!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 64 !!
हंसदूतम्
भाग 2
गवाक्ष में खड़े कृष्ण वृन्दावन की ओर निहार रहे हैं ।
रोमांच हुआ कृष्ण को …….जब हंस उठता हुआ कृष्ण के सामनें आकर खड़ा हो गया ……रोमांच इसलिये हुआ कि ‘अपनें लोगों” की खुशबु से सरावोर था ये…….
कृष्ण भाव विभोर हो उठे थे ……..जब “राधा राधा राधा” नाम उच्चारण करनें लगा था वो हंस………
ओह !
अपनी गोद में रख लिया उस हंस को कृष्ण नें ………और बड़े प्रेम से मोती खिलानें लगे थे ……………
हंस ! मेरे मित्र ! क्या तुम सच में मेरे वृन्दावन हो आये ?
क्या मेरी राधा तुमसे मिलीं ? बताओ ना ! वो ठीक तो हैं ना ?
और हाँ हंस ! क्या उस मण्डली में आज भी मेरी चर्चा होती है ?
मेरी प्राणबल्लभा के दिन कैसे कटते हैं ? हंस ! ये गुप्त बात है किसी को कहना नही …….मेरा तो इस मथुरा में बिल्कुल मन नही लगता …..बस वृन्दावन की याद आती रहती है…….कैसा है मेरा वृन्दावन ?
मेरे ग्वाल बाल कैसे हैं ? मेरी मैया ? रो गए कृष्ण…..मेरे बाबा ?
और हाँ मेरी गैया ? बताना हंस ! सब कैसे हैं ?
तू भाग्यशाली है कि मेरी राधा को तेनें देखा ! और मुझे सब पता है ललिता सखी नें तुझे बड़ा प्रेम दिया है…..उनकी गोद में बैठनें का तेरा सौभाग्य ! इतना कहकर अपनें हृदय से लगा लेते हैं उस हंस को ।
हंस अब बोलता है……..”प्रेम की भाषा सब समझते हैं वज्रनाभ ! “
हंस नें जो वर्णन करके बताया है……….वो अद्भुत है ।
महर्षि शाण्डिल्य नें कहा ।
हे मथुराधीश ! मैं क्या कहूँ उस वृन्दावन के बारे में …………..
हंस नें बताना शुरू किया था ।
डूब जाएगा वृन्दावन …………उन गोपियों के आँसुओं की बाढ़ में डूब जाएगा वृन्दावन ……..बचा लो केशव ! बचा लो ।
आपकी मैया यशोदा …….अभी भी माखन निकालती हैं ……और नित्य आपकी प्रतीक्षा करती हैं ………..कोई लाख कहे कि …उसका लाला अब नही आएगा वृन्दावन …….पर वो मानती कहाँ ?
आँखों से नही दिखाई देता उन्हें अब………क्यों कि आँसू बहुत बह चुके हैं आँखों से ……..सुनाई भी कम देता है ……क्यों की आँखों का सम्बन्ध कान से भी तो होता है ।
वो मैया यशोदा माननें को राजी ही नही है कि ………आप देवकी के पुत्र हो ………….मैया यशोदा का कहना है कि कृष्ण मेरा ही पुत्र है ….चाहे दुनिया कुछ भी कहती रहे …………वो नही मानतीं ।
एक दिन ………स्वयं को रस्सियों से बाँध लिया मैया यशोदा नें ……
गोपियाँ दौड़ीं……मैया मैया ! ये क्या कर रही हो ?
ओह ! बहुत दर्द होता है………बहुत कष्ट होता है……मुझे तो हो रहा .. मेरे अत्यन्त कोमल कन्हाई को कितना कष्ट हुआ होगा ….जब मैने उसे बाँध दिया था ।
मेरे ये हाथ टूट क्यों नही जाते………वो अपनें हाथों को पत्थरों में मारती हैं ……गोपियाँ जैसे तैसे उन्हें शान्त करती हैं ………पर ।
हे मथुराधीश ! आपके बाबा नन्द के बारे में तो मैं क्या कहूँ ।
गम्भीरता ओढ़ ली है उन्होंने……..समाज के सामनें गम्भीर बने रहते हैं ………..कोई कुछ कहता है आपके बारे में ……तो ज्ञान सुना देते हैं ….कौन किसका है ? ये जगत बिछुड़नें के लिये है !
पर अकेले में रोते हैं …..बहुत रोते हैं ……..और जब कोई उन्हें पकड़ लेता रोते हुए ……..तो कहते हैं आँखों में कुछ पड़ गया था ।
रात रात में अज्ञात से बातें करते हैं………”कैसे लाता मैं उसे यहाँ वृन्दावन ……….क्या इन लाठियों से उन जरासन्ध जैसे आतंककारी का हम सामना कर पाते ?……..और हमारी बात नही है ……हम तो मर भी जाएँ ….पर कृष्ण को हम कैसे बचाते ……पूरा बृज मुझ बूढ़े को ही दोष देता है …..कि मैं क्यों नही लाया कन्हाई को यहाँ !
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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