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August 30, 2025 6:54 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( रूपाकुल श्याम सुन्दर – “कहा कहौं इन नैंननि की” ) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( रूपाकुल श्याम सुन्दर – “कहा कहौं इन नैंननि की” ) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!

( रूपाकुल श्याम सुन्दर – “कहा कहौं इन नैंननि की” )

गतांक से आगे –

ओह ! श्रीप्रिया जी का वह अपार रूप सौन्दर्य !

जिसे देखकर श्याम सुन्दर आकुल हो उठते हैं ….प्यारी जी मुस्कुरा जाती हैं तो बिजली सी कौंध जाती है …और श्याम घायल हो जाते हैं । वो अपलक निहारते रहते हैं …उनके नेत्रों से अश्रु प्रवाह चलते रहते हैं ! वो जितना इस रूप माधुरी का पान करते हैं उनकी उतनी प्यास और बढ़ती ही जाती है …..वो और और देखते ही जाते हैं ….श्याम सुन्दर मानौं त्राटक ही लगा जाते हैं । क्या कहें ! ये श्रीराधारानी रूप प्यास ही है ….प्यास को ओर बढ़ाने वाली है ।

कितना कहें ! ये प्रेम है ही ऐसा कि ब्रह्माण्ड की प्यास को श्याम सुन्दर मिटाते हैं पर श्याम सुन्दर की प्यास को मिटाने वाली ये श्रीराधिका जू ही है । रूप में माधुर्य इतना है श्रीजी के कि इनकी प्यास बुझती कहाँ है ….और और और ……

“प्यारी जू को रूप मानौं प्यास ही रूप है”

अब ये दशा है प्रेम में हमारे परब्रह्म परमात्मा की ।


                  कहा कहौं इन नैंननि की बात ।
    ये अलि प्रिया वदन अंबुज रस ,  अटके अनत न जात ।।

  जब जब रुकत पलक सम्पुट लट ,  अति आतुर अकुलात ।
    लंपट लव निमेष अंतर ते ,   अलप कलप सत सात ।।

     श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच ,   मृग मद ह्वै न समात ।
       श्रीहित हरिवंश नाभि सर जल चर , जाँचत साँवल गात ।60 ।

कहा कहौं इन नैंननि की बात ….

अद्भुत पद गायन हुआ आज तो …पागल बाबा – आहा ! जय हो ! वाह ! , श्रीहित चौरासी जी के इस साठवें पद गायन में भाव निमग्न ही हो गये थे …वो बारम्बार “जय हो जय हो” कर रहे थे ।
श्रीहित चौरासी जी बाबा के रग रग बसी हुई हैं ….फिर भी बाबा इन पदों को ऐसे सुनते हैं जैसे पहली बार सुन रहे हैं । मोर कोयल आदि पक्षी भी बाबा के इस भाव पर रीझ मधुर स्वर से गान करने लगे हैं । रसिक समाज प्रेम सिंधु में अवगाहन कर रहा है । क्या कहें !

अब बाबा ध्यान करायेंगे ……चलिये इस पद का ध्यान कीजिए ।


                                  !! ध्यान !! 

सुन्दर कुँज है …..सुन्दर सुन्दर लताओं से आच्छादित कुँज है । उन लताओं में पुष्पों के अनेक गुच्छ हैं ….उन गुच्छों में भ्रमरों की गुंजार होती ही रहती है । भ्रमरों के रस पीने से पुष्पों का सुगन्ध फैल रहा है ….उस गन्ध में अद्भुत मादता है …..महक रहा है श्रीवन ।

ये प्रातः की वेला है …..वन विहार से युगल सरकार लौट आये हैं ….सखियों ने दोनों को अलग अलग स्नान कुँज में स्नान कराया है । अब श्रृंगार होगा दोनों का । तो स्नान कुँज से सखियाँ युगलवर को श्रृंगार कुँज में ले गयीं हैं । पर वहाँ एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी थी ।

स्नान कुँज में दोनों अलग अलग स्नान किये थे , इसलिए उतनी देर का वियोग दोनों को हुआ था ।

बस इतनी देर में भी वियोग ? ये प्रश्न अपने मन से हटा दीजिये । ये प्रश्न उठ रहा है आपके मन में तो जान लीजिये कि आप ने “प्रेम” को अभी जाना ही नही है । ये तो बहुत समय हो गया …अरे ! अगाध प्रेम जब उमड़ता है ना , तब प्रिय को देखते हुये पलकें भी गिरती हैं …तब भी ऐसा लगता है कि युग-युग बीत गये ।

सखियां आपस में चर्चा करती हैं – अरी सखियों ! श्याम सुन्दर तो चलते हुए भी प्रिया जी के मुख को अपलक निहारते आ रहे थे …वो तो हम हैं कि जैसे तैसे यहाँ श्रृंगार कुँज तक ले आईं , नही तो गिरते पड़ते आते । अभी भी देखे जा रहे हैं प्रिया जू को । ऐसे तो श्रृंगार होने से रहा । फिर क्या करें ? ललिता बोली- दूसरे कुँज में लाल जी का श्रृंगार हो और इसमें प्रिया जी का । विशाखा सखी ने कहा – ये ठीक है । ललिता सखी ने अपलक प्रिया जी को देखते हुए लालन को उठाना चाहा की चलिए दूसरे कुँज में । पर लाल जू ने सुना नही …ललिता सखी को इस प्रेम में डूबे प्रेमी को यहाँ से हटाना सही नही लगा । विशाखा सखी ने कहा …उठाओ ना , ले जाओ दूसरे कुँज में …हम यहाँ श्रीजी का श्रृंगार करेंगी । ललिता बोली …विशाखा ! मुझे तो इनको यहाँ से ले जाना पाप लगेगा , ऐसा लग रहा है । क्यों कि देखो ना , कैसे प्यारी जू का रूप देखकर ये आकुल से हो रहे हैं …इन्हें कुछ मतलब नही है इस समय किसी से …..बस प्रिया जी का रूप माधुर्य ! उसी में ये डूबे हैं । कुछ सोचकर ललिता बोली …एक काम करें ! क्या ? दोनों के मध्य एक झीना परदा डाल दें । हाँ ये ठीक रहेगा । विशाखा तुरन्त एक पर्दा ले आई और दोनों के मध्य आवरण डाल दिया ।

ये पर्दा तो महाविघ्नकारी है ….विचलित हो गए प्यारे लालन ।

पर सखियाँ अब मानने वाली नही हैं ….दोपहर भी तो होने वाली है अब ….भोग का भी समय हो रहा है …इसी में ये तो डूब जायेंगे तो भोग कब आरोगेंगे , ये वात्सल्यमयी भी तो हैं सखियाँ । सखियों में सारे रस हैं ।

दोनों छोटे छोटे हैं ….इनके अनुसार नही चलना है …ये तो प्रेम में डूबे रहेंगे फिर भूख प्यास इन्हें कहाँ लगेगी ! ये ध्यान हमें देना है ….ऐसा विचार करके सखियों ने श्रृंगार आरम्भ कर दिया ।

आज हित सखी श्याम सुन्दर का श्रृंगार कर रही है …और ललिता आदि श्रीप्रिया जी का ।

तब हित सखी कहती है – लालन ! उधर मत देखो …
इस तरफ देखो , नही तो अंजन अच्छे से नही लगेगा ।

श्याम सुन्दर हित सखी की ओर देखते हैं …..
फिर आकुल हो अपने हृदय की बात बताने लगते हैं ।


कहाँ देखूँ सखी !

कहा कहूँ ?

ये जो नेत्र हैं ना मेरे , ये तो भ्रमर बन गए हैं ….और प्रिया जी के मुखारविंद रूपी कमल के रस में ही अटके हैं । और कहीं नही जाते । सखी ! किसी को देखने की इच्छा ही नही होती ।

कहा कहूँ ?
श्याम सुन्दर ये कहते हुए प्रिया जी के मुखकमल को ही निहार रहे हैं ….झीने पर्दा के कारण अब स्पष्ट नही दिखाई दे रहा मुखकमल ..पर ये तो देख रहे हैं । झुक कर , उचक कर , कैसे भी देख रहे हैं ।

हित सखी बैठ गयी और लालन जू की बातें बड़े प्रेम से सुनने लगी ।

सखी ! ये नेत्र हैं ना , इनमें भी आवरण पड़ जाता है ..जैसे पलकें आ जाती हैं …बाधा है ये । उतने क्षण में भी ये नेत्र बाबरे अकुला जाते हैं । बेकार हैं ये नयन , लोभी हैं ..अब लोभी होना तो अच्छी बात नही है ना सखी ! हित सखी बस मुस्कुरा देती है और लालन जू की बात सुनती रहती है ।

“नेत्र रूप रस के लोभी हैं”……
लाल जू इतना बोले और फिर श्रीजी के रूप सिंधु में कुछ देर के लिए डूब गए ।

इनको श्रीजी के रूप में डूबा हुआ देख हितसखी इधर प्रिया जी के पास आगयी ।
ललिता आदि ने आगे बढ़ाया ….क्यों की लाल जी के पास से आयी है …और उनकी कोई बात श्रीजी को बतानी होगी ….ये सोचकर आगे कर दिया ।

श्रीजी ने हित सखी की ओर देखा और नयनों से ही पूछा ….क्या कह रहे हैं प्रीतम !

हित सखी बोली …वो तो आपके पुजारी हैं , वो तो आपके परम उपासक बन गए हैं ।

मुस्कुराते हुये श्रीजी ने पूछा …अच्छा ! तो उपासक का मनोरथ क्या है ?

बस उनका तो यही मनोरथ है कि …हम प्रिया जी के कानों के कर्णफूल बन जायें । वक्ष में लगने वाली कस्तूरी बन जायें ..और प्यारी के वक्ष में ही समा जायें । वो यही याचना करते हैं …कि मेरे नयन प्रिया जी के नाभि रूप सरोवर का मीन बन जाये । सच प्यारी जू ! वो यही मनोरथ कर रहे हैं …और कहें क्या ! हित सखी के मुख से ये सुनते ही प्यारी जू नयन झुका लेती हैं ….और फिर अपनी भारी पलकें उठाकर अपने प्यारे को चुपके से देख लेती हैं ।


पागल बाबा प्रेमोन्मत्त हो उठे हैं ….वो – राधा राधा राधा …पुकार रहे हैं ।

कुछ देर बाद गौरांगी इसी पद का जब गान करती है तो बाबा देह सुध भूल कर नृत्य कर उठते हैं ।

“कहा कहौं इन नैंननि की बात”

शेष चर्चा अब कल –

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