!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 139 !!(2),महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (107)& श्रीमद्भगवद्गीता : Niru Ashra
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (107) (स्वामी अखंडानंद सरस्वती ) गोपियों में दास्य का उदय ठाकुरजी ने प्रशंसा की है कि बहुत अच्छा बना है, आप जरूर खाइये। अब मैं खाने को बैठा तो कढ़ी में नमक ही नहीं था, और भात के चावल कच्चे थे। मैंने कहा- जरूर ठाकुरजी तुमको बनाते हैं, … Read more