!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( प्रेम-विरहा – “बैठे लाल निकुंज भवन” )
गतांक से आगे –
मिलन है , नित्य मिलन है यहाँ , पर विरह न हो तो मिलन का सुख कहाँ ? इसलिये विरह भी प्रकट होता है …अजी ! निकुंज में सब सूक्ष्म है …यहाँ मिलन सूक्ष्म है तो विरह भी सूक्ष्मतम है । इसे जो प्रेमी होगा वही अनुभव कर सकेगा ।
ये सत्य है कि मधुरातिमधुर वस्तु नित्य प्राप्त हो किन्तु भूख न हो तो उस वस्तु की कोई क़ीमत है ? ऐसे ही भूख हो पर वस्तु न प्राप्त हो तो भी कोई अर्थ नही है ….यही बात प्रेम में है ….मिलन हो रहा है , नित्य मिलन हो रहा है …पर विरह न हो …तो उस मिलन से उचाट होने लगता है …और मात्र विरह हो …मिलन ही न हो …तो प्रेम फलेगा ही नही । इस बात को श्रीराधाबल्लभ सम्प्रदाय ने नाम दिया है ….”प्रेम-विरहा” ।
एक पक्षी है सारस, वो अपनी प्रिया के वियोग को सह नही पाता ….और मर ही जाता है ।
और एक पक्षी है चकवी….वो रात्रि होते ही अपने प्रिय से दूर किनारे चली जाती है …और सुबह होने पर मिलती है । रात भर विरह में गुज़ारती है ।
एक बार सारस ने चकई से पूछा ….तू कैसे रहती है ? बिना प्रियतम के कैसे पूरी रात गुज़ार देती है ? तब चकई ने उत्तर दिया था ….सारस ! तू क्या जानें विरह के रस को ….तू तो क्षणिक वियोग प्राप्त होते ही मर जाता है ….मैं उस विरह का रस लेती हूँ रात भर …फिर उस दुःसह विरह के पश्चात् जब मिलती हूँ तब जो सुख का अनुभव होता है उसे तू क्या जाने ?
दोनों की ही बात सही है ….सारस मर जाता है वियोग में …उससे नही रहा जाता …उसका प्रेम ही ऐसा है ….वो मिलन के सुख को जानता , पर चकवी विरह को पीती है तो मिलन के सुख को दुगुना करके फिर आनन्द लेती है ….ये भी सही है । अब श्रीहित हरिवंश गोसाईं जी ने दोनों के ही प्रेम को निकुंज में प्रकट करने का प्रयास किया है …..सारस के समान क्षणिक वियोग को भी श्याम सुन्दर नही सह पाते ….अजी ! यहाँ तो ये स्थिति है कि अधर रस का पान करते ही जा रहे हैं ….तब उन्हें पान करते भी तृषा सताती है …तो अपनी प्रिया से कहते हैं …मैं तड़फ रहा हूँ ….मुझे अधर रस का पान कराओ । ये स्थिति निकुंज रस की है …..रस पीते हुए भी प्यास का बढ़ना ….ये है मिलन में विरह …..मिलते मिलते आकुल व्याकुल हो उठें ….कि प्यारी ! अब मिलो । प्रिया कह रही हैं …प्यारे मिले तो हो ….पर विरह बना ही हुआ है ….ये विरह नही बनेगा तो प्रेम का खेल नही होगा ….उबाऊ हो जाएगा । ऐसा अद्भुत प्रेम निकुंज में ही सम्भव है …जहां संयोग और वियोग की स्थिति एक साथ सम्भव हो जाती है ….ये है अद्भुताद्भुत ….रसानन्द ।
पागलबाबा उसी रसानन्द में छके पड़े हैं …..मत्त हैं । इन दिनों राधा बाग में अपने को छुपाते हुए …रस वर्षा कर रहे हैं । रहनी सामान्य से भी सामान्य है ….अपने पीछे लोगों की भीड़ को चलने नही देते …ज़्यादा भीड़ बाबा के पीछे चलने लगती है ..तो उन्हें आगे चलने के लिए कहते हैं …नही मानती भीड़ तो वहीं खड़े हो जाते हैं । कल की बात है श्रीजी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए किसी सेठ ने भिक्षुकों के साथ इनको भी एक रुपए दे दिये ….वो बाँटता हुआ आरहा था …तो बाबा को देखा ये इतने सामान्य बन कर रहते हैं …कि सेठ ने इनको भी एक रुपए का सिक्का दिया …और ये भी बड़े विचित्र …हाथ में ले लिया …मैं पीछे था …मैं हंसा …गौरांगी हंसी …शाश्वत ने कुछ रोष में कहा – कैसे लोग होते हैं ..पहचानते भी नहीं । बाबा हंसे …बोले ..पहचाना है तभी तो दिया …और हंसने लगे …..इन्हें कोई फर्क नही पड़ता …कोई क्या समझ रहा है …ये बरसाने की सीढ़ी चढ़ते बोले ….लोग क्या समझते हैं उसका क्या मूल्य ?
सच में गौरांगी बोली भी …रस में वही डूब सकता है …जो अपने को पूरा मिटा सके ।
बाबा ने अपने को रसमय बना लिया है ….रस ही बन गए हैं ये ….बाबा ये भी बोले थे श्रीजी के मन्दिर में ….कि सिद्ध से बड़ा होता है रसिक …गौरांगी कहती है ये पूर्ण रसिक हैं । आहा ।
“अच्छा , बातें न बना , आज तो चालीसवाँ पद है …चल गायन कर”। गौरांगी को बाबा ने आज्ञा दी ….लोग आगये हैं ….वाद्य लेकर कलाकार भी उपस्थित हो गये हैं …चारों ओर रस ही रस बहने लगा है …..राग रंग में सब भींजने लगे हैं । गौरांगी ने मधुर कण्ठ से गायन आरम्भ किया ….
बैठे लाल निकुंज भवन ।
रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित , त्रिविध पवन ।।
तू सखी काम केलि मनोहर , मदन दवन ।
वृथा गहर कत करत कृशोदरि, कारन कवन ।।
चपल चली तन की सुधि बिसरी , सुनत श्रवन ।
श्रीहित हरिवंश मिले रस लंपट , राधिका रवन । 40 ।
बैठे लाल निकुंज भवन ……………
बाबा खूब हंसते हैं ….नित्य मिलन में ही नित्य विरह की अनुभूति कराने वाला ये प्रेम रस सबके समझ से परे है । अनवरत रस पान करते हुये भी रसपान करने की चरम प्यास का बना रहना यही प्रेम का सर्वोच्च रूप है ….जिसकी हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं ।
बाबा इतना बोलकर फिर हमें ध्यान की गहराई में ले जाते हैं …जहां दिव्य निकुंज है …और चरम संयोगावस्था में चरम वियोगावस्था की अनुभूति हो रही है । प्रेम का ये सनातन खेल है ।
!! ध्यान !!
शरद की रात्रि है ….शीतल पवन बह रहे हैं …बड़ी सुन्दर रात्रि है …दिव्य सिंहासन है …उसमें युगलवर विराजें हैं ….सखियाँ भोग लगा रही हैं …..बड़े आनन्द से भोग लगाती हैं । भोग लगाते मधुर मधुर गीत गाती हैं ….श्याम सुन्दर पहले प्रिया जू को पवाते हैं फिर स्वयं पाते हैं …जैसे कोई आराधक अपने आराध्य को भोग लगाकर प्रसाद पाता है ..श्याम सुन्दर भी ऐसे पा रहे हैं ।
प्रिया जी रस में मत्त हैं …उनके अरुण अधर रस से भरे लग रहे हैं ….उन अधरों को बारम्बार श्याम सुन्दर देख रहे हैं ….उनको पीने की कामना से ये उन्मत्त हो उठते हैं …..हो गया …भोग पा लिया ….अब तो एकान्त चाहिये इन दोनों प्रेम के खिलौनों को । श्याम सुन्दर एकाएक खो जाते हैं ….मिलन के सुख में अपने आपको भूल जाते हैं …फिर स्व स्मृति जागती है तो प्रिया जी को निहारने लगते हैं ….पर अब एकाएक लालन के मनोरथ जाग्रत हो गया है । क्या मनोरथ ? कि सुन्दर सेज शैया हो ….और वो शैया कमल दल से सज्जित हो …चमेली के पुष्पों के झालर हों ..ताकि उसकी सुगन्ध से महक उठे वो कुँज । तो क्यों न मैं अभी ऐसे शयन कुँज का निर्माण करूँ ! श्याम सुन्दर तुरन्त उठे और चल दिये । सखियाँ हस्त प्रक्षालन के जल झारी लिए खड़ी थीं …..प्रिया जी के कर धुल चुके थे अब लालन के हाथों को धुलाना था …पर नही ये तो भोजन कुँज से ही चले गये …..सखियाँ बुला रही हैं पर रुके नहीं …एक बार प्रिया जी ने भी आवाज़ दी पर नही …वो तेज चाल से चले गये । प्रिया मानवती हो उठीं ….वो भी भोजन कुँज से अकेले बाहर आयीं और एक लता के नीचे बैठ गयीं …..रूठ गयीं प्यारी जू ।
पर उधर शयन कुँज सजा लिया श्याम सुन्दर ने …अपने मन की भाई सब करी ..प्रसन्न हुए और अब अपनी प्यारी को बुलाने के लिए जैसे ही बाहर आये …..वो तो लता के नीचे अकेली बैठी हैं …श्याम सुन्दर उन्हें देखकर मुस्कुराये …पर उन्होंने मुँह फेर लिया …..बस …..
तभी सखियाँ श्याम सुन्दर के पास गयीं ..और बोलीं ..कैसे आप भोजन कुंज से चले आये ? मैं तो प्रिया के लिए इस शयन कुँज को सजाने आया था …पर अब तो आपकी प्रिया रूठ गयीं हैं ।श्याम सुन्दर का मुख कमल ये सुनते ही कुम्हला गया है …वो बेचैन हो उठे हैं …उन्हें कुछ नही सूझ रहा …प्यारे ! जाओ मनाओ …सखियों ने कहा । नही , वो नही मानेंगी …ये कहते हुए श्याम सुन्दर अवनी में गिर गये ..सखियों ने उन्हें सम्भाला । प्यारे ! इतने अधीर मत बनो , हित सखी आगे आकर बोली …तो सखी ! तू मेरा एक काम कर दे ..जा और मेरी प्राण सर्वस्व को मना दे । उनको यहाँ ले आ । हित सखी बोली …प्यारे ! आप चलो ना , आप जाओगे तो वो मान जायेंगी । श्याम सुन्दर बोले ..नही , मुझ से अब खड़ा भी नही हुआ जा रहा …मेरे पाँव में अब शक्ति नही रही …ये कहते हुए श्याम सुन्दर लम्बी लम्बी साँस लेने लगे । हित सखी इस विरह अवस्था को समझ गयी वो श्रीराधिका जू के पास गयी …और जाकर बोली ….हे सखी !
( सख्य रस के कारण श्रीराधा जी को “सखी” सम्बोधन कर रही है )
हे सखी ! क्यों मान कर रही हो …वो प्यारे आपके ही रंग में तो रंगे हैं …शयन मंदिर में बैठे आपकी ही तो प्रतीक्षा कर रहे हैं …कितनी सुन्दर रात्रि है …हित सखी श्रीराधा जी से कह रही है ….
कितनी सुन्दर रात्रि है …रस खेल के लिए इस रात्रि से सुन्दर और कुछ हो नही सकता । फिर चमेली भी फूल रही है …हे सखी ! चमेली की सुगन्ध रात्रि को और मादक बना देगी …देखो तो …जिस शयन कुँज को सजाया है आपके प्यारे ने उसमें चमेली की ही सज्जा है ….हे कृश कटि वाली राधिके ! रस विलास में उन्मत्त होओ । देर मत करो , नही तो रात्रि बीत जाएगी …
जब श्रीराधा इस पर भी कुछ नही कहतीं …तो हित सखी कहती है ….आपके प्यारे व्यथित हैं …आपके वियोग में उनके प्राण कण्ठगत आगये हैं …उन्हें अपनी कोई सुध बुध नही है …वो बस आपमें ही खो गये हैं …..हित सखी बोले जा रही है …..ये सुनते ही प्रिया जू का हृदय द्रवित हो उठा ….ओह ! मेरे प्यारे मेरे लिए कुँज सज्जा करने गए थे …और मैं रूठ गयी हूँ ये देखकर वो इतने व्याकुल हैं …उठीं हैं श्रीराधा और दौड़ पड़ीं उस शयन कुँज की ओर ….रस लोलुप श्याम सुन्दर ने जब नूपुर की सुमधुर ध्वनि सुनी …तो वो समझ गये मेरी प्यारी आरही हैं मेरे पास , ये उठ गये …और ..और ..और ….दोनों रसिक गले मिल गए …..और धीरे धीरे एक हो गये ।
बोलो युगल सरकार की ….सखियाँ बोल उठीं …जय जय जय जय ।
पागल बाबा कहते हैं …ये प्रीत की रीत है …इतना ही बोले और मौन साध लिए ।
गौरांगी ने फिर इसी पद का गायन किया ………
“बैठे लाल निकुंज भवन”
आगे की चर्चा अब कल –


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