!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 138 !!(2), !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !! & श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 138 !!

मैया यशोदा की गोद में द्वारिकाधीश
भाग 2

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पौर्णमासी माता को मैं क्या जबाब दूँगा……..उनके लाड़ले मनसुख को हमनें कुरुक्षेत्र लाकर खो दिया ………….

वज्रनाभ ! मैं ध्यान में बैठ गया था …………….पर नन्दराय नें मुझे ध्यान से उठा दिया ………..कितनें भोले हैं ये नन्द जी ……..कोई बालक तो नही है मनसुख, आही जाएगा ।

श्रीदामा, मधुमंगल, तोक, भद्र ये सब सखा भी जग गए थे …….

मनसुख नही है ………ये बात सबनें सुन ली थी ……बाहर जाकर देखा भी ………बहुत भीड़ थी ………कोलाहल बहुत था………..राजा और बड़े बड़े नगर के व्यापारी रथ इत्यादि में बैठ कर आरहे थे ……और जो सामान्य वर्ग था …….वो पैदल ही चल रहे थे ।

नन्दराय को बेचैन देखा तो मैं भी उनके साथ बाहर आगया…… शिविर से बाहर ……………..

देखिये ना ! कहाँ गया होगा ?

  श्रीदामा   थोड़ी दूर तक देखकर भी आये .....पर  कहीं  अता पता नही है मनसुख का  ।

तभी –

मेरी आँखें एकाएक ठहर गयीं……….उस रूप पर ।

भीड़ को चीरते हुए वो आरहे थे ……….उनके आगे मनसुख था …….वो भीड़ को हटा रहा था……..और दिव्य मुकुट धारण किये हुए ……पीताम्बरी पहनें …….नीला वर्ण …….वही मन्द मुस्कान ।

कानों में कुण्डल …………मकराकृत कुण्डल ………जो उनके कपोलों को छू रहे थे बारबार …….क्यों कि वो तेज़ चाल से चल रहे थे ।

मैं जोर से बोल पड़ा …….नन्दराय ! देखो ! वो सामनें आरहा है तुम्हारा कन्हैया ! मैं आनन्द की स्थिति में चिल्ला पड़ा था ।

नन्दराय नें देखा ……….सखाओं नें देखा …………

सब खड़े रह गए……..क्या करें ! कुछ समझ नही आरहा है ।

श्रीकृष्ण आगये……..अपनें नन्द बाबा के सामनें आकर खड़े हो गए ।

सामनें अपनें कन्हैया को देखते ही …..सौ बर्ष बाद देखनें का अवसर मिला है अपनें लाला को …………नेत्रों से आनन्द के अश्रु बह चले ।

कुछ बोल भी न सके नन्द बाबा …………….

कृष्ण झुके चरण वन्दन करनें के लिये ……पर बाबा नें उठा लिया और अपनें हृदय से लगा लिया …………दोनों ही रो रहे हैं ।

श्रीदामा ! बाबा से मिलनें के बाद श्रीदामा को गले लगाते हुए कृष्ण फिर रो पड़े थे …………..मधुमंगल, तोक, भद्र सबको अपनें हृदय से लगाया …………..

हे वज्रनाभ ! मेरे गोविन्द नें मुझे देखा था …………..फिर बड़ी श्रद्धा से मेरे चरणों की वन्दना भी की ।

क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –

🍁 राधे राधे🍁

Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!

( “सिद्धान्त सुख” – 19 )

गतांक से आगे –

॥ दोहा ॥

अत्यैश्वर्य माधुर्य कौ, बरनें को विस्तार ।
परमधाम राजै जहाँ, आनंदमयी अपार ॥

॥ पद ॥

आनंदमय अंग इंगितज्ञ ईश्वर अधिप अनंत वीर्याश्चर्य रूप अविकार ।
इंदिरेसादि ईंडित उपेंद्रादि उत्कट अनन्यादि कारन अकत्र्त्तार ॥
उत्तमोत्तम उपादान उत्पत्ति रहित एक ऐश्वर्य परिपूरनाधार।
ओज औदार्य उर्ध्वग उसत्तम उर्ध्व नित्यनैमित्त्यपति कृपा कूपार ॥
अजित अच्युत अनामय असत सत असँग अप्रमेयादि अव्यक्त सुबिहार ।
कमन कैसोर कीर्त्तन्य गुनकौतुकी कोटि कंदर्प लावन्यतागार ॥
परम अभिराम परधाम राजत सदा सर्व पर सेव्य पर सेव्य सुखसार ।
अमित ऐश्वर्यमाधुर्य श्रीहरिप्रिया कहन विस्तार कवि पावैं को पार ॥ ९ ॥

*विश्व का भरण पोषण करने वाले भगवान विष्णु हैं ….अमित ऐश्वर्य है उनके पास तभी तो विश्व का पोषण कर पाते हैं ….पोषण ही नही …..उनकी चरण सेवा में निरन्तर रत महालक्ष्मी जी “भरण” करती हैं विश्व का । आज हरिप्रिया सखी मुझे तत्व समझा रहीं थीं । सृष्टि बनाने वाले हैं विधाता ब्रह्मा , जो सृष्टि का निर्माण करते हैं ….इसलिए उनके पास भी ऐश्वर्य है ….और भगवान शिव …ललिता कहती हैं …विध्वंस के महादेवता हैं ….संहार करते हैं …तो ऐश्वर्य इनके पास भी है …जगदंबा पार्वती इनकी अर्धांगिनी हैं ….जो अमित ऐश्वर्य से पूर्ण हैं । कहो ! यही हैं ना तुम्हारे त्रिदेव ? हरिप्रिया जी ने मुझे पूछा था । किन्तु इन सबके पास ऐश्वर्य है ….माधुर्य कहाँ है ? बताओ ? मुझे वो बालक की तरह पूछ रही थीं । हाँ , उनके सामने मैं बालक ही तो था ।

माधुर्य के बिना रस नही है , माधुर्य के बिना रास नही हैं …माधुर्य के बिना प्रेम उमंग उत्साह नही है …क्या मैं सही नही कह रही ? मैंने सिर झुकाकर कहा – आप सत्य कह रही हैं ।

माधुर्य सिर्फ यहीं है , निकुँज में । निकुँज के युगल यानि श्यामसुन्दर और उनकी आल्हादिनी श्यामा जू ये पूर्ण माधुर्य से भरे हैं ….और जहाँ माधुर्य ही माधुर्य है वहीं पूर्णता है ।

हरिप्रिया मुझे और अच्छे से समझाती हैं ।

भगवान विष्णु में ऐश्वर्य के पूरे गुण हैं ….कोई ऐश्वर्य ऐसा नही है जो इनसे छूटा हो ….ब्रह्मा और शिवादि ये सब भगवान विष्णु से कमतर ही इसलिए होते हैं क्यों की ऐश्वर्य के जितने गुण होने चाहिए उतने नही हैं और भगवान विष्णु में हैं । हरिप्रिया सखी जी अब यहाँ महाविष्णु का भी उल्लेख करती हैं …..किन्तु बाद में वो कहती हैं ….इनमें भी माधुर्य नही हैं । मेरा हाथ पकड़ कर हरिप्रिया बोलीं ….हंसते हुए बोलीं ….क्या भगवान विष्णु अपनी महालक्ष्मी के साथ नृत्य कर सकते हैं ? वो तो परम शान्त हैं …उनमें कहाँ से थिरकन आएगी ? थिरकन के लिए चंचलता चाहिए ….पर ये तो “शान्ताकारं” हैं । हरिप्रिया आज स्वयं चंचल हो उठी थीं । मैं तो बहुत चंचल हूँ ….माधुर्य की भूमि में हूँ …मेरे सेव्य माधुर्य से भरे हैं …फिर मैं क्यों न चंचल हौंऊँ ?

सबमें , हर भगवत्सरूप में ऐश्वर्य है ……किन्तु माधुर्य नही है …..अपने विषय में फिर आगयीं थीं हरिप्रिया । कुछ देर रुककर सखी जी ने कहा …..माधुर्य से भरे , और किंचित माधुर्य , हो सकता अवतारों में भी पाया गया हो ….जैसे – श्रीकृष्ण का अवतार ….उनमें माधुर्य है ….पर विशुद्ध माधुर्य नही है …कभी कभी ऐश्वर्य प्रकट हो जाता है ….जैसे – रास चल रहा था ..राक्षस आगया ..उसको मारने के लिए ऐश्वर्य का प्रयोग किया गया । अब सोचो ! माधुर्य में ऐश्वर्य आए तो मिलावट हुयी ना , अब वहाँ प्रेयसी अपने प्रेमी को क्या मानें …..मन में कहीं न कहीं ऐश्वर्य का भान तो हुआ ! फिर जब भान हुआ तब क्या माधुर्य खिल सकेगा ? वहाँ क्या तुम कह सकोगी कि मेरी बेणी गूँथ दो प्यारे ! क्या तुम कह सकोगी कि मेरे पाँव दूख रहे हैं ! ..नही , तुम्हें लगेगा कि ये तो भगवान हैं ….ऐश्वर्य वहाँ भी है …अवतार काल में भी । किन्तु यहाँ निकुँज में …इस श्रीवृन्दावन में ….ऐश्वर्य का प्रवेश नही हैं ….तभी तो हमारे मन में कभी नही आता कि ये जगदीश हैं …तो हम खिलाने पिलाने की चिन्ता क्यों करें ! नही , यहाँ शुद्ध माधुर्य है …और ये माधुर्य कहीं नही हैं ..न किसी भगवदरूप में है …न किन्ही अवतारों में ।

सामान्य भक्त कैसे इस माधुर्य लोक में पहुँचे ? अब मैंने तत्वतः जानने की अपेक्षा साधक के लिए सरल मार्ग यहाँ तक पहुँचने का पूछ लिया था ।

“साधक “राग” को स्थिर रखे”…..हरिप्रिया जी गम्भीर होकर बोलीं ।

हर मनुष्य में राग है …किन्तु वो राग इधर उधर फैला दिया है …बालक में , पत्नी में , धन में , यश में आदि आदि ….उस राग को अगर जीव स्थिर रखे अपने इष्ट प्रियतम के प्रति …अकंप रखे …कभी भी , कैसी भी स्थिति परिस्थिति आए अपने राग को कंपित न होने दे ..तो यही राग तुम्हें प्रियतम से मिला देगा । ये मार्ग रागानुगा है ….वैधी मार्ग नही है । हरिप्रिया जी ने बड़ी ही सुन्दरता से मुझे सब कुछ समझा दिया था ।


अमित आनन्द महामाधुर्य का परम विस्तार अगर कहीं देखने को मिलता है तो वो है -श्रीवृन्दावन । यहाँ श्रीवन का आधिपत्य जिनके हाथों में है …वह परम माधुर्य के ही तो रस सार हैं ….फिर उस मधुर रस का , जो इस निकुँज की वीथियों में फैला हुआ है …उसके सम्बन्ध में कौन कहे । क्या कोई कह सकता है ? हरिप्रिया जी अपने मधुर रस में मत्त होकर अब कहती हैं ।

“माधुर्य का विलास , रस रास का विलसन”…….इसके पीछे कोई कारण है ऐसा मत सोचना …कोई कारण नही है …बस अपने आनन्द का उछाल …आह्लाद को अपने में समा लेने की कामना , समा कर एक होना …ये तड़फ , इसी तड़फ के कारण ये सब यमुना , वन , उपवन , कुँज निकुँज मन्दिर ये सब यहाँ हैं ….इसका कारण सिर्फ आनन्द की बेचैनी है अपनी आल्हादिनी से मिलने की …फिर कहूँ ..एक होने की बैचेनी । बस इतना ही ।

ये युगल सृष्टि नही करते …सृष्टि आदि के लिए त्रिदेव निर्धारित हैं ना …..ये तो बस नित्य विहार करते हैं ….इस नित्य विहार से ही परम ऐश्वर्यशाली त्रिदेवों को मधुर रस का किंचिद कण मिल जाता है उसी से ये आनंदित रहते हैं …और सृष्टि को भी आनन्द देते हैं ।

ये अजित हैं …हरिप्रिया कहती हैं । इन्हें कौन जीत सकता है ….हाँ इन्हें सिर्फ़ प्रेम ही जीत सकता है और परास्त भी कर सकता है ….हमारी प्रिया जी इन्हें परास्त कर तो देती हैं ।

ये अच्युत भी हैं ….इनका कभी पतन नही होता ….किन्तु हमारी प्रिया जी इन्हें गिराकर अपने चरणों में बैठा लेती हैं । अब तो हरिप्रिया बड़ी ठसक से बोल रहीं थीं ।

किन्तु ये परम सुन्दर हैं ….इनको निहारते ही सारे दुःख दूर हो जाते हैं …..परमधाम में विराजे हैं ….प्रेम मूर्ति इतने हैं कि बस अपनी प्रिया की ओर ही देखते रहते हैं । फिर सखियों की ओर कौन कृपा दृष्टि डालता है ? ये प्रश्न मेरा था । हमारी लाड़ली । वो हमारा बड़ा ख़्याल रखती हैं …कभी कभी तो लाल जी की बात भी नही मानतीं किन्तु हमारी बात सदैव स्वामिनी ने मानी है ….ऐसी माधुर्यमयी , महिमामयी ये जोरी है ….अरी सखी ! इसका वर्णन कौन कर सका है ।

हरिप्रिया इतना ही बोलीं थीं ।

शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 26
🍒🍒🍒🍒

यतो यतो निश्र्चलति मनश्र्चञ्चलमस्थिरम् |

 ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् || २६ ||

यतः यतः – जहाँ जहाँ भी; निश्र्चलति – विचलित होता है; मनः – मन;
चञ्चलम् – चलायमान; अस्थिरम् – अस्थिर; ततः ततः – वहाँ वहाँ से;
नियम्य – वश में करके; एतत् – इस; आत्मनि – अपने; एव – निश्चय

ही; वशम् – वश में; नयेत् – ले आए |
भावार्थ
🍒🍒🍒
मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहाँ कहीं भी विचरण

करता हो,मनुष्य को चाहिए कि उसे वहाँ से खींचे और अपने वश में लाए |

तात्पर्य
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मन स्वभाव से चंचल और अस्थिर है | किन्तु स्वरुपसिद्ध योगी को मन को वश में लाना होता है, उस पर मन का धिकार नहीं होना चाहिए | जो मन को (तथा इन्द्रियों को भी) वश में रखता है, वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है और जो मन के वशीभूत होता है वह गोदास अर्थात् इन्द्रियों का सेवक कहलाता है | गोस्वामी इन्द्रियसुख के मानक से भिज्ञ होता है | दिव्य इन्द्रियसुख वह है जिसमें इन्द्रियाँ हृषिकेश अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण की सेवा में लगी रहती हैं | शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण की सेवा ही कृष्णचेतना या कृष्णभावनामृत कहलाती है | इन्द्रियों को पूर्णवश में लाने की यही विधि है | इससे भी बढ़कर बात यह है कि यह योगाभ्यास की परम सिद्धि भी है |

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