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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 119 !!
निकुञ्ज रहस्य
भाग 2
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सखियाँ हँसीं ………….निकुञ्ज में कोई जड़ नही है सब चैतन्य हैं ।
मतलब ? अर्जुन समझे नही थे ।
देखो उसे – तोता बनकर नाम रट लगानें वाली ….अर्जुन ! देखो !
ओह ! ये क्या ……वो कोई शुक यानि तोता नही …….वो तो सखी थी …..हँस पड़ी ………सखी के रूप में आते हुये ।
अर्जुन कुछ समझ नही पा रहे……..पर पूछते हैं , कि ये क्या है ?
हे अर्जुन ! निकुञ्ज का एक ही धर्म है …..”हित धर्म”……….हित मानें प्रेम ………अच्छा ! अर्जुन ! तुम्हे पता है……..प्रेम का सिद्धान्त है ….”प्रेमी के सुख में सुखी रहना”…….अपनें सुख की होली जलाकर …प्रियतम की प्रसन्नता में प्रसन्न रहना ।
अर्जुन ! तुमनें पूछा कि …….यहाँ ऋतु कौन सी है अभी ?
तो सुनो ! यहाँ ऋतु भी हम ही हैं…….युगलवर को जब गर्मी लगे तो हम ही वायु बनकर चलनें लगती हैं …..और उन “युगल” को छूकर हम धन्यता का अनुभव करती हैं……जब हमें लगता है बैठे बैठे युगलवर बोर हो रहे हैं …….तो हम पक्षी बनकर उनको गान सुनाती हैं ……।
कोई मोर बनकर नाचनें लग जाती है ।
हे अर्जुन ! ये प्रेम लोक है ………इसमें हम सबकी एक ही इच्छा है ……कि हमारे श्रीप्रियाप्रियतम को सुख मिलना चाहिए ।
अर्जुन समझ रहे थे कि ये प्रेम लोक है……..जो वैकुण्ठ से भी ऊँचे स्थित हैं……..और एक बात और अर्जुन की समझ में आरही थी कि ……ये लोक यन्त्रवत् होते हैं……..साधक अपनी साधना से इन लोको को प्राप्त करता है ……पर ये “प्रेम लोक” साधना से नही मिलता …..ये तो कृपा से ही प्राप्त होते हैं ।
ये कुञ्ज कैसे सुन्दर सुन्दर हैं ना ?
अर्जुन नें चलते हुए सखियों से पूछा ।
ऐसे 308 कोटि कुञ्ज हैं …………और उनमें 84 कुञ्ज प्रमुख हैं …..जिनमें युगलवर अपनी लीलाओं का सम्पादन करते रहते हैं ।
84 कुञ्ज ……………..
अर्जुन अतिआनन्दित थे निकुञ्ज में ……………
मंगलाआरती का समय हो रहा था ……इसलिये सखियाँ जल्दी जल्दी जा चल रही थीं ।
“सखी भाव” से भावित होना, क्यों आवश्यक है ?
हे सखियों ! ये मेरा प्रश्न है…….मेरे में अभी पुरुष भाव आही नही रहा ….मैं पूर्ण सखी भाव से भरा हुआ हूँ…..पर इसकी आवश्यकता क्या ?
अर्जुन के इस प्रश्न को सुनकर सखियाँ हँसीं ………….और बोलीं ……हे अर्जुनी ! अब बातें न बनाओ ……शीघ्र चलो …..नही तो मंगला आरती छूट जायेगी ……………सखियाँ तेज़ चाल से चलनें लगीं ……साथ में अर्जुन भी चल रहे थे ।
न ! न जगाओ अभी …..अभी तो सोये हैं ….हमारे युगलसरकार ।
बड़े प्यार से दुलार से ….रंगदेवी सखी जू नें कहा था ।
पर उठाना तो पड़ेगा ना ! रात भर के सोये हैं भूख लग रही होगी ।
ललिता सखी नें स्नेह से भरकर कहा ।
पास में जाती हैं वो प्रमुख अष्टसखियाँ …………देखती हैं …………बड़ी गहरी नींद में सोये हैं ………जगाना उचित नही है ………….रंगदेवी जू फिर बोल उठती हैं ।
कुछ देर रंगदेवी और ललिता में बातें हुयीं …………..बस उसी समय कमलनयन के नयन खुल गए …….कमललोचनी के लोचन खुल गए ।
सखियाँ देख रही हैं…..आहा ! दोनों किशोर और किशोरी उठ गए थे ।
घुँघराले बाल उलझे हैं…………श्रीकिशोरी जी का हार और श्याम सुन्दर की मोतिन माला …दोनों एक दूसरे में उलझे हैं ।
श्याम सुन्दर के आँखों में लाली लगी है ………….और श्रीकिशोरी जी के अधरों में काजल लगा है ……..उलझे हुए हैं दोनों एक दूसरे में ।
क्रमशः….
शेष चरित्र कल –
🙌 राधे राधे🙌


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