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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 138 !!
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नन्दराय नें देखा ……….सखाओं नें देखा …………
सब खड़े रह गए……..क्या करें ! कुछ समझ नही आरहा है ।
श्रीकृष्ण आगये……..अपनें नन्द बाबा के सामनें आकर खड़े हो गए ।
सामनें अपनें कन्हैया को देखते ही …..सौ बर्ष बाद देखनें का अवसर मिला है अपनें लाला को …………नेत्रों से आनन्द के अश्रु बह चले ।
कुछ बोल भी न सके नन्द बाबा …………….
कृष्ण झुके चरण वन्दन करनें के लिये ……पर बाबा नें उठा लिया और अपनें हृदय से लगा लिया …………दोनों ही रो रहे हैं ।
श्रीदामा ! बाबा से मिलनें के बाद श्रीदामा को गले लगाते हुए कृष्ण फिर रो पड़े थे …………..मधुमंगल, तोक, भद्र सबको अपनें हृदय से लगाया …………..
हे वज्रनाभ ! मेरे गोविन्द नें मुझे देखा था …………..फिर बड़ी श्रद्धा से मेरे चरणों की वन्दना भी की ।
आचार्य गर्ग आपसे मिलनें के लिये बहुत उत्सुक हैं महर्षि !
मुझ से कहा था कृष्ण नें ।
…मेरा सौभाग्य होगा कि मैं आचार्य के दर्शन करूँगा …….मैने कहा ।
लाला ! अपनी मैया से नही मिलेगा ?
नन्द राय जी नें कृष्ण का हाथ पकड़ते हुए कहा ।
कहाँ हैं मेरी मैया ? सजल नयन से पूछा था कमलनयन नें ।
चल ………..
हाथ पकड़ कर ले चले, बाबा नन्द कन्हैया को ।
यशोदा ! सुनो ! अरे ! क्या कर रही हो ?
मनसुख मिल गया क्या ? यशोदा नें पूछा ।
पता है वो कहाँ गया था ? पास में गए नन्द बाबा यशोदा के ।
वो गया था अपनें कन्हैया के पास………नन्दबाबा नें कहा ।
आप विनोद मत कीजिये ना …………..सच बताइये क्या मनसुख को मेरा कन्हैया मिला ? बोलिये ना ?
हाँ मिला ………………देखो ! वो रहा हमारा कन्हैया ।
नन्दबाबा नें सामनें दिखाया ……..यशोदा नें देखा ………..
मुकुट धारण किया हुआ ………..पीताम्बरी ……….नीला रँग …….वही मुस्कुराता मुख मण्डल …………
सुनिये ! मैं कोई सपना देख रही हूँ ………..बताइये ना ? ऐसे सपनें मैं वृन्दावन में दिन में हजारों बार देखती रहती हूँ ………..ये सपना है ना ?
सामनें आकर खड़े हो गए कृष्ण………….
मैया ! ओ मैया ! ये सपना नही है……..मैं तेरा लाला कन्हैया हूँ ।
हः ………तू मेरा लाला कन्हैया है ! मैया चेहरा छूतीं हैं ……..
रो गए कन्हैया ! तेरा अपराधी हूँ मैं मैया ! इतनें वर्षों बाद मैं अपनी मैया से मिल रहा हूँ……….
मैया अब रो पड़ी ……….गोपाल ! मेरा लाल ! मेरा कन्हैया !
हिलकियाँ फूट पडीं मैया के ………..कभी पागलों की तरह माथे को चूमती हैं ……कभी गालों को चूमती हैं ………कभी अपनें हृदय से लगाती हैं………पर ये क्या !
वात्सल्य का उन्माद छा गया एकाएक मैया यशोदा में……….
अपनें कन्हैया को पकड़ कर गोद में बिठा लिया ……….
वात्सल्य चरम पर पहुँच गया था ……..इसलिये वक्ष से दूध की धार बहनें लगी यशोदा मैया के ।
जैसे कोई योगी समाधि को प्राप्त करता है …..ऐसे ही मानों वात्सल्य की ऊँचाई पा ली यशोदा मैया नें………
लाला कन्हैया ! एक बात कहूँ…….गालों को चूमती हुयी बोलीं ।
क्या मैया ! बोल मैया ! क्या कहना है ?
लाला ! अब जीनें की इच्छा नही है ……..अब तक थी ….सोच रही थी कि …..तुझे एक बार देख लूँ ……….देख लिया तुझे ……..अब जीना नही चाहती ……मेरे गोपाल ! अब तेरी मैया ………..
मैया ! कुछ मत बोल ……….अपनी ऊँगली मैया के मुख में रखते हुए रो पड़े कन्हैया………मैया ! मेरे जीवन में वात्सल्य रस भरनें वाली तू ही है मेरी मैया ! ये सच है ……..कि देवकी को मैं “माता” ….”माँ” इत्यादि कहता हूँ ……..पर “मैया” तो तू ही मेरी ।
मैया कहनें में …….जो एक वात्सल्य का साकार रूप दिखाई देता है …वो “मैया” में ही दिखाई देता है ….वो मात्र तुझ में ही दिखाई देता है ।
हिलकियों से रो पड़े थे दोनों, मैया और उनके लाला ।
शेष चरित्र कल –
🍁 राधे राधे🍁
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना के सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 20 )
गतांक से आगे –
|| दोहा ||
निगम निगम आगम अगम, लहि न सकें गुन ग्रंथ।
नेम प्रेम ते परचल्यौ, परमपरा कौ पंथ ॥
॥ पद ॥
रहि गयो मारग उरें नेम अरु प्रेम कौ, परचल्यौ परा कौ परम पर पंथ।
निगम कौ निगम अरु अगम आगमन कौ, नाहिं समरथ्य गुन गनन में ग्रंथ ॥
अखिल ब्रह्मांड बैराट के थाट सब, महाबैराट के रोम के कूप।
सावकासै उड़त रहत निति सहजहीं, परम ऐश्वर्य आश्चर्यमय रूप ॥
सो प्रथम एक सून्य मधि समि रह्यौ, जैसें त्रिसरेनु को रेनु सत अंस ।
यातें दस दस गुनी सहस्र सत सुन्य पुनि, तिनतै लख सहस्र महासुन्य अवतंस ॥
तिन महासुन्य के सिखर पर तेज कौ, कोटि गुन तें गुनों अमित विस्तार।
तहाँ निजधाम वृन्दाविपिन जगमगैं, दिव्य वैभवन कौ दिव्य आगार ॥
मन बचनहुँ जहाँ पहुँचि सकत न कबहुँ, बुधि विथकित चित्तहु अतिहि असमर्थ ।
सकल साधन सुकृति मुक्ति सारिष्ट लगि,बिन कृपा कोटि कोटयान बिधि ब्यर्थ ॥
नित्य बिहरत जहाँ नित्यकैसोर दोउ,नित्य सहचरिन संग नित्य नवरंग ।
नित्यरस रास उल्लास आनंद उर,नित्य प्रतिकास परभास अँग अंग ॥
निर्विकारी निराकार चैतन्य तन,विस्व व्यापक प्रकृति पुरुष के ईस ।
अक्षरातीत परब्रह्म परमात्मा, सर्ब कारन परें जोति जगदीस ॥
नाद कें अंड तें अखंड धारा द्रवत, स्रवत जा मध्य सत सृष्टि कें हेत ।
जिहिं जिहिं भाँति जे जे उपासत जिन्हें, तिहिं तिहिं भाँति तेते तिन्हें देत ॥
तत्व के तत्व सिद्धांत सिद्धांत के, सार के सार सुख रूप के रूप।
अमित ऐश्वर्य माधुर्य श्रीहरिप्रिया, भावतिनु भौंन के भावते भूप ॥१०॥
*वेद कहाँ जान पाये हैं इस प्रेम पन्थ को …वेद कहाँ पहुँच पायेंगे इस रस सिन्धु तक । हाँ , वेद की पहुँच भक्ति तक अवश्य है …भक्ति मार्ग तक वेद पहुँचें हैं …किन्तु इस प्रेम मार्ग तक वेद की गति नही है ।
हरिप्रिया जी अब उठीं और मेरे स्कन्ध में हाथ रखते हुए वो आगे एक सुन्दर सी पगदंडी की ओर चल पड़ीं थीं ।
तभी तो वेद “नेति नेति” कह देते हैं …..तुम जानती ही हो नेति का अर्थ ! नेति का अर्थ होता है …हमने जितना जाना है वही इति नही है …इसके आगे भी है …कर्म मार्ग की विस्तृत चर्चा वेद ने की ….सबसे ज़्यादा विस्तार वेद ने कर्मकाण्ड कि की है । ऐसा इसलिए …क्यों कि रजोगुण मनुष्य में व्याप्त है …वो रजोगुण से ही प्रेरित है …उसे करना है…बिना कुछ किए वो रह नही सकता इसलिए कर्मकाण्ड का विस्तार है वेद में । उसके बाद ज्ञान की चर्चा है ..हरिप्रिया जी मुझे इन गम्भीर तत्वों को भी कितने सहज में समझा रहीं थीं । अब ज्ञान के बाद भक्ति की चर्चा वेद ने की तो है किन्तु संक्षिप्त में ..थोड़े में ..जिसे “उपासना”कहा गया ।
इसके बाद हरिप्रिया रुक गयीं …सामने एक छोटा सुन्दर सा सरोवर था ….कमल उसमें खिले थे …बहुत कमल थे …उस सरोवर की सीढ़ियाँ मणियों से बनी थीं ….वहीं हरिप्रिया जी बैठ गयीं मैं उनसे एक सीढ़ी नीचे बैठा ….उनके चरणो को मैं बारम्बार छू रहा था ।
“वेद भक्ति तक ही रुक गये”…सखी जी की ये बात सुनकर मैंने उनसे पूछा क्या ये मार्ग भक्ति नही है ? सखी जी हंसीं …उनकी हंसी सुनकर चार पाँच हंस वहाँ आगये और सखी जी की गोद में बैठ गए ….अब उनको ये सहला रही हैं ….और मेरी ओर देखकर कुछ देर बाद कहती हैं …”भक्ति से ऊँचा है ये प्रेम पन्थ”…..ये प्रेम का मार्ग है ….इस बात को वेद नही जान पाए …न उनकी पहुँच यहाँ तक बनीं …..क्यों ? मैंने पूछ लिया । क्यों की वेद नियमों में आबद्ध है …किन्तु प्रेम क्या नियमों को मानता है ? इसने आज तक किसी नियम को माना है ? मुझ से ये पूछते हुए सखी जी नभ की ओर हंस को उड़ा देती हैं …और वो हंस ..राधा राधा राधा …कहता हुआ उड़ जाता है ।
फिर इस प्रेम की प्राप्ति पुराणों से होगी ? या शास्त्रों से ?
मेरी ये बात सुनकर सखी जी कुछ देर तक सरोवर को देखती रहीं …फिर सहज भाव से बोलीं …भक्ति तक पहुँचे हैं शास्त्र भी …पुराण , तन्त्र , संहिता भी । मेरी पीठ पर हाथ धरते हुए सखी जी बोलीं …..किन्तु ये प्रेम मार्ग न वेद से मिलेगा ,न शास्त्र ,न तन्त्र आदि से …ये तो मिलेगा युगल सरकार , श्रीधाम वृन्दावन , सखी वृन्द …इनकी ही कृपा से, बाकी कोई भी यहाँ तक पहुँचाने में असमर्थ हैं ।
हाँ , सखी जी बोलीं …..पुराणों में महापुराण श्रीमदभागवत भक्ति से कुछ आगे तक ले जाती अवश्य है ….प्रेम के राजमार्ग को दिखा देती है ….लेकिन प्रेम के इस राज्य का वर्णन वह भी कर नही पाती …रुक जाती है । हरिप्रिया बोलीं ….शास्त्रीय नेम से परे है ये प्रेम मार्ग ….वेदादि के नियम ये मार्ग नही मानता ।
( वो तो मैंने देख लिया था कि यहाँ सखियाँ साष्टांग युगल सरकार को प्रणाम करती हैं , वैसे वैदिक नियम में ये उचित नही हैं …किन्तु यहाँ कहाँ वेद के नियम ….उखाड़ के फेंक दिया नियमों को इस प्रेम पन्थ ने )
अच्छा बताओ ..ब्रह्माण्ड कितने हैं ? मैंने संकेत में कहा …पता नही ..सखी जी मेरी ओर देखकर मुस्कुरा रहीं थीं …तो मैंने कहा …यही अनन्त ब्रह्माण्ड …..वो बोलीं ..अनन्त ही नहीं , अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड । और जितने ब्रह्माण्ड तुम देखते जाओगे उसके ऊपर उससे बड़े ब्रह्माण्ड उपस्थित हैं …और हर ब्रह्माण्ड के एक एक ब्रह्मा हैं …किसी में चार मुख वाले ब्रह्मा, तो किसी में आठ , सोलह बत्तीस ..ऐसे अनन्त ब्रह्मा हैं, और ब्रह्मा अनन्त हैं तो विष्णु भी अनन्त हैं, शिव भी अनन्त हैं ।
हरिप्रिया जी मुझे ये सब बड़ी गम्भीरता से बता रहीं थीं ।
किन्तु महाविराट के एक रोम में ….अनन्त ब्रह्माण्ड निवास करते हैं ….कितने रोम होंगे उस विराट के शरीर में , फिर कितने ब्रह्माण्ड हुए ? मैं हंसते हुए झुका और सरोवर के शीतल जल से अपना मुँह धो लिया …और बोला ….ये तो बड़ा ही रहस्यपूर्ण है ।
हरिप्रिया जी ने मेरा हाथ पकड़ा और हंसते हुए कहा ….”वो महाविराट भी एक शून्य में समा जाता है” क्या ? अनन्त ब्रह्माण्ड को अपने एक रोम में समाने वाला महाविराट, एक शून्य में समा जाता हैं ? मैं चकित हो गया था । हरिप्रिया बोलीं …हाँ , वो शून्य ऐसा है जिसमें वो महाविराट समा गया तो पता भी नही चलता कि वो कहाँ गया ? हरिप्रिया जी कहती हैं …सूर्य का प्रकाश ( धूप ) जब घरों में आता है तो उसमें अत्यंत सूक्ष्म अणु परमाणु होते हैं , उस एक अणु को दस गुना और सूक्ष्म करो । फिर उसमें से एक अणु लो , उसे सौ गुना सूक्ष्म फिर करो …सखी जी मुझे कहती हैं …उस सौ गुने में से एक अणु लेकर फिर लाख गुना सूक्ष्म करो ..उस लाख से एक अणु लेकर उसे करोड़ गुना सूक्ष्म करते जाओ …अब हो गयी करोड़ गुनी सूक्ष्म ….तो बस …मुख मण्डल खिल गया सखी जी का …वो बोलीं …”तिन महा शून्य के शिखर पर” …इन्हीं शून्य के शिखर में एक तेज जगमग कर रहा है …तेज कैसा है ..अपूर्व ….उस तेज के भी अन्तिम शिखर पर पहुँचो तो वहाँ है ये दिव्य श्रीवृन्दावन …जो स्वयं प्रकाशित है ..प्रकाशमान है …इसके आगे कुछ नही है …कुछ नही …इसी श्रीवृन्दावन में दिव्य यमुना जी हैं सखी वृन्द हैं ….कुँज , निकुँज आदि सब हैं । और हमारे प्राणेश्वर युगल सरकार स्वयं ही प्रकाशित होकर जगमग हो रहे हैं । अनन्त माधुर्यमय है ये श्रीवृन्दा विपिन ….हरिप्रिया जी के मुख से ये वर्णन सुनते ही मैं चकित हो गया था मेरा रोम रोम पुलकित हो उठा था । जय जय हो …मैं बोलने लगा था ।
हे सखी जी ! आपने जैसा वर्णन किया वहाँ तक बुद्धि नही पहुँच पा रही है ।
“नही पहुँच पाएगी”। हरिप्रिया जी तुरन्त बोलीं ।
इस निकुँज में , मन की गति नही है , बुद्धि की गति नही है ….चित्त भी असमर्थ हो जाता है ।
साधना यहाँ तक पहुँच नहीं पाती ….मुक्ति से परे की स्थिति है यहाँ की ..मुक्त पुरुष भी यहाँ आने के लिए ललचाते रहते हैं ….किन्तु उनको झलक भी नही मिलती ।
सखी जी कहती हैं ….अरे तुम देखो ! ये है निकुँज …इसे ही श्रीवृन्दावन कहते हैं …ये युगल सरकार की दिव्य विहार स्थली है ….निहारो , इसे । देखो , कैसे युगलवर की अंगकान्ति से झलमला रहा है यहाँ का वातावरण । हाँ , वो तो शब्दातीत है ..मैंने लम्बी स्वाँस लेकर कहा ।
क्या करे साधक ? मैंने कुछ देर बाद पूछा था । यहाँ के प्रेमधन प्राप्ति के लिए क्या करे ?
हरिप्रिया बोलीं – प्रिया जी के नूपुर कलरव से शब्द ब्रह्म का प्राकट्य हुआ है और उसी शब्द ब्रह्म से अनन्त ब्रह्माण्ड बने हैं …इसलिए हमारे आनन्दस्वरूप युगलसरकार की ये प्रेम विहार भूमि हैं, जहाँ विहरण करते हैं द्वय रसिक रसिकनी, ऐसे युगलसरकार ही हम सखी जनों के मन भांवते हैं …इनको प्यार करो , इनको ही लाड़ करो । हरिप्रिया जी इतना कहकर सरोवर में झुक जातीं हैं …और उस जल , अमृत समान जल को भर पेट पीकर आनंदित हो उठती हैं ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (104)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों का श्रीकृष्ण को पूर्वरमण की याद दिलाना
वृन्दावन धाम के नित्य निकुञ्ज में कुञ्ज-कुञ्ज में नयी-नयी लीला होती रहती है। नया-नया समय, नया-नया स्थान, नयी-नयी ऋतु, नया-नया विलास, नयी-नयी गोपी, नये-नये कृष्ण अर्थात उनका नया-नया वेश, नया-नया श्रृंगार- रसिक लोग इस प्रकार से उस लीला का ध्यान करते हैं। आपके ध्यान में यह बात होनी चाहिए कि यह जो श्रीमद्भागवत की कृष्णलीला का वर्णन है वह इसके लिए नहीं है कि इसको सुनकर कोई अनुकरण करें, अच्छा, पाँच हजार वर्ष पहले लीला हो गयी तो हम लोगों का उससे क्या संबंध? वह न तो इतिहास का वर्णन है, और न तो आगे के लिए वर्णन का निर्देश है। तब ये काहे के लिए है कि जिसका मन संसारी सुख में आसक्त हो गया है, उसके मन को, एक ऐसा दिशा-निर्देश है ये कि तुम अपने मन में देखो वृन्दावन, मन में देखो नित्य निकुञ्ज, मन में देखो गोपी, मन में देखो नवीन-नवीन कृष्ण।
इस प्रकार श्रीकृष्ण का ध्यान करो तो तुम्हारी विषयासक्ति मिट जायेगी। अनजान लोग जब इन लीलाओं को पढ़ते हैं तो सोचते हैं कि हमको भी ऐसा करना चाहिए अथवा कहते हैं कि हम एक ऐतिहासिक, या साहित्यिक अध्ययन कर रहे हैं कि प्राचीनकाल में ऐसी संस्कृति थी। यह साहित्यिक अध्ययन नहीं है, कोई इतिहास का वर्णन नहीं है, यह वर्णन है उनका अथवा उनके लिए जो रसिकजन हैं, जो भावुकजन हैं, जो श्रद्धालु और विश्वासीजन हैं, जिससे वे अपनी चित्त-वृत्ति को बाह्य विषयों से हटाकर अंतरंग में विराजमान जो भगवान की लीला है, उसका ध्यान करें और अपने हृदय में अनन्तसुख का अनुभव करें। सुख और दुःख बाहर नहीं होते, लाल-पीले-नीले नहीं होते, उनकी लम्बाई-चौड़ाई नहीं होती और न उनकी उम्र होती है और न इनके माँ-बाप होते हैं। तो आप अगर अपने मन को भगवान की लीला में उलझा दें, तो दुनिया की जो आपत्ति-विपत्ति है, दुनिया का जो सुख-दुःख है, दुनिया की जो चिन्ता है, उससे आप छूटकर सुख की प्राप्ति करेंगे; और आपके हृदय में परमानन्द रस का रसास्वादन होगा। इसके लिए ये लीलाएं हैं।+
श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे …… पुरुषभूषण देहि दास्यम
श्रीर्यत्पदाम्बुजरश्चकमे तुलस्या लब्धवापि वक्षसि पदं किल भृत्युजुष्टम् ।
यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासस्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः ।।
तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन तेऽङ्घ्रिप्रमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपाशनाशाः । त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकामतप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ।।
यह वेदान्त जो है वही भारतीय वैदिक सनातन धर्म की पृष्ठभूमि है। वह धरातल है; इसमें बैठ जाओ तो सब बात समझ में आ जावेगी कि जगत् में ब्रह्म है, चित्त भी ब्रह्म है, जीव भी ब्रह्म है, ज्ञान भी ब्रह्म है, अज्ञान भी ब्रह्म, जड़ भी ब्रह्म, चेतन भी ब्रह्म। अहमिदं सर्व ब्रह्मैव- मैं और यह, वह और तुम, सब परमात्मा हैं। इसमें व्यक्ति का जीवन है वह मर गया और परमेश्वर जी उठा? इसलिए कि जब-सब परमात्मा है तो राग-द्वेष के लिए स्थान नहीं रहा, और जब राग और द्वेष के लिए स्थान नहीं रहा तो व्यक्तित्व तो मर ही गया। उसी का नाम जीवन-मुक्ति है।
‘व्यक्ति’ शब्द का बड़ा विलक्षण अर्थ है। जैसे यह सफेद कोरा कागज है, और इस पर विशेष प्रकार का रंग, एक रेखा, एक मानचित्र, रेखा-चित्र बना दिया जाय; तो कागज है ब्रह्म, और जो मानचित्र रेखा-चित्र है, उसको बोलेंगे व्यक्ति। ‘वि’ माने विशेष, और ‘अक्ति’ माने रंग, एक विशेष प्रकार से किसी चीज को रंग देना। जैसे अंजन भौंह पर लगावें कि छोटी आँख बड़ी दिखने लगे वैसे एक अंजन ब्रह्म में ऐसा लगावें, कि ब्रह्म छोटा दिखने लगे; इस अंजन का नाम ही व्यक्ति है। तो ब्रह्म को व्यक्ति के रूप में देखना है तो भी अंजन चाहिए और अपने को व्यक्ति के रूप में तो भी अंजन चाहिए। सबको ‘हाँ’ करना यह ब्रह्म जीवन है। सबको ‘ना’ बोल देना यह जिज्ञासु जीवन है और आधा को ब्रह्म और आधा को संसार मानना, यह दुःखी जीवन है। तो यह जो श्रीकृष्ण की लीला है, यह जो वृन्दावन धाम है, आप क्या समझते हैं कि वह ब्रह्म नहीं है?++
नारायण! वह ब्रह्म है। यह जो, साँवरी सलोनी, मन्द-मंथर गतिशील, तरंगावनादिनी, कृष्णवाह, कोमल-बलु का सेवितयमुनाजी हैं जिन्होंने अपने हाथों से वहाँ की बालू को लहरदार, हवा के तरंग के कारण बालू को टेढ़ा-मेढ़ा करके अपने हाथों सजाया है; और वह लता, वह वृक्ष, वे पत्ते, वे पुष्प, जो हिल-हिलाकर बुला रहे हैं कि आओ नारियों, आओ; वे फल जो श्रीकृष्ण की सेवा के लिए प्रकट हो रहे हैं, आप क्या समझते हैं कि वे सब ब्रह्म नहीं हैं? नारायण, सब ब्रह्म हैं इस पृष्ठभूमि में, इस धरातल पर, इस (निर्विशेष) ज्ञान में, गोपियों ने अपने दलि के रंग से रंगकर ब्रह्म को कृष्ण बना दिया है।
यह श्रीकृष्ण आँख के लिए साँवरा, रसना के लिए सलोना, त्वचा के लिए सुकुमार, नाक के लिए सौरभ, कान के लिए मीठी-मीठी आवाजवाला और मन को प्रेम से भर देने वाला किशोराकृति परब्रह्म सामने खड़ा है; और संसार में जितने प्रकार की शिष्ट वृत्तियाँ हैं- शब्द चाहने वाली, स्पर्श चाहने वाली, रूप चाहने वाली, रस चाहने वाली, गंध चाहने वाली, यानी जितने प्रकार की चाह इस सृष्टि में हो सकती है वे सब चाह मूर्तिमान् होकर मूर्तिमान् परब्रह्म परमानन्दघन की ओर दौड़ रही हैं। अब देखो, मिलेगा किसको? गोपियों को अपने त्याग का थोड़ा अभिमान आ गया था कि हम इतना प्यार करके आयीं, घर हमने छोड़ा, धर्म हमने छोड़ा, पिता, पुत्र पति हमने छोड़ा, यह छोड़ा, वह छोड़ा; तो कृष्ण ने कहा- गोपियों! तुमने सब कुछ छोड़ा पर अभिमान नहीं छोड़ा, और हमारी प्राप्ति में, हमारे पास तक आने में यदि कोई बाधा है तो यही अभिमान है।
चाखा चाहे प्रेमरस, राखा चाहै मान ।
एक म्यान में दो खड़ग देखा सुना न कान ।।
इसीलिए गोपियों को भगवान ने टक्कर दी कि लौट जाओ जैसे गंगा की धारा है वह सोलह हजार फुट ऊँचे पर्वत से निकलती है- अरे बाबा, विष्णुपद से चलती है अथवा आकाश से चलती है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (105)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का उदय
विष्णुपद से, ब्रह्मलोक की धारा मूल प्रदेश की और बहती है, ऐसे प्रेमरस की धार का स्वभाव है कि पहाड़ बीच में पड़े तो टिक जाय, अड़ जाय, और धरातल थोड़ा निम्न होता जाय तो बहती जाय। यह प्रेमरस की धारा अहंकार के पर्वत पर नहीं चढ़ती, वह तो निरभिमानता के लिए निम्न धरातल पर बहती है और बहती जाती है। त्याग किया ठीक है पर त्याग का अभिमान कहाँ छूटा? तो कृष्ण ने कहा कि हमारी प्राप्ति में तुम्हारे लिए जो प्रतिबन्धक है, जो रुकावट है, जो अड़चन है, उसको हम तोड़ेगे। बोले- गोपियो। लौट जाओ।
गोपी बोली कि जिस दिन से हमने पैरों का तलवा छुआ उस दिन से तो हम किसी के सामने एक क्षण के लिए भी खड़ी नहीं हो सकीं; अब तुम्हारे चरणकमल के सिवाय हमारे लिए कोई आश्रय नहीं है। इसका मतलब यह है कि हम मर जायँ, खाक में मिल जायँ; तुम्हारे चरणों की धूल बनना हमको पसंद है, लेकिन तुम्हारी ओर से मुँह घुमाकर लौटना हमारे लिए शक्य नहीं है।
कृष्ण ने कहा- अरी गोपियों, तुम इतने ऊँचे वंश की और घर में तुम्हारा इतना आदर, तुम इतनी धर्मनिष्ठा और तुम्हारी इतनी प्रतिष्ठा, और तुमने हमारे पाँव की धूल में मिल जाना चाहती हो। अपना सब गौरव महिमा तुमने मिटा दिया। राम-राम-राम, अब भी सम्हल जाओ, लौट जाओ।
अब गोपियों में जो यह दैन्य आया उसको मधुररस का दैन्य संचारी भाव क्या होता है? श्रृंगाररस में जो दैन्य है, दीनता है, माने अपने को छोटा बनाना है उसमें अपने स्वभाव का त्याग है, यह केवल प्रेमास्पद को मनाने के लिए आता है। इसलिए यह सञ्चारीभाव है। यह देर तक रहने के लिए नहीं आता है। मधुररस में तो अपने को छाती पर भी चढ़ना होता है, उसके कंधे पर भी चढ़ना होता है, उसके लिए सिर पर भी चढ़ना होता, उससे हँसना-बोलना भी होता है, डाँटना भी होता है; लेकिन पहले यह जो प्रतिबंधक है, रुकावट है, यह छूट जानी चाहिए। इसी से रस की अनुभूति में दैन्य को सञ्चारीभाव माना जाता है। सञ्चारीभाव माने चलता-फिरता आ गया, और फिर चला जाएगा, रहेगा नहीं; गोपी हमेशा ऐसे हाथ-पाँव जोड़े रहेगी, सो नहीं।+
तासां तद् सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः ।
अरे, उनको फिर मान आवेगा, फिर मद आवेगा। अभी कृष्ण में मान है, गोपी मना रही हैं; फिर जब गोपी में मान आवेगा तो कृष्ण मनावेंगे। फिर तो काम बराबरी का। लेकिन यह जो अभिमान है अपने त्याग का वह तो छूटना चाहिए। तो कृष्ण ने कहा- तुम इतनी बड़ी होकर मेरे पाँव की धूल बनना चाहती हो, राम-राम-राम। गोपी बोली- महाराज, आपके पाँव की धूल क्या कोई छोटी चीज है?-
श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किस भृत्यजुष्टम् ।
यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासस्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः ।।
कहती है कि स्वयं लक्षमी आपके चरणकमल की रज को चाहती हैं। रज माने धूलिकण; जैसे कमल में पराग होता है- उसकी कर्णिका पर उसकी मञ्जरी पर छोटे-छोटे जो कण होते हैं उनको पराग बोलते हैं- वैसे भगवान् के चरणकमल की पराग है उनमें लगी धूलि। ‘श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे’ लक्ष्मी जी जो हैं आपके चरणकमलों का पराग चाहती हैं, माने आपके चरणकमलों की धूलि चाहती हैं, अतः आपकी चरणरज कोई मामूली चीज नहीं है।
श्रीमद्भागवत में ऐसा आता है कि ब्रह्माजी तो किसी भी ब्रजवासी के चरण की धूलि चाहते हैं, पशु हो, पक्षी हो, द्विपाद हो, चतुष्पाद हो, भेड़ हो, बकरी हो, चिड़िया हो; ब्रह्माजी चाहते हैं कि किसी के पाँव की धूलि मिल जाय तो मेरा जीवन सफल हो जाय। अब देखो यह दैन्यातिदैन्य हो गया। महात्मा ने हमको सुनाया था कि ब्रह्माजी की यह हिम्मत नहीं थी कि वह कहें कि हमको गोपी की चरण-धूलि चाहिए। उनकी यह भी हिम्मत नहीं थी कि वह कहें कि श्रीकृष्ण। हमको आपके चरणों की धूलि चाहिए। उनकी यह हिम्मत भी नहीं थी कि हमको ग्वालों के बछड़ों के चरणों की धूलि चाहिए; स्वयं अपराधी थे क्योंकि उनको चुरा लिया था। फिर गायों के चरण की धूलि चाहि, इसकी हिम्मत तो हो ही कैसे सकती थी जिनके बेटों को चुरा लिया था। इसलिए बोले
तद्भूरिभाग्यमिहजन्मकिमप्यटव्यां, यद्गोकुलेऽपि कत माङ्घ्ररजोभिषेकम्-
हमें तो ब्रज की धूलि चाहिए बाबा, हम किसी व्रजवासी का नाम लेने के हकदार नहीं है, हम तो सबके अपराधी हैं। ब्रह्मा की यह स्थिति है। रही कृष्ण के चरणों की धूलि, वह तो अक्रूर में मिल गयी। अक्रूर ने देखा कि ये श्रीकृष्ण के चरणचिह्न हैं। रथ पर कूद पड़े और लोटने लगे। उद्धवजी को कृष्ण को चरणों की धूलि तो मिलती थी, पर वह तो गोपियों के चरणों की धूलि चाहते थे।++
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम् ।।
देखो, जिसके चरणों की धूलि ली जाती है, उसको श्रेष्ठ समझते हैं; तब उसका भाव हमारे अंदर आता है। तो उद्धवजी चाहते हैं गोपियों का भाव, गोपियों का जैसा प्रेम है कृष्ण के रति, वैसा प्रेम हमारे हृदय में आवे, इससे वह चाहते हैं गोपियों के चरणों की धूलि! लेकिन गोपियों ने देखा कि हमारे अन्दर अभी कोई न कोई दोष जरूर है। जब तक संसार का संस्कार शेष रहता है तब तक भगवान् में प्रेम नहीं होता। ये संसार में जो भोग हम लोगों को मिले हैं बचपन से अब तक और पूर्वजन्म में और पुस्तकों में जिनके बारे में पढ़े हैं, और लोगों को जो भोग भोगते देखा है, उन सबका संस्कार हृदय में रह जाता है। और ये दम्भी लोग जो हैं, वे भोगों को भोगकर ज्यादा आनन्द जाहिर करते हैं। मन में पछताते भी हैं, तब भी लोगों को यही दिखाते हैं कि हमको संसार के भोग से बड़ा सुख हो रहा है। हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो शराब पीते हैं तो लोगों में दिखाते हैं कि शराब पीकर बड़ा मजा आया; और घर में आते हैं तो अपनी माँ के सामने, पिता के सामने सिर पीटते हैं कि हमसे बड़ी गलती हो गयी। तो वह जो उनका आनन्द दिखाना है, वह असल में दम्भ है।
ये संसारी लोग जब चोरी में सफल हो जाते हैं तो कहते हैं कि हमने बाजी मार ली, मगर भीतर तो उनके चोरी की ग्लानि रहती है। व्यभिचारी लोग व्यभिचार करने के बाद चाहे जितना सुखी बतावें, उनके मन में ग्लानि तो रहती है। ये भोग के संस्कार जो चित्त में हैं वे शुद्ध प्रेम में बाधक हैं। भोग का संस्कार-शेष वासना, और अपने में ग्रहण का अभिमान अथवा त्याग का अभिमान, ये दोनों हृदय में भगवान् को बैठने भर की जगह भी नहीं देता। दिल में भगवान् के बैठने के लिए स्थान चाहिए। तो ग्रहण का अभिमान भी दिल को छोटा बना देता है और त्याग का अभिमान भी दिल को छोटा बना देता है; भगवान् के बैठने भर का आसन भी नहीं मिलता।
अब गोपियाँ क्या चाहती हैं? गोपियाँ चाहती हैं कि श्रीकृष्ण के चरणों की धूलि! इसमें अब वे सताती हैं शिष्टाचार! कहती हैं कि हम श्रीकृष्ण के चरणों की धूलि चाहने से छोटी नहीं हो गयीं, क्योंकि उसको तो लक्ष्मी भी चाहती हैं। भगवान् के चरणों की धूलि चाहना उनके चरणों के चिह्न चाहना, उनके चरणों की सुगन्ध चाहना, उनके चरणों का रस चाहना, उनके अँगूठे को चूसना, रस चाहना, उनका स्पर्श-सुख चाहना, इस चाह की महिमा कहाँ तक बतावें। उनके चरणों में त्रिवेणी का निवास है
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 27
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् || २७ ||
प्रशान्त – कृष्ण के चरणकमलों में स्थित; मनसम् – जिसका मन; हि – निश्चय ही; एनम् – यह; योगिनम् – योगी; सुखम् – सुख; उत्तमम् – सर्वोच्च; उपैति – प्राप्त करता है; शान्त-रजसम् – जिसकी कामेच्छा शान्त हो चुकी है; ब्रह्म-भूतम् – परमात्मा के साथ अपनी पहचान द्वारा मुक्ति; अकल्मषम् – समस्त पूर्व पापकर्मों से मुक्त |
भावार्थ
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जिस योगी का मन मुझ में स्थिर रहता है, वह निश्चय ही दिव्यसुख की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करता है | वह रजोगुण से परे हो जाता है, वह परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता को समझता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मों के फल से निवृत्त हो जाता है |
तात्पर्य
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ब्रह्मभूत वह अवस्था है जिसमें भौतिक कल्मष से मुक्त होकर भगवान् की दिव्यसेवा में स्थित हुआ जाता है | मद्भक्तिं लभते पराम् (भगवद्गीता १८.५४) | जब तक मनुष्य का मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर नहीं हो जाता तब तक कोई ब्रह्मरूप में नहीं रह सकता | स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः | भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में निरन्तर प्रवृत्त रहना या कृष्णभावनामृत में रहना वस्तुतः रजोगुण तथा भौतिक कल्मष से मुक्त होना है |


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