन्दावन की जय हो …..हरिप्रिया ने घूमते हुए कहा ।
सच्चिदानन्द घन श्रीवृन्दावन की जय हो ।
लाल जी को भी सुख देने वाले श्रीवृन्दावन की जय हो ।
प्रिया जी जिस श्रीवन को देखकर मोहित हो जाती है उस श्रीवन की जय हो ।
मुझे बहुत आनन्द आरहा था ….मेरे पास शब्द नही हैं ….
हरिप्रिया जी का रस आवेश थमने का नाम नही ले रहा …ओह ! इनके ऊपर लता वृक्षों ने भी पुष्प बरसाने शुरू कर दिए थे ….इनके ऊपर मोरछली के छोटे छोटे सुगन्धित पुष्प गिर रहे थे …नही नही वर्षा ही हो रही थी मानों । पुष्पों की वर्षा ।
आहा ! कितना सुन्दर है मेरा श्रीवृन्दावन , जहाँ पर मेरे प्रिया प्रियतम विहार करते हैं …नित्य विहार ! श्रीरंगदेवि आदि सखियाँ जहाँ सुख पूर्वक वास करती हैं ….जहाँ मेरे नित्य किशोर और किशोरी रतिरंग में डूबे रहते हैं …..यहाँ के कण कण में वहीं श्याम गौर हैं …..इसलिए ऐसी प्रेमपूर्ण अवनी श्रीवृन्दावन की …जय हो ।
ये जुगल रसिकवर की क्रीड़ा भूमि हैं ….जब हमारे रसिक जुगल इस अवनी में चलते हैं तब ये अवनी भी नवनीत की तरह कोमल बन जाती है …ये आश्चर्य जनक है …अति सुन्दर है ये श्रीवन….चिदघन है , जड़ नही । हंसीं हरिप्रिया , बोलीं ….जब सब कुछ रस है यानि प्रेम है तो ये श्रीवन जड़ कैसे हो सकता है ….ये तो सच्चिदानन्द है …..
ऐसे चिदघन श्रीवृन्दावन की जय हो , जय हो ।
इतना कहकर हरिप्रिया कुछ देर के लिए बैठ गयीं – मौन हो गयीं ….फिर मुझे अपने पास बुलाकर बैठाया और कहा …..ये श्रीवृन्दावन माधुर्यपूर्ण है , रस पूर्ण है …..फिर उनकी दृष्टि यमुना जी में गयी तो हरिप्रिया बोलीं …माधुर्य रस पूर्ण यमुना जी श्रीवृन्दावन का शृंगार हैं । ये यमुना जी में जो कुछ बह रहा है ….वह जल नही है …वो रस है …स्वयं सच्चिदानन्द रस बनकर यमुना के रूप में बह रहा है ….लता-वृक्ष बनकर वही रस खड़ा हो गया है ..वही सच्चिदानन्द हवा के रूप में यहाँ बह रहा है । मेरे कन्धे में हाथ रखा हरिप्रिया जी ने और कहा ….जिसके ऊपर स्वामिनी की कृपा हो ना …वही इस रस का अनुभव कर पाता है ।
दिव्य स्वर्णमयी अवनी है ….इसका अर्थ ? मुझ से ही पूछ रहीं थीं ।
मैं क्या बोलता ! हरिप्रिया जी ने मुझे कहा ….प्रिया जी । प्रिया जी का मंगल विग्रह है ये श्रीवन की अवनी । ये कहते हुए श्रीवन की धरती को सखी जी ने प्रणाम किया ।
कोई बाधा नही , दयायुक्त हैं प्रिया जी , और श्रेष्ठ जन से विभूषित हैं ….यानि श्याम सुन्दर ही श्रेष्ठ हैं ….अजी सर्वश्रेष्ठ हैं । और ये लता पत्र सुगन्धित वायु के रतिकाम युक्त झोंका , प्रेम के द्वारा आक्रमण कर रहे हैं । अद्भुत ! मैं सुन ही नही रहा था …मुझे सब कुछ दिखाई दे रहा था ।
चंपक आदि सुमन , ये खिल गए थे …इसका अर्थ है प्रिया जी प्रसन्न हैं ….श्याम सुन्दर ने देखा तो वो झुके और प्रिया जी के चरण का स्पर्श किया ….( यानि श्रीवृन्दावन की अवनी को छुआ ) तब प्रसन्न होकर प्रिया जी ने इन्हें दो फल प्रदान किए …उन फलों का आस्वादन करके लाल जी अब श्रीवृन्दावन की अवनी में केलि करने के लिए उत्सुक हो उठे थे ।
हरिप्रिया सखी जी इसके आगे बोल नही सकीं …
उनकी वाणी रुद्ध हो गयी थी ….वो ध्यानस्थ हो गयीं थीं ।
शेNiru Ashra: 🌺🙏🌺🙏🌺🙏🌺
[2/4, 9:36 PM] Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख”- 11 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
बिबिधि सुरति संपति सहित, अति अद्भुत अभिराम ।
चिदानंदघन जयति जै, श्रीवृन्दावन धाम ॥
॥ पद ॥
जै जै श्रीवृन्दावन धाम। चिदानंदघन पूरन काम ॥
बहति बिमल कल केलि रूपिनी, श्रीजमुना कमना चहुँकोद ।
अति रस रंग तरंग उमंगनि, अँग अंगनि प्रति बढ़वनि मोद ॥
दिब्य कनकमय अवनि अखंडित, मृदुमनि मंडितमयी मनोज ।
बिबिधि भाँति तरु बेलिन झेली, रति-रेली अलबेली ओज ॥
महि महि चारु चंबेली चंदन, चंपक बकुल बरन बर बेस ।
पियवासें अनुकूल बसंती, सदा सेवती सुमन सुदेस ॥
*( मुझे आज्ञा है कि महावाणी जी के “सिद्धांत सुख” को मैं विस्तार से लिखूँ …. ये पद बहुत बड़ा है इसलिए मैं इसे दो दिन या तीन दिन में पूरा करूँगा , आप बस रसपान कीजिए और भावना से मेरे साथ निकुँज की यात्रा कीजिए – हरिशरण )
“मैं पूर्व में कह चुकी हूँ कि इस निकुँज ( दिव्य श्रीवृन्दावन ) में एक ही तत्व है , और वह है रस “।
हरिप्रिया जी मुझे ये बात बताने लगीं थीं …..उन्होंने दिव्य मोहन महल का दर्शन कराया था …फिर मोहन मण्डप का भी , उस रसार्णव मण्डल को देखकर मुझे भी रस मत्तता का भान होने लगा था ।
“क्यों न होगा ,सब रस का ही तो विस्तार है”…..हरिप्रिया जी ने मुझे कहा ।
फिर कुछ देर मौन रहने के बाद …..( मैंने अनुभव किया कि यहाँ सखी जू ज़्यादा बोल नही पा रहीं थीं , उनको रसावेश हो गया था )
“देखो , सब रस हैं …मूलतः यहाँ जो भी है …वो सब एक ही तत्व “रस” ही हैं ।
जैसे – युगलसरकार रस हैं ….आनन्द श्यामसुन्दर हैं तो आह्लाद उनकी प्यारी श्रीराधारानी हैं …हम सब सखियाँ उनकी इच्छा शक्ति हैं तो ये श्रीवृन्दावन आल्हादिनी प्रिया जी का देह है ।
हरिप्रिया नेत्रों को बन्द करके बोल रहीं थीं उनको ये सब कहते हुए रोमांच हो रहा था । मूल में सब एक हैं, यहाँ सब रस ही रस है ….भाव में भींज कर सखी मुझे बता रहीं थीं ।
किन्तु अब एकाएक उनको पूर्ण आवेश आगया था …रस का आवेश । हरिप्रिया जी वर्तुल घूमने लगीं थीं ….वो नभ में दृष्टि किए धीरे धीरे अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाये घूम रहीं थीं …..उसी समय शीतल हवा भी चल पड़ी ….सुवास वातावरण में फैल गया था । मुझे ये देखकर बार बार रोमांच होने लगा ।
श्रीवृन्दावन की जय हो …..हरिप्रिया ने घूमते हुए कहा ।
सच्चिदानन्द घन श्रीवृन्दावन की जय हो ।
लाल जी को भी सुख देने वाले श्रीवृन्दावन की जय हो ।
प्रिया जी जिस श्रीवन को देखकर मोहित हो जाती है उस श्रीवन की जय हो ।
मुझे बहुत आनन्द आरहा था ….मेरे पास शब्द नही हैं ….
हरिप्रिया जी का रस आवेश थमने का नाम नही ले रहा …ओह ! इनके ऊपर लता वृक्षों ने भी पुष्प बरसाने शुरू कर दिए थे ….इनके ऊपर मोरछली के छोटे छोटे सुगन्धित पुष्प गिर रहे थे …नही नही वर्षा ही हो रही थी मानों । पुष्पों की वर्षा ।
आहा ! कितना सुन्दर है मेरा श्रीवृन्दावन , जहाँ पर मेरे प्रिया प्रियतम विहार करते हैं …नित्य विहार ! श्रीरंगदेवि आदि सखियाँ जहाँ सुख पूर्वक वास करती हैं ….जहाँ मेरे नित्य किशोर और किशोरी रतिरंग में डूबे रहते हैं …..यहाँ के कण कण में वहीं श्याम गौर हैं …..इसलिए ऐसी प्रेमपूर्ण अवनी श्रीवृन्दावन की …जय हो ।
ये जुगल रसिकवर की क्रीड़ा भूमि हैं ….जब हमारे रसिक जुगल इस अवनी में चलते हैं तब ये अवनी भी नवनीत की तरह कोमल बन जाती है …ये आश्चर्य जनक है …अति सुन्दर है ये श्रीवन….चिदघन है , जड़ नही । हंसीं हरिप्रिया , बोलीं ….जब सब कुछ रस है यानि प्रेम है तो ये श्रीवन जड़ कैसे हो सकता है ….ये तो सच्चिदानन्द है …..
ऐसे चिदघन श्रीवृन्दावन की जय हो , जय हो ।
इतना कहकर हरिप्रिया कुछ देर के लिए बैठ गयीं – मौन हो गयीं ….फिर मुझे अपने पास बुलाकर बैठाया और कहा …..ये श्रीवृन्दावन माधुर्यपूर्ण है , रस पूर्ण है …..फिर उनकी दृष्टि यमुना जी में गयी तो हरिप्रिया बोलीं …माधुर्य रस पूर्ण यमुना जी श्रीवृन्दावन का शृंगार हैं । ये यमुना जी में जो कुछ बह रहा है ….वह जल नही है …वो रस है …स्वयं सच्चिदानन्द रस बनकर यमुना के रूप में बह रहा है ….लता-वृक्ष बनकर वही रस खड़ा हो गया है ..वही सच्चिदानन्द हवा के रूप में यहाँ बह रहा है । मेरे कन्धे में हाथ रखा हरिप्रिया जी ने और कहा ….जिसके ऊपर स्वामिनी की कृपा हो ना …वही इस रस का अनुभव कर पाता है ।
दिव्य स्वर्णमयी अवनी है ….इसका अर्थ ? मुझ से ही पूछ रहीं थीं ।
मैं क्या बोलता ! हरिप्रिया जी ने मुझे कहा ….प्रिया जी । प्रिया जी का मंगल विग्रह है ये श्रीवन की अवनी । ये कहते हुए श्रीवन की धरती को सखी जी ने प्रणाम किया ।
कोई बाधा नही , दयायुक्त हैं प्रिया जी , और श्रेष्ठ जन से विभूषित हैं ….यानि श्याम सुन्दर ही श्रेष्ठ हैं ….अजी सर्वश्रेष्ठ हैं । और ये लता पत्र सुगन्धित वायु के रतिकाम युक्त झोंका , प्रेम के द्वारा आक्रमण कर रहे हैं । अद्भुत ! मैं सुन ही नही रहा था …मुझे सब कुछ दिखाई दे रहा था ।
चंपक आदि सुमन , ये खिल गए थे …इसका अर्थ है प्रिया जी प्रसन्न हैं ….श्याम सुन्दर ने देखा तो वो झुके और प्रिया जी के चरण का स्पर्श किया ….( यानि श्रीवृन्दावन की अवनी को छुआ ) तब प्रसन्न होकर प्रिया जी ने इन्हें दो फल प्रदान किए …उन फलों का आस्वादन करके लाल जी अब श्रीवृन्दावन की अवनी में केलि करने के लिए उत्सुक हो उठे थे ।
हरिप्रिया सखी जी इसके आगे बोल नही सकीं …
उनकी वाणी रुद्ध हो गयी थी ….वो ध्यानस्थ हो गयीं थीं ।
शेष अब कल –
[2/4, 9:36 PM] Niru Ashra: 🌺🙏🌺🙏🌺🙏🌺
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 135 !!
“प्रियतम मिलेंगे” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 3
👏👏👏👏
तब वो श्याम मुझ से कहता ……..चन्द्रावली ! अभी मुकुट दे दे ……शाम को आऊँगा …….तब मैं ही तुझे अपनें हृदय से लगाउँगा …….मैं भोली भाली …..मान जाती ……….मुकुट बाँसुरी दे देती …..पर वो नही आता था ………..हाँ ………मैने कई बार देखा …………वो राधा को ही अपनें हृदय से लगाये रखता था …………..और मुझे पता है …….कुरुक्षेत्र में भी वो राधा को ही देखेगा ……….तुम्हे और हमें नही देखनें वाला ………..चन्द्रावली रोते हुए बोली थी ।
तुम तो श्याम सुन्दर से प्रेम करती हो ना जीजी !
ललिता नें सम्भाला चन्द्रावली को ।
बहुत प्रेम करती हूँ ललिता ! चन्द्रावली नें आँसू पोंछते हुए कहा ।
फिर प्रेम में तो प्रियतम की ख़ुशी ही सर्वोपरि है ना !………श्याम सुन्दर को अच्छा लगेगा ….श्याम सुन्दर प्रसन्न होंगें ……..यही क्या बड़ी बात नही हैं जीजी ! ……. जीजी ! हम भी प्रेम करती हैं श्याम सुन्दर से …….बहुत करती हैं ……….पर श्याम सुन्दर हमारी श्रीराधा रानी से प्रेम करते हैं ……..इसलिये हमारे लिये श्रीराधा रानी महत्व की हैं …..क्यों की हमारा श्याम इनसे ही प्रसन्न होता है ।
रंगदेवी सखी आगे आईँ ……..चन्द्रावली का हाथ पकड़ते हुए बोलीं …..
जीजी ! ये सूचना अत्यन्त सुखद है ……..मानों ऐसा लग रहा है कि …सदियों बाद सूखी धरती जल से अपनी प्यास बुझाएगी ………….
कुरुक्षेत्र सब जायेंगें ……….हम सब अपनें प्राण श्याम सुन्दर को देखेंगें ……..उनकी जिस में प्रसन्नता हो ….हम वही करेंगें ।
और जीजी ! प्रेम का सिद्धान्त भी यही कहता है ।
हमारे गहवर वन में बस यही युगलनाम चलता रहता है ………
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे !!
रंगदेवी सखी नें कहा – जीजी ! हम मात्र श्रीराधा का नाम नही लेतीं …..न हम केवल श्याम सुन्दर का ही नाम लेते हैं ……
हम दोनों का नाम लेते हैं …………क्यों ? इसलिये कि …..
“कृष्ण” कहनें से …….हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी प्रसन्न होती हैं ….और “राधा” कहनें से हमारे श्याम सुन्दर प्रसन्न होते हैं ।
रंगदेवी सखी नें चन्द्रावली को समझाया ………अपना सुख देखना प्रेम नही है ……….प्रियतम के सुख में सुखी हो जाना ही प्रेम है ।
चन्द्रावली को प्रेम तत्व का सिद्धान्त सहजता में समझा दिया था रंगदेवी सखी नें …………..।
तुम सब राधा की सखी हो ……….तो कोई साधारण तो हो नही ……प्रेम सिद्धान्त को तुमसे बढ़िया और कौन समझ सकता है और समझा सकता है ……………अष्ट सखियों को प्रणाम करते हुये चन्द्रावली सखी धीरे धीरे चली गयीं थीं ।
सखियाँ आनन्दित हो उठीं ……….कुरुक्षेत्र में अब सनातन दो प्रेमी मिलनें वाले थे ……….आस्तित्व को प्रतीक्षा थी उस दिन की ।
हे वज्रनाभ ! भले ही लोग कहते रहें कि कुरुक्षेत्र ज्ञान और युद्ध की भूमि है ……..पर भूलना नही चाहिये कि ……कुरुक्षेत्र पहले प्रेम की भूमि है ……..गीता ज्ञान की घटना बाद में घटी है ………पहले तो प्रेमियों का जो महाकुम्भ हुआ …………श्रीराधा और श्याम सुन्दर जो मिले इस भूमि में ………….आहा ! मैं साक्षी था उस मिलन का ।
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ से कहा था ।
शेष चरित्र कल –
🌺 राधे राधे🌺
[2/4, 9:36 PM] Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (096)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है
‘कुर्वन्ति त्वयि रतिं कुशलाः’ रसिक का रस कहाँ से आता है, मजा कहाँ से आता है, सवाल यह है। तुमको मजा चाट खाने में आता है? शरीर से सटाने में मजा आता है? जब आँख में आँसू आते हैं तब भी मजा आता है? अपने मजा को तुमने कहाँ डाल दिया है? अपने मजा को पराये घर मत फेंको। जो कुशल पुरुष होते हैं वे अपनी रति कहाँ रखते हैं? त्वयि रतिं कुर्वन्ति। वे केवल श्रीकृष्ण से रति करते हैं। उनकी चमक-दमक, हँसी सब उन्हीं के लिए है। उन्हीं के लिए वे चमकते हैं, उन्हीं के लिए दमकते हैं, और उन्हीं के लिए हँसते हैं, उन्हीं के लिए सिसकारी भरते हैं।
कुशल बुद्धि का यह फल है कि हमारी प्रीति श्रीकृष्ण से जुड़े। नहीं तो अगर कृष्ण से, ईश्वर से नहीं जोड़ेंगे तो दुनिया में कहीं न कहीँ फँसेगी। ये कन्था (गुदड़ी) तो पुरानी भी हो जाती हैं, नये कपड़े से न मिले तो पुराने से भी सी लेते मगर यह जो दिल की गुदड़ी है वह अगर जवान से न जुड़े तो किसी बुड्ढे से भी जड़ जाती है। इसी से उपनिषद में यही आया है कि- यं सर्वोनवन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च- चे कोई मुमुक्षु हो चाहे ब्रह्मवादी हो, उसको अपने हृदय में जो रति है उस रति को भगवान के साथ जोड़ना चाहिए। यह व्यक्ति के हृदय का सवाल है, तत्त्व का सवाल नहीं है। इसलिए जितने बुद्धिमान पुरुष हैं वे आपमें रति करते हैं और इसी को उल्टा कहें तो? कि ‘ये त्वयि रतिं कुर्वन्ति ते कुशलाः’ जो तुमसे प्रेम करते हैं वही बुद्धिमान हैं। माने तुम्हीं से प्रेम करना और बुद्धिमान होना- दोनो एक ही बात है।
भगवान से प्रेम करने में क्या सुविधा ऐसी है? तो गोपी कहती हैं-
स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम
क्योंकि हे श्रीकृष्ण। तुम प्यार करने वाले का नित्यप्रिय अर्थात् परमप्रेमास्पद आत्मा हो। स्व आत्मन्। भागवत् में वर्णन आया है। गोवर्धन पहाड़ की चोटी पर बछड़े चर रहे थे। छठीकरा के पास, वृन्दावन से छः किलोमीटर है। जब गायों ने देखा कि हमारे बछड़े चर रहे हैं, तो दौड़ी- सिर उठाके, पूँछ उठाकर, दो पाँव पर; ग्वालों ने रोकने की कोशिश की, नहीं रुकीं।+
बड़ा क्रोध आया ग्वालों ने रोकने की कोशिश की, नहीं रुकी। बड़ा क्रोध आया ग्वालों को कि आज गायों को पीटें, गये तो देखा गायें अपने बड़े-बड़े बछड़ों को दूध पिलाने लगी हैं और ग्वालों ने स्वयं जब अपने बच्चों को देखा तो गोद में लेकर उनको प्यार करने लगे, आँसू आ गये आँख में और श्रीकृष्ण जी एक ओर खड़े। बलराम जी ने कहा-
यह क्या माया है लाला? कन्हैया, यह क्या खेल है कि तुम यहाँ खड़े हो और गौएं अपने बछड़ों को प्यार कर रही हैं, ग्वाले अपने बच्चों को प्यार करते हैं, तुम्हारे रहते ये क्या हुआ? देखो, बलरामजी ठीक प्रश्न करते हैं; सामने हों भगवान् और प्यार करें किसी दूसरे से?
बोले- माया है। श्रीकृष्ण ने कहा- हाँ दाऊ दादा! यह माया है। क्या माया है कि असली बछड़े और असली ग्वाले तो ब्रह्माजी के प्रपंच में हैं, और ये तो मैं हूँ, ये सब गवाले, सब बछड़े मैं हूँ, ये सब मुझसे प्रेम कर रहे हैं। तो राजा परीक्षित ने पूछा कि महाराज, यह क्या बात है कि सब लोग कृष्ण से प्रेम करते हैं? तो बोले- कृष्ण पराये किसी के नहीं है, सबके अपने प्रिय आत्मा हैं। श्रीकृष्ण में असत्पना नहीं है, मरने वाला नहीं है, श्रीकृष्ण में जड़ता नहीं है, श्रीकृष्ण में दुःख नहीं है, श्रीकृष्ण में दूरी नहीं है, श्रीकृष्ण के मिलने में देरी नहीं है, श्रीकृष्ण कोई पराये नहीं हैं। सबसे अधिक प्रेम हमारे अपने-आपसे ही होता है। स्व आत्मन नित्यप्रिये। नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम् ।
बोले- भाई, पति से प्रेम करो, पुत्रादि से प्रेम करो। कई पुरुष जो यहाँ तो सुनते हैं कथा और घर गये तो अपनी स्त्री को डाँट दिया कि तुम कथा में मत जाओ क्योंकि स्वामी जी कहते हैं कि पति – पुत्रादि से प्रेम मत करो, भगवान् से करो। फिर तुम क्यों सुनते हों? तो कहा- हम सुनकर आते हैं तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन अगर तुम सुनोगी, तो घर बिगड़ जायेगा। यह संसार के व्यवहार को बिगाड़ने वाली बात नहीं है। यह तो दूसरे का जो मोह है उसको भगवान् की ओर फेरने के लिए, बात है।++
ये पति-पुत्रादि जो सगे-संबंधी हैं, एक दिन उनसे वियोग होगा। ये छूटें तो इनसे वियोग होगा और वे छूटें तो वियोग होगा और जब वियोग होगा तो दुःख भी होगा ही। हमारी दृष्टि में कई लोग हैं, जिनका श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम है, प्रियतम भाव हैं। कृष्ण की भक्ति हृदय में आने के बाद उनके प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति का संसार से वियोग हो गया लेकिन हमने देखा कि उनके हृदय की ऐसी तैयारी है, जैसे एक साधु की तैयारी होती है कि भिक्षा मिलेगी तब भी ऐसे रहेंगे, और नहीं मिलेगी तब भी ऐसे रहेंगे। समता की यह तैयारी उन माताओं के हृदय में आ गयी हैं, कि सगे-संबंधी, रिश्तेदार, नातेदार बहुत बढ़िया हैं, ईश्वर के रूप हैं। और अगर ईश्वर उनको अपनी गोद में ले ले तो ईश्वर तो हमारा है। वे तो- ‘पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्’ अगर ईश्वर के अलावा किसी से रिश्ता जोड़ोगे तो भोग के लिए जड़ोगे, उनसे कुछ पाने के लिए जोड़ोगे, पर कहीं न कहीं देने वाला ऐसे स्थान पर पहुँच जायेगा, जहाँ वह ना कर देगा। एक ईश्वर ही ऐसा है जो अपने को देने में ना नहीं करता। दुनिया में सब दुःख देते हैं, केवल ईश्वर ही ऐसा है, कि उससे प्रेम करो तो दुःख कभी नहीं मिलेगा-
तत्रः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ।
हे परमेश्वर! श्रीकृष्ण के लिए गोपियाँ बोलती हैं- तुम परमेश्वर हो। परमा जो शक्ति है उसके स्वामी हो। अथवा परम ईश्वर, ईश्वर के भी ईश्वर प्राणेश्वर, हृदयेश्वर हो। और ईश्वर माने है उपाधि से असंश्लिष्ट होना- जो कभी अंतःकरण से बंधन में नहीं आता, जो कभी भावनाओं के वशीभूत नहीं होता, जो अपने आनन्दस्वरूप में, शान्त स्वरूप में अक्षेप रहता है; उसका नाम परमेश्वर है। हे परमेश्वर। ‘तत् नः प्रसीद’ हम लोगों के प्रति तुम प्रसन्न हो जाओ। हमारा अगर मुंह लटक गया है तो तुम्हारा भी तो मुँह लटक गया है। अच्छा मान लो, हमने आँख नीची कर ली हैं पर मुस्कुराओ तो सही, प्रसीद। हमको तुमने लौटने को कहा पर अपने को तो नहीं कहा? तुम तो यही रहोंगे। हमको लौटने को कहा तो हम तो रोती हैं, लेकिन तुमको तो यहाँ रहना है, तुम तो मुस्कुराओ।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (097)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है
‘प्रसीद’ तुम खुश होकर हमारी आँखों के रास्ते से हमारे दिल में अपना जो प्रसन्नरूप है उसको प्रकट करो। ‘मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र’ हे कमलनयन। माने इतनी कोमलता है तुम्हारी आँखों में, इतना रसीलापन है तुम्हारी आँखों में, और तुमने हमारे हृदय में एक आशा की लता लगयी है। तुमने हमारे हृदय में आशा का खेत बनाया, उसमें बीज बोया, उसको अंकुरित किया, सींचा, पल्लवित किया, पुष्पित किया, फलित किया।
ये आशा की लता अब लहला उठी, फूल गय गये, फल लग गये। तो विधि तो यह है, कायदा तो यह है कि अपने हाथ के लगाये हुए विष की बेल को भी नहीं उखाड़ना चाहिए। फिर यह प्रेमलता जो हमारे दिल में तुम्हारी ही लगायी हुई उसको क्यों उखाड़ना चाहते हो। अब तो इसके रसास्वादन का समय आया है। तुम इसको काटने क्यों जा रहे हो? यह तुम्हारी रसीली आँखों के लिए, ये तुम्हारे कोमल हृदय के लिए, ये तुम्हारे प्रेम के लिए, ये तुम्हारे अनुरूप नहीं है। अब रही बात जाने की। तो पाँव हमारे जल गये, रास्ता घर का भूल गया, अब लौटानें में तो तुम भी समर्थ नहीं हो; तुम कहो कि लौट जाओ तो तुम्हारी यह आज्ञा हम कैसे पालन करें, सामर्थ्य ही नहीं है पालन करने की!+
गोपियों की न लौट पा सकने की बेबसी और मर जाने के परिणाम का उद्घाटन
(चित्तं सुखेन….पदवीं सखे ते)
चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यत्रिर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये ।
पादौ पदं न चलस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा ।।
सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् ।
नो चेद् वयं विरजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।।
ये जो गोपियों के वचन हैं श्रीकृष्ण के प्रति, ये बोले गये हैं सीधे-साधे? परंतु गोपियों के भेद के समान ही- जैसे हजारों प्रकार की गोपियाँ हैं, और हजारों गोपियों के मन में हजारों भाव हैं, वैसे ही उनके एक-एक वचन में हजार-हजार भाव भी है। गोपी कहती हैं-
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्। तत्रः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ।।
यह मालूम पड़ता है कि बहुत बुद्धिमान है यह गोपी। श्रीकृष्ण से प्रेम करने से पहले श्रुति का प्रमाण दिया था-
देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून् सन्त्यज्य सर्विविषयांस्तव पादमूलम् ।
वेद में यह बात कही गयी है, कि जिनका परमप्रेमास्पद परमेश्वर है, जैसे वे अर्थ, धर्म, काम, सबकी इच्छा छोड़ करके परमेश्वर से प्रेम करते हैं और परमेश्वर उनका परित्याग नहीं करते वैसे हम भी सर्व विषयों का त्याग करके तुम्हारी शरण में आयी हैं। इसलिए तुम्हारे द्वारा हमारा त्याग उचित नहीं है। क्या रखा है विषयों में? ये तो आज हैं कल चले जायेंगे। ये संसार के भोग चार दिन ज्यादा रहें, चार दिन कम रहें, छोड़कर ये जायेंगे जरूर।++
जैसे भोग नष्ट हो जाते हैं, इंद्रियों की शक्ति क्षीण हो जाती है, मन में रुचि नहीं रहती है, शरीर सूख जाता है, चाहे भोगने वाला मरे, चाहे भोगे जानेवाला मरे, लेकिन संसार के विषय में वियोग जरूर है। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो हमेशा अपने पास रहे। जब एक दिन छूटेंगे ही तब जान बूझकर क्यों नहीं छोड़ देते?
अगर संसार के विषय तुम्हें छोड़कर जायेंगे, तो तुम बड़ा दुःख होगा, परंतु अगर तुम छोड़कर चले गये तो छाती ठोंककर भरी सभा में खड़े होकर कह सकेंगे कि मैंने छोड़ दिया, तुमको छोड़ने का सुख होगा, त्याग-वैराग्य सुख मिलेगा, मालूम होता है कि यह गोपी बहुत विदुषी है, उसने धर्म का निर्णय दिया-
यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
धर्म की दृष्टि से देखो तो अंतःकरण की शुद्धि धर्म का फल है। भक्ति का फल है- अंतःकरण की द्रवता, अंतःकरण की भगवदाकारता।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवास्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ।।
सबके असली प्यारे तुम हो, अगर तुमसे प्रेम नहीं किया तो प्रेम गलत रास्ते पर बह गया। किसी के घर में आया गंगाजल, लेकिन बदकिस्मती ऐसी, दुर्भाग्य ऐसा, कि फूटे बर्तन में रख दिया; सारा जल बह गया। प्रेम अमृत है, यह इधर-उधर बहाने के लिए नहीं है, यह तो ईश्वर को तृप्त करने के लिए है। अपने प्रेम से परमेश्वर को तृप्त कर दो। प्रेम यदि पति-पुत्रादि से किया तो दुःख अवश्यम्भावी है- ‘पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्।’ फिर गोपी बोली कि देखो, तुमने अपने रसीले बड़े-बड़े सुंदर-सुंदर नेत्रों से प्रेम रस की वर्षा करके हमारे हृदय में जो आशा-लता थी, उसका पोषण किया, और हमारा मन चारों ओर से हटकर तुम्हारे मन में लग गया। अब उस प्रेमलता को काटो मत। इसके बाद गोपी ने कहा- ‘कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः’ संसार में बुद्धिमान् होने का लक्षण क्या है?
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 16
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नात्यश्र्नतस्तु योगोSस्ति न चैकान्तमनश्र्नतः |
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || १६ ||
न – कभी नहीं; अति – अधिक; अश्नतः – खाने वाले का; तु – लेकिन; योगः – भगवान् से जुड़ना; अस्ति – है; न – न तो; च – भी; एकान्तम् – बिलकुल, नितान्त; अनश्नतः – भोजन न करने वाले का; न – न तो; च – भी; अति – अत्यधिक; स्वप्न-शीलस्य – सोने वाले का; जाग्रतः – अथवा रात भर जागते रहने वाले का; न – नहीं; एव – ही; च – तथा; अर्जुन – हे अर्जुन |
भावार्थ
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हे अर्जुन! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है |
तात्पर्य
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यहाँ पर योगियों के लिए भोजन तथा नींद के नियमन की संस्तुति की गई है | अधिक भोजन का अर्थ है शरीर तथा आत्मा को बनाये रखने के लिए आवश्यकता से अधिक भोजन करना | मनुष्यों में मांसाहार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रचुर मात्रा में अन्न, शाक, फल तथा दुग्ध उपलब्ध हैं | ऐसे सादे भोज्यपदार्थ भगवद्गीता के अनुसार सतोगुणी माने जाते हैं | मांसाहार तो तमोगुणियों के लिए है | अतः जो लोग मांसाहार करते हैं, मद्यपान करते हैं, धूम्रपान करते हैं और कृष्ण को भोग लगाये बिना भोजन करते हैं वे पापकर्मों का भोग करेंगे क्योंकि वे दूषित वस्तुएँ खाते हैं | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् | जो व्यक्ति इन्द्रियसुख के लिए खाता है या अपने लिए भोजन बनाता है, किन्तु कृष्ण को भोजन अर्पित नहीं करता वह केवल पाप खाता है | जो पाप खाता है और नियत मात्र से अधिक भोजन करता है वह पूर्णयोग का पालन नहीं कर सकता | सबसे उत्तम यही है कि कृष्ण को अर्पित भोजन के अच्छिष्ट भाग को ही खाया जाय | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कभी भी ऐसा भोजन नहीं करता, जो इससे पूर्ण कृष्ण को अर्पित न किया गया हो | अतः केवल कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही योगाभ्यास में पूर्णता प्राप्त कर सकता है | न ही ऐसा व्यक्ति कभी योग का अभ्यास कर सकता है जो कृत्रिम उपवास की अपनी विधियाँ निकाल कर भोजन नहीं करता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शास्त्रों द्वारा अनुमोदित उपवास करता है | न तो वह आवश्यकता से अधिक उपवास रखता है, ण ही अधिक खाता है | इस प्रकार वह योगाभ्यास करने के लिए पूर्णतया योग्य है | जो आवश्यकता से अधिक खाता है वह सोते समय अनेक सपने देखेगा, अतः आवश्यकता से अधिक सोएगा | मनुष्य को प्रतिदिन छः घंटे से अधिक नहीं सोना चाहिए | जो व्यक्ति चौबीस घंटो में से छः घंटो से अधिक सोता है, वह अवश्य ही तमोगुणी है | तमोगुणी व्यक्ति आलसी होता है और अधिक सोता है | ऐसा व्यक्ति योग नहीं साध सकता |
“प्रियतम मिलेंगे” – कुरुक्षेत्र जानें की तैयारी
भाग 3
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तब वो श्याम मुझ से कहता ……..चन्द्रावली ! अभी मुकुट दे दे ……शाम को आऊँगा …….तब मैं ही तुझे अपनें हृदय से लगाउँगा …….मैं भोली भाली …..मान जाती ……….मुकुट बाँसुरी दे देती …..पर वो नही आता था ………..हाँ ………मैने कई बार देखा …………वो राधा को ही अपनें हृदय से लगाये रखता था …………..और मुझे पता है …….कुरुक्षेत्र में भी वो राधा को ही देखेगा ……….तुम्हे और हमें नही देखनें वाला ………..चन्द्रावली रोते हुए बोली थी ।
तुम तो श्याम सुन्दर से प्रेम करती हो ना जीजी !
ललिता नें सम्भाला चन्द्रावली को ।
बहुत प्रेम करती हूँ ललिता ! चन्द्रावली नें आँसू पोंछते हुए कहा ।
फिर प्रेम में तो प्रियतम की ख़ुशी ही सर्वोपरि है ना !………श्याम सुन्दर को अच्छा लगेगा ….श्याम सुन्दर प्रसन्न होंगें ……..यही क्या बड़ी बात नही हैं जीजी ! ……. जीजी ! हम भी प्रेम करती हैं श्याम सुन्दर से …….बहुत करती हैं ……….पर श्याम सुन्दर हमारी श्रीराधा रानी से प्रेम करते हैं ……..इसलिये हमारे लिये श्रीराधा रानी महत्व की हैं …..क्यों की हमारा श्याम इनसे ही प्रसन्न होता है ।
रंगदेवी सखी आगे आईँ ……..चन्द्रावली का हाथ पकड़ते हुए बोलीं …..
जीजी ! ये सूचना अत्यन्त सुखद है ……..मानों ऐसा लग रहा है कि …सदियों बाद सूखी धरती जल से अपनी प्यास बुझाएगी ………….
कुरुक्षेत्र सब जायेंगें ……….हम सब अपनें प्राण श्याम सुन्दर को देखेंगें ……..उनकी जिस में प्रसन्नता हो ….हम वही करेंगें ।
और जीजी ! प्रेम का सिद्धान्त भी यही कहता है ।
हमारे गहवर वन में बस यही युगलनाम चलता रहता है ………
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे !
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे !!
रंगदेवी सखी नें कहा – जीजी ! हम मात्र श्रीराधा का नाम नही लेतीं …..न हम केवल श्याम सुन्दर का ही नाम लेते हैं ……
हम दोनों का नाम लेते हैं …………क्यों ? इसलिये कि …..
“कृष्ण” कहनें से …….हमारी स्वामिनी श्रीराधा रानी प्रसन्न होती हैं ….और “राधा” कहनें से हमारे श्याम सुन्दर प्रसन्न होते हैं ।
रंगदेवी सखी नें चन्द्रावली को समझाया ………अपना सुख देखना प्रेम नही है ……….प्रियतम के सुख में सुखी हो जाना ही प्रेम है ।
चन्द्रावली को प्रेम तत्व का सिद्धान्त सहजता में समझा दिया था रंगदेवी सखी नें …………..।
तुम सब राधा की सखी हो ……….तो कोई साधारण तो हो नही ……प्रेम सिद्धान्त को तुमसे बढ़िया और कौन समझ सकता है और समझा सकता है ……………अष्ट सखियों को प्रणाम करते हुये चन्द्रावली सखी धीरे धीरे चली गयीं थीं ।
सखियाँ आनन्दित हो उठीं ……….कुरुक्षेत्र में अब सनातन दो प्रेमी मिलनें वाले थे ……….आस्तित्व को प्रतीक्षा थी उस दिन की ।
हे वज्रनाभ ! भले ही लोग कहते रहें कि कुरुक्षेत्र ज्ञान और युद्ध की भूमि है ……..पर भूलना नही चाहिये कि ……कुरुक्षेत्र पहले प्रेम की भूमि है ……..गीता ज्ञान की घटना बाद में घटी है ………पहले तो प्रेमियों का जो महाकुम्भ हुआ …………श्रीराधा और श्याम सुन्दर जो मिले इस भूमि में ………….आहा ! मैं साक्षी था उस मिलन का ।
महर्षि शाण्डिल्य नें वज्रनाभ से कहा था ।
शेष चरित्र कल –
🌺 राधे राधे🌺
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (096)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है
‘कुर्वन्ति त्वयि रतिं कुशलाः’ रसिक का रस कहाँ से आता है, मजा कहाँ से आता है, सवाल यह है। तुमको मजा चाट खाने में आता है? शरीर से सटाने में मजा आता है? जब आँख में आँसू आते हैं तब भी मजा आता है? अपने मजा को तुमने कहाँ डाल दिया है? अपने मजा को पराये घर मत फेंको। जो कुशल पुरुष होते हैं वे अपनी रति कहाँ रखते हैं? त्वयि रतिं कुर्वन्ति। वे केवल श्रीकृष्ण से रति करते हैं। उनकी चमक-दमक, हँसी सब उन्हीं के लिए है। उन्हीं के लिए वे चमकते हैं, उन्हीं के लिए दमकते हैं, और उन्हीं के लिए हँसते हैं, उन्हीं के लिए सिसकारी भरते हैं।
कुशल बुद्धि का यह फल है कि हमारी प्रीति श्रीकृष्ण से जुड़े। नहीं तो अगर कृष्ण से, ईश्वर से नहीं जोड़ेंगे तो दुनिया में कहीं न कहीँ फँसेगी। ये कन्था (गुदड़ी) तो पुरानी भी हो जाती हैं, नये कपड़े से न मिले तो पुराने से भी सी लेते मगर यह जो दिल की गुदड़ी है वह अगर जवान से न जुड़े तो किसी बुड्ढे से भी जड़ जाती है। इसी से उपनिषद में यही आया है कि- यं सर्वोनवन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च- चे कोई मुमुक्षु हो चाहे ब्रह्मवादी हो, उसको अपने हृदय में जो रति है उस रति को भगवान के साथ जोड़ना चाहिए। यह व्यक्ति के हृदय का सवाल है, तत्त्व का सवाल नहीं है। इसलिए जितने बुद्धिमान पुरुष हैं वे आपमें रति करते हैं और इसी को उल्टा कहें तो? कि ‘ये त्वयि रतिं कुर्वन्ति ते कुशलाः’ जो तुमसे प्रेम करते हैं वही बुद्धिमान हैं। माने तुम्हीं से प्रेम करना और बुद्धिमान होना- दोनो एक ही बात है।
भगवान से प्रेम करने में क्या सुविधा ऐसी है? तो गोपी कहती हैं-
स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम
क्योंकि हे श्रीकृष्ण। तुम प्यार करने वाले का नित्यप्रिय अर्थात् परमप्रेमास्पद आत्मा हो। स्व आत्मन्। भागवत् में वर्णन आया है। गोवर्धन पहाड़ की चोटी पर बछड़े चर रहे थे। छठीकरा के पास, वृन्दावन से छः किलोमीटर है। जब गायों ने देखा कि हमारे बछड़े चर रहे हैं, तो दौड़ी- सिर उठाके, पूँछ उठाकर, दो पाँव पर; ग्वालों ने रोकने की कोशिश की, नहीं रुकीं।+
बड़ा क्रोध आया ग्वालों ने रोकने की कोशिश की, नहीं रुकी। बड़ा क्रोध आया ग्वालों को कि आज गायों को पीटें, गये तो देखा गायें अपने बड़े-बड़े बछड़ों को दूध पिलाने लगी हैं और ग्वालों ने स्वयं जब अपने बच्चों को देखा तो गोद में लेकर उनको प्यार करने लगे, आँसू आ गये आँख में और श्रीकृष्ण जी एक ओर खड़े। बलराम जी ने कहा-
यह क्या माया है लाला? कन्हैया, यह क्या खेल है कि तुम यहाँ खड़े हो और गौएं अपने बछड़ों को प्यार कर रही हैं, ग्वाले अपने बच्चों को प्यार करते हैं, तुम्हारे रहते ये क्या हुआ? देखो, बलरामजी ठीक प्रश्न करते हैं; सामने हों भगवान् और प्यार करें किसी दूसरे से?
बोले- माया है। श्रीकृष्ण ने कहा- हाँ दाऊ दादा! यह माया है। क्या माया है कि असली बछड़े और असली ग्वाले तो ब्रह्माजी के प्रपंच में हैं, और ये तो मैं हूँ, ये सब गवाले, सब बछड़े मैं हूँ, ये सब मुझसे प्रेम कर रहे हैं। तो राजा परीक्षित ने पूछा कि महाराज, यह क्या बात है कि सब लोग कृष्ण से प्रेम करते हैं? तो बोले- कृष्ण पराये किसी के नहीं है, सबके अपने प्रिय आत्मा हैं। श्रीकृष्ण में असत्पना नहीं है, मरने वाला नहीं है, श्रीकृष्ण में जड़ता नहीं है, श्रीकृष्ण में दुःख नहीं है, श्रीकृष्ण में दूरी नहीं है, श्रीकृष्ण के मिलने में देरी नहीं है, श्रीकृष्ण कोई पराये नहीं हैं। सबसे अधिक प्रेम हमारे अपने-आपसे ही होता है। स्व आत्मन नित्यप्रिये। नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम् ।
बोले- भाई, पति से प्रेम करो, पुत्रादि से प्रेम करो। कई पुरुष जो यहाँ तो सुनते हैं कथा और घर गये तो अपनी स्त्री को डाँट दिया कि तुम कथा में मत जाओ क्योंकि स्वामी जी कहते हैं कि पति – पुत्रादि से प्रेम मत करो, भगवान् से करो। फिर तुम क्यों सुनते हों? तो कहा- हम सुनकर आते हैं तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ता, लेकिन अगर तुम सुनोगी, तो घर बिगड़ जायेगा। यह संसार के व्यवहार को बिगाड़ने वाली बात नहीं है। यह तो दूसरे का जो मोह है उसको भगवान् की ओर फेरने के लिए, बात है।++
ये पति-पुत्रादि जो सगे-संबंधी हैं, एक दिन उनसे वियोग होगा। ये छूटें तो इनसे वियोग होगा और वे छूटें तो वियोग होगा और जब वियोग होगा तो दुःख भी होगा ही। हमारी दृष्टि में कई लोग हैं, जिनका श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम है, प्रियतम भाव हैं। कृष्ण की भक्ति हृदय में आने के बाद उनके प्रिय-से-प्रिय व्यक्ति का संसार से वियोग हो गया लेकिन हमने देखा कि उनके हृदय की ऐसी तैयारी है, जैसे एक साधु की तैयारी होती है कि भिक्षा मिलेगी तब भी ऐसे रहेंगे, और नहीं मिलेगी तब भी ऐसे रहेंगे। समता की यह तैयारी उन माताओं के हृदय में आ गयी हैं, कि सगे-संबंधी, रिश्तेदार, नातेदार बहुत बढ़िया हैं, ईश्वर के रूप हैं। और अगर ईश्वर उनको अपनी गोद में ले ले तो ईश्वर तो हमारा है। वे तो- ‘पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्’ अगर ईश्वर के अलावा किसी से रिश्ता जोड़ोगे तो भोग के लिए जड़ोगे, उनसे कुछ पाने के लिए जोड़ोगे, पर कहीं न कहीं देने वाला ऐसे स्थान पर पहुँच जायेगा, जहाँ वह ना कर देगा। एक ईश्वर ही ऐसा है जो अपने को देने में ना नहीं करता। दुनिया में सब दुःख देते हैं, केवल ईश्वर ही ऐसा है, कि उससे प्रेम करो तो दुःख कभी नहीं मिलेगा-
तत्रः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ।
हे परमेश्वर! श्रीकृष्ण के लिए गोपियाँ बोलती हैं- तुम परमेश्वर हो। परमा जो शक्ति है उसके स्वामी हो। अथवा परम ईश्वर, ईश्वर के भी ईश्वर प्राणेश्वर, हृदयेश्वर हो। और ईश्वर माने है उपाधि से असंश्लिष्ट होना- जो कभी अंतःकरण से बंधन में नहीं आता, जो कभी भावनाओं के वशीभूत नहीं होता, जो अपने आनन्दस्वरूप में, शान्त स्वरूप में अक्षेप रहता है; उसका नाम परमेश्वर है। हे परमेश्वर। ‘तत् नः प्रसीद’ हम लोगों के प्रति तुम प्रसन्न हो जाओ। हमारा अगर मुंह लटक गया है तो तुम्हारा भी तो मुँह लटक गया है। अच्छा मान लो, हमने आँख नीची कर ली हैं पर मुस्कुराओ तो सही, प्रसीद। हमको तुमने लौटने को कहा पर अपने को तो नहीं कहा? तुम तो यही रहोंगे। हमको लौटने को कहा तो हम तो रोती हैं, लेकिन तुमको तो यहाँ रहना है, तुम तो मुस्कुराओ।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (097)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
श्रीकृष्ण में रति ही बुद्धिमानी है
‘प्रसीद’ तुम खुश होकर हमारी आँखों के रास्ते से हमारे दिल में अपना जो प्रसन्नरूप है उसको प्रकट करो। ‘मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र’ हे कमलनयन। माने इतनी कोमलता है तुम्हारी आँखों में, इतना रसीलापन है तुम्हारी आँखों में, और तुमने हमारे हृदय में एक आशा की लता लगयी है। तुमने हमारे हृदय में आशा का खेत बनाया, उसमें बीज बोया, उसको अंकुरित किया, सींचा, पल्लवित किया, पुष्पित किया, फलित किया।
ये आशा की लता अब लहला उठी, फूल गय गये, फल लग गये। तो विधि तो यह है, कायदा तो यह है कि अपने हाथ के लगाये हुए विष की बेल को भी नहीं उखाड़ना चाहिए। फिर यह प्रेमलता जो हमारे दिल में तुम्हारी ही लगायी हुई उसको क्यों उखाड़ना चाहते हो। अब तो इसके रसास्वादन का समय आया है। तुम इसको काटने क्यों जा रहे हो? यह तुम्हारी रसीली आँखों के लिए, ये तुम्हारे कोमल हृदय के लिए, ये तुम्हारे प्रेम के लिए, ये तुम्हारे अनुरूप नहीं है। अब रही बात जाने की। तो पाँव हमारे जल गये, रास्ता घर का भूल गया, अब लौटानें में तो तुम भी समर्थ नहीं हो; तुम कहो कि लौट जाओ तो तुम्हारी यह आज्ञा हम कैसे पालन करें, सामर्थ्य ही नहीं है पालन करने की!+
गोपियों की न लौट पा सकने की बेबसी और मर जाने के परिणाम का उद्घाटन
(चित्तं सुखेन….पदवीं सखे ते)
चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यत्रिर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये ।
पादौ पदं न चलस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा ।।
सिञ्चांग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निम् ।
नो चेद् वयं विरजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।।
ये जो गोपियों के वचन हैं श्रीकृष्ण के प्रति, ये बोले गये हैं सीधे-साधे? परंतु गोपियों के भेद के समान ही- जैसे हजारों प्रकार की गोपियाँ हैं, और हजारों गोपियों के मन में हजारों भाव हैं, वैसे ही उनके एक-एक वचन में हजार-हजार भाव भी है। गोपी कहती हैं-
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन् नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्। तत्रः प्रसीद परमेश्वर मा स्म छिन्द्या आशां भृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ।।
यह मालूम पड़ता है कि बहुत बुद्धिमान है यह गोपी। श्रीकृष्ण से प्रेम करने से पहले श्रुति का प्रमाण दिया था-
देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून् सन्त्यज्य सर्विविषयांस्तव पादमूलम् ।
वेद में यह बात कही गयी है, कि जिनका परमप्रेमास्पद परमेश्वर है, जैसे वे अर्थ, धर्म, काम, सबकी इच्छा छोड़ करके परमेश्वर से प्रेम करते हैं और परमेश्वर उनका परित्याग नहीं करते वैसे हम भी सर्व विषयों का त्याग करके तुम्हारी शरण में आयी हैं। इसलिए तुम्हारे द्वारा हमारा त्याग उचित नहीं है। क्या रखा है विषयों में? ये तो आज हैं कल चले जायेंगे। ये संसार के भोग चार दिन ज्यादा रहें, चार दिन कम रहें, छोड़कर ये जायेंगे जरूर।++
जैसे भोग नष्ट हो जाते हैं, इंद्रियों की शक्ति क्षीण हो जाती है, मन में रुचि नहीं रहती है, शरीर सूख जाता है, चाहे भोगने वाला मरे, चाहे भोगे जानेवाला मरे, लेकिन संसार के विषय में वियोग जरूर है। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो हमेशा अपने पास रहे। जब एक दिन छूटेंगे ही तब जान बूझकर क्यों नहीं छोड़ देते?
अगर संसार के विषय तुम्हें छोड़कर जायेंगे, तो तुम बड़ा दुःख होगा, परंतु अगर तुम छोड़कर चले गये तो छाती ठोंककर भरी सभा में खड़े होकर कह सकेंगे कि मैंने छोड़ दिया, तुमको छोड़ने का सुख होगा, त्याग-वैराग्य सुख मिलेगा, मालूम होता है कि यह गोपी बहुत विदुषी है, उसने धर्म का निर्णय दिया-
यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
धर्म की दृष्टि से देखो तो अंतःकरण की शुद्धि धर्म का फल है। भक्ति का फल है- अंतःकरण की द्रवता, अंतःकरण की भगवदाकारता।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवास्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा ।।
सबके असली प्यारे तुम हो, अगर तुमसे प्रेम नहीं किया तो प्रेम गलत रास्ते पर बह गया। किसी के घर में आया गंगाजल, लेकिन बदकिस्मती ऐसी, दुर्भाग्य ऐसा, कि फूटे बर्तन में रख दिया; सारा जल बह गया। प्रेम अमृत है, यह इधर-उधर बहाने के लिए नहीं है, यह तो ईश्वर को तृप्त करने के लिए है। अपने प्रेम से परमेश्वर को तृप्त कर दो। प्रेम यदि पति-पुत्रादि से किया तो दुःख अवश्यम्भावी है- ‘पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्।’ फिर गोपी बोली कि देखो, तुमने अपने रसीले बड़े-बड़े सुंदर-सुंदर नेत्रों से प्रेम रस की वर्षा करके हमारे हृदय में जो आशा-लता थी, उसका पोषण किया, और हमारा मन चारों ओर से हटकर तुम्हारे मन में लग गया। अब उस प्रेमलता को काटो मत। इसके बाद गोपी ने कहा- ‘कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः’ संसार में बुद्धिमान् होने का लक्षण क्या है?
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे ] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 16
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नात्यश्र्नतस्तु योगोSस्ति न चैकान्तमनश्र्नतः |
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || १६ ||
न – कभी नहीं; अति – अधिक; अश्नतः – खाने वाले का; तु – लेकिन; योगः – भगवान् से जुड़ना; अस्ति – है; न – न तो; च – भी; एकान्तम् – बिलकुल, नितान्त; अनश्नतः – भोजन न करने वाले का; न – न तो; च – भी; अति – अत्यधिक; स्वप्न-शीलस्य – सोने वाले का; जाग्रतः – अथवा रात भर जागते रहने वाले का; न – नहीं; एव – ही; च – तथा; अर्जुन – हे अर्जुन |
भावार्थ
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हे अर्जुन! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है अथवा जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई सम्भावना नहीं है |
तात्पर्य
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यहाँ पर योगियों के लिए भोजन तथा नींद के नियमन की संस्तुति की गई है | अधिक भोजन का अर्थ है शरीर तथा आत्मा को बनाये रखने के लिए आवश्यकता से अधिक भोजन करना | मनुष्यों में मांसाहार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रचुर मात्रा में अन्न, शाक, फल तथा दुग्ध उपलब्ध हैं | ऐसे सादे भोज्यपदार्थ भगवद्गीता के अनुसार सतोगुणी माने जाते हैं | मांसाहार तो तमोगुणियों के लिए है | अतः जो लोग मांसाहार करते हैं, मद्यपान करते हैं, धूम्रपान करते हैं और कृष्ण को भोग लगाये बिना भोजन करते हैं वे पापकर्मों का भोग करेंगे क्योंकि वे दूषित वस्तुएँ खाते हैं | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् | जो व्यक्ति इन्द्रियसुख के लिए खाता है या अपने लिए भोजन बनाता है, किन्तु कृष्ण को भोजन अर्पित नहीं करता वह केवल पाप खाता है | जो पाप खाता है और नियत मात्र से अधिक भोजन करता है वह पूर्णयोग का पालन नहीं कर सकता | सबसे उत्तम यही है कि कृष्ण को अर्पित भोजन के अच्छिष्ट भाग को ही खाया जाय | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कभी भी ऐसा भोजन नहीं करता, जो इससे पूर्ण कृष्ण को अर्पित न किया गया हो | अतः केवल कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही योगाभ्यास में पूर्णता प्राप्त कर सकता है | न ही ऐसा व्यक्ति कभी योग का अभ्यास कर सकता है जो कृत्रिम उपवास की अपनी विधियाँ निकाल कर भोजन नहीं करता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शास्त्रों द्वारा अनुमोदित उपवास करता है | न तो वह आवश्यकता से अधिक उपवास रखता है, ण ही अधिक खाता है | इस प्रकार वह योगाभ्यास करने के लिए पूर्णतया योग्य है | जो आवश्यकता से अधिक खाता है वह सोते समय अनेक सपने देखेगा, अतः आवश्यकता से अधिक सोएगा | मनुष्य को प्रतिदिन छः घंटे से अधिक नहीं सोना चाहिए | जो व्यक्ति चौबीस घंटो में से छः घंटो से अधिक सोता है, वह अवश्य ही तमोगुणी है | तमोगुणी व्यक्ति आलसी होता है और अधिक सोता है | ऐसा व्यक्ति योग नहीं साध सकता |


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