🌻🦚🌻🦚🌻
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 138 !!
भाग 1
🌲🦜🌲🦜🌲
अनन्त आकाश में हर दिन हर रात कहीं न कहीं चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण पड़ता ही रहता है …….ज्योतिष भी कहता है ………..कि राहू छाँया पुत्र है ….यानि छायाँ से प्रकट है राहू……….सूर्य और चन्द्र के बीच में पृथ्वी की छायाँ पड़ती ही रहती है ……..पृथ्वी छोटी है सूर्य से …..इसलिये उसे पूरा ढँक पाना पृथ्वी के लिए भी मुश्किल ही पड़ता है …..पर पृथ्वी चन्द्रमा से बड़ी है ……..इसलिये चन्द्रमा को पृथ्वी की छायाँ ढँक लेती है ……….सूर्य ग्रहण की अपेक्षा चन्द्र ग्रहण ज्यादा ही पड़ते हैं इसका कारण भी यही है ……….पूर्ण चन्द्र ग्रहण पड़ता है …..पर पूर्ण सूर्य ग्रहण कम ही पड़ता है…….और जब पूर्ण सूर्य ग्रहण पड़ता है ……..तब ज्योतिष का कहना है कि …जहाँ यह दिखाई दे …..उस स्थान पर उसका प्रभाव अच्छा बुरा होता ही है ।
ये विषय , गणितज्ञों के शोध का विषय है ………क्यों की शुद्ध गणित है ये ……..ये कोई अंध श्रद्धा नही है …………….
कहते हैं……..पूर्ण सूर्यग्रहण जब पड़ता है……..तो उसका प्रभाव पृथ्वी वासियों को भुगतना पड़ता है ………पूर्ण सूर्यग्रहण …..यानि दिन में ही अन्धकार हो जाए ………और तारे भी दीखनें लगें ।
पृथ्वी की छायाँ नें सूर्य को ढँक दिया ………..कहते हैं इस तरह की ग्रहों में कोई भी घटना घटती है …….तब पृथ्वी पर महामारी या भीषण युद्ध या कुछ दैवीय आपदा, बड़े पैमानें पर होते ही हैं ।
साधक चाहें तो महाभारत के युद्ध को इस सूर्य ग्रहण से जोड़कर देख सकते हैं कि ……..ज्योतिष तो इसी तरह महाभारत के संग्राम को देखता है ……कि खग्रास पूर्ण सूर्य ग्रहण पड़ा था ………तभी महाभारत हुआ ।
अच्छा ! ज्योतिष शास्त्र यह भी कहता है कि …..चन्द्र ग्रहण के समय काशी वाराणसी की गंगा में स्नान करनें से पुण्यफल की प्राप्ति होती है ……और सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करनें से पुण्यफल की प्राप्ति होती है ………….और हाँ …..ज्योतिष ये भी कहता है कि ….ग्रहण पड़ रहा है …….पर अगर आपके यहाँ वह ग्रहण दिखाई नही दे रहा …..तो उसका कोई असर आप पर होनें वाला नही है ।
आज का युग पूरी तरह मनमानी पर चलनें वाला युग है ………..
शास्त्र की बातें हमें माननी नही हैं……..पाश्चात्य का प्रभाव हर क्षेत्र में दिखाई दे रहा है ……यहाँ तक की अध्यात्म में भी पाश्चात्य का दखल स्पष्ट दृष्टि गोचर हो रहा है……….ऐसे युग में भी सूर्य ग्रहण के समय लाखों लोग कुरुक्षेत्र में स्नान के लिये जाते हुए दिखाई देते हैं ……काशी वाराणसी में चन्द्र ग्रहण के समय लाखों लोग स्नान करते हैं …..।
…..तो आज से साढे पाँच हजार वर्ष पहले जब मात्र हम सनातन धर्मावलंवी ही थे…..अन्य ये तथाकथित इस्लाम, या ईसाई ये तो जन्में भी नही थे…..तब कितनी भीड़ रही होगी …..एक कल्पना करो ।
साधकों ! मैं ज्योतिष का ज्ञाता नही हूँ ……….न अच्छा गणितज्ञ ही हूँ ……पर मुझे लगा कि …….सूर्यग्रहण के समय और आज से साढे पाँच हजार वर्ष पहले का दृश्य कैसा होगा …..”भावना” कर रहा था ।
भावना को आप कल्पना भी कह सकते हैं ……मुझे कोई आपत्ति नही है ।
पर मेरा चिन्तन खूब हो रहा है……आप लोग इस “श्रीराधाचरितामृतम्”
से कितना लाभ ले रहे हो ………मुझे नही पता ……..पर मुझे भरपूर लाभ मिल रहा है……मेरा अन्तःकरण पवित्र हो रहा है…….और श्रीराधारानी जू के पावन चरित्रों का चिन्तन करते हुए मैं जब लिखता हूँ …….तब मेरी आँखें सहज बरसनें लगती हैं ………..उस समय जो आनन्द आता है …………मैं उसे बता नही सकता ।
उसी आनन्द के लिये ……… मैं ये लिखता हूँ ।
अब चलिये ! कुरुक्षेत्र ……………
महर्षि ! देखिये ना !
मनसुख कहाँ गया ? इस भीड़ में कहाँ खो गया ?
हे वज्रनाभ ! मेरे पास फिर आगये थे नन्द राय जी ।
अब तो ब्रह्ममुहूर्त की भी वेला होनें जा रही हैं ………..वो कहाँ गया ?
पौर्णमासी माता को मैं क्या जबाब दूँगा……..उनके लाड़ले मनसुख को हमनें कुरुक्षेत्र लाकर खो दिया ………….
वज्रनाभ ! मैं ध्यान में बैठ गया था …………….पर नन्दराय नें मुझे ध्यान से उठा दिया ………..कितनें भोले हैं ये नन्द जी ……..कोई बालक तो नही है मनसुख, आही जाएगा ।
श्रीदामा, मधुमंगल, तोक, भद्र ये सब सखा भी जग गए थे …….
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
🍁 राधे राधे🍁
[Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 18 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
हिय हरनी सुख की महा, विस्तरनी कवनीय।
बिपिन चंद्रकी चंद्रिका, जै राधा रवनीय ॥
॥ पद ॥
जै जै राधिका रवनी कवनी, चंद्रिका बन चंद्र की ॥
रंग रंगीली छैल छबीली, हिय हरनी चंपक बरनी ।
नवल नागरी नीरज नैनी, नव नागर सुख विस्तरनी ॥
अमित अलौकिक सुख की धामा, श्रीस्यामा सोभा सदनी।
महामोहनी मनमोहन की, मन मोहन वारिज बदनी ॥
अँग अंग आभा अभरन की, निरखि नैंन चकचौंधी होति ।
वृन्दावन की बगर बगर में, जगर-मगर जगमगि रहि जोति ॥
कोक-कला कुल कोबिद कुसल, किसोर-किसोरी जोरी ऐंन ।
बिहरत बिबिधि बिहार उदार, बिहारी बिहारनि सब सुख देंन ॥
स्यामसुंदर बर रसिक पुरंदर, गुन मंदिर गोरी कौ कंत ।
छिन छिन नव नव भाव तरंगनि, अंग अनंगनि के सरसंत ॥
प्रिया प्रान-प्रीतम की जीवनि, प्रीतम प्रिया प्रान आधार ।
सदा सनातन रहत स्वतंतर, रमत निरंतर नित्य बिहार ॥
सखी सबै नवरंग रंगीली, जानत जुगल हियें कौ हेत ।
सोई सोइ प्रगट दिखावत अनुदिन, सब भाँतिनसों सबसुख देत ॥
प्रेम पयोधि परे दोउ प्यार, पल न्यारे होत न अँग अंग।
रंगमहल की टहल करत जहाँ, हितु सहचरि श्रीहरिप्रिया संग ॥८॥
युगल रस मूर्ति ही इस निकुँज के उपास्य हैं ….युगल में भी श्रीराधा प्रधान उपासना है । हरिप्रिया जी मुझे बता रहीं थीं । ये युगल कब प्रकटे ? मैंने जब ये प्रश्न किया हरिप्रिया जी से तो उनका उत्तर था …कालातीत हैं ये …फिर कैसे बताया जाये कि कब प्रकटे । आगे मैं प्रश्न भूल जाऊँगा इसलिए मैंने ये प्रश्न भी कर दिया …वेद आदि में लिखा है वो ब्रह्म एक था फिर दो हुआ …वो कब की घटना है ? मेरे इस प्रश्न को सुनकर हरिप्रिया जी हंसीं …और बोलीं …ऐसा कुछ नही हैं ….ये नित्य विहार की रसमयता में खो जाते हैं और एक हो जाते हैं …जब उस रति केलि से बाहर आते हैं तब ये दो हो जाते हैं । क्या कुँज,निकुँज इनके भी विभाग हैं ? मैंने अवसर जानकर ये प्रश्न भी कर दिया । हाँ , कुँज है …फिर निकुँज हैं , फिर नित्य निकुँज और निभृत निकुँज । कुँज में सबका प्रवेश है ….हरिप्रिया कहने लगीं । क्या पुंभाव का भी ? सखी जी बोलीं …नहीं , अहंकार का तो प्रवेश ही नही है । किन्तु कुँज में साधन वाले पहुँच सकते हैं …..यहाँ दूर से बस झलक मिलती है युगल सरकार की । इसके बाद आता है निकुँज …निकुँज में कृपा वाले ही पहुँचते हैं …साधन वालों की यहाँ पहुँच नही है । सखी वृन्द, मंजरी , सहेली आदि सब यहाँ होते हैं …अब हरिप्रिया जी कहती हैं …इसके बाद नित्य निकुँज …जहाँ ये युगल सरकार विहार करते हैं …यहाँ तक सखियों का प्रवेश है । किन्तु निभृत निकुँज में …मात्र प्रिया प्रियतम होते हैं …वो भी धीरे धीरे एक हो जाते हैं और सखियाँ भी प्रिया प्रियतम में समा जाती हैं ।
ये कहकर मौन हो गयीं सखी जी , यही रहस्य है इस निकुँज का । इतना अवश्य कहा ।
मैं भी उनके साथ मौन हो गया था …दिव्य अद्भुत निकुँज की प्रेम ऊर्जा मुझे घेर रही थी ।
“लाल जी के अन्तकरण को हरने वाली हमारी प्रिया जी की जय हो ..जय हो”।
हरिप्रिया सखी उन्मत्त हो गयीं थीं तो वो फिर स्वामिनी जू की जयजयकार करने लगीं थीं ।
“वो प्रियतम को मोहित करने वाली हैं …वो प्रियतम के हृदय में राज करने वाली हैं ….अपने कजरारे नयनों से प्रियतम के हृदय को विदीर्ण करने वाली हमारी प्रिया जी की जय हो जय हो “।
असीम दिव्य सुख की आलय कमल वदनी सदा कैशोर अवस्था में रहने वालीं ..अपने मंगल विग्रह से प्रियतम का मन मोहने वाली ऐसी मोहन मन मोहनी आपकी जय जय हो ।
हरिप्रिया गदगद हैं ….मेरे निभृत निकुँज की चर्चा छेड़ते ही उनको भाव का आवेश आगया था ।
अब सखी जी के सामने “लीला”चल पड़ी थी …कौन सी लीला ? अजी निभृत निकुँज की लीला …दो से एक होने की लीला ।
सुमन सेज पर प्रिया जी विराजी हैं, तनिक लज्जा के कारण नीचे देख रही हैं, उनका हिय धड़क रहा है, स्वाँस की गति तेज हो रही है, हम सब कुँज रंध्र से देख रही हैं, हरिप्रिया कहती हैं ।
सेज पर आए प्रियतम सबसे पहले प्रिया जी के कोमल कर को पकड़ते हैं ….उनके अत्यन्त गोरी कलाई में चूड़ियाँ हैं ….प्रियतम चूड़ियाँ देख रहे हैं और चकित हैं …हम भी चकित हैं ..हरिप्रिया कहती हैं ….क्यों की चूड़ियों से जगमग प्रकाश की किरणें निकल रही हैं ….उन किरणों से कुँज , निकुँज , नित्य निकुँज मार्ग , वन …आदि सब प्रकाशित हो रहे हैं ।
रस विलास में ये दोनों ही कुशल हैं ….रस विलसन की कला में ये पारंगत हैं ….और सबसे बड़ी बात रस दाता हैं ….दान करने की कला इन्हें अच्छे से आती है तभी तो “निभृत निकुँज” बनता है …..हरिप्रिया मंद मुस्कुराती हैं । ये एक दूसरे को रस दान करते हैं ….प्रिया जी लाल जी को और लाल जी प्रिया जी को ….दोनों रस मत्त होकर प्रेम विलसन की लीला द्वारा फिर समस्त को रस प्रदान कर स्वयं रस में डूब जाते हैं ।
हरिप्रिया जी आनन्द मत्त हैं …..ये दोनों ही एक दूसरे के प्राण हैं ….प्रिया जी के प्राण लाल जी में और लाल जी के प्राण प्रिया जी में ….दोनों “दो” हैं ही नहीं ।
और हम सखियाँ ! हरिप्रिया जी कहती हैं …हमें तो इन्हीं का सुख चाहिए …ये सुखी रहें …ये प्रेम में डूबे रहें ….इन्हें प्रसन्नता मिले हम तो यही चाहती हैं ….और इसी में लगी भी रहती हैं ।
अब देखो ! दोनों के तन , मन , प्राण एक हो रहे हैं …गौर रंग श्याम रंग में मिल रहा है …नही नही , घुल रहा है ….इतने मग्न हो गए हैं एक दूसरे में ये दोनों कि अब तो एक ही दिखाई दे रहे हैं …..एक …द्वैत मिट गया है अद्वैत घटित हो गया है । ये सब निहारते निहारते हम सब सखी भी उन्हीं में जाकर विलीन हो जाती हैं …..कोई नही बचता …बस एक …वो एक कौन ? ब्रह्म ? हरिप्रिया बोलीं …नहीं ….वो एक है …रस , प्रेम …..बस । इतना कहकर हरिप्रिया भाव सिन्धु में अवगाहन करने लग जाती हैं ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (103)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों का श्रीकृष्ण को पूर्वरमण की याद दिलाना
गोपी बोलीं- हे चपल, बड़े चञ्चल हो, दूर हो जाओ। कृष्ण ने कहा- अच्छा, मैं चञ्चल हूँ तो मैं जाता हूँ। तो बोली- हे करुणैकसिन्धो, दया करो। दैन्य-भाव का उदय हो गया। प्रीति की रीति यही है। गोपी बोलीं- ‘करुणैकसिन्धो’ हे नाथ रमण। अरे बाबा, लौट आओ, तुम मालिक हो बाबा, यह हमारा शरीर तुम्हारा है। तुम मारो, पीटो, चाहे जो करो, अब हमारा कोई हक नहीं, हम कुछ नहीं हैं।
कृष्ण ने कहा- अच्छा बाबा, तुम्हारा ऐसी ही ख्याल है तो हम छूते नहीं, जाते हैं। वो बोलीं- हे रमण। लौट के आये तो बोलीं- नयनाभिराम देखने में तो बड़े अच्छे लगते हो बस दिल अच्छा नहीं है, क्योंकि सताते हो। कृष्ण फिर चल दिए। गोपी फिर चिल्लायी- जाना नहीं, बाबा- ‘कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे।’ छिप क्यों गये? हमारी आँखें तुम्हें देखने के लिए तरस रही है, तुम्हारे बिना तो हमारी आँखें कुछ देख नहीं सकतीं, अन्धी हो गयी हैं; हमारा दिल व्याकुल हो रहा है; लौट आओ। लौट आओ !! तो प्रीति की यह रीति है कि जैसे साँप की गति टेढ़ी होती है; वैसे ही प्रेम की गति भी टेढ़ी होती है। और इसमें जब गोपियों ने वामता छोड़ दी, टेढ़ापन छोड़ दिया, और सीधे-सीधे कृष्ण के पास आयीं तब कृष्ण ने वामता दिखायी। जब गोपियों ने पुरुषधर्म को स्वीकार कर लिया था, तब श्रीकृष्ण ने अपने में स्त्रीभाव प्रकट कर लिया कि लौट जाओ? बोलीं- ‘यर्ह्म्बुजाक्ष’ ऐसे कैसे जायँ? हे अम्बुजाक्ष! अम्बुजाक्ष माने कमलनयन, माने बड़ी रसीली हैं तुम्हारी आँखें। अब तुम कहते हो कि जाओ अपने परिवार और संबंधियों से मिलो। जब से हमने तुम्हारे चरणकमल का स्पर्श किया है तबसे धोखे से भी हमने किसी का स्पर्श नहीं किया; किसी के सामने हमने आँख खोलकर देखा नहीं, दूसरे के प्रति हमारे हृदय में प्रीति का उदय हुआ नहीं, क्षणभर के लिए भी किसी के सामने खड़ी नहीं हो सकीं। कैसे हैं आपके चरणकमल? ‘रमायाः क्वचित् दत्तक्षणं’ लक्ष्मी को भी ये चरणकमल कभी-कभी मिलते हैं।
यह सौभाग्यलक्ष्मी को कभी-कभी मिलता है कि तुम्हारे पादतल को अपनी जाँघ पर रखकर उसको सहलावें। क्यों? क्योंकि हैं- अरण्यजनप्रियस्य तुमको तो जंगली लोग प्यारे हैं। अरण्यजन माने ऋषि, महर्षि, महात्मा, तपस्वी जो वन में रहते हैं उनके बीच में तो तुम नंगे पाँव बैठे रहते हो, नंगे पाँव, नंगे बदन दौड़ते हो परंतु लक्ष्मी तो नागरी हैं ना। तुम्हें तो नागरी प्रिय नहीं है। तुम्हें तो वन में रहने वाले जो ऋषि, महात्मा, तपस्वी, त्याग वैरागी हैं, वे प्यारे हैं। लेकिन इसमें एक बहुत है- ‘रमाया क्वचित् दत्तक्षणं अरण्यजनप्रियस्य तव’ हम भी अरण्यजन हैं (वृन्दावन की हैं) अतः हम भी तुम्हारी प्यारी हैं, और तुम भी प्यारे हो। तो हमारे बीच में रहना तुमको फबता है। तुमको अच्छा लगता है, तुमको आनन्द आता है लेकिन लक्ष्मी को कभी-कभी स्पर्श का मौका देते हो।+
अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः ।
जबसे तुमने अपने चरणतल के स्पर्श का हमको मौका दिया- अभिरमिता- यह नहीं कि केवल पाँव छू लेने दिया, तुमने हमें आनन्द दिया। अभिरमिता का अर्थ है कि रमा को जो सुख प्राप्त है तो वह एकांगी है। हमको तो तुमने अभिरमा बना दिया; वह रमा है और हम अभिरमिता हैं। बड़ा ही प्रेम किया तुमने हमारे साथ, अब तो हम किसी की ओर देख नहीं सकतीं। दूसरे के सामने खड़ी नहीं हो सकती। इसके संबंध में ऐसा कहते हैं कि ये जो भगवान की वृन्दावन-धाम की लीला है वह बड़ी विलक्षण है। वृन्दावन-धाम कोई पञ्चभौतिक नहीं है। तब कैसा है? किसी दार्शनिक से पूछो तो बोलेगा कि भौतिक नहीं, ध्यानक है। यह भावनासिद्ध धाम है।
भावनासिद्ध धाम में ऐसा होता है कि सब कुछ लीला के अनुरूप होता है। पहले धाम में एक जगह जब भगवान का मन हुआ कि जल-विहार करें, तो उसी जगह में गर्मी पड़ने लगी और बड़ा भारी सरोवर प्रकट हो गया और उसमें कमल खिल गये। और गोपियों के साथ भगवान उसमें उतर गये। अब महाराज एक-दूसरे पर पानी उलीच रहे हैं, कमल को पहले कौन छूता है, यह होड़ लग गयी। अब इसी जगह दूसरी बार भगवान के मन में आया कि वसन्त विहार करें; तो वृन्दावन के एक हिस्से से वसन्त ऋतु पैदा हो गयी। वो नयी कोपलें निकल आयीं, आम की बौर की सुगन्ध चारों ओर फैल गयी, कोयल कुहू-कुहू करने लगी, और भगवान गोपियों के साथ वन-विहार करने के लिए निकले। उसी समय उनके मन में आया कि रासलीला करें तो बस तुरंत दिन नहीं, रात हो गयी। एक जगह बेचारी दिन और एक जगह रात और उसमें चाँदनी छिटक गयी। बेला, चमेली के सब फूल खिल गये, मन्द-मन्द सुगन्ध फैल गयी और भगवान गोपियों के साथ रास करने लगे।
एक जगह महाराज भगवान का मन हुआ कि गोपी आकर हमारे शरीर से सट जाय, तो नारायण ठंड बढ़ी। गोपी ठंड से व्याकुल होकर गया और कृष्ण के साथ चिपक गयी। भगवान के मन में आया कि वर्षा होवे तो वर्षा होने लगी, और भीगने के डर से गोपी आयी और भगवान से कहा कि हमें अपने कम्बल के नीच ले लो कन्धे पर कम्बल फैला दिया और बोले कि आ जाओ इसके भीतर! तो जैसी-जैसी रुचि होती है भगवान की, वैसा ही काल वृन्दावन-धाम में घर में जा रहे हैं तो दूसरे के घर में से निकल रहे हैं। एक को मना रहे हैं तो एक को रुठा रहे हैं। एक जगह ग्वालों के साथ-साथ भोजन कर रहे हैं तो एक जगह शयन कर रहे हैं, एक जगह नाच रहे हैं, एक जगह बाँसुरी बजा रहे हैं।++
वृन्दावन के कुञ्ज-कुञ्ज में, नवीन-नवीन लीला नित्य होती रहती है। यह वृन्दावन-धाम का स्वभाव है। अंत में प्रकट लीला होती है। बाकी और समय में अप्रकट लीला, गुप्त लीला होती है, होती रहती है। इसी को स्वामी प्रबोधानन्द सरस्वती ने, श्रीहितहरिवंशजी महाराज ने, और भी अन्य रसिक भक्तों ने, इन लीलाओं का गान भजन में किया है। वे बोलते हैं कि कोटि-कोटि कल्प बीत जाते हैं और गोपी और कृष्ण का विहार जारी रहता है; कभी नहीं हो, ऐसा नहीं, कभी बन्द नहीं होता है-
अनादि-अनन्त विलास करें दोउ, लाल प्रिया में भाई न चिह्नारी।
नित्य-नूतन होकर गोपी से मिलते रहते हैं और नित्यलीला दोनों की होती रहती है।
त्वयाभिरमिता बत पारयामः वेणुगीत में आपने सुना होगा ‘पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जरागश्रीकुंकुमेन दयिता स्तनमण्डितेन’- श्रीराधारानी के हृदय पर लगा हुआ कुंकुम कदाचित् श्रीकृष्ण के पाँव में लग गया, और वह पाँव में लग गया, और वह पाँव में से तृण पर लग गया। वहाँ लकड़ी लेने के लिए, पत्ता लेने के लिए जो भीलनी आयी थीं उनको वह मिल गया। और उस कुंकुम को लेकर भीलनी ने अपने मुख पर, और वक्षःस्थल पर लगाया और श्रीकृष्ण के प्रेम से जो उनके हृदय में व्याधि पैदा हुई थी, उसको शांत किया। ऐसा वर्णन वेणुगीत में है। यहाँ भी ऐसा लगता है कि गोपियों के साथ खुले आम जो श्रीकृष्ण का विहार हुआ उसी का संकेत ‘त्वयाभिरमिता बत पारयामः’ में किया है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
श्रीमद्भगवद्गीता
Niru Ashra: अध्याय 6 : ध्यानयोग
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
श्लोक 6 . 25
🌹🌹🌹🌹
शनैः शनैरूपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया |
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् || २५ ||
शनैः – धीरे-धीरे; शनैः – एकएक करके, क्रम से; उपरमेत् – निवृत्त रहे; बुद्धया – बुद्धि से; धृति-गृहीतया – विश्र्वासपूर्वक; आत्म-संस्थम् – समाधि में स्थित; मनः – मन; कृत्वा – करके; न – नहीं; किञ्चित् – अन्य कुछ; अपि – भी; चिन्तयेत् – सोचे |
भावार्थ
🌹🌹
धीरे-धीरे, क्रमशः पूर्ण विश्र्वासपूर्वक बुद्धि के द्वारा समाधि में स्थित होना चाहिए और इस प्रकार मन को आत्मा में ही स्थित करना चाहिए तथा अन्य कुछ भी नहीं सोचना चाहिए |
तात्पर्य
🌹🌹
समुचित विश्र्वास तथा बुद्धि के द्वारा मनुष्य को धीरे-धीरे सारे इन्द्रियकर्म करने बन्द कर देना चाहिए | यह प्रत्याहार कहलाता है | मन को विश्र्वास, ध्यान तथा इन्द्रिय-निवृत्ति द्वारा वश में करते हुए समाधि में स्थिर करना चाहिए | उस समय देहात्मबुद्धि में अनुरक्त होने की कोई सम्भावना नहीं रह जाती | दुसरे शब्दों में, जब तक इस शरीर का अस्तित्व है तब तक मनुष्य पदार्थ में लगा रहता है, किन्तु उसे इन्द्रियतृप्ति के विषय में नहीं सोचना चाहिए | उसे परमात्मा के आनन्द के अतिरिक्त किसी अन्य आनन्द का चिन्तन नहीं करना चाहिए | कृष्णभावनामृत का अभ्यास करने से यह अवस्था सहज ही प्राप्त की जा सकती है |
