Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (107)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का उदय
ठाकुरजी ने प्रशंसा की है कि बहुत अच्छा बना है, आप जरूर खाइये। अब मैं खाने को बैठा तो कढ़ी में नमक ही नहीं था, और भात के चावल कच्चे थे। मैंने कहा- जरूर ठाकुरजी तुमको बनाते हैं, तुमको प्रेम नहीं करते, खाते-वाते नहीं है, क्योंकि तुम राधारानी से सौतियाडाह करती हो।
तो जब लक्ष्मीजी से भगवान ने ऐसे कहा, कि हमारे चरणों में से तुलसी है तुम कैसे रहोगी? तो लक्ष्मीजी ने कहा कि एक नहीं बाबा, तुम दस सौत रख लो, हम बिल्कुल सौत की ओर नहीं देखेंगे। हम तुम्हारी ओर देखने के लिए तुमसे प्रेम करते हैं कि अगल-बगल झाँकने के लिए तुमसे प्रेम करते हैं? प्रेम अपने प्रियतम पर नजर जमाने के लिए होता है, दृष्टि तदाकार करने के लिए होता है, अपने मैंको मारने के लिए होता है, दाहिने-बायें देखने के लिए थोड़े ही होता है। भगवान ने कहा- अच्छा, तुलसी के साथ रहना तुमको मंजूर? लक्ष्मी ने कहा- मंजूर। बोले- देवीजी, एक और दिक्कत है; तुम छाती पर ही रहो, तुम चरणों में मत जाओ। आठ पहर चौंसठ घड़ी, ठाकुर पर ठकुराइन चढ़ी, अगर तुम वक्षस्थल पर रहोगी तो अकेली रहोगी, लेकिन चरणों में जाओगी तो भृत्यजुष्टम्- ये हजारों जो सेवक हैं उनमें कोई चरणामृत लेने आता है, कोई चन्दन लगाने आता है, कोई तुलसी चढ़ाने आता है, यहाँ तो भीड़ ही लगी रहेगी, धक्कमधक्का बना रहेगा, और फिर तुम चिढ़ोगी और हमारे सेवकों से बिगाड़ करोगी, फिर तुमको-हमको सुख कहाँ होगा?
हमारे सेवकों से जब बिगाड़ पैदा हो जावेगा तो एक समस्या ही तो पैदा हो जावेगी न। आयी सेवा करने के लिए, आयी सुख देने के लिए, और वहाँ महाराज बिल्कुल लंकाकाण्ड हो गया। इसलिए तुम वक्षस्थल पर ही आनन्द से रहो, चरणों में जाने का नाम मत लो। लेकिन फिर भी लक्ष्मी ने कहा-
श्रीर्यत्पदाम्बुजरश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं- भगवान तो कहते थे कि तुम हमारे वक्षस्थल पर रहो, हमारे हृदय में रहे, हमारे अंतरंग रहो, छिपी रहो दिनभर; वक्षस्थल का मतलब क्या है कि ये हीरा ये मोती, ये जवाहरात और वह फूलों की माला, वैजयन्ती और वनमाला और कमलमाला, इनके नीचे लक्ष्मीजी लिए जाती हैं; दूसरे को तो पता नहीं चलता है। भगवान से तो चिपकी रहती है लक्ष्मी पर दूसरे को दिखाई भी नहीं पड़ता। बोले- भाई वाह! प्रेम हो तो ऐसा। लक्ष्मीजी बोलीं- ना-ना, भले हमको तुलसी के साथ रहना पड़े, हम लक्ष्मी होकर भी तुलसी के साथ ही आपके चरणों में ही रहेंगी।+
असल में तुलसी धरती का प्रतीक है, भू-देवी का प्रतीक है। माने भू-देवी जो है वे तुलसी बनकर आयीं और जो श्रीदेवी लक्ष्मी हैं वे कहती हैं कि हम-भूदेवी के साथ ही आपके पाँव में रहेंगी। ठीक है, आप भू-देवी से बहुत प्रेम करते हैं। उसकी रक्षा के लिए तो आप अवतार लेकर आये ही हैं; और मैं घर-घर घूमती हूँ। इससे तो अच्छा है कि मैं भू-देवी के साथ ही रहूँ। रही बात भृत्यजुष्टम् की, तो मैं आपके सेवकों की भीड़-भाड़ में भी रहूँगी, लेकिन हमको मिलनी चाहिए चरण-रज!
कालिय-नाग के प्रसंग में नाग-पत्नियाँ बोलती हैं कि इस कालिय-नाग ने क्या तपस्या की है, यह हम नहीं जानती हैं, जिसके कारण इसको हे कृष्ण। तुम्हारे पदरेणु का स्पर्श प्राप्त हुआ।
कस्यानुभावोस्य न देव विद्यहे, तवाङ्घ्रिरेणु-स्पर्शाधिकारः ।
यद वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपो विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता ।।
जिन चरणों की धूलि की कामना से आपकी खास श्रीमती लक्ष्मीजी, ललनाललाम, ललनारत्न, लक्ष्मीजी भी तपस्या करती हैं तो गोपियाँ कहती हैं कि हमको चाहिए आपके चरणों की रेणु जिसकी चाह लक्ष्मीजी भी करती हैं। लक्ष्मीजी कोई ऐसी वैसी थोड़ी ही हैं- ‘यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयासः’ बहुत से देवता चाहते हैं, बहुत से देवताओं का प्रयास है कि लक्ष्मी उनकी ओर देख करके आपके चरणों की धूलि चाहती हैं, तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः- जब श्रीशिरोमणि महिला-मूर्धन्य भगवती लक्ष्मी भी आपके चरणों की धूलि चाहती हैं तो हम गाँव की गँवार गोपी यदि उसी चरणरेणुको चाहें तो इसमें क्या आश्चर्य है? हम भी आपके चरणों के रज की शरण ग्रहण करती हैं।
श्रीकृष्ण बोले-आखिर गोपियो, तुम चाहती क्या हो? अच्छा, तुम खड़ी रहो, हम बाँसुरी बजाकर सुनाते हैं। तुम कहो तो तुम्हारे सामने गायें, तुम कहो तो तुम्हारे सामने नाचें, तुमको जैसे खुशी हो गोपियो, तुम चुपचाप खड़ी रहो, हम वैसे करके बात देते हैं। देख लो, दर्शन का सुख ले लो।++
गोपियों ने कहा- नहीं, हमको दर्शन का सुख नहीं चाहिए। दर्शन तो हम रोज ही करती हैं, नाचते भी देखती हैं, बजाते भी देखती हैं, गाते भी देखती हैं, गाय चराते देखती हैं, आते देखती हैं, जाते देखती हैं। तुमने तो हमको बड़ा सुख दिया है। पर हम चाहती क्या है-
तत्रः प्रसीद वृजिनार्दन तेङघ्रिमूलं प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणतीव्रकामतप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ।।
हम और कुछ नहीं चाहती हम आपकी सेवा चाहती हैं। माने हम आपको नचाकर, गवाकर बजवाकर अपनी इन्द्रियों की तृप्ति नहीं चाहतीं, हम तो आपकी सेवा करके आपकी प्रीति चाहती हैं। देखो, काम में और प्रेम में क्या फर्क है? देवर्षि नारद ने इसका विवरण दिया। जहाँ काम होता है वहाँ अपना स्वार्थ और अपना प्रिय चाहिए। और जहाँ प्रेम होता है वहाँ प्रियतम का स्वार्थ चाहिए। बोले यह तो बिल्कुल एकांगी बात हो गयी; यह क्या प्रेम है कि बस उन्हीं-उन्हीं का चाहिए? हमको कुछ चाहिए नहीं? हमारा कुछ नहीं है? दुनिया में ऐसा प्रेम नहीं हो सकता। बोले- भाई सुनो, इस बात को समझो- ‘तस्मिन् तत्सुखे सुखित्वम्’ प्रियतम के सुख में अपना सुख होना।
हम कब मुसकराते हैं? जब वे मुसकराते हैं। उनका दिल खिलता है तब हमारा दिल खिलता है; हमारी जीभ को भोजन अच्छा लगा यह हमारी खुशी का कारण नहीं है, उनकी जीभ को भोजन अच्छा लगा यह हमारी खुशी का कारण है। माने उनकी जीभ हमारी जीभ हो गयी। इसका मतलब यह हुआ कि इसमें अपना त्याग ही त्याग हो। वैराग्य ही वैराग्य हो, ऐसी बात नहीं है। अपना सुख भी है पर अपने सुखी होने का साधन बनाया अपने प्रेमास्पद के सुख को। देखो, आपके बच्चे को कोई प्यार करता है, तो आपको सुख मिलता है कि नहीं? क्यों मिलता है? आपका बच्चा अपना है, उसको जब प्यार मिलता है, तब मालूम पड़ता है, मानो हमको ही प्यार मिल रहा है। तो आपका जो प्रियतम है उसको जब सुख मिले तब आप सुखी होवें, यह प्रेम का लक्षण है। प्रियतम आपका है ना? उसको सुख मिलता है तो आपको ही सुख मिलता है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[Niru Ashra: 🙏🙏🌸🙏🙏
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 139 !!
कुरुक्षेत्र में श्रीराधाकृष्ण का मिलन
भाग 2
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ललिता सखी ? द्वार पर खड़ी है………गम्भीर है ……….श्याम सुन्दर को देखकर मुस्कुराती भी नही है…….बस अपलक देख रही है ।
ललिता ! कृष्ण नें नाम से पुकारा ।
चलो ! नाम तो नही भूले हो ! मुझे लगा तुम सब भूल गए ।
ललिता का अधिकार है …….इतना व्यंग तो कर ही सकती है ।
कहाँ है वो ? ललिता सखी से पूछा . श्याम सुन्दर नें ।
नाम याद है ? की भूल गए ? ललिता सजल नेत्रों से बोली ।
पास में गए श्याम सुन्दर…….ललिता सखी के ।
एक भी पल ऐसा नही बीता मेरा………जब मुझे मेरी राधा याद न आयी हो……..मेरा रोम रोम राधामय है ललिते ! ।
श्याम सुन्दर की बातें सुनकर ………ललिता सखी नें कहा ……….मिलोगे ?
हाथ जोड़ लिए ललिता के श्याम सुन्दर नें ……….तुम कृपा करो हे ललिते ! मिला दो ना मेरी राधा रानी से ।
ललिता नें हाथ पकड़ा श्याम सुन्दर का ……..और ले गयीं श्रीराधा रानी के शिविर में ……….काँप रहे थे उस समय श्याम सुन्दर ……..साँसे तेज़ तेज़ चल रही थीं ………….उफ़ !
स्वामिनी ! लाडिली ! हे राधिके !
देखो ! कौन आया है…….श्याम सुन्दर आये हैं ……देखो !
ललिता नें शिविर में प्रवेश करते ही………चहकती आवाज में श्रीराधारानी से कहा ।
विनोद करना अभी भी नही छोड़ा तुम लोगों नें …………..ऐसे मत बोलो ………विरहिणी के साथ विनोद करना उचित नही हैं ।
श्रीराधारानी नें आँखें बन्द कर लीं ।
ललिता सखी को चुप कराकर दवे पाँव श्याम सुन्दर आगे बढ़ें …….
और पीछे जाकर खड़े हो गए …….
…. और प्रेम से बोले – राधे ! मेरी प्यारी !
चौंक गयीं श्रीराधा………ये आवाज मेरे श्याम सुन्दर की है …….मेरे श्याम ! मेरे प्राण ! मेरे प्रियतम !
पीछे मुड़कर जैसे ही देखा श्रीराधा नें ……………
सामनें वही मुस्कुराता मुखारविन्द………नील वर्ण …….मोर मुकुट धारी ….पीताम्बर धारण किये हुए ।
और श्याम सुन्दर नें देखा……..तपे हुए सुवर्ण की तरह गौर वर्णी ………कृश कटि…….लजीले नयन………नीली साडी ……..
दोनों एक दूसरे को देखते ही रहे…………अपलक ………किसी के पलक भी नही गिर रहे………….दोनों के नेत्रों से आनन्द के अश्रु बहते जा रहे हैं ……….दोनों बढ़े आगे …….धीरे धीरे …….ये सहज था ……….सहजता में बढ़ रहे थे दोनों…….पास में जाकर खड़े हो गए फिर……..पास में……….बहुत पास……..दोनों की साँसे टकरा रही थीं………दोनों के भीतर का सौ वर्षों का महावियोग………छटपटाहट उसकी ही थी ।
कुछ नही……….एकाएक हृदय से लगा लिया दोनों नें ……..एक दूसरे को………एक हो गए ………दोनों एक हैं……..धड़कनें एक हो गयीं ……..प्राण एक हो गए……….
ये होना ही था……….क्यों की प्रेम देवता भी तो यही चाहते हैं कि …….दो एक हों ………यही तो चमत्कार है प्रेम का ।
दिव्य मिलन हुआ……..पर कुछ देर बाद दोनों ही हिलकियों से रो पड़े थे………..आनन्द के अश्रु निरन्तर बहते जा रहे थे ।
कहते हैं …….उस समय अस्तित्व नें पुष्प बरसाए आकाश से ।
उफ़ ! सौ वर्षों का भीषण महावियोग था……..आज जाकर मिलन की वेला आयी थी……..इधर दोनों युगल मिल रहे थे ……….उधर बाहर बाजे गाजे बजनें शुरू हो गए थे ।
शेष चरित्र कल –
🦚 राधे राधे🦚
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 29
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सर्वभूतस्थमात्मनं सर्वभूतानि चात्मनि |
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः || २९ ||
सर्व-भूत-स्थम् – सभी जीवों में स्थित; आत्मानम् – परमात्मा को; सर्व – सभी; भूतानि – जीवों को; च – भी; आत्मनि – आत्मा में; ईक्षते – देखता है; योग-युक्त-आत्मा – कृष्णचेतना में लगा व्यक्ति; सर्वत्र – सभी जगह; सैम-दर्शनः – समभाव से देखने वाला |
भावार्थ
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वास्तविक योगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है | निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है |
तात्पर्य
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कृष्णभावनाभावित योगी पूर्ण द्रष्टा होता है क्योंकि वह परब्रह्म कृष्ण को हर प्राणी के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित देखता है | ईश्र्वरः सर्वभूतानां हृद्देशोऽर्जुन तिष्ठति | अपने परमात्मा रूप में भगवान् एक कुत्ते तथा एक ब्राह्मण दोनों के हृदय में स्थित होते हैं | पूर्णयोगी जानता है कि भगवान् नित्यरूप में दिव्य हैं और कुत्ते या ब्राह्मण में स्थित होने से भी भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होते | यही भगवान् की परं निरपेक्षता है | यद्यपि जीवात्मा भी एक-एक हृदय में विद्यमान है, किन्तु वह एकसाथ समस्त हृदयों में (सर्वव्यापी) नहीं है | आत्मा तथा परमात्मा का यही अन्तर है | जो वास्तविक रूप से योगाभ्यास करने वाला नहीं है, वह इसे स्पष्ट रूप में नहीं देखता | एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को आस्तिक तथा नास्तिक दोनों में देख सकता है | स्मृति में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है – आततत्वाच्च मातृत्वाच्च आत्मा हि परमो हरिः | भगवान् सभी प्राणियों का स्त्रोत होने के कारण माता और पालनकर्ता के समान हैं | जिस प्रकार माता अपने समस्त पुत्रों के प्रति समभाव रखती है, उसी प्रकार परम पिता (या माता) भी रखता है | फलस्वरूप परमात्मा प्रत्येक जीव में निवास करता है |
बाह्य रूप से भी प्रत्येक जीव भगवान् की शक्ति (भगवद्शक्ति) में स्थित है | जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जाएगा, भगवान् की दो मुख्य शक्तियाँ हैं – परा तथा अपरा | जीव पराशक्ति का अंश होते हुए भी अपराशक्ति से बद्ध है | जीव सदा ही भगवान् की शक्ति में स्थित है | प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार भगवान् में ही स्थित रहता है | योगी समदर्शी है क्योंकि वह देखता है कि सारे जीव अपने-अपने कर्मफल के अनुसार विभिन्न स्थितियों में रहकर भगवान् के दास होते हैं | इस प्रकार प्रत्येक अवस्था में जीव ईश्र्वर का दास है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति में यह समदृष्टि पूर्ण होती है
