!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( फिर मानिनी – “तेरे हित लैन आई” )
गतांक से आगे –
प्रेम का एक मापदण्ड कहाँ ? क्या आप कह सकते हैं कि – ये करना ही प्रेम है ?
प्रेमनिर्झर हृदय से जो करो वो प्रेम ही है । प्रशंसा प्रेम है तो गाली देना भी प्रेम है । हंसना प्रेम तो रोना भी प्रेम है , रूठना प्रेम तो मनाना भी प्रेम है । फिर ये तो प्रेम राज्य है – निकुँज , यहाँ तो सब प्रेम ही प्रेम है ।
आज फिर श्रीराधारानी रूठ गयीं । क्यों ? वो छोड़िये । बस रस केलि को आगे बढ़ाना है ।
तेरे हित लैन आई , वन तै श्याम पठाई । हरति कामिनि घन कदन काम कौ ।
काहे कौं करत बाधा , सुनि री चतुर राधा । भेटि कैं मेटि री माई प्रकट जगत भौ ।।
देखि री रजनी नीकी , रचना रुचिर पी की । पुलिन नलिन नभ रोहिनी धौ ।
तू तौव सखी सयानी , तै मेरी एकौ न मानी , हौं तोसौं कहत हारी , जुवति जुगति सौ ।।
मोहन लाल छबीलौ , अपने रंग रसीलौ , मोहत विहंग पशु मधुर मुरली रौ ।
वे तौव गनत तन जीवन जोवन धन , श्रीहित हरिवंश हरि भजहि भामिनी जौ ।58 !
तेरे हित लैन आई वन तै श्याम पठाई ………
इस पद को गौरांगी ने सुमधुर स्वर में गया , बाबा ने आज कोई भूमिका नही बनाई …
सीधे इस अट्ठावनवें पद का गायन और फिर बाबा आज गम्भीरता के साथ ध्यान में बैठ गये ….सब रसिक जन भाव में मग्न होकर ध्यान में चले गए थे ।
!! ध्यान !!
शरद ऋतु है , शरद की रात्रि है । शीतल पवन बह रहे हैं । यमुना जल चन्द्र की चाँदनी में चमक रहा है । सुन्दर सुन्दर पुष्प खिले हैं । आज पुष्पों के प्रति श्याम सुन्दर का अनुराग कुछ ज़्यादा ही दिखाई दे रहा है ….श्याम सुन्दर प्रिया जु के साथ बाग में घूम रहे हैं ….वो पुष्पों को छूते हैं …फिर कहते हैं अपनी प्रिया से …ये पुष्प कितना सुन्दर है ना ! प्रिया जी बस मुस्कुरा जाती हैं ….फिर श्याम सुन्दर आगे बढ़ते हैं ….दूसरे पुष्पों को देखते हैं ….आहा ! प्यारी ! पुष्प तो ये भी सुन्दर है ….अब प्रिया जी कुछ नही बोलतीं ….श्याम सुन्दर दौड़ते हुए आगे चले जाते हैं और कहते है ….ये पुष्प तो और भी सुन्दर है । अब प्रिया जी मौन हो जाती हैं …उन्हें पुष्पों की ओर प्यारे का इतना ध्यान देना रुच नही रहा । पर श्याम सुन्दर भी अब कहते हैं ….प्रिया जी ! क्या इन पुष्पों के द्वारा मैं सेज सजाऊँ ? बहुत सुख प्रद लगेगा आपको । प्रिया जी इस पर भी कुछ नही बोलतीं तो श्याम सुन्दर को लगता है ….प्यारी ने बात मान ली । वो उत्साह से उछलते हुए पुष्पों को तोड़कर पीताम्बर में भर कर ले जाते हैं ….सामने जो कुँज है वहाँ पर चले जाते हैं ।
किन्तु इधर श्यामा जु तो रूठ गयी हैं ….वो यमुना तट पर बैठ जाती हैं ।
पर इन बातों से अनभिज्ञ श्याम सुन्दर सेज सजा रहे हैं …..बड़े मन से सज्जा करते हैं …फिर उस सेज सज्जा को देखते हैं …..मुग्ध हो जाते हैं । बहुत देर के बाद वो बाहर आते हैं और जब अपनी प्यारी को पुकारते हैं तो वो मुड़कर भी नही देखतीं …वो पास जाते हैं पर श्रीजी मुँह फेरकर बैठ जाती हैं ….ओह ! ये क्या हुआ ? श्याम सुन्दर उदास हो कर लौट जाते हैं और अपने बनाए सेज सज्जा को देखकर रो उठते हैं …उनके मुख से राधा , हा राधा ! पुकार ही निकल रही है ।
तभी हितसखी ये करुण पुकार उनकी सुन लेती है ….
और वो तुरन्त श्याम सुन्दर के सामने आ खड़ी होती है ।
श्याम सुन्दर उससे कहते हैं ….सखी ! तू समझा , तू कह मेरी प्यारी से …कि उसी के लिए मैंने सब कुछ रचा है ….वो मुझ से मिलें , हे सखी ! तू मेरी दूतिका बन और जा ।
श्याम सुन्दर के ये कहने पर हित सखी श्रीराधा जी के पास चली जाती है ।
तू जा ! तुझे श्याम सुन्दर ने भेजा होगा ना मुझे मनाने के लिए ! और तू उनका पक्ष रखने के लिए मेरे पास आई है । मुझे नही सुननी कोई बात । हित सखी को श्रीराधिका जी जाने के लिए कहती हैं …..पर हित सखी प्रेम की गूढ़ता को समझती है इसलिए वो धैर्य रखकर वही बैठ जाती है ..और कुछ देर कुछ नही कहती ….फिर अपनी स्वामिनी को सखी भाव से देखती है उनके कोमल करों को छूते हुये कहती है …..हे मेरी प्यारी सखी श्रीराधा ! तुम तो जानती हो , मैं उनकी नही तुम्हारी हित चिंतका हूँ । मैं तुम्हारे लिए ही श्याम सुन्दर के पास गयी थी ….और मैं अब तुम्हारे पास आई हूँ तो इसमें भी तुम्हारा ही हित है । मैं समझती हूँ तुम्हारे भी प्राणो के प्राण श्याम सुन्दर ही हैं ….दुखी हो …तुम्हें दुःख न हो इसलिये मैं तुम्हें लेने के लिए आई हूँ …चलिये ।
श्रीराधा जी अब कुछ नही बोलतीं …वो मौन ही रहती हैं और सखी की बातों को सुन रही हैं ।
देखो सामने देखो ! वो पुष्पों को लेकर जो गए थे ….उससे वो सेज सैया ही सजाने वाले हैं ….आपके लिए ही उन्होंने ये सब किया है । बहुत सुंदर सजाया है आप चलिये वहाँ ।
वो रो रहे हैं …..वो बिलख रहे हैं …..हित सखी बोलती जा रही है ।
क्यों ? प्रिया जी इतना नेत्रों के संकेत से पूछती हैं ।
इसलिए कि उन्हें आपका संग चाहिए ….आपके संग बिना उन्हें काम परेशान करता है …आप साथ रहती हैं तो वो काम पर विजय पा लेते हैं …चलिए प्यारी जी ! आप तो सब जानती ही हैं …चतुर हो आप …उनकी रस पिपासा शान्त आप ही कर सकती हो ….इसलिए चलिए । मिलिये उनसे …मिलन में बाधा मत डालिये ।
इस के बाद भी श्रीराधा जी कुछ नही कहतीं ….तो उठकर खड़ी हो जाती है हित सखी कहती है ….शरद की ऋतु को तो देखो , पूर्ण चन्द्र खिला है उसे देखो , और अपने प्यारे के द्वारा निर्मित कुँज की सैया को तो देखो ….
प्रिया जी इसके बाद भी कुछ बोलतीं ….तो हित सखी अन्तिम में कहती है ….तुम तो बिना बोले भी समझती हो …फिर आज क्यों नही समझ रहीं !
हित सखी की बात सुनकर श्रीवन भी विमोहित हो गया …पशुपक्षी सब मोहित हो गये ….कुछ भी हो ये हित सखी वंशी की अवतार जो है …इसकी वाणी में ही सम्मोहन है ….दुखी होकर हित सखी अब कहती है …हे मेरी गम्भीर सखी ! जिनका तुमने सब कुछ हरण कर लिया वो तेरे लिए बिलख रहे हैं …अब बताओ वो कहाँ जायें …सब कुछ तो उनका तुम्हारे ही पास है । ये सुनते ही श्याम सुन्दर कुँज के बाहर श्रीराधारानी को दिखाई दिये …वो हाथ जोड़ रहे थे । प्यारी जू का हृदय पिघल उठा वो दौड़ पड़ीं …..हित सखी आनंदित हो उठी ….वो भी पीछे दौड़ी …..श्याम सुन्दर को श्रीराधा रानी ने अपने हृदय से लगा लिया था ।
पूरा श्रीवन बोल उठा …..जय जय श्रीराधे , जय जय श्रीराधे ! जय जय श्री राधे ।
पागल बाबा भाव निमग्न हैं । गौरांगी इसी का पद का फिर गान करती है ।
तेरे हित लैन आई वन तै श्याम पठाई ……..
शेष चर्चा कल –


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