[] Niru Ashra: 🙏🥰 श्रीसीताराम शरणम् मम 🥰🙏
मैंजनकनंदिनी..1️⃣0️⃣1️⃣भाग 1
( माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)
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नीलनीरज-दलायतेक्षणां लक्ष्मणाग्रज-भुजावलम्बिनीम्।
शुद्धिमिद्धदहने प्रदित्सतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।
नील कमल-दल के सदृश जिनके नेत्र हैं, जिन्हें श्रीराम की भुजा का ही अवलंबन है, जो प्रज्वलित अग्नि में अपनी पवित्रता की परीक्षा देना चाहती हैं, उन रामप्रिया श्रीसीता माता का मैं ध्यान करता हूं।
“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे –
मैं वैदेही !
तू इतनी सुन्दर क्यों है त्रिजटा ?
तू सांवरी होकर भी सुन्दर लगती है !
त्रिजटा नित्य शाम को आजाती थी मेरे पास ……..मुझे उसका संग अच्छा लगता……वो मुझे कहती थी ……”राम नाम” मेरे घर के द्वार पर अंकित है ……….तुलसी का पौधा और राम नाम ……….ये दोनों मेरे पिता विभीषण जी को बहुत प्रिय हैं ………………
रावण कुछ नही कहता, राम नाम लिखनें पर ? …………मैं पूछती थी त्रिजटा से ……….तब वह हँसती और हँसते हुए कहती ………एक दिन रावण मेरे घर में आगये थे……..उन्होंने द्वार पर लिखा हुआ देखा ……”राम”…….तब वह क्रोध से लाल पीले हो गए ….और चिल्लाकर बोले ……….विभीषण ! मेरी लंका में ये राम नाम ? वो भी घर के द्वार पर ही क्यों लिखाया है ….?
मेरे पिता जी ज्यादा चतुर नही हैं ……..वो झूठ बोल नही सके …..
तब मैं आगे आई ……………हँसते हुए त्रिजटा बोल रही थी ।
मैने कहा ….ताऊ जी ! आप इतनें क्रोधित क्यों होते हैं………….
आप का ही तो नाम लिखा है पिता जी नें …………..मैने कहा था ।
“राम” मेरा नाम है ?………….रावण नें क्रोध में ही पूछा था ।
हाँ……..पर गलती इतनी हो गयी पिता जी से कि दो अक्षरों को जोड़ दिया …….इसलिये आपको गलतफहमी हो रही है ……..
ताऊ जी ! “रा” का अर्थ है रावण ..यानि आप …और “म” का अर्थ है मन्दोदरी..यानि ताई……हुआ कि नही दोनों को मिलाकर राम !
मैं त्रिजटा की बात सुनकर हँसी ………मुझे कई दिनों के बाद पहली बार हँसी आयी थी…………त्रिजटा और हम दोनों हँसते रहे थे ।
आपनें पूछा – मैं इतनी सुन्दर कैसे हूँ ……………
आप को शायद पता नही मेरी माँ गन्धर्व की कन्या हैं …….इस सम्पूर्ण राक्षस समाज में मेरी माँ जैसी सुन्दरी और कोई नही है …..आपनें तो देखा ही है ना मेरी माँ को ……”सरमा”…..यही नाम है मेरी माँ का ।
मेरी माँ गन्धर्व पुत्री हैं……..और मैं उनकी कन्या …….शायद इसलिये मैं सुन्दर लगती हूँ ………..त्रिजटा इतराते हुए बोली थी ।
एक बात पूछूँ त्रिजटा ? अन्यथा मत लेना मेरी बात का ………..मैनें उससे पूछा ।
रावण से तुम माँ बेटी शत्रुता का भाव क्यों रखती हो ?
मेरे इस प्रश्न नें त्रिजटा को क्रोधित कर दिया था ……………
रावण नें मेरे नाना जी की हत्या की है……….इतना ही नही मेरे मामा और पूरे मामा के कुनबे को भी समाप्त कर दिया ………तब से मेरी माँ और मैं … रावण का सर्वनाश करनें की प्रतिज्ञा ले चुकीं हैं ……….ये कहते हुए त्रिजटा क्रोध से काँप उठी थी ……….मैं उसे देखती रही ……..सच में बहुत अधर्म किया है रावण नें – मैं सोच रही थी ।
क्रमशः ….
शेष चरिञ अगले भाग में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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[] Niru Ashra: श्री भक्तमाल (095)
सुंदर कथा ५९ (श्री भक्तमाल – श्री गोपालदास और विष्णुदास जी)
पूज्यपाद श्री भक्तमाली जी के टीका , श्री राजेंद्रदास जी ,प्रियादास शरण एवं संतो के लेख पर आधारित ।
श्री गोपालदास जी और श्री विष्णुदास जी दोनों गुरुभाई थे ।अनंत सद्गुणों से युक्त, स्वभाव से गंभीर और हरिगुण गायक भक्तवर श्री गोपालदास जी बांबोली ग्राम के निवासी थे । भजन -भावमें शूरवीर श्री विष्णुदास जी दक्षिण दिशा में काशीर ग्राम के निवासी थे । ये दोनों संतो भक्तो को गुरु गोविन्द के सामान मानकर उनकी सेवा करते थे । साधु- सेवा में दोनों गुरुभाइयों का हार्दिक परम अनुराग था ।
यह दोनों साधु- संतो को ऐसे सुख देनेवाले थे की इन्होंने एक नयी रीति चलायी । जब कभी किसी संत महात्मा के यहाँ कोई महोत्सव ,भोज , भंडारा होता और इनको निमंत्रण आता तब ये बड़े उल्लास के साथ बैल गाड़ी में भरकर घी, चीनी और आटा आदि जो भी सामान लगता वह सब ले जाते थे । कोठारी से मित्रता कर के उससे कह देते – देखो संतो की सेवा में किसी चीज़ की कमी नहीं पड़नी चाहिए । क्या क्या सामान कम है हमें आप हमें बता दो , हम सब ला देंगे ,महंत जी को इस बारे में पता नहीं चलना चाहिए की यह सामान कौन दे गया । इस तरह ये दोनों गुरुभाई गुप्त रूप से सेवा करते थे ।
कभी भी सेवा का दिखावा और प्रदर्शन इन्होंने नहीं किया । किसी को पता न चले इस तरह से सेवा करते थे । ऐसा करने में इन दोनों का तात्पर्य यह होता कि महोत्सव में किसी प्रकार की कोई कमी न पड़े और संतो की निंदा न हो । इस भेद को कोई जान नहीं पाता था । महोत्सव संपन्न होने के बाद सबको बड़ा सुख होता था कि कोठार-भंडार में किसी वस्तु की कोई कमी नहीं हुई । बहुत से लोग तो कहने लगते की पता नहीं इस कोठार में कोई सिद्धि है या भंडारे में कोई सिद्धि है ।
एक बार एक संत के आश्रम में उत्सव था । श्री गोपालदास जी और श्री विष्णुदास जी रात्रि में बैलगाड़ी में सामान भरकर संत के स्थान पर जा रहे थे । रास्ते में चलते चलते बैलो की प्रकृति ख़राब हो गयी । बैल चल पाने में असमर्थ दिखाई पड़े । यह दोनों गुरुभाई ऐसे महान गोभक्त थे की उन्होंने बैलो को गाडी से खोल दिया और एक स्थान पर उन्हें बिठा दिया । जोर जबरदस्ती बैलो से काम नहीं करवाया । उन्होंने निश्चय किया की हम गाडी पर बैठ कर तो नित्यप्रति सेवा करते ही है परंतु कभी स्वयं गाडी खीचने की सेवा करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ । आज श्री रघुनाथ ने कृपा की है अतः बैलो के स्थान पर लग जाओ ।
एक तरफ गोपालदास जी लग गए और एक तरफ विष्णुदास जी लग गए । कोसो दूर तक यह दोनों गुरुभाई गाडी खिंच कर संत के आश्रम पर ले गए । एक दिन इन दोनों ने हाथ जोडकर विनती करते हुए अपने गुरुदेव से कहा – भगवन ! बहुत दिनों से हमारे मन में ऐसी उमंग उठ रही है की एक महा-महोत्सव हो जिसमें अनेक साधु – संतो का आगमन हो और उनकी सेवा करने का अवसर प्राप्त हो । उसमे आपकी कृपा और आज्ञा की आवश्यकता है । श्री गुरुदेव बोले – यदि ऐसा विचार है तो शीघ्रातिशीघ्र तैयारी करो । बहुत उत्साहपूर्व महोत्सव करो और सारी धरती के संतो को न्यौता देना है प्रकट ,अप्रकट, सिद्ध ,गुप्त ,आकाशचारी सबको न्योता देना है । दोनों गुरुभाई बोले – गुरुदेव ! यह इतने कम समय में कैसे संभव है । इनके गुरुदेव महान् सिद्ध महात्मा थे , उन्होंने अपने कमण्डलु से हाथ में जल लेकर चारो ओर जल का छींटा दिया ।
जल के छींटे फेकते ही उनके सामने आकाश से चार सिद्ध पुरुष प्रकट हो गए । वे उन महात्मा को दण्डवत् प्रणाम् करके सामने खड़े हो गए और हाथ जोड़कर बोले – महाराज श्री ! कृपा करके बताइये की हमारे लिए क्या आज्ञा है ? महात्मा बोले – हमारे स्थान पर महोत्सव के निमित्त धरती के सभी संत महात्माओ को न्यौता देना है । वे चारो सिद्ध प्रणाम् करके जो आज्ञा कहकर वहाँ से चले गए । गुरूजी ने अपने दोनों शिष्यो से कहा कि इस उत्सव में महात्माओ की भारी भीड़ इकठ्ठा होगी ,अतः उनके ठहरने के लिए कुटियां (सुंदर निवास स्थान ) बनवाओ । उत्सव प्रारम्भ होते ही चारो ओर से संत महात्मा पधारे ।दोनों गुरुभाइयों ने उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम् किया फिर उन्हें आदरपूर्वक भोजन प्रसाद पवाया और वस्त्र भेंटकर सब प्रकार से प्रसन्न किया ।
लाखो की संख्या में संत महात्मा आते गए ।
उत्सव तो करवाना था एक दिन का परंतु उत्सव चलते चलते तीन दिन हो गए और देखते देखते तीन दिन से पांच दिन हो गए । इस प्रकार संत – समूह के द्वारा अखंड कथा कीर्तन होता रहा । उत्सव की समाप्ति उत्सव की समाप्ति होनेपर श्री गुरुदेव से दोनों शिष्यों ने पूछा – गुरुदेव जी ! हमलोग खूब दूर दूर तक जाकर भोज भंडारा करते है परंतु जो सब संत जो यहां पधारे थे , ऐसे ऐसे संत तो हमने कभी देखे ही नहीं । ये सब कहा से पधारे ? गुरुदेव ने दोनों को आज्ञा दी कि -कल प्रात: काल सम्पूर्ण सन्त-मण्डली को परिक्रमा करने जाना । वहाँ परमानन्द स्वरुप श्री नामदेव जी के दर्शन होंगे । वे उज्जवल वस्त्र धारण किये हुए हाथ में तानपुरा लिए प्रसन्न मनसे अकेले ही जा रहे होंगे । उनके चरणो मे सिर रखकर प्रणाम करना । वे तुम्हें परम सिद्ध सन्त श्री कबीरदास जी का दर्शन करा देंगे ।
श्री गुरुदेव की आज्ञा पाकर प्रात:काल होते ही दोनो गुरुभाई संतशाला की प्रदक्षिणा करने चले । वहाँ सफ़ेद वस्त्र में जो दिव्य महात्मा दिखाई पड़े हाथ में तानपुरा लिए । उनसे दोनों गुरुभाइयों ने पूछा – महाराज आप कौन है ? उन महात्मा ने कहा – पंढरीनाथ का लाडला ! लोग हमें नामदेव के नाम से जानते है । उस समय नामदेव जी समाधिस्त हो चुके थे । पता चल गया की यही दिव्य शरीरधारी श्री नामदेव जी है , दर्शन करके प्रसन्न हो गए । उमंग के साथ दोनों उनके श्रीचरणो मे लिपट गये । छुडाने से भी चरणो को नहीं छोड़ रहे थे, तब श्रीनामदेव जी ने उन दोनो से कहा-जहां साधु सन्तो का अपमान होता है, वहाँ हमलोग कभी नहीं आते-जाते हैं और जहां उनका सम्मान होता है, वहाँ हमलोग आते -जाते रहते हैं । हमने तुम्हारी सन्तो में प्रीति और सेवा करने की रीति देखी है, उससे हम बहुत ग्रसन्न हुए ।
ऐसा कहकर श्रीनामदेव जी ने दोनों भक्तों को गले से लगा लिया । फिर कहा- जाओ, आगे चलनेपर तुम्हे श्री कबीरदास जी मिलेंगे? जैसे ही ये दोनों आगे चले, एक दिव्या महात्मा दिखाई पड़े । दोनों ने पूछ – महाराज आप कौन है ? महात्मा बोले – जगत्गुरू श्री रामानंदाचार्य का शिष्य , लोग हमें कबीरदास जी के नाम से जानते है । प्रसन्न हो गए भक्तराज श्रीकबीर जी के दर्शन करके। उस समय श्रीकबीरदास जी भी भगवान् के धाम पधार चुके थे ।दोनो ने चरणो में पडकर प्रणाम किया । आंखों से आँसुओ की धारा बह चली ।
हंसकर श्रीकबीर जी बोले – कहो, अभी पीछे किसी सुखदायी सन्त के तुम्हें दर्शन हुए ? इन्होने उत्तर दिया- हाँ, महाराज दर्शन हुए । जहां साधू संतो की भाव से सेवा होती है ,वहाँ वैकुण्ठ साकेत गोलोक से तक संत आते है ।इसके पश्चात् श्रीकबीर जी ने दोनो का सम्मान किया । गुरूजी के पास दोनों गुरुभाई रोते रोते आये । गुरूजी ने पूछा – क्या हुआ ,क्यों रो रहे हो ? दोनों शिष्यो ने कहा – महाराज ! हमारा जीवन सफल हो गए , हमें श्री नामदेव और कबीरदास जी के दर्शन हुए । गुरूजी ने कहा – केवल यह दोनों संत ही नहीं अपितु ऐसे ऐसे बहुत से संत इस उत्सव में पधारे थे ।इस प्रकार इन दोनो गुरु भाइयों पर संतो और गुरुदेव की पूर्ण कृपा हुई ।
[] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 18 : उपसंहार – संन्यास की सिद्धि
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श्लोक 18.17
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यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते |
हत्वापि स ईमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते || १७ ||
यस्य – जिसके; न – नहीं; अहङकृत – मिथ्या अहंकार का; भावः – स्वभाव; बुद्धिः – बुद्धि; यस्य – जिसकी; न – कभी नहीं; लिप्यते – आसक्त होता है; हत्वा – मारकर; अपि – भी; सः – वह; इमान् – इस; लोकान् – संसार को; न – कभी नहीं; हन्ति – मारता है; न – कभी नहीं; निबध्यते – बद्ध होता है |
भावार्थ
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जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि बँधी नहीं है, वह इस संसार में मनुष्यों को मारता हुआ भी नहीं मारता । न ही वह अपने कर्मों से बँधा होता है ।
तात्पर्य
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इस श्लोक में भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि युद्ध न करने की इच्छा अहंकार से उत्पन्न होती है । अर्जुन स्वयं को कर्ता मान बैठा था, लेकिन उसने अपने भीतर तथा बाहर परम (परमात्मा) के निर्देश पर विचार नहीं किया था | यदि कोई यह न जाने कि कोई परम निर्देश भी है, तो वह कर्म क्यों करे? लेकिन जो व्यक्ति कर्म के उपकरणों को, कर्ता रूप में अपने को तथा निर्देशक के रूप में परमेश्र्वर को मानता है, वह प्रत्येक कार्य को पूर्ण करने में सक्षम है | ऐसा व्यक्ति कभी मोहग्रस्त नहीं होता | जीव में व्यक्तिगत कार्यकलाप तथा उसके उत्तरदायित्व का उदय मिथ्या अहंकार से तथा ईश्र्वरविहीनता या कृष्णभावनामृत के अभाव से होता है | जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में परमात्मा या भगवान् के आदेशानुसार कर्म करता है, वह वध करता हुआ भी वध नहीं करता | न ही वह कभी ऐसे वध के फल भोगता है | जब कोई सैनिक अपने श्रेष्ठ अधिकारी सेनापति की आज्ञा से वध करता है, तो उसको दण्डित नहीं किया जाता | लेकिन यदि वही सैनिक स्वेच्छा से वध कर दे, तो निश्चित रूप से न्यायालय द्वारा उसका निर्णय होता है |


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