Niru Ashra: 🌲☘️🌲☘️🌲☘️🌲
!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 147 !!
!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 147 !!
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मेरी बहन राधा फिर द्वितीय ग्रहण यात्रा में गयी……..
कुरुक्षेत्र तो मैं भी गया था…….पर यहाँ नही जा पाया ।
कहते हैं – कश्यपाश्रम सिद्धपुर तीर्थ में विशेष स्नान का महत्व है …….तीर्थ स्नान के लिये हम बृजवासी, कहीं कब गए ? क्या समस्त तीर्थ हमारे बृज में ही नही हैं ? तीर्थराज प्रयाग को स्वयं मैने यहाँ की रज में लोटते हुए देखा है ……….फिर हम क्यों जानें लगे कहीं, किसी अन्य तीर्थों में………सब बहानें हैं ……..कन्हैया से मिलना है ……….इसलिये कभी कुरुक्षेत्र तो कभी सिद्धपुर जा रहे हैं ।
मेरे सखा मिलेंगें ! ओह ! मेरी कितनी इच्छा थी ……….मुझे अपनें हृदय से लगाकर कन्हैया रोया था कुरुक्षेत्र में ………खूब रोया था …..और मुझे कहा भी था सिद्धपुर में अवश्य आना…….द्वितीय ग्रहण पड़ रहा है …….वैसे ग्रहण का ज्यादा पड़ना शुभ नही माना जाता….कलियुग में ही ग्रहण ज्यादा पड़ते हैं ………हाँ कलियुग की अब शुरुआत होनें ही वाली है ………..
चले गए सब……….मैं भी जाता ……….पर मेरे पिता श्रीबृषभान जी नें मुझे बरसानें का अधिपति जो बना दिया । मैं कैसे उनकी बात तो काटूँ …….उनका कहना है…. कि इस बृज को अगर हमनें नही सम्भाला
तो कन्हैया बुरा मान जायेगा ……….हमारे ही भरोसे तो छोड़ा है इस बृज को ……….मेरे बाबा भानु ठीक हैं ……….अगर हम सब द्वारिका जाते रहे ……..तो इन वन्य सम्पत्ती की रक्षा कौन करेगा …….?
मैं देखता रहा…….मेरी बहन राधा…….बैल गाडी में बैठ कर जा रही थी…….मैं हिलकियों से रो गया था………बहन कोमलांगी है …..कुछेक वर्ष ही तो हुए हैं कुरुक्षेत्र गए हुए……फिर द्वारिका के समीप की यात्रा ……कुरुक्षेत्र तो पास में ही था…….पर द्वारिका तो पास में नही है ……बहुत दूर है……..खारे समुद्र से घिरी एक सुवर्ण की नगरी ।
मेरी बहन राधा ………जब जा रही थी ……….तो वो एक बार बोली …..भैया ! आप चलो ………..पर मैं बस रो गया ……….लाली ! कन्हैया को कहना……..श्रीदामा ही अपराधी है तुम दोनों का ……
आज जो तुम इतना रो रही हो, विरहाग्नि में जलती हो …………उसका दोषी अगर कोई है तो ये तेरा श्रीदामा भैया ही है………..
वो दिन ! ………..गोलोक की लीला…….मैं श्रीदामा खो गया था …….मेरी बहन बोलती रही श्रीदामा भैया ! श्रीदामा भैया ।
बैल गाड़ियाँ चल दीं थीं………………
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल-
🦜 राधे राधे🦜
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 45 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
उदधि महामाधुर्य के, रसिक दोउ रसभौंन ।
सदा सर्बदा एक रस, राजत राधारौंन ॥
॥ पद ॥
सदा सर्बदा राधिकारवन राजैं। रसिक रसभवन में भव्य भ्राजैं ।
मधुर माधुर्य औदधि उदारा । श्रवत नित रहत सुख सुधाधारा ॥
सहज स्वकीयानि प्रति पोष कर्ता । अमित गुन चंड ब्रांड भर्ता ॥
श्रीहरिप्रिया जुगल वपुधरि बिहारें। धनि हैं ये जु इनि हैं निहारें ॥१९॥
* अपना सुख खोज रहे हो प्रेम में ? तो गलत हो ..अपना सुख खोजना आसुरी स्वभाव है ….दान देते हो सुख खोजते हो , तीर्थ जाते हो सुख खोजते हो , मन्त्र जाप करते हो तुम्हें सुख चाहिये , नही , इस मार्ग में ये सब नही चलेगा , प्रियतम के सुख में सुखी रहने की आदत डालो ! भक्ति मार्ग में भी तो भक्त जो भी करता है ..अपने भगवान के लिए ही करता है …फिर ये मार्ग तो भक्ति से भी ऊँचा है …प्रेम का मार्ग है …विशुद्ध प्रेम का मार्ग । इसमें तो प्रियतम के लिए ही करना है …अपने को मिटा कर करना है …स्वयं मिट जाना है …बस रह जाए प्रिय ।
सखी भाव इसी का नाम है ….मैं पूर्व में भी बता चुका हूँ । सखियाँ नृत्य कर रही हैं …युगल सरकार के लिए …सखियाँ गा रहीं हैं युगल को प्रसन्न करने के लिए …वो अपना शृंगार कर रही हैं जिससे युगल प्रसन्न हों । अपनी हर क्रिया युगल सरकार के लिए …ये प्रेम की चरम अवस्था है …अच्छा एक बात और समझने की है ….इन सखियों का मन नही है , बुद्धि नही है , चित्त और अहंकार नही है ….उच्च प्रेम में ये सब खो जाते हैं …यही स्थिति इन सखियों की है । फिर आप कहोगे मन नही है इन सखियों का , तो उत्साहित कैसे होती हैं ….मन नही है तो उत्सव की तैयारी कैसे करती हैं …मन नही है तो इच्छा कैसे प्रकट करती हैं कि “नित्य विहार में पधारो युगल सरकार”। तो सुनिए – युगल सरकार के साथ इनका इतना तादात्म्य है …कि अपना मन न होने के बाद भी …युगल सरकार का मन इनमें काम करता है …इनका अपना अहं नही है …युगल सरकार के अहं से ही ये ठसक से भरी रहती हैं , ऐसा अद्भुत उच्च भाव न देखा गया न सुना गया । श्रीमहावाणीकार इन सखी भाव की चर्चा विस्तृत करते हैं …..सखी जन सिर्फ श्रीराधा की नहीं , न श्याम सुन्दर की …ये दोनों की हैं और दोनों के ही साथ रहना चाहती हैं , दोनों को सुख प्रदान करती रहती हैं । यही श्रीमहावाणी की सुन्दरता है ।
ये महारस सिन्धु में सदा निमग्न रहने वाले हैं …रसिक शेखर ये श्यामाश्याम रसदान करते हुए आनन्द में ही डूबे रहते हैं …इस रस क्षेत्र में अनादि काल से सुख-अमृत का यहाँ अविरल प्रवाह चल ही रहा है । हरिप्रिया जी ने सन्ध्या आरती के पश्चात् युगल सरकार को साष्टांग दण्डवत किया …सब सखियों ने किया था …जयजयकार के बाद हरिप्रिया जी मुझे ये बताने लगीं थीं …ये माधुर्य का ही प्रभाव है जो समस्त निकुँज जनों को , पक्षी , वृक्ष , लता …सखी जन आदि सबको माधुर्य रस से सिंचित करता रहता है …निकुँज जनों को ही नही …समस्त सृष्टि को भी किंचित माधुर्य जो अनुभव में आता है , वो यहीं से है । शाश्वत सुख के ये दो रूप हैं प्रिया जी और लाल जी । अरी ! अगर शाश्वत सुख की चाह है तो निकुँज की उपासना करो …यानि इन युगल सरकार के चरणों का आश्रय ले लो …बस …और कुछ नही चाहिए । हरिप्रिया इतना ही बोलीं ….और युगल को निहारने लगीं थीं ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 5
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अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् |
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् || ५ ||
अपरा – निकृष्ट, जड़; इयम् – यह; इतः – इसके अतिरिक्त; तु – लेकिन; अन्यास् – अन्य; प्रकृतिम् – प्रकृति को; विद्धि – जानने का प्रयत्न करो; मे – मेरी; पराम् – उत्कृष्ट, चेतन; जीव-भूताम् – जीवों वाली; महा-बाहो – हे बलिष्ट भुजाओं वाले; यया – जिसके द्वारा; इदम् – यह; धार्यते – प्रयुक्त किया जाता है, दोहन होता है; जगत् – संसार |
भावार्थ
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हे महाबाहु अर्जुन! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है जो उन जीवों से यक्त है, जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं |
तात्पर्य
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इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि जीव परमेश्र्वर की परा प्रकृति (शक्ति) है | अपरा शक्ति तो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार जैसे विभिन्न तत्त्वों के रूप में प्रकट होती है | भौतिक प्रकृति के ये दोनों रूप-स्थूल (पृथ्वी आदि) तथा सूक्ष्म (मन आदि) – अपरा शक्ति के ही प्रतिफल हैं | जीव जो अपने विभिन्न कार्यों के लिए अपरा शक्तियों का विदोहन करता रहता है, स्वयं परमेश्र्वर की परा शक्ति है और यह वही शक्ति है जिसके कारण संसार कार्यशील है | इस दृश्यजगत् में कार्य करने की तब तक शक्ति नहीं आती, जब तक परा शक्ति अर्थात् जीव द्वारा यह गतिशील नहीं बनाया जाता | शक्ति का नियन्त्रण सदैव शक्तिमान करता है, अतः जीव सदैव भगवान् द्वारा नियन्त्रित होते हैं | जीवों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है | वे कभी भी सम शक्तिमान नहीं, जैसा कि बुद्धिहीन मनुष्य सोचते हैं | श्रीमद्भागवत में (१०.८७.३०) जीव तथा भगवान् के अन्तर को इस प्रकार बताया गया है –
अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता-
स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा |
अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत्
सममनुजानतां यदमतं मतदृष्टतया ||
“हे परम शाश्र्वत! यदि सारे देहधारी जीव आप ही की तरह शाश्र्वत एवं सर्वव्यापी होते तो वे आपके नियन्त्रण में न होते | किन्तु यदि जीवों को आपकी सूक्ष्म शक्ति के रूप में मान लिया जाय तब तो वे सभी आपके परं नियन्त्रण में आ जाते हैं | अतः वास्तविक मुक्ति तो आपकी शरण में जाना है और इस शरणागति से वे सुखी होंगे | उस स्वरूप में ही वे नियन्ता बन सकते हैं | अतः अल्पज्ञ पुरुष, जो अद्वैतवाद के पक्षधर हैं और इस सिद्धान्त का प्रचार करते हैं कि भगवान् और जीव सभी प्रकार से एक दूसरे के समान हैं, वास्तव में वे प्रदूषित मत द्वारा निर्देशित होते हैं |”
परमेश्र्वर कृष्ण ही एकमात्र नियन्ता हैं और सारे जीव उन्हीं के द्वारा नियन्त्रित हैं | सारे जीव उनकी पराशक्ति हैं, क्योंकि उनके गुण परमेश्र्वर के समान हैं, किन्तु वे शक्ति की मात्रा के विषय में कभी भी समान नहीं है | अतुल तथा सूक्ष्म अपराशक्ति का उपभोग करते हुए पराशक्ति (जीव) को अपने वास्तविक मन तथा बुद्धि की विस्मृति ही जाती है | इस विस्मृति का कारण जीव की जड़ प्रकृति का प्रभाव है | किन्तु जब जीव माया के बन्धन से मुक्त हो जाता है, तो उसे मुक्ति-पद प्राप्त होता है | माया के प्रभाव में आकर अहंकार सोचता है, “मैं ही पदार्थ हूँ और सारी भौतिक उपलब्धि मेरी है |” जब वह सारे भौतिक विचारों से, जिनमें भगवान् के साथ तादात्म्य भी सम्मिलित है, मुक्त हो जाता है, तो उसे वास्तविक स्थिति प्राप्त होती है | अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गीता जीव को कृष्ण की अनेक शक्तियों में से एक मानती है और जब यह शक्ति भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाती है, तो यह कृष्णभावनाभावित या बन्धन मुक्त हो जाती है |
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (126)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-3
अपने कृष्णसार पतियों के साथ आ-आ करके अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से, प्रेमभरी चितवन से श्यामसुन्दर का दर्शन करती हैं, डरती नहीं है, और श्यामसुन्दर बड़े गौर से उनके आँख की ओर देखते हैं। गोपियाँ कहती हैं- विधाता ने इनके पलक नहीं बनायी, कितनी बड़ी-बड़ी आँखें बनायी हैं, और इनके पति कितने अनुकूल निकले कि इनके साथ जाते हैं, ये धन्य हैं, ये धन्य हैं।
अब देखो इसमें व्यंग्य क्या हुआ कि वृक्ष को तो रोमाञ्चित कर दिया। वृक्ष का धर्म क्या रोमाञ्चित होना है? गाय का धर्म क्या मनुष्य के सौन्दर्य पर मोहित होना है? हरिणी का क्या धर्म है कि मनुष्य के सौन्दर्य पर मोहित हो जाय? वृक्ष का क्या धर्म है कि वह मधुक्षरण करे? तो तुम जब गाय का धर्म बिगाड़ देते हो, पेड़ का धर्म बिगाड़ देते हो, हरिणी का धर्म बिगाड़ देते हो, सबको धर्मभ्रष्ट कर दिया तुमने, स्वभावभ्रष्ट हो गये सब। विधाता ने तुमको बनाया ही इसलिए है कि हरिणी भी अपना धर्मपालन न करे, लतावृक्ष भी अपना धर्मपालन न करें, पक्षी-पक्षिणी भी अपना धर्म पालन न करें, और गाय-बछड़ा भी अपना धर्म पालन न करें, यह तुम्हारा सौन्दर्य प्रकट ही इसलिए हुआ है कि संसार के लोग संसार का भोग छोड़ करके, अर्थ छोड़कर के यहाँ कर्तव्य धर्म- का बन्धन छोड़ करके और मोक्ष की आकांक्षा छोड़ करके, तुम्हारी वंशीध्वनि पर लुभा जायँ, और अपने लौकिक, पारलौकिक, पारमार्थिक धर्म से भ्रष्ट होकर के और तुम्हारे फन्दे में फँस जायँ। फिर हमारे लिए उलाहना क्यों?
श्रीकृष्ण ने कहा- बाबा! हार मान ली तुमलोगों से। गोपियों, बोलने में तो तुम्हारा सानी, तुम्हारी बराबरी का कोई नहीं। लासानी हो तुम। हार गया तुम्हारी मुखरता के सामने! जो कहो सो करें। गोपियों ने कहा- नहीं-नहीं श्रीकृष्ण, हम बदसलूक नहीं हैं। हमारे प्राणों में पीड़ा है। हमारा मन तुम्हारे लिए विह्वल है, आर्त है। हमें भय है कि कहीं तुम छोड़ न दो, हमारे हृदय में पीड़ा है, आर्ति है, कि तुम हमारे प्यारे होकर ऐसा क्यों बोल रहे हो? यह तो रोगी जैसे बर्राता है वैसे हम बर्रा रही हैं। हम तो चाहती हैं कि तुम हमारा रोग दूर कर दो! रोगी होकर हम आयी हैं। बोले- अच्छा गोपियों! क्या करें? बोलीं- पहली बात है कि अपना हाथ हमारे सिर पर रखो तो हम यह समझ जायँ कि तुम हमें अपनी समझते हो। दूसरी बात यह कि अपना हाथ हमारे हृदय पर रखो। इससे क्या होगा?+
गोपियों की चाहत
का स्त्र्यंग ते……शिरस्सु च किंकरीणाम्
का स्त्रयंग ते कलपदामृतवेणुगीत
सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् ।
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद्
गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ।।
व्यक्तं भवान व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो,
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ताः ।
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो
तप्तस्तनेषु च शिरसस्सु च किंकरीणाम् ।।
का स्त्रयंग ते कलपदामृतवेणुगीत
सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् ।
तीनों लोकों में तमोगुण रजोगुण सत्त्वगुण में पड़ी हुई ऐसी कौन सी स्त्री है जो तुम्हारी कलपद अमृतमय वेणुनाद से सम्मोहित होकर आर्यचरित्र से विचलित न हो जाय। गोपियाँ मानो संपूर्ण स्त्रीजाति का प्रतिनिधित्व कर रही हों, सबकी ओर से बोल रही हैं। जो तामसिक प्रकृति के होते हैं वे मूढ़तावश कहीं न कहीं फँसे होते हैं। न उनको धर्म का ज्ञान है, न भगवान का ज्ञान है, न भक्ति का ज्ञान है। तो ऐसे लोग अधिकांश न धर्म समझें, न अधर्म समझें, जहाँ फँस गये, ‘पोंगा-पंथी’ हो गये। इसके लिए- शब्द चलते हैं- पोंगापंथी, दकियानूसी। ये सब धर्म की भाषा में गाली दी जाती है। वे भी जब बाँसुरी की ध्वनि वेणुनाद सुनते हैं तो उनकी मूढ़ता छूट जाती है क्योंकि वह स्वरलहरी उनके सुषुप्त मन को जाग्रत कर देती है। दूसरे जो राजरसिक लोग हैं उनको भी धर्म अधर्म का पता नहीं है। जहाँ उनको मजा आवे वही काम करते हैं; वे तो राग-द्वेष में फँसे हुए हैं।
जो गुणी लोग जो हैं वे रागमूलक धर्म में ही फँसे हुए हैं। तो यह भगवान की बाँसुरी उनको कहती हैं कि यहाँ से ज्यादा मजा इधर है, आओ! उनको वेणुनाद अमृतध्वनि से अपनी ओर खींच लेता है। और नारायण, सात्त्विक लोग जो हैं वे अभिमान में फँसे हुए हैं कि हम बड़े धर्मात्मा, उनकी तो महाराज, यह तारीफ है कि हम कितनी बार मिट्टी से हाथ धोते हैं, इसी में वे अपनी तारीफ समझते हैं। इंद्रिय- शुद्धि की कि नहीं, मन शुद्ध किया कि नहीं, भगवान का भजन होता है कि नहीं इस पर उनकी दृष्टि नहीं है; कपड़ा हम सूती पहनते हैं कि रेशमी, इसी पर दृष्टि है। तो यह धर्माभिमान भी भगवान से विमुक करने वाला है। इसको भगवान कलपद, अमृत और वेणुनाद से आकर्षित करते हैं।++
इस प्रकार तामस को वेणुध्वनि से, राजस को अमृत से और सात्त्विक को कलपद से आकर्षित करते हैं। और गुणातीत को यह वंशीध्वनि ब्रह्मानन्द की अभिव्यक्ति के द्वारा खींचती है। तो भगवान् की वंशीध्वनि तमोगुणी को, रजोगुणी को, सतोगुणी को, वृत्तिमात्र को चाहे जीवनमुक्त की वृत्ति ही क्यों न हो, सबको बुलाती है। इसलिए-
आत्मारामाश्चय मुनयो निर्ग्रन्थाप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ।।
आत्मारामाः – जो आत्माराम हैं, अर्थात् जो अपने स्वरूप की समाधि में मग्न हैं; मनयः अर्थात् जो सल्लीनमानसाः हैं, समाधि लग रही हैं; और निर्ग्रन्थाः- जो पोथी-पन्ना फेंककर, चोटी का गाँठ खोलकर, जनेऊ की गाँठ तोड़कर, कपड़े की गाँठ तोड़कर, कामग्रन्थि, क्रोधग्रन्थि, लोभग्रंथि, मोहग्रन्थि तोड़कर, अविद्या- ग्रंथि का निरसन करके अवधूत संन्यासी हैं, उनको भी यह कलपद, अव्यक्त अस्फुट ध्वनि अपनी ओर खींच लेती है। फिर कौन सी ऐसी स्त्री है? जो आपकी ओर न खिंच आवे।
गर्भाधान का शक्तिसामर्थ्य जिसमें हो उसको संस्कृत भाषा में स्त्री बोलते हैं-
‘स्त्यायति गर्भः अस्यां इति स्त्रीः स्यायति विषयः अस्यां इति स्त्रीवृत्तिः’ विषयरूप बालक को जो अपने पेट में हमेशा रखे उसे वृत्ति कहते हैं, जैसे स्त्री अपने गर्भ में बच्चे को रखती है, वैसे यह घट है, पट है, मठ है, कोई न कोई विषय, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध, कुछ न कुछ भीतर जो रखे उसका नाम वृत्ति है। उसी को स्त्री कहते हैं। महाराज। यह श्यामसुन्दर की बाँसुरी भला किसको मोहित नहीं करती? आर्यचरितात्-न चलेत् त्रिलोक्याम् अयि मूढ़ो, तमो-गुणियो! कहाँ फँसे हो, चलो उठो, जागो। ओ रजोगुणियों। क्या बात करते हो दुनिया में, बात करने के लिए योग्य श्रीकृष्ण ही हैं। ओ सत्त्वगुणियों। काहे का अभिमान है तुमको। अरे ओ जीवनमुक्तो! जब तुमने अपना मन छोड़ ही दिया तो उसको आने दो हमारी ओर, रोकते काहे हो? क्यों निषेध करते हो? जब तुम्हारे लिए विधि नहीं है तो तुम निषेध क्यों करते हो? आने दो- का स्त्रयंग ते कलपदामृतवेणुगीतं यह वंशीध्वनि तो गुरुमंत्र है। यह बाँसुरी ब्रह्मविद्या है। उसमें जो ध्वनि है वह तत्त्वमस्यादि- ‘महावाक्य के समान है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877