Niru Ashra: 🙏🏻रामतत्त्व के शक्ति पुंज🙏🏻
रावण-वध के पश्चात श्रीराम समुद्र के किनारे एक शिला पर शांत बैठे हैं। तभी एक स्त्री की छाया उन्हें अपने समीप आती दिखाई देती है। वे यकायक ठिठक जाते हैं। सोच में पड़ते हैं कि रणक्षेत्र में स्त्री का आगमन क्यों और कैसे ? राम इस भाव से स्वयं को समेटने लगते हैं, गलती से किसी पराई स्त्री की छाया का स्पर्श उनसे न हो जाए।
स्त्री के समीप आने पर राम बिना मुड़े, बिना देखे, वे पूछते हैं, “कौन हैं आप ? और क्या चाहती हैं?”
पता चलता है कि लंकापति रावण की पत्नी मंदोदरी अपने पति का संहार करने वाले को देखने आई है।
मंदोदरी कहती है कि “मैं देखना चाहती थी कि कौन हैं वह, जिन्होंने अजेय और प्रकांड विद्वान् रावण को मार गिराया। और ऐसा कौन सा गुण है उस व्यक्ति में, जो मेरे पति में नहीं था..?”
इससे पहले कि राम कुछ कहते, मंदोदरी अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं देते हुए कहती है, “लेकिन मुझे समझ में आ गया कि वह भेद क्या है? एक आप हैं, जो पराई स्त्री की परछाईं को भी स्पर्श नहीं करना चाहते और एक रावण था, जिसने पराई स्त्री को अपना बनाने के लिए सबकुछ दाँव पर लगा दिया।”
एक पराई स्त्री के प्रति राम का यह मर्यादित रूप और आचरण ही उन्हें ‘पुरुषोत्तम’ बनाता है।विचार ही व्यक्तित्व का निर्माण
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Niru Ashra: 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 145 !!
सखी ! अब चलो वृन्दावन
भाग 1
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“चलो अब वृन्दावन ! मन नही लग रहा कुरुक्षेत्र में”
भानुदुलारी से मिलनें कृष्ण आये थे ….पर श्रीराधारानी ललिता सखी से कुछ कह रही थीं……छुप गए …..और ध्यान से सुननें लगे थे ।
श्रीराधा कह रही थीं – चलो सखी ! वृन्दावन …..मन नही लग रहा अब कुरुक्षेत्र में ……….
पर आप ऐसा क्यों कह रही हो…….श्याम सुन्दर तो हैं ना !
ललिता सखी नें कहा ।
सखी ! प्रियतम श्याम सुन्दर वही हैं ……यहाँ कुरुक्षेत्र में मिल भी गए …….और राधा भी मैं वही हूँ………हम लोगों का मिलन – सुख भी वही है ……..पर ……वो बात नही है जो बात वृन्दावन में थी ।
ललिते ! मेरा मन तो उन वृन्दावन बिहारी के प्रति ही निष्ठावान है …..द्वारिकाधीश में वो बात नही है ……….मैं चाहती हूँ सखी ! कि वो पंचम स्वर में बंशी ध्वनि, जो यमुना के तीर में बजती थी …..और हम सब दौड़ पड़तीं ……….मैं , मैं चाहती हूँ ……..वृन्दावन में प्रियतम को देखूँ ………रस की सृष्टी हर स्थान पर सम्भव नही है …….इसलिये मेरी सखी ! जितनी जल्दी हो सके मुझे वृन्दावन पहुँचा दो ……….यदुनाथ में वो बात कहाँ ……जो बृजनाथ में थी ………
द्वारिकाधीश में वो बात कहाँ …………जो वृन्दावनाधीश में थी ।
कृष्णचन्द्र छुपकर सुन रहे थे …………….ये सब सुनकर उनकी हिलकियाँ बंध गयीं ………..ललिता सखी नें सुना ……तो जाकर देखा ………..स्वामिनी ! श्याम सुन्दर खड़े हैं यहाँ ।
श्रीराधारानी गयीं …………पर श्याम सुन्दर बस रोये जा रहे थे ।
प्यारे ! क्यों रो रहे हो ……………मुझे अब जानें दो वृन्दावन ……..मेरे लिये वही स्थान उचित है ………..और आप जब मुझे वहाँ दिखाई देते हो ……….कदम्ब में , मोर के नृत्य में , यमुना की तरंगों में , बरसानें के कुञ्ज – निकुञ्ज में ……….बहुत आनन्द है वहाँ ………पिया ! मत रोको अब ……….आप प्रसन्न हो मेरे लिए यही जानना आवश्यक था ………मैने देख लिया । ………आपको प्रसन्न देखकर ….आपकी समस्त रानियों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा ………आपकी देख रेख अच्छी हो रही है ………प्यारे ! खुश रहो ……….मेरे प्राण ! ऐसे ही प्रसन्नता आपके मुखारविन्द में छाई रहे………इतना कहते हुए आगे बढ़कर श्रीराधारानी नें आँसू पोंछ दिए थे कृष्ण चन्द्र के ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –
🙌 राधे राधे🙌
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 39 )
गतांक से आगे –
॥ पद ॥
सेवें चाव चढ़ी चितभारी। सौंज सुभाय सजें सहचारी ॥
अति उदारि मृदुचित्त महारी । रहसि रिझावहिं प्रीतम प्यारी ॥
जुगल चरन उरमें धर सोंही। नहिं समान उपमा कौ कोही ॥
कोटिक चंद कलानि विमोही। अमित माधुरी अंगनि जोही ॥
निसवासर इकरस रस पीवैं। परम तृषातुरि सहज सदीवैं ॥
जोय-जोय जुग चंदहिं जीवैं। मैंन कटाछि चरन रज छीवैं ॥
अष्टमि हँदुलेखा अति जीकी । प्यारी सदा प्रीतमा पीकी ॥
तुंगभद्रादि आठ इनिही की। आठ-आठ इनिकें सुनि नीकी ॥
*ये अत्यन्त गौर वर्ण की हैं और इनके गौर वर्ण में लाल साड़ी और सुन्दर लग रही थीं ।
ये युगल सरकार की आठवीं सखी हैं ….श्रीइन्दुलेखा जी । हरिप्रिया जी ने मुझे इनका नाम बताया । ये सेवा भाव में पगी हैं …इनके अंतःकरण में सेवा भाव ही है । हाँ, वो तो मैं देख ही रहा हूँ …ये सेवा सामग्रियों को बड़े मनोयोग से मिला रहीं थीं …जैसे …कुछ खाने की वस्तुयें भी थीं तो पेय भी था …पेय में खस आदि के शरबत , और खाने में मेवा आदि । ये उस भोग की तैयारी है ….जो अभी युगल सरकार जागेंगे उत्थापन में, तब उनको भोग लगाया जाएगा ।
भोग में अन्य वस्तुयें भी थीं ….जो इनकी ही सखियाँ ले लेकर आरहीं थीं । मुरब्बा , आँवले आदि के , कुछ नमकीन के साथ मिष्ठान्न भी थे । फलों को एक अलग ही पात्र में सजाकर रख दिया था ….उन फलों को भी ये बड़े ध्यान पूर्वक देख रहीं थीं । पक्व फल आवश्यक थे …वैसे सारे फल पके ही थे फिर भी ये ध्यान दे रहीं थीं ।
ये इतना ही नही ….हाथ-मुख पोंछने के वस्त्र , हाथों को धुलाने के लिए पात्र , जल झारी …ये भी तैयार कर रहीं थीं ….अब युगल सरकार जागेंगे , इसकी तैयारी थी । हरिप्रिया जी ने मुस्कुराते हुए कहा ….इनके समान सेवा में पूर्ण दक्ष कोई नही हैं …इसलिए इन श्रीइन्दुलेखा जी से सब परामर्श लेती हैं ….ये विनम्रता से सबको परामर्श देती भी हैं । इनके हृदय में युगल के प्रति अगाध प्रेम भरा है ….ये बस युगल की प्रसन्नता के बहाने खोजती रहती हैं …..ये जब युगल सरकार के सामने होती हैं तो छुप के उनके मुख चन्द्र को ऐसे निहारती हैं ..जैसे – उनको पता भी न चले और मुख के भाव से ये समझ भी जायें कि अब इनको क्या चाहिए ….”ये अद्भुत बात है”….हरिप्रिया जी इतना ही बोलीं । इसके बाद इन श्री इन्दुलेखा सखी जी की अष्ट सखियाँ वहाँ उपस्थित हो गयीं थीं …..इनके नाम इस प्रकार हैं ……हरिप्रिया जी ने मुझे बताया …….तुंगभद्रा जी , रसातुंगा जी , रंगवाटी जी , चित्रलेखा जी , सुसंगता जी , चित्रांगी जी , मोदिनी जी और मदनालसा जी ।
ये सब सखियाँ अपनी सखी जी का हाथ बटा रहीं थीं ….श्रीइन्दुलेखा जी सबको सेवा भाव सिखा भी रहीं थीं …..और हंस हंस कर सिखा रहीं थीं ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 46
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तपस्विभ्योSधिको योगी ज्ञानिभ्योSपि मतोSधिकः |
कर्मिभ्यश्र्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन || ४६ ||
तपस्विभ्यः – तपस्वियों से; अधिकः – श्रेष्ठ बढ़कर; योगी – योगी; ज्ञानिभ्यः – ज्ञानियों से; अपि – भी; मतः – माना जाता है; अधिक – बढ़कर; कर्मिभ्यः – सकाम कर्मियों की अपेक्षा; च – भी; अधिकः – श्रेष्ठ; योगी – योगी; तस्मात् – अतः; योगी – योगी; भव – बनो, होओ; अर्जुन – हे अर्जुन |
भावार्थ
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योगी पुरुष तपस्वी से, ज्ञानी से तथा सकामकर्मी से बढ़कर होता है | अतः हे अर्जुन! तुम सभी प्रकार से योगी बनो |
तात्पर्य
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जब हम योग का नाम लेते हैं तो हम अपनी चेतना को परमसत्य के साथ जोड़ने की बात करते हैं | विविध अभ्यासकर्ता इस पद्धति को ग्रहण की गई विशेष विधि के अनुसार विभिन्न नामों से पुकारते हैं | जब यह योगपद्धति सकामकर्मों से मुख्यतः सम्बन्धित होती है तो कर्मयोग कहलाती है, जब यह चिन्तन से सम्बन्धित होती है तो ज्ञानयोग कहलाती है और जब यह भगवान् की भक्ति से सम्बन्धित होती है तो भक्तियोग कहलाती है | भक्तियोग या कृष्णभावनामृत समस्त योगों की परमसिद्धि है, जैसा कि अगले श्लोक में बताया जायेगा | भगवान् ने यहाँ पर योग की श्रेष्ठता की पुष्टि की है, किन्तु उन्होंने इसका उल्लेख नहीं किया कि यह भक्तियोग से श्रेष्ठ है | भक्तियोग पूर्ण आत्मज्ञान है, अतः इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है | आत्मज्ञान के बिना तपस्या अपूर्ण है | परमेश्र्वर के प्रति समर्पित हुए बिना ज्ञानयोग भी अपूर्ण है | सकामकर्म भी कृष्णभावनामृत के बिना समय का अपव्यय है | अतः यहाँ पर योग का सर्वाधिक प्रशंसित रूप भक्तियोग है और इसकी अधिक व्याख्या अगले श्लोक में की गई है |


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