Niru Ashra: 🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 149 !!
गोपी तालाब – गोपी चन्दन
भाग 2
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मेरे शरीर में जो द्वादश उर्ध्वपुण्ड्र देख रहे हो ना वज्रनाभ ! ये गोपी चन्दन है……….इसकी इतनी महिमा है कि……..स्वयं न लगानें के बाद भी इस चन्दन से किये गए तिलक का कोई दर्शन भी कर लेता है ना ………..तो उसके पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और वो परमपवित्र हो भक्ति का अधिकारी बनता है……..महर्षि शाण्डिल्य इस गोपी चन्दन की महिमा का गान कर रहे थे …….गंगा स्नान से हजार गुना फल मात्र गोपी चन्दन के एक बिन्दु, मस्तक में लगानें से ही प्राप्त हो जाता है ।
फिर देह में गोविन्द और श्रीराधारानी का नाम स्मरण करते हुए द्वादश तिलक धारण किया जाए…….तो उसकी महिमा का बखान कौन कर सकता है…….बड़ी महिमा है इस गोपी चन्दन की …..महर्षि नें कहा ।
महर्षि शाण्डिल्य के चरणों में प्रणाम करते हुए वज्रनाभ बोले –
आप एकाएक गोपी चन्दन की महिमा क्यों गानें लगे महर्षि !
वज्रनाभ नें चकित हो पूछा …….क्यों की प्रसंग तो सिद्धपुर में स्नान का चल रहा था ना ? फिर आप क्यों गोपी चन्दन की महिमा सुनानें लगे !
महर्षि सहज हुए …….और .वज्रनाभ को गम्भीरता से देखा ……
दारुक ! ये सब मेरे अपनें हैं ………….सुन्दर सुन्दर रथ तैयार करवाओ ……….और ये सब मेरे साथ मेरी द्वारिका में चलेंगें ।
अपनें सारथि “दारुक” को आज्ञा दे दी थी कृष्ण चन्द्र नें ।
“पर हम आपकी द्वारिका में रुकेंगें नहीं”……..सब चौंक गए थे ….क्यों की सबसे कम बोलनें वालीं श्रीराधारानी नें ही ये निर्णय सुना दिया था…….नही ……..हम वनवासी लोग हैं ………..वन , पक्षी, लता, पुष्प……..तुम जानते हो श्याम सुन्दर ! हम इन्हीं के साथ रहनें के आदी हैं ……….तुम्हारी सुवर्ण की द्वारिका में हम रह नही पायेंगें ………बुरा मत मानों प्यारे ! सुवर्ण की नगरी में रहना हम लोगों को शोभा नही देता ……..इसलिये हम जायेंगीं ……हम जायेंगें…..और तुम्हारी द्वारिका देखकर आयेंगें …………पर हम रुकेंगीं नहीं तुम्हारे महल में……..श्रीराधारानी नें स्पष्ट कह दिया था ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल-
🌹 राधे राधे🌹
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 51 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
सहस वदन हू सकत नहिं, जाकी महिमा लाध।
इक मुख अलप कहा कहैं, अति गुन रूप अगाध ॥
॥ पद ॥
अतिहि अगोचर महा अगाध ।
लीला उदधि पार नहिं पावत, सहस बदन से समरथ साध ॥
इकमुख अलप कहाँ लगि बरनें, अमित कलप लों भर्यो उपाध ।
कृपा कटाछि चितै श्रीहरिप्रिया, तबही सकै चरन रज ॥ २५ ॥
*श्रीवृन्दावन अपने आपमें अद्भुत रहस्य लिए हुए है …..इसको बुद्धि से मात्र जानना असम्भव ही है ….मैंने हरिप्रिया जी से पूछा ….फिर कैसे जाना जाएगा ? तब उनका उत्तर था ….रागानुगा रति से …विशुद्ध राग से । हम उन युगल तत्व के प्रति अपना स्वाभाविक राग प्रकट करें …..अपना राग संसार से मोड़कर युगल के चरणों में लगा दें । उनको लाड़ करें ….उनको भूख लग रही है …इसके लिए बेचैन हो उठें …..रात में उठ उठकर जल देखें …उनके लिए सुन्दर सुन्दर पुष्प सजायें ….”यही अपने हैं”….इस भाव से भावित हो उठें ……उस श्रीवृन्दावन की भावना को अपने मन में बनाये रखें ……वो दिव्य श्रीवृन्दावन ….जहाँ पूर्णानंद रस का सागर है …..वहीं से रस , समस्त ब्रह्माण्डों को मिलता रहता है …..यही है वो श्रीवृन्दावन । जहाँ सभी सखियों का विग्रह आनन्द और रस के पदार्थ से ही बना है ….हमारा देह कोई हाड़ मांस का थोड़े ही है ….ये दिव्य देह है …..इसलिए हमारी आयु बढ़ती नही है ….न घटती है ….अनादि अनन्त काल से एक समान , एक रस …..हरिप्रिया जी कहती हैं ….यहाँ दुःख नही हैं …न शोक है …मृत्यु , क्रोध अहंकार इन किसी की गति नही है यहाँ ……यहाँ तो वृक्षों को भी पुलकित होते हुए तुम देख सकते हो …..पक्षी पशु आदि भी यहाँ आनन्द के अश्रु बहाते हुये तुम को मिल जाएँगे …..यह अत्यन्त रहस्यपूर्ण स्थान है …..इसलिए यहाँ तक पहुँच पाना अत्यन्त दुर्लभ है …सुलभ नही …..हरिप्रिया जी कहती हैं । फिर यहाँ दर्शन करो ….अपने नयनों से निहारो ….जन्मों की साध पूरी करो …..युगल सरकार दिव्य सिंहासन में विराजे हैं ….उनके पीछे सखियाँ खड़ी हैं ……हरिप्रिया जी के ये कहते ही मेरे नेत्र बन्द हो गये , मुझे मानों प्रेम समाधि ही लग गयी थी ।
मैंने हरिप्रिया जी के चरणों में अपना मस्तक रख दिया था ……क्या वर्णन किया आपने ….श्रीवृन्दावन सखियाँ और युगल वर …..रस सिक्त हो गया मेरा तन मन । मेरी बात खतम हुयी नही थी कि ….हरिप्रिया जी मुसकुराईं …..मैंने क्या वर्णन किया ! अरे ! इस निकुँज का और निकुँज के परिकर का वर्णन कौन कर सका है ……हजार मुख वाले शेष भगवान भी इसका वर्णन नही कर सकते …फिर मैं क्या वर्णन कर सकती हूँ ! हरिप्रिया जी एकाएक दैन्यता से भर उठीं थीं ….मेरा एक मुख और उनके अनन्त गुण ! मेरा एक मुख और युगल का अगाध सौन्दर्य सिन्धु ! एक मुख से उनके उन अनन्त रूप , गुण का वर्णन कर पाना सम्भव नही है ….मैं तो उन युगल की किंकिरी हूँ …..अत्यन्त अत्यन्त छोटी एक राधा दासी । मैं देख रहा हूँ …हरिप्रिया कैसे दैन्यता से भरी हुयी बोल रहीं थीं …..किन्तु उसी समय उनमें युगल के “अहं”का उनमें संचार हुआ …..हाँ , अगर युगल चरणों की रज मिल जाये तो क्या सम्भव नही है …हरिप्रिया कह उठीं , कृपा ही सब कुछ है …नही तो मुझ जैसी कितनी हैं …किन्तु युगल सरकार ने अपना लिया तो ये क्या से क्या हो गयी ? ये कहते हुए मेरे स्कन्ध में हरिप्रिया जू ने हाथ धर दिया था । मैं प्रेम भाव में निमग्न ।
शेष अब कल –
PM] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 11
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बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोSस्मि भरतर्षभ || ११ ||
बलम् – शक्ति; बल-वताम् – बलवानों का; च – तथा; अहम् – मैं हूँ; काम – विषयभोग; राग – तथा आसक्ति से; विवर्जितम् – रहित; धर्म-अविरुद्धः – जो धर्म के विरुद्ध नहीं है; भूतेषु – समस्त जीवों में; कामः – विषयी जीवन; अस्मि – हूँ; भरत-ऋषभ – हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ !
भावार्थ
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मैं बलवानों का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूँ | हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है |
तात्पर्य
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बलवान पुरुष की शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए होना चाहिए, व्यक्तिगत आक्रमण के लिए नहीं | इसी प्रकार धर्म-सम्मत मैथुन सन्तानोन्पति के लिए होना चाहिए, अन्य कार्यों के लिए नहीं | अतः माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि वे अपनी सन्तान को कृष्णभावनाभावित बनाएँ |
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Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (131)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों की चाहत
श्रीवल्लभाचार्यजी कहते हैं कि जैसे सोने की दो मूर्ति बनायी जायँ- अहम् और इदम्- तो दोनों जैसे सोना है, उसी प्रकार भगवत्-संकल्प में भगवत्-संकल्पानुसार जो प्रपञ्च दिख रहा है वह भगवत्-स्वरूप से पृथक् नहीं है। श्रीशंकराचार्य की तो बात ही छोड़ देते हैं, क्योंकि उनके मत में तो….सर्वं खलु इदं ब्रह्म- मूल सिद्धांत यही है कि परमात्मा के सिवाय और कुछ नहीं है। तब यह दूसरा क्या है?
बोले- अतोन्यद् आर्तम्। उपनिषद् में कहा- कि देखो, है तो सब परमात्मा, लेकिन तुम्हें यदि परमात्मा के सिवाय और कुछ मालूम पड़ता है तो वह दुःख है। गोपियों ने कहा-महाराज! यह जो तुमने कह दिया कि लौट जाओ तो हम तुमको छोड़ करके कहीं और लौट जायँ इसी का नाम आर्ति है। अगर तुम ऊपर-ऊपर से बोल रहे हो तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर सचमुच भीतर से बोलते हो तो बड़ा डर लगता है। तो हमारा तो सिर झन्ना रहा है। अब हम बेहोश होकर गिरने वाली हैं, हमारा दिल फटने वाला है, हमारा हृदय गरम हो रहा है, ‘तप्तस्तनेषु च’ यहाँ स्तन जो है वह हृदय का उपलक्षण है। तन्नो निधेहि कर-पंकज मार्तबन्धो- आप अपना करकमल हमारे हृदय पर रख दीजिए।
भगवान ने कहा- अरे बाबा। तुम्हारा जलता हुआ दिल और हमारा यह कमल के समान कोमल ठंडा-ठंडा हाथ मैं रखूंगा तो जल जायेगा। क्या तुम हमारा हाथ जलाना चाहती हो? गोपी ने कहा- नहीं-नहीं, हमारे हृदय में जो ताप है वह अग्नि का ताप नहीं है। यह सूर्य का ताप है विरह को सूर्य बताते हैं; जैसे- सूर्य में दो गुण होते हैं- एक तापक और प्रकाशक, वैसे ही विरह में भी दो गुण हैं। विरह में एक तो हता है ताप जलन, दुःख और दूसरे प्रकाश होता है। प्रकाश कैसा होता है? आप देखना जब तक आदमी अपने पास रहता है तब तक उसके गुण नहीं मालूम पड़ते; जब वह दूर चला जाता है या बिछुड़ जाता है तब लगता है कि वह बहुत अच्छा था भाई, उसमें गुण सूझने लगता है। तो विरह एक ओर तापक है, दाहक है तो दूसरी ओर प्रकाशक भी है। जब श्रीकृष्ण गोपियों के बीच में नृत्य कर रहे हैं, तब तो गोपियाँ कहती थीं ‘हम बड़ी सुन्दरी हैं, हमारे ऊपर कृष्ण मोहित हैं’, क्या पूछना है। अभिमान हो गया। और जब चले गये तो हा कृष्ण। हा कृष्ण। हा कृष्ण। तुम्हारे बिना तो हम कुछ हैं ही नहीं।.+
न खलु गोपिकानन्दनो भवान् अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
यह कब सूझा? कि विरह में। तो विरह-सूर्य जिसका विरह होता है उसके माहात्मय को सूचित (प्रकाशित) करता है और जिसको विरह होता है उसके दिल को जलाता है। तो गोपियों ने कहा-आप अपने करकमल हमारे हृदय पर रख दो, वह जलेगा नहीं। सूर्य के ताप में भी कमल खिलता है; यदि तुम हमारे हृदय में स्थित विरह-सूर्य के ताप की ओर अपना करकमल करोगे तो हमारा हृदय होगा ठंडा। पहले वैद्य लोग जब किसी को खूब ताप हो तो चिकित्सा में हृदय पर कमल रखते थे। गर्मी से वह कुम्हला जाता था तो दूसरा रखाते दूसरा हटाया, तीसरा रखाते। केले के पत्ते पर सुलाते थे, कमल की पुरइन पर सुलाते थे। ढक देते थे लोगों को। क्यों?
जैसे- आजकल बर्फ का प्रयोग करते हैं न? वैसे पहले कमल के फूल और कमल के पत्तों का प्रयोग करते थे। बोलीं- हमारे हृदय में जो ज्वाला है उसको शान्त करेगा तुम्हारा करकमल और तुम्हारे करकमल को ताप लगेगा नहीं क्योंकि विरह-सूर्य के प्रकाश में वह और खिल जायेगा, उसमें रोमांच हो जायेगा, उसमें प्रेम और आनन्द आ जायेगा, तुम हमारे हृदय पर अपना हाथ रखकर देखो तो। बोले- अच्छा गोपियों। हम रख देते हैं हृदय पर हाथ। बोलीं- नहीं, शिर पर भी रखो। बोले- शिर पर क्यों रखें? तो कहा- तुमने हमको अपना लिया- यह मालूम तो पड़े। देखो, प्रेम में वासना और बुद्धि में अहंकार होने का डर रहता है। दोनों में दो विघ्न लगे हुए हैं। प्रेम में वासना और बुद्धि में अहंकार। इसलिए गोपियों ने कहा- हृदय पर हाथ रख दो कि यह हमारा प्रेम शुद्ध रहे, वासना न हो; और हमारे शिर पर अपना हाथ रख दो, जिससे हमारी बुद्धि तुम्हारे चरणों में लगे, लेकिन अभिमान न हो।
कृष्ण ने कहा- क्यों रखें, गोपियों। क्या हम तुम्हारे कोई आज्ञाकारी हैं? बोलीं बाबा। तुम आज्ञाकारी नहीं हो, आज्ञाकारी तो हम हैं- किंकरीणाम्- हम किंकरी हैं। किं करोमि किं करोमि- मैं क्या करूँ, मैं क्या करूँ? क्या आज्ञा है? हम तो तुम्हारा आज्ञापालन करने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी हैं, तुम्हारी किंकरी है।
देखो, यहाँ जो ‘तन्नो’ ‘नो’ है न, वह ‘नः’ के अर्थ में है। ‘नः’ माने हमारा। लेकिन ‘नो’ माने ‘नहीं’ भी होता है।
महाराज, कभी बाद में जाकर के गोपी और कृष्ण की बात हुई। कृष्ण ने कहा- उस दिन तुम्हारी क्या दशा हो गयी थी, आज शान बताती हो, मान जताती हो? उस दिन तुमने अपने मुँह से क्या कहा था- तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो- अपने मुँह से तुमने कहा था कि नहीं?++
गोपी ने कहा- हमने षष्ठी बहुवचन के अर्थ में ‘नो’ शब्द का प्रयोग नहीं किया था, हमने तो ‘नहीं’ के अर्थ में किया था।
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो ।
तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम् ।।
अर्थात् हमारे हृदय पर हाथ मत रखो- हमने तो यह कहा था, गोपियाँ बिलकुल निकल गयीं। देखो- असल में दुःख के अंत में सुख है, यह बात बिलकुल निश्चित है। दुःख देखकर घबराना नहीं, जब दुःख अपनी सीमा पर पहुँचता है, चढ़ते-चढ़ते पारा जब अपनी सीमा पर पहुँचता है तब एकाएक गिर जाता है। वहाँ भगवान प्रकट हो जाते हैं। देखो- भगवान के प्रकट होने की रात। वर्षाऋतु, कृष्णपक्ष, अष्टमीतिथि, अँधेरी रात; उस घोर अंधकार में भगवान का प्रकाश। और यहाँ गोपियों के घोर दुःख में परमानन्द का प्रकाश, यहाँ मृत्यु में जीवन का प्रकाश, यहाँ निरहम् में सच्चे अहं का प्रकाश, यहाँ जगत् में भगवान का प्रकाश, यहाँ जीव में ब्रह्म का प्रकाश। इति विक्लवितं तासां श्रुत्वा योगेश्वरः।
भगवान ने गोपियों के मुँह से गोपियों के हृदय में जो प्रेमी की पराकाष्ठा है वह सुन ली, श्रुत्वा। बोले-इतनी गोपियों को कैसे मनावेंगे? योगेश्वरः प्रहस्य हँस गये। हँसकर बोले- गोपियों। हम जरा माखन लेने तुम्हारे पास आवें, हजार बहाने बनावें कि गोपी जरा सुन ले, हमारी ओर देख ले, तो क्या मान, क्या शान, क्या धर्मात्मा बनती थीं। रोज-रोज तो तुम अपार वामता से, उलटी चाल से, हमारे साथ चलती थी; और आज मैंने जरा दो मिनट के लिए उलटी चाल चल दी तो तुम्हारी यह दशा हो गयी। बस-बस, अब आगे से कभी उलटी बात मत बोलना, तुम्हारे दिल में जो बात छिपी थी, आज जाहिर हो गयी।
सुन लो देवताओं। वृन्दावन के वृक्षो सुनो, लताओं सुनो, पशुपक्षियों सुनो, देखो- तुम गवाह रहना, आज दो मिनट में ही गोपियों की सिट्टी-पिट्टी स्वयं गुम हो गयी और ये हाथ जोड़कर कैंकर्य की प्रार्थना करने लग गयी हैं। ओ ललिता, ओ चंद्रावलि, ओ विशाखा, अब देखो कोई मुँह से नाम मत निकालना, हम कहें तो नाचना, हम कहें तो गाना, हम कहें तो खड़ी होना, हम कहें तो बैठ जाना; हम जैसे कहें वैसे करना, अब आज के बाद हमारे सामने उलटी चाल कभी मत चलना क्योंकि तुम लोगों की सब पोलपट्टी खुल गयी। तुम्हारे अन्दर न धैर्य है, न तुम्हारे अन्दर विवेक है। बोलीं- हाँ महाराज हम तो आप ही की हैं।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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