🙏🥰 #श्रीसीतारामशरणम्मम 🥰🙏
#मैंजनकनंदिनी…. 2️⃣3️⃣
भाग 1
( #मातासीताकेव्यथाकीआत्मकथा )_
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#सखिनमध्यसियसोहतिकैसे…..
📙( #रामचरितमानस )📙
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#मैवैदेही ! ……………._
मेरे जनकपुर के मानस नें तो इसी विवाह के रस, रास, हास्य, परिहास कोहवर की प्रेम क्रीड़ा के दर्शन चिन्तन को ही अपनी साधना बना ली ……….
है ना विचित्र बात………छोड़ दिया ज्ञानी के उस निराकार ब्रह्म को ……..दृष्टा ब्रह्म हमारे किस मतलब का………हमें तो उस ब्रह्म की तलाश थी ……जो हमारे साथ खड़ा रहे ……हमारा पक्ष ले ।
छोड़ दिया था इस विवाह महोत्सव के बाद मेरे जनकपुर वासियों नें …………किसी अन्य देवी देवताओं की साधना करना ……..।
राम ही तो ब्रह्म हैं !……….अब विदेह नगरी के लोगों को भला कोई समझायेगा ? और मै ! ……उनकी बेटी, उनकी बहन ……..उस ब्रह्म की आल्हादिनी शक्ति …………..इसी भाव से ही भरे रहते हैं मेरे जनकपुर वाले ………ब्रह्म और उनकी आल्हादिनी में ही हमारे अन्तःकरण चतुष्टय लग गए ……..तो हो ही गया ……………।
अब देखिये मेरी सखी चन्द्रकला जब उस विवाह मण्डप को देखती है ……जहाँ मुझे और मेरे प्राण रघुनन्दन को विराजना है ……….तब वेदान्त के ज्ञान को इस विवाह महोत्सव से कितना सुन्दर जोड़ती है !
मुझे कह रही थी……..जो दिव्य विवाह मण्डप बना है ………..ऐसे ही मण्डप मेरे हृदय में भी बन जाए …….काश !
फिर ज्ञान की चरमावस्था में पहुँच जाती है …………कहती है …….मण्डप बनानें के लिए चार खम्भो की जरूरत पड़ती है ……
ऐसे ही हमारे पास भी चार खम्भे हैं …….उनका प्रयोग करो ……
मन, बुद्धि , चित्त और अहंकार ………….और मध्य में है कलश …….
ये कलश अद्वैत तत्व का प्रतीक है ………।
मैने तो उस मण्डप को देखा है ……………सिया जू ! इतना सुन्दर मण्डप है कि मेरे पास शब्द नही है उसका बखान करनें के लिए ।
ऐसे ही अगर हम जीव, अपनें अन्तःकरण चतुष्टय को ही मण्डप का स्तम्भ बना दें ……………..
मैने चन्द्रकला से पूछा था ……..फिर क्या होगा ?
चन्द्रकला कहती है …………मैने जब उस मण्डप को देखा …….तो मै समझ गयी ……मणियों के खम्भे हैं ………….
और सिया जू ! जब आप और रघुनन्दन विराजेंगें ना उस विवाह मण्डप में ……..तो उन मणियों के खम्भों में आप दोनों का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ेगा ।
सिया जू ! क्या अन्तःकरण चतुष्टय की सार्थकता इसमें नही है ……कि मन, बुद्धि, चित्त और अहं ही ब्रह्ममय हो जाए ।
और इतना ही नही ……….चन्द्रकला विदुषी है ………वैसे तो विदेह नगरी का झाडू लगानें वाला भी विद्वान है ………फिर मेरी सखी अगर ज्ञान की ऊँचाई पर स्थित है तो इसमें क्या बड़ी बात है ।
हाँ ……..पर मेरे विवाह नें इस ज्ञान की नगरी को प्रेम की नगरी में परिवर्तित कर दिया ……….पर ज्ञान के धरातल पर प्रेम टिका हो ….तो उसकी बात अलग ही रहती है ………..मै भी क्या क्या लिखनें लग गयी हूँ आजकल ………अरे ! प्रेम होना ही पर्याप्त है ………..।
और सिया जू ! आपका ही ये विवाह है …..जो साँझ को शुरू होकर सुबह तक चलनें वाला है ………………
मेरी सखी चन्द्रकला नें मुझे बताया …………………..
आपके विवाह से पहले, दिन में ही विवाह की प्रथा थी ………….पर ।
पर, क्या चन्द्रकले ! बताओ ……….. मैने पूछा ।
दिन का मतलब है….अब रात गयी…….मिलन का समय बीत गया ।
क्रमशः ….
शेष चरिञ अगले भाग में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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[] Niru Ashra: “प्रेमियों का ध्यानयोग – वेणुगीत”
भागवत की कहानी – 37
भागवत का ये प्रसंग अद्भुत है । क्यों न अद्भुत हो , परब्रह्म रस का वितरण करने निकला है …ये जीव बेचारे हैं …जन्मजन्मों से भवरूपी वन में भटक रहे हैं ….उन लोगों को रस का स्वाद चखाने के लिए ये रसिकशिरोमणि श्रीवृन्दावन में प्रवेश करते हैं । इनका रूप भी विलक्षण हो उठता है उस समय । सिर में मोर पंख , गले में वैजयंती की लम्बी माला , कान में कनेर के पुष्प , चमचमाती पिताम्बरी । क्या किसी को भी पागल करने के लिए इतना पर्याप्त नही है ? फिर क्यों बाँसुरी बजाते हैं ? बाँसुरी सुनकर तो हम सुध बुध भूल जाती हैं । बेचारी गोपियों की अपनी दिक्कत है …इसे कौन समझे ! श्याम सुन्दर को तो बस आग लगानी आती है ….वेणु बजाकर ये सबके हृदय में प्रेम की अगन जला देते हैं ..फिर ये सब प्रेम के झुलसे लोग इधर उधर भागते फिरते हैं …..शुकदेव कहते हैं – उस प्रेम की अगन से ऐसी दशा हो जाती है गोपियों की ….कि इनका ना जी लगे ….ना कहीं मति लगे ….प्रेम ने भीतर तक आंदोलित कर दिया है इन्हें ।
गौचारण करने जा रहे हैं गोपाल …..सुबह की वेला है …..सज धज के गायों को आगे करके …..पीछे ये “मधुर गोपाल” अपने साथियों के संग श्रीवृन्दावन जा रहे हैं । सुन्दर ये इतने हैं कि सुन्दरता इनको देखकर सकुचा जाती है । गोपियाँ देखती हैं …..पुष्प उछालती हैं ….ये मुस्कुराते हैं ….हाथ हिलाकर गोपियों का प्रेम स्वीकार करते हैं । गोपियाँ देखती रहती हैं ….जब ये चले जाते हैं …तब गोपियाँ धीरे धीरे अपने घरों के भीतर आती हैं ….कोई दाल चढ़ाकर आयी थी तो कोई भात चढ़ाकर …..किन्तु अब ये सब भूल गयी हैं ….क्यों की अपने प्रियतम को इन्होंने देख लिया है ना ! हद्द तो तब हो गयी जब श्रीवृन्दावन पहुँचकर श्याम सुन्दर ने बाँसुरी बजानी शुरू की ….उफ़ ! ये गोपियाँ ! ये तो पहले ही सुध बुध खोकर बैठी थीं उसके ऊपर बाँसुरी ओर । पगलाईं गोपियाँ इधर उधर देखने लगीं ….अब भोजन बनाना इन्हें कहाँ याद रहे ….ये तो मिल जुल कर बैठ गयीं ….आँखें इनकी बंद हो गयीं हैं …..और मुरलीधर इनके हृदय में प्रकट हो गए …..ये हृदय के माध्यम से ही अपने प्रेमोस्पद को निहार रही हैं ।
शुकदेव कहते हैं – जीव अल्पज्ञ है ….जीव में अल्पशक्ति है …तो ऐसी स्थिति में जीव का क्या होगा ? जीव वैसे ही संसार में फंस गया है ….वो देखता है तो वही फंस जाता है क्यों की संसार सुन्दर है …..जीव किसी से बतियाता है तो वहीं मोहित हो जाता है ….क्यों कि उसके कानों में मधुर शब्द , मधुर ध्वनि पड़ी । किसी ने आलिंगन किया तो ये जीव वहीं आसक्त हो उठता है …क्यों की त्वचा तो स्पर्श सुख चाहती है ना ! ओह ! एक जगह फंसा हो जीव तो निकल भी जाए किन्तु ये तो चारों ओर से फंसा पड़ा है ……तब क्या करें ? ब्रह्म अपने करुणामय स्वभाव को दिखाता है …..वो आकार लेलेता है ….वो निराकार था …साकार हो उठता है ….जीव इसे देखता है ….ओह ! ऐसा सौन्दर्य ! उसके नेत्रों से ये मधुर ब्रह्म हृदय में प्रवेश कर जाता है ….फिर वो मधुर बाँसुरी वादन करता है …..कानों में अमृत घोल दिया है । फिर तो ……..सुनिए – वेणु गीत में गोपियाँ क्या कहती हैं …………
अरी देख ! कितने सुन्दर लग रहे हैं हमारे श्याम सुन्दर ! कैसे मोर के पंख को अपने सिर में खोंस लिया है …..मोर पंख के चारों ओर कोमल कोमल आम के पत्तों से कैसे सजा दिया है इनके सखाओं ने । हाँ हाँ सखी ! कुछ देर के लिए वहाँ शान्ति छा जाती है फिर दूसरी सखी कहती है …..ओह ! इस बाँसुरी ने ऐसा क्या किया कि श्याम सुन्दर के अधरों से चिपकी रहती है …..तो दूसरी सखी हंसते हुए कहती है ….बाँस है बाँस । फिर भी हिम्मत तो देखो जिस अधर रस को पीने के लिए हम बाबरी हुई बैठी हैं ….उस रस को ये बाँसुरी पूरा ही पी रही है ।
तभी तीसरी सखी कहती है ….निगोड़ी बाँसुरी न खुद सोती है न हमें सोने देती है ….न बजे ना , क्यों बजना ! हमारा चैन भी छीन लिया ….हट्ट । चौथी सखी कहती है …..अच्छा ! एक बात बता ….इस बाँसुरी ने क्या तप किया है ? तो पाँचवी सखी कहती …वन में तप किया है …सर्दी गर्मी सहा है ….फिर इसे काटा गया है …इसमें नाना प्रकार के छेद किए गए हैं ……बिना तप किए प्रेममार्ग में प्रेमी आ कहाँ सकता है ? किन्तु प्रेममार्ग का तप अलग ही होता है ….सहना पड़ता है …बिना सहनशक्ति के तुम इस मार्ग में चल ही नही सकते । सब कुछ तो सहता है प्रेमी । अरे ! यहाँ तक कि वो खोखला तक हो जाता है …भीतर छुपाने जैसा उसके पास कुछ बचता ही नही है …..उन्मुक्त होकर अपने सारे छिद्रों ( दोषों ) को वो अपने प्रियतम के सामने उघाड़ देता है …..
बस फिर क्या ….चारों ओर प्रेम ही प्रेम ….वन के पक्षी प्रेम में डूबे हैं ….वृक्ष प्रेम रस में डूबे हैं ….वन में खिले पुष्प प्रेम रस में मग्न है …….पुष्पों में मँडराते भ्रमर वो प्रेमी हो गये हैं ….वन में नाचते मोर प्रेम के कारण अश्रु बहा रहे हैं …..हिरण हिरणी ये प्रेम में डूबकर मत्त हो उठे हैं ….इतना ही क्यों ? यमुना नदी प्रेम के उछल कर अपने प्रियतम के चरणों में कमल पुष्प चढ़ा रही है । अरे ! आकाश में बादल छा गए हैं …..बादल मानौं छत्र बनकर श्याम सुन्दर को छांयां कर रहे हैं …..इतना ही नही ….अंतरिक्ष में देवता लोग खड़े हैं वो मुरलीमनोहर को निहार रहे हैं उनकी पत्नियों की दशा तो और विलक्षण है …..मुरली मनोहर के दर्शन कर देवियाँ विमान में ही गिर रही हैं …..उनकी चोटी ढीली हो गयी है …उनकी चोटी के पुष्प नीचे गिर रहे हैं ….वो सीधे श्याम सुन्दर पर …..और श्याम सुन्दर बाँसुरी बजा रहे हैं । गोपियाँ ये सब अनुभव करती हैं …उन्हें अनुभव हो रहा है कि सब कुछ प्रेममय है ….और प्रेममय क्यों न हो प्रेममूर्ति स्वयं अधरों में वेणु को रखकर सबको रस-रास का निमन्त्रण जो दे रहे हैं ।
शुकदेव कहते हैं …….ये प्रेम का ध्यानयोग है ….गोपियाँ इस तरह ध्यान करती हैं अपने प्रियतम का ….और वो खो जाती हैं । प्रेम का अर्थ ही तो स्वयं का खो जाना है अपने प्रियतम में ।
Niru Ashra: भक्त नरसी मेहता चरित (38)
॥नरसी जी के भजन का प्रभाव॥
आज एकादशी का दिन था । भक्त दम्पति का नियम था कि –
‘एकादशी व्रत रखना और दिन भर भगवद भजन के अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य न करना । अःत आज नित्य कर्म से निवृत होकर दोनों पति -पत्नी भजन में संलग्न हो गये ।’
अन्य दिन तो भोजनादि कुछ झंझट रहता था, जिससे भजन में कुछ बाधा पड़ जाती थी । आज उससे भी छुट्टी थी ।
अतएव और दिनों से आज कहीं अधिक आनंद था ; निश्चित रूप से दोनों का भजन चल रहा था ।
आजकल ‘ धार्मिक कार्यों में श्रद्धा न रखने वाले बहुत से नवशिक्षित युवक एकादशी आदि व्रतों के दिन उपवास रखने की कोई आवश्यकता नहीं समझते । उनकी दृष्टि में यह सब बातें स्वास्थ्य के विरुद्ध है ।’
परंतु वास्तव में देखा जाय तो वे भ्रम में है । हमारे प्राचीन ऋषि -मुनियों ने एकादशी आदि व्रतों को धर्म के साथ जोड़कर हमारा बड़ा भारी उपकार किया है । यदि हम धार्मिक तत्व को छोड़ भी दे तो वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन सब व्रतों का बड़ा महत्व है । यह सभी स्वीकार करेंगे कि दसों इन्द्रियों और मन का संयम करना मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है ।
परंतु माणिकबाई का शरीर आज कुछ अस्वस्थ था । उसे साधारण ज्वर हो आया था । फिर भी वह शरीर का कुछ भी ख्याल न कर पति के साथ भजन करने में लीन थी ।
‘कोटिजन्मार्जिते पूण्ये कृष्णे भक्तिः प्रजायतै”
इस शास्त्र वाक्य को लक्ष्य में रखकर वह अपना मनुष्य जन्म सफल बना रही थी । दोनों पति पत्नी भगवत प्रेम में इतने मग्न हो रहे थे कि मानो वे इस मायिक जगत से निकलकर भजनानन्द अनुपम जगत में विहार कर रहे हों.
सुन मनमौजी सांवरियां.
तू तो बेठियो हुकम चलावे,
कानुड़ा नखरा घना दिखावे
तेरी मेरी कइया निभ सी,
छप्पन भोग छति सो व्यंजन वो भी लागे थोडो,
सब जानू सांवरिया तू है स्वाद को घणो चिटोरो,
ढूंढे है तू स्वाद नया तू तो बेठियो हुकम चलावे,
कानुड़ा नखरा घना दिखावे
तेरी मेरी कइया निभ सी,
रंग बिरंगा बागा पहने नित शृंगार करावे,
इक वार भी सांवरियां क्यों मन में तेरे ना आवे,
क्यों तू जरा खर्चा घना
तू तो बेठियो हुकम चलावे,
कानुड़ा नखरा घना दिखावे
तेरी मेरी कइया निभ सी,
सेवा कहल तेरा हुकम चलाने सब कुछ न्यारो लागे,
म्हाने तेरा लटका झटका नखरा प्यारा लागे,
मर्जी जितनी नखरो दिखा तू तो बेठियो हुकम चलावे,
कानुड़ा नखरा घना दिखावे
तेरी मेरी कइया निभ सी,
क्रमशः ………………!
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
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श्लोक 10 . 7
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एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः |
सोSविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७ ||
एताम् – इस सारे; विभूतिम् – ऐश्र्वर्य को; योगम् – योग को; च – भी; मम – मेरा; यः – जो कोई; वेत्ति – जानता है; तत्त्वतः – सही-सही; सः – वह; अविकल्पेन – निश्चित रूप से; योग्येन – भक्ति से; युज्यते – लगा रहता है; न – कभी नहीं; अत्र – यहाँ; संशयः – सन्देह, शंका |
भावार्थ
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जो मेरे इस ऐश्र्वर्य तथा योग से पूर्णतया आश्र्वस्त है, वह मेरी अनन्य भक्ति में तत्पर होता है | इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है |
तात्पर्य
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आध्यात्मिक सिद्धि की चरम परिणिति है, भगवद्ज्ञान | जब तक कोई भगवान् के विभिन्न ऐश्र्वर्यों के प्रति आश्र्वस्त नहीं हो लेता, तब तक भक्ति में नहीं लग सकता | सामान्यतया लोग इतना तो जानता हैं कि ईश्र्वर महान है, किन्तु यह नहीं जानते कि वह किस प्रकार महान है | यहाँ पर इसका विस्तृत विवरण दिया गया है | जब कोई यह जान लेता है कि ईश्र्वर कैसे महान है, तो वह सहज ही शरणागत होकर भगवद्भक्ति में लग जाता है | भगवान् के ऐश्र्वर्यों को ठीक से समझ लेने पर शरणागत होने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं रह जाता | ऐसा वास्तविक ज्ञान भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत तथा अन्य ऐसे ही ग्रंथों से प्राप्त किया जा सकता है |
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इस ब्रह्माण्ड के संचालन के लिए विभिन्न लोकों में अनेक देवता नियुक्त हैं, जिनमें से ब्रह्मा, शिव, चारों कुमार तथा अन्य प्रजापति प्रमुख हैं | ब्रह्माण्ड की प्रजा के अनेक पितामह भी हैं और वे सब भगवान् कृष्ण से उत्पन्न हैं | भगवान् कृष्ण समस्त पितामहों के आदि पितामह हैं |
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ये रहे परमेश्र्वर के कुछ ऐश्र्वर्य | जब मनुष्य को इन पर अटूट विश्र्वास हो जाता है, तो वह अत्यन्त श्रद्धा समेत तथा संशयरहित होकर कृष्ण को स्वीकार करता है और भक्ति करता है | भगवान् की प्रेमाभक्ति में रूचि बढ़ाने के लिए ही इस विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता है | कृष्ण की महानता को समझने में अपेक्षा भाव न वरते, क्योंकि कृष्ण की महानता को जानने पर ही एकनिष्ट होकर भक्ति की जा सकती है |
