!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( सैद्धान्तिक पद – “यह जू एक मन बहुत ठौर करि” )
गतांक से आगे –
क्या सुनना चाहते हो ?
कुछ सिद्धान्त की बातें ।
अच्छा तो सुनो ।
राधा बाग में पागलबाबा आज कुछ सिद्धांत की बातें बताने बैठ गए थे । हम तो चकित थे कि ये आज लीला चिन्तन न करा कर सिद्धांत की बातें क्यों बताने लगे । किन्तु गौरांगी से पता चला कि आज का जो “हित चौरासी जी” का पद है , उनसठवाँ पद , वो सैद्धान्तिक है ।
“एक मन है एक ही जगह लगाओ ना”, बाबा बोले । फिर वो आगे कुछ बोलते कि उससे पहले ही गौरांगी ने आकर बाबा को प्रणाम किया तो बाबा बोल दिये …आज का पद सुनाओ ।
गौरांगी ने देखा शान्त भाव से बैठे हैं आज बाबा , उनके आस पास रसिकों की जमात है …उन्होंने कुछ प्रश्न किया है …..उसके ही उत्तर में बाबा ने गौरांगी को आज का पद गाने के लिए कहा ।
समय भी होने वाला था …इसलिये वीणा लेने के लिए जा ही रही थी गौरांगी कि ….बाबा ने कहा …तुम आज बिना वीणा के ही गाओ । गौरांगी बैठ गयी और बड़ी गम्भीरता के साथ पद गायन करने लगी ।
यह जु एक मन बहुत ठौर करि , कहु कौनें सचु पायौ ।
जहँ तहँ विपति जार जुवति लौ , प्रकट पिंगला गायौ ।।
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि , परत कौन पै धायौ ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ ।।
श्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब , काल व्याल कौ खायौ ।
यह जिय जानि श्याम श्यामा पद , कमल संगि सिर नायौ । 59 ।
“यह जु एक मन बहुत ठौर करि ……….
ये अद्भुत सिद्धांत पद है …इस सिद्धांत को कोई समझ ले और जीवन में उतार ले तो बस हो गया …..कई बातें वेद-वेदान्त शास्त्र आदि भी नही समझा पाते उसे एक अनुभवी सिद्ध समझा देते हैं …और बड़े सरल शब्दों में समझाते हैं …बाबा कहते हैं – इसलिये हम लोग बार बार कहते हैं कि सत्संग करो , सत्संग से बहुत लाभ है …सन्त लोग आपके कल्याण का उपाय बताते हैं ।
आज बात सिद्धांत की थी इसलिए ध्यान लगवाया नही बाबा ने ….पर बहुत बड़ी आध्यात्मिक समस्या का समाधान आज के सत्संग में हो गया था ।
एक मन है दो नही है …..फिर उस एक मन को एक ही जगह लगाओ ना !
विचार करो ! इस एक मन को तुम दस जगह लगाकर क्या सुख पाओगे ? या किसी ने आज तक सुख पाया है ? और याद रहे जो मन को दस जगह लगाता है उसका नाम वैश्या होता है । क्या वैश्या के जीवन में सुख होता है ? नही ना , वो दुःख ही दुःख भोगती है । ऐसे ही जिसका मन चारों ओर लगता है …लगाता है …उसके जीवन में दुःख है …..और इस बात को भागवत में एक पिंगला नामकी वैश्या ने भी बताया है । जिसने हजारों लोगों में अपना मन लगाया …पर उसे दुःख ही तो मिला …और उसने अन्तिम में यही कहा कि “आशा करना परम दुःख का कारण है” । ये बात भागवत में स्पष्ट कही गयी है । अच्छा ! एक बात बताओ …दो घोड़ों को जोड़कर , दो घोड़ों की कोई एक साथ सवारी कर सकता है क्या ? श्रीहित हरिवंश गोसाईं जी हमसे पूछते हैं ….वैश्या के पुत्र को कौन पिता अपनी गोद में बैठायेगा ?
देखो ! ये जगत एकदम झूठा है ..असत् है …और काल रूपी सर्प ने इसे ग्रस भी लिया है …
ये पल पल नष्ट हो रहा है …उसके बाद भी तुम अपना मन इसे दिये हुए हो ? कितनी जगह बँटा हुआ है तुम्हारा मन , विचार करो । पुत्र , पत्नी , धन , सम्बन्धी , यश , शरीर आदि आदि सबको मन दिए हुये हो …..फिर कैसे भगवान को अपना कह सकते हो ? तुमने मन तो चारों ओर दे रखा है ! फिर क्या करें ? श्रीहित आचार्य चरण समाधान देते हैं – कुछ मत करो ….मन में पक्का निर्णय कर लो कि ये सारा संसार नाशवान है ….इसको मन देंगे तो दुखी ही होंगे ….ये पक्का है ….फिर क्यों न हम अपना मन श्यामा श्याम के चरणों में लगा दें ! फिर क्यों न अपना मन हम निकुँज की वीथियों में लगा दें ! फिर क्यों न हम अपना मन उस निरन्तर प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम रस जहां निरन्तर प्रवाहमान होता रहता है …वहाँ लगा दें ! श्रीहिताचार्य कहते हैं – भई ! मेरी तो बात समझ में आगयी है ….इसलिए मैंने तो पूर्ण समर्पण पूर्वक एक मात्र युगल सरकार का आश्रय ले लिया है ….तुम भी यही करो । नही तो कोई लाभ नही है …बेकार में मन को इधर उधर डुलाने से । दुःख और रोने के सिवाय और कोई मार्ग नही बचेगा ।
बाबा कहते हैं …..सत्य है …..और सत्य बात को श्रीहित हरिवंश गोसाईं जी ने बड़ी सरलता से ही हमें समझाया है । अब इसी बात को वेद-वेदान्त समझायेगें तो कितना कठिन होगा समझना …पर महापुरुषों की बात अलग ही होती है । इतना समझ लो कि – मन को ज़्यादा भटकाना नही है । मन को ज़्यादा इधर उधर लगाना नही है । ये बात अच्छे से समझ लो कि ज़्यादा फैलाव करने से मात्र दुःख ही मिलता है …..नये नये सम्बन्ध बनाने नही हैं …नये नये सम्बंधी जोड़ने नही हैं , मन एक है तो उसे एक में ही लगाओ …..”यह जिय जानि श्याम श्यामा पद” यही सार है आज के पद का …….कि पहले ये समझ लो कि सब मिथ्या का बाजार है …उसमें सत्य केवल श्यामा श्याम हैं । बाबा अन्तिम में यही बोले ।
“गौरांगी ने इस पद को फिर गाया”
“यह जु एक मन बहुत ठौर करि”
आगे की चर्चा अब कल –


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