!! उद्धव प्रसंग !!
{ गौरांगी के कुछ प्रश्न – “उद्धव प्रसंग” के प्रति }
भाग-4
मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दुरस्थे गोकुलस्त्रियः ।
(श्रीमद्भागवत)
उसके नयन सजल थे… वो कई दिनों के बाद मुझ से मिली थी ।
कार्तिक में उसने… एक महीने तक मौन रहना और एकान्त वास का सुख लूटा था…
मैं भी अष्टयाम सेवा में व्यस्त हो गया… तो न कुञ्ज जा पाया… न गौरांगी से ही मिल पाया… वैसे ये सब पागलबाबा की आज्ञा लेकर ही मैंने किया था ।
कल कई दिनों के बाद मैं कुञ्ज गया… वहाँ के कदम्ब वृक्ष को आलिंगन किया ।
इतने दिन बाद ? कदम्ब वृक्ष ने मानो मुझ से शिकायत की थी ।
कुञ्ज का वातावरण… कुञ्ज की प्रेममयी ऊर्जा… मैं आनन्दित हो गया था ।
दूर हल्की कुनकुनी धूप में ध्यान में लीन थी गौरांगी ।
मैं उसके पास गया… पर वो इस लोक में थी ही नही ।
करीब 40 मिनट के बाद उसका ध्यान खुला… मुझे देखते ही वो खुश हो गयी थी ।
हरि जी ! इतने दिनों बाद ?
हाँ… अष्टयाम सेवा में व्यस्त था । मैंने कहा ।
आपका “उद्धव प्रसंग” बहुत सुंदर चल रहा है ।
इतना कहकर वो फिर भावुक हो गयी थी ।
कुछ प्रश्न हैं… मुझे लगा, आपसे ही पूछूँ ।
क्या प्रश्न हैं गौरांगी ?… मैंने पूछा ।
** साधकों ! गौरांगी ने मुझ से कल कुछ प्रश्न किये हैं ।
मैं “उद्धव प्रसंग” लिख रहा हूँ… इसलिये इन प्रश्नों के उत्तर आवश्यक हैं… आप सब लोग ( जो “उद्धव प्रसंग” को बड़े मनोयोग से पढ़ रहे हैं ) गौरांगी के प्रश्न और मेरे इस उत्तर को आज अवश्य पढ़ें ।
गौरांगी ने जब मुझ से ये प्रश्न किये… तब मुझे लगा… कि इनका उत्तर देना आवश्यक है… सो मैंने लिख दिया है… गौरांगी का प्रश्न और मेरा उत्तर ।
धूप से लाल हो गया था गौरांगी का चेहरा ।
पीला चादर ओढ़े हुए… माथे में बृज रज का तिलक ..और केसर का चन्दन…गौरांगी को और दिव्य बना रहा था ।
वो मेरे पास ही बैठी थी… मुझे पता नही आज गौरांगी से बातें करते हुये… ऐसा महसूस होने लगा था कि… मैं उद्धव हूँ… और ये गौरांगी कृष्ण की प्रिया… कोई गोपी है… जो कृष्ण विरह से सन्तप्त है ।
हरि जी ! कृष्ण जब वृन्दावन के लिये इतना रो रहे थे… तड़फ़ रहे थे
तो वृन्दावन क्यों नही आ गए ?
हरि जी ! वृन्दावन और मथुरा में दूरी तो कोई विशेष नही है ।
या वो सदैव के लिये अब नही आसकते थे…तो एक दिन या कुछ समय के लिये ही वृन्दावन आजाते… और अपने प्रिय जनों से मिल जुल कर चले जाते ।
या ये भी सम्भव नही था कृष्ण के लिये… तो इन गोपी या ग्वालों को अपने मथुरा में ही बुलवा लेते ।
या इतनी ही तड़फ़ थी… तो कृष्ण तो मथुरा के राजा ही थे… मथुरा में ही कोई स्थान ऐसा बना देते… जहाँ ये वृन्दावन के लोग रह जाते… वहाँ कृष्ण इनसे मिलते जुलते रहते ।
हरि जी ! उद्धव को क्यों भेजा… स्वयं क्यों नही आये कृष्ण वृन्दावन ?
गौरांगी इन प्रश्नों को मुझ से कर रही थी… पर प्रश्न करने में वो कुछ आक्रामक-सी दीखी… वृन्दावन से इसकी आत्मीयता किसी से छुपी तो नही है ।
जहाँ मनुष्य को प्रेम मिलता है… मनुष्य उस स्थान को त्यागना नही चाहता… कम प्रेम वाले स्थान को त्यागना… और अधिक प्रेम वाले स्थान से चिपके रहना… ये मानव का स्वभाव है ।
मैं शान्त भाव से बोल रहा था… पर मुझ से भी ज्यादा शान्त ये गौरांगी थी…जो मुझे सुन रही थी ।
पर गौरांगी ! ये स्वभाव मनुष्य का है… ईश्वर का नही ।
कृष्ण ईश्वर हैं… इस बात को हमें भूलना नही है ।
जो ईश्वर को प्रेम करता है… ..ईश्वर उसे प्रेम करते ही हैं… जैसा करता है… वैसा ही वे प्रेम करते हैं… कोई ज्यादा प्रेम करे… तो उसे ज्यादा प्रेम देते हैं… पर कम प्रेम करने वालों को भी ये भूलते कहाँ हैं ?
भले ही यशोदा की तुलना में… देवकी का वात्सल्य कहीं टिकता नही है… पर गौरांगी ! देवकी के त्याग से भरे प्रेम को बिसारा तो नही जा सकता ना !
वर्षों तक देवकी और वसुदेव ने तप ही तो किया है… कारागार में रहकर… मैंने कहा ।
इन मथुरा के प्रेमियों को भी ईश्वर कैसे नजर अंदाज़ कर दे !
भले ही वृन्दावन कृष्ण के प्राण हों…उनके प्राणप्रिय जन इसी श्री धाम वृन्दावन में रहते हों… पर अन्य जगहों पर भी जो भक्त इंतज़ार करके बैठे हैं… उनको भुला देना… ये “भक्त वत्सल” नाम की सार्थकता तो नही हुयी !
गौरांगी ! इसीलिये वृन्दावन छोड़कर वे मथुरा में गए ।
आये क्यों नही वृन्दावन ?
फिर पूछा गौरांगी ने ।
इसलिये नही आये…जिसके कई राजनैतिक कारण भी थे ।
बाबा ! आप बोलो ना… कृष्ण हमारे साथ वृन्दावन चले ।
ये मान नही रहा… इसके बिना हम लोग कैसे जीयेंगे ?
कंस मर गया… वसुदेव देवकी को कारागार से कृष्ण मुक्त कर चुके हैं… ग्वाल बालों ने कहा… अब चलें ?
वृन्दावन चलें कृष्ण !
तब कृष्ण ने इतना ही कहा… आप लोग चलिये… मैं कुछ समय बाद आऊंगा ।
नन्द बाबा ने अपने आँसू पोंछे… फिर कृष्ण के सिर में हाथ रखते हुये नन्द जी बोल रहे थे ।
ये नही जा रहा वृन्दावन… ठीक ही कर रहा है… ये समझदार है… मेरा बेटा है ना… ।
क्या मतलब बाबा ? ग्वालों ने नन्द महाराज से पूछा ।
हाँ… ये राजनीति तुम लोग नही समझोगे…
जरासन्ध शत्रु मान चुका है मथुरा को… क्यों कि उसकी दोनों बेटियां जो कंस की पत्नी थीं… वो अब अपने पिता जरासन्ध के यहाँ जाकर रह रही हैं…।
नन्द बाबा ने कहा – मुझे अक्रूर ने बताया… कि जरासन्ध अब अवश्य मथुरा में आक्रमण करेगा…और लक्ष्य उसका होगा – कृष्ण ।
क्यों कि उसके जमाई कंस को कृष्ण ने मार दिया है… ये बात अब जग जाहिर हो चुकी है… नन्द महाराज ने समझाया ।
अब अगर वृन्दावन जाकर कृष्ण रहेगा… तो क्या हम लोग उस जरासन्ध के अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित सेना का मुकाबला… अपनी लाठी से कर पायेंगे ?
क्या हम अपने कृष्ण को बचा पायेंगे उस जरासन्ध से ?
नन्द महाराज ये कहते हुए… रुआंसे से हो गए थे ।
इसलिये इसका अभी वृन्दावन न जाना ही उचित होगा ।
और कृष्ण समझदार है… कुछ सोच कर ही ये निर्णय लिया है इसने ।
नन्द बाबा बस इतना ही बोल पाये थे… और शीघ्र ही कृष्ण के सिर में हाथ रखकर…”तू ठीक रहे… जहां भी रहे” ।
इतना कहकर वो अपनी बैल गाड़ी में बैठ कर चल दिए थे ।
नन्द बाबा आगे जाकर खूब रोये… खूब रोये ।
बैल पशु होकर भी आँसू बहाते रहे थे ।
गौरांगी ! ये भी एक कारण था कृष्ण के वृन्दावन न आने का… मैंने कहा ।
पर मिलकर तो जाया जा सकता था ना… ?
गौरांगी ने फिर प्रश्न किया ।
हरि जी ! कृष्ण मिल लेते अपनी मैया से… मित्रों से… गोपियों से…
फिर चले जाते… मथुरा ।
गौरांगी ! इस तरह मिलने में… दो बातें होतीं ।
मैंने कहा ।
पहली बात होती… कि वर्षों से जिस भूमि ने जल का दर्शन भी न किया हो… ऐसी भूमि में एक दो जल की बूंदों को गिराना… वो बूँदें… धरती की प्यास को नही बुझाएगी… बल्कि भूमि की प्यास और बढ़ जायेगी ।
इतना वियोग था… विरह की आग से हृदय जल रहा था… इन वृन्दावन वालों का… ऐसे समय में कृष्ण आकर… घड़ी दो घड़ी अगर रुक जाते… मिल जुल लेते… तो इससे इन वृन्दावन वालों की प्यास तो बुझती ही नही… बल्कि प्यास और बढ़ जाती ।
बेचैनी और बढ़ा देती ये मिलन ।
और कृष्ण ये कतई नही चाहते… कि मेरे कारण किसी का दुःख और बढ़ जाए… वैसे ही कम था क्या !
और दूसरा कारण ? कृष्ण के वृन्दावन न आने का ?
गौरांगी ने ही पूछा ।
मैंने कहा… थोड़े थोड़े समय के लिये कृष्ण अगर वृन्दावन आते जाते रहते ।… तो इसकी जानकारी जरासन्ध को मिल ही जाती ।
और जरासन्ध ये समझ जाता कि… कृष्ण की कमजोरी है… वृन्दावन… नन्द बाबा, यशोदा मैया… गोपियाँ… और राधा ।
गौरांगी ! तब कृष्ण को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए… जरासन्ध इन वृन्दावन के भोले भाले प्रेमियों को परेशान करता । वो करता ! इसलिये कृष्ण ये नही चाहते कि दुनिया को पता चले… कि मेरा प्रेम वृन्दावन है… ।
इसलिये कृष्ण नही आये वृन्दावन ।
मथुरा में क्यों नही बुलवाया ?
कृष्ण मथुरा में ही एक नगर बनाकर, उस नगर में केवल वृन्दावन के लोग ही रहें… ऐसी व्यवस्था बना देते !… क्यों नही बनाई ?
गौरांगी की बातें सुनकर मुझे हँसी आयी ।
प्रेम के लिये प्रेम का स्थान भी चाहिए ।
क्या मथुरा में कृष्ण का प्रेम स्वरूप प्रकट हो पाता ?
गौरांगी से ही मैंने पूछा ।
भले ही नगर बनाकर वृन्दावन वालों को मथुरा में कृष्ण बसा लें ।
पर दया की भीख पर गौरांगी ! प्रेम नही पनपता ।
प्रेम के लिये तो प्रेमीन की अपनी ठसक चाहिये…
मथुरा में कृष्ण राजा हैं… यादवेन्द्र हैं… कृष्ण ।
इस मथुरा की भूमि में… पुत्र ! कहते हुए भी संकोच करती हैं माँ देवकी ।
पर वृन्दावन में तो… कान पकड़ कर… दो थप्पड़ लगाने में भी यशोदा हिचकती नही है ।
मथुरा में… जब देवकी के चरणों में प्रणाम करने के लिए कृष्ण झुकते हैं… तब बड़े संकोच वश देवकी अपना हाथ आशीष के लिए उठा पाती है… पर यहाँ वृन्दावन में तो !
वृन्दावन में तो अपने बाबा नन्द और मैया यशोदा की जूती अपने सिर में रखकर ले आता था बालकृष्ण !…तब प्रसन्न होकर नन्द और यशोदा इसे आशीष देते थे…।
मथुरा में… कोई कृष्ण से मिल भी नही सकता…
पर वृन्दावन में तो… ये गोपियों के यहाँ दिन भर नाचते हुए थकता नही था ।
“मेरी गगरी उठा दो कन्हैया”
ये बात तो हर गोपी कहती रहती थी कृष्ण से… वृन्दावन में ।
और कृष्ण प्रेम से सबकी गगरी उठाते रहते थे ।
पर मथुरा में क्या ये सम्भव है ?
मथुराधीश के साथ मर्यादा चाहिए…
गौरांगी ! तुम स्वयं सोचो… प्रेम में मर्यादा रहे… तो क्या वहाँ प्रेम होगा ?
प्रेम में विधि निषेध रहे… तो क्या वहाँ प्रेम होगा ?
गौरांगी ! कृष्ण “रस सिद्धान्त” के संस्थापक हैं… “प्रेम धर्म” के प्रवर्तक हैं… वो अच्छे से जानते हैं कि…… मथुरा में वह प्रेम प्रकट ही नही होगा… फिर ऐसा “रस संकट” क्यों उत्पन्न किया जाए ।
इसलिये कृष्ण ने वृन्दावन वासियों को न मथुरा बुलवाया… न स्वयं गए वृन्दावन ।
प्रेम को जलाते रहे… विरह के हल्की आँच में, प्रेम पकता रहा ।
उबाल जल्दी आजाये… बह जाए… तो फिर प्रेम रहा ही कहाँ ?
उसे तो अपने हृदय में घोटो… खूब घोटो… किसी को पता न चले… ।
कृष्ण ने मथुरा में हल्ला कहाँ मचाया… कि मैं इतना रो रहा हूँ… बिलख रहा हूँ… कहा भी तो अपने सखा से… अपने प्रिय सखा से… उद्धव से ।
और किसी से नही कहा…
यही प्रेम साधना है… गौरांगी !
मैंने गौरांगी की और देखा… अभी तक मैं नेत्र बन्द करके ही बोल रहा था… जब मैंने देखा… तब गौरांगी के नेत्र बरस रहे थे… ।
उसके आगे प्रेम ने आकार ले लिया था… इसलिये तो नयन बरसने के बाद भी उसके मुख मण्डल में मुस्कुराहट थी ।
मैं उसे देखता रहा… उसके रोम रोम से… “राधा राधा राधा” नाम चल रहा था ।
साधकों ! कल कुञ्ज में गया… पागलबाबा से मिला… मुझे बहुत प्रेम किया बाबा ने… अपने हृदय से लगा लिया था ।
गौरांगी मिली… उसने कुछ प्रश्न कर दिए थे… और प्रश्न भी “उद्धव प्रसंग” के ही थे… जो इन दिनों में लिख रहा हूँ ।
इसलिये मैंने आज गौरांगी के प्रश्नों को और अपने उत्तर को ही “आज के विचार” में लिख दिया ।
क्यों कि कल कुछ साधकों ने भी यही प्रश्न किये थे… कि “कृष्ण वृन्दावन क्यों नही आये ? अपने लोगों से मिल कर चले जाते मथुरा ।
या वहीं मथुरा ही बुलवा लेते ।
मैंने उत्तर देने की कोशिश की है… मेरे सुधि साधक समझ जायेंगे ।
शेष चर्चा कल…
प्रेम नगर की डगर कठिन रे बटोही न करना बसेरा…
!! उद्धव प्रसंग !!
{ उद्धव की वृन्दावन यात्रा }
भाग-5
धारयन्त्यती कृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चन ।
(श्रीमद्भागवत)
तुमको ये पीताम्बरी बहुत सुहाती है…
और माथे में ये मोर का पंख… राधा ने कहा ।
…और सामने मोर नाच रहा था… उसका पंख गिरा उसे ही लेकर कृष्ण के पाग में लगा दिया था श्री राधा ने ।
पीला पटका… काँधे में डाल दिया था कृष्ण के, राधा ने… .. ये सुहाता है तुम्हें…
और गोरोचन का तिलक ..।
थोड़ी दूर खड़ी होकर राधा ने अपने कृष्ण को निहारा था ।
नही नही… अभी तो एक कमी और है…
अपने आँखों का काजल निकाल कर कृष्ण के कपोल में लगा दिया…
हाँ… प्रिय ! अब ठीक लग रहे हो !
ये कहते हुए राधा ने चूम लिया था अपने कृष्ण को ।
तुम्हें मेरा ये सब लगाना अच्छा लगता है ?…कृष्ण ने यमुना के किनारे राधा के साथ बैठे बैठे ही पूछ लिया था ।
हाँ… ये पीताम्बरी, ये मोर का पंख… केसर और गोरोचन का तिलक… मुझे ही क्यों ! हर वृन्दावन वासी को यही रूप तुम्हारा प्रिय है… इसमें ऐश्वर्य नही माधुर्य झलकता है ।
और अगर सुदर्शन चक्र लूँ तो ?
और चार भुजा… ? कृष्ण ने हँसते हुए राधा से पूछ लिया था ।
फिर तो हम वृन्दावन वासी डर ही जायेंगे… राधा ने सहजता में बोल दिया… और क्या !… किसी के भला चार हाथ होते हैं !
ये तो देवताओं को ही मुबारक हो चार हाथ ।
ठीक है… मैं अपनी प्यारी के लिए… यही माधुर्य रूप ही धारण करूँगा… ये कहते हुये कृष्ण ने राधा को अपने बाहु पाश में भर लिया था ।
उद्धव ! तुम ये मोर मुकुट धारण करो…
ये कहते हुए कृष्ण की आँखें फिर सजल हो गयीं थीं ।
तुम्हें वृन्दावन जाना है ना… इसलिये तुम ये मुकुट धारण करो ।
शान्त भाव से खड़े रहे उद्धव…मोर पंख खोंस दिया था पीले पाग में उद्धव के… कृष्ण ने ।
ये मोर का पंख ?
पर इसे तो छूकर भी हाथ धोना पड़ता है… पक्षी का पंख अशुद्ध होता है…
उद्धव ने कहा ।
प्रेम में शुद्ध अशुद्ध कुछ नही होता उद्धव ! कृष्ण ने कहा ।
ओह ! वो दिन जब वृन्दावन के उस मोर ने मुझे मेरी राधा से मिलाया था… अब नेत्र सजल ही नही हुए कृष्ण के… बह चले थे ।
क्यों इतना प्रेम करते हो इस मोर से…? राधा ने पूछा था ।
क्यों कि मैंने एक दिन… राधा ! सुना… कि तुम बड़े प्रेम से कह रही थीं अपनी सखियों से… वो देखो ! मोर ! मोर !
मैंने सुन लिया… जब मेरी राधा इस पक्षी को मोर (मेरा) कह रही है… तो राधा का मोर… तो मेरा भी मोर (मेरा) ही हुआ ना !
मुझे ये तब से बहुत प्रिय है ।
*** कृष्ण रो पड़े । उद्धव ! तुम मेरे जैसे हो… मेरे जैसे ही लगते हो !
तुमको मेरी राधा मिलेगी… वो देखेगी… तुमको मेरे सखा देखेंगे… मेरी मैया यशोदा… और मेरे पिता नन्द जी… सब देखेंगे… ।
तुम मेरे जैसा श्रृंगार करके जाओ… ताकि वो लोग तुमसे बातें करें !
नही तो वो किसी से बातें नही करते… और मेरी राधा और मेरी गोपियाँ तो परपुरुष की ओर देखती भी नही हैं ।
तुम्हें मैं इसलिये अपने जैसा बना रहा हूँ… ताकि मेरे लोग तुम्हारा आदर करें ।
सजा दिया था कृष्ण ने अपने प्रिय सखा उद्धव को…
अपने दोनों हाथों से उद्धव के चेहरे को पकड़ा… और बड़े प्रेम से बोले… ये चेहरा आज कितना भाग्यशाली है… जिसे मेरी राधा देखेगी ।
उद्धव ! मेरा सच्चा भक्त वो है… जो अपना मन मुझमें लगाये… पर गोपियों ने अपना मन मुझ में नही लगाया… बल्कि अपना “मन ही” मुझे दे दिया… अब उनके पास “मन” ही नही है ।
उद्धव ! गोपियों के मन में, मैं नही हूँ… उनका मन ही मैं हूँ
कृष्ण ये कहते हुए फिर रो पड़े थे…।
कृष्ण ! ओ कृष्ण !
कृष्ण के महल में आकर बलराम ने द्वार खटखटाया था ।
कृष्ण ने खोला… द्वार ।
भैया ! आप ? कृष्ण ने बलदाऊ को देखा सुबह सुबह, तो पूछ बैठे ।
हाँ… मैंने सोचा की प्रातः कालीन भ्रमण में तुम्हें भी अपने साथ ले चलूँ !
नही… बड़े भाई ! आप जाओ… मैं अभी नही जाऊँगा…
कृष्ण ने कहा ।
अच्छा ! अच्छा ! मत जाओ ।
पर ये उद्धव को क्या बना दिया तुमने ?
बलराम हँसे… !
अपने जैसा ही बना दिया… उद्धव तो बिलकुल तुम्हारे जैसा ही लग रहा है… बलराम फिर हँसे ।
मैं उद्धव को वृन्दावन भेज रहा हूँ !
कृष्ण ने अब गम्भीर होकर ये बात कही ।
क्या ! उद्धव को वृन्दावन ? पर क्यों ?
बलराम ने पूछा ।
उन विरह सन्तप्त लोगों को सांत्वना देने… कृष्ण ने कहा ।
क्या उन्हें सांत्वना सच में मिल पाएगी ?
बलराम के नयन भी सजल हो रहे थे ।
क्या उन ममतामयी यशोदा को सांत्वना दे पायेगा ये उद्धव ?
क्या तुम्हारे बिना गए… वहाँ किसी को भी सांत्वना मिल सकती है ?
वो सखा… वो गोपियाँ… वो पिता नन्द… मैया यशोदा… वो क्या इस तरह के सांत्वना से शान्त हो पायेंगे !
कृष्ण कुछ नही बोले…।
क्या हुआ ? कृष्ण ! क्यों सिर झुकाकर खड़े हो ? माँ रोहिणी ने भी तभी “कृष्ण महल” में प्रवेश किया ।
ओह ! माँ रोहिणी ! कृष्ण और बलराम दोनों ने प्रणाम किया…
उद्धव भी पीछे नही रहे… माँ रोहिणी को प्रणिपात करने में ।
देखो ना ! माँ ! वृन्दावन में उद्धव को अपने जैसा बनाकर ये कृष्ण भेज रहा है ।
रोहिणी माँ ने उद्धव को देखा – वो यशोदा मैया!… वो सखा… वो गोपियाँ… वो राधा !… कितनी भावुक हो जायेंगी… इस उद्धव को तुम्हारे भेष में देखकर ।
पर तुम्हारा कोई विकल्प नही है कृष्ण !
उद्धव को मैं अपना विकल्प बना कर कहाँ भेज रहा हूँ माँ ?
मैं तो इसे अपने आप से मिलाने ही भेज रहा हूँ ।
कृष्ण के मुख से ये बातें सुनकर रोहिणी माँ को भी आश्चर्य हुआ ।
फिर उद्धव की ओर मुड़ते हुए कृष्ण ने कहा… उद्धव ! मैं तुम्हें अपने आपसे मिलाने के लिए भेज रहा हूँ… ।
उद्धव ! मैं मथुरा में कहाँ हूँ… यहाँ तो मेरा शरीर मात्र है… मेरी आत्मा तो वृन्दावन में ही है… मैं वृन्दावन छोड़ कर कहीं नही जाता ।
जहाँ मन है… व्यक्ति वहीं तो है ना ?
मेरा मन वृन्दावन में है… ।
रोहिणी और बलराम अपने आँसू पोंछते हुए वहाँ से चले गए थे ।
मेरे पिता नन्द और मैया यशोदा के चरण छूना… उद्धव !
तू मेरा मित्र है.. तो मित्र के माता पिता भी तो अपने ही माता पिता सदृश ही होते हैं ना !
उद्धव ! वो भी तुम्हारे माता पिता ही हैं… मेरी ओर से चरण वन्दन करना ।
मेरी मैया को कहना…
ये कहते हुए कृष्ण फिर रो पड़े थे ।
यहाँ कोई माखन नही देता… और मैया ! देता भी है तो अपने हाथों से तुम्हारी तरह कोई नही खिलाता ।
सुबह सुबह आकर यहाँ कोई नही जगाता… मेरे साथ कोई नही सोता… मैं यहाँ अकेले सोता हूँ मैया !
कहना उद्धव ! मेरी मैया यशोदा से ।
तू तो मैया ! मैं एक करवट भी रात में लेता था… तो तू जग जाती थी… मेरे बेटे को आज नींद नही आरही…
मैया ! वृन्दावन से आये मुझे कितने दिन हो गए… आज तक मैं अच्छे से सोया नही हूँ… मुझे यहाँ नींद नही आती मैया ।
फिर भावावेश में कृष्ण आगये थे ।
ये सब कहना… मेरी राधा को भी कहना… मेरे सखाओं को भी मेरा सन्देश कहना… कृष्ण आँसू पोंछते जा रहे हैं… और उद्धव को सन्देश बताये जा रहे हैं ।
आप यन्त्री हो… मैं आपका यन्त्र हूँ मेरे नाथ !
चरण पकड़ लिए थे ये कहते हुए उद्धव ने ।
आप मुझ से जैसा कार्य सम्पादन करवाना चाहें… करवाएं ।
मैं आपका हूँ… सिर्फ आपका ।
आपकी आज्ञा का पालन ही मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म है नाथ !
उद्धव जी बोले ।
जा उद्धव ! अब तू जा ! मेरे वृन्दावन जा !
कृष्ण उद्धव का हाथ पकड़ कर बाहर तक ले आये ।
देख ! वो यमुना हैं ना…उस यमुना के किनारे किनारे चला जा ।
उद्धव का हाथ पकड़ कर… फिर यमुना के किनारे आगये कृष्ण ।
देख उद्धव ! इस यमुना की धारा को देख…पर धारा की ओर मत चलना… धारा के उलटे दिशा की ओर बढ़ना ।
वृन्दावन से मथुरा आयी हैं यमुना जी ।
उद्धव ! इसी यमुना के किनारे में यज्ञ करते हुए ब्राह्मण लोग मिल जायेंगे…उन ब्राह्मणों को प्रणाम करना उद्धव !
और हाँ… ब्राह्मणों को ही प्रणाम नही…उनकी जो पत्नियां हैं… उनको पहले प्रणाम करना…क्यों कि उद्धव ! उन पुरोहित पत्नियों में बहुत प्रेम है… बहुत श्रद्धा है ।
फिर आगे बढ़ना…सुन ! मेरे श्री धाम की जब सीमा शुरू होगी ना… तब वहाँ एक बार मेरी ओर से अपना सिर श्रीधाम वृन्दावन की भूमि में रखकर प्रणाम अवश्य करना । उद्धव ! वृन्दावन बहुत पवित्र भूमि है ।
आगे जब जाओगे ना… तो मेरे सखा तुम्हें गौ चराते मिलेंगे… उनका स्पर्श करना… उद्धव ! वो लोग इतने प्रेमपूर्ण हैं कि उनके स्पर्श से ही तुम्हें प्रेम का स्वाद मिलना शुरू हो जायेगा ।
पता है वो मेरे सखा हैं… जैसे ही तुम्हें वो देखेंगे ना… तो मेरा साक्षात्कार उन्हें वहीं हो जाएगा ।
वो लोग सर्वत्र मुझे ही देखते हैं… ये उनका प्रेमावेश है ।
पर उद्धव ! उनके प्रेमावेश को किंचित् भी आघात न लगे इसका ध्यान देना… ।
मेरी राधा मिलेगी ।… “राधा” कहते हुए फिर कृष्ण भाव समुद्र में उतरने लगे थे ।
प्रभु ! आप मुझे अपने निज धाम वृन्दावन भेज रहे हैं… तो इसमें मेरा कल्याण ही छुपा होगा… ऐसा मुझे पूर्णविश्वास है ।
अब आप मुझे आज्ञा दें… उद्धव इतना बोल कर पैदल चल पड़े ।
नही ! उद्धव ! मेरा रथ ले जाओ… उसमें बैठ कर जाओ ।
नही… नाथ ! आपके उस दिव्य श्रीधाम वृन्दावन की यात्रा मैं पैदल ही करना चाहता हूँ ।
कृष्ण ने भाव में भरकर फिर अपने मित्र उद्धव को आलिंगन किया ।
उद्धव ! पैदल जाओगे तो बहुत समय लग जाएगा… फिर मुझमें इतनी धैर्यता भी कहाँ है ?
रथ में जाओ… शीघ्र पहुंचोगे… और शीघ्र ही लौट आओगे ।
कृष्ण ने कहा ।
मैं मात्र दो घड़ी में ही सन्देश दे कर आजाऊंगा… रथ में बैठ गए उद्धव ।
ये क्या बोल रहा है उद्धव ! आश्चर्य से कृष्ण ने उद्धव की ओर देखा ।
दो घड़ी ?
अरे ! छ: महीने से पहले तुम नही आओगे उद्धव !
कृष्ण ने लम्बी साँस लेते हुए कहा ।
प्रणाम करके उद्धव चल पड़े… श्री धाम वृन्दावन की ओर ।
कृष्ण देखते रहे… मन कर रहा था कृष्ण का… कि दौड़ कर जाएँ और उद्धव के साथ ही अपनी प्रेम भूमि श्रीधाम की यात्रा करें… ।
अपने लोगों को मिलें… पर… ।
कृष्ण वहीं खड़े रहे… तब तक खड़े रहे… जब तक उद्धव का रथ कृष्ण की आँखों से ओझल नही हो गया ।
और उद्धव की वृन्दावन यात्रा यहाँ से प्रारम्भ होती है ।
शेष चर्चा कल…
साधकों ! ये प्रसंग है… द्वन्द्वातीत का द्वन्द्व !
शोकातीत का शोक !
पूर्णानंद का विलाप !
यहीं से तो प्रेमदेवता का प्राकट्य होता है…


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