Niru Ashra: 🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 149 !!
गोपी तालाब – गोपी चन्दन
भाग 3
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वायु गति से चलनें वाले अश्व जोते गए थे रथों में ………..
द्वारिका के निकट उन रथों नें इन्हें पहुँचा दिया था ……….
समुद्र का किनारा…….सब ग्वाल सखा ……नन्दराय मैया यशोदा ……श्रीराधारानी – सखियाँ ……और मैं, महर्षि शाण्डिल्य ।
समुद्र को सबनें देखा ……समुद्र के मध्य में सुवर्ण की खड़ी द्वारिका भी देखी…….स्वागत करनें के लिये स्वयं महारानी रुक्मणी खड़ी हैं……….उनके साथ सभी रानियाँ भी आयी हैं ………..
पुत्र पौत्र सब श्रीराधारानी के दर्शन करनें के लिए जुट गए थे ।
आरती उतारी रुक्मणी नें श्रीराधा रानी की ………….यशोदा मैया के चरण धोये ……….वसुदेव जी नें बड़ा आदर किया नन्दबाबा का ।
आचार्य गर्ग के दर्शन का मुझे भी लाभ, शीघ्र ही प्राप्त हो गया था ।
चरण रखिये द्वारिका में …….रुक्मणी नें बड़े आदर से कहा ।
नही …………हमनें यहीं से देख लिया …………बड़ा सुन्दर शिखर है …….सुवर्ण की द्वारिका है ये तो ।
श्रीराधारानी नें फिर मना किया …………
महारानी ! आप चिन्ता न करें ……..हमको वन इत्यादि में ही रहनें की ज्यादा आदत है …..इसलिये हम लोग इधर ही रहेंगें ………आप सब आना ……….अपनें पुत्र और पौत्रों को लेकर आना ……….मैं सबसे मिलना चाहती हूँ……….श्रीराधारानी और मैया यशोदा नें सबको यही बात कही थी ।
द्वारिका के निकट ही एक प्राकृतिक सुन्दर स्थान था ………
एक सुन्दर सरोवर भी था……तालाब…..उसमें सुन्दर सुन्दर पुष्प खिले थे ……कमल के ही पुष्प थे …..और आश्चर्य ! हर रँग के पुष्प थे ।
हे वज्रनाभ ! मेरी कुटिया भी नन्दराय जी के पास में ही थी …….हम ऋषि मुनियों के साथ थे ।
प्रातः समय जब मैं सन्ध्या कर रहा होता ………….तब तालाब में से एक अद्भुत सुगन्ध की धारा फूट पड़ती …………….
मैं सन्ध्या कर रहा होता ………….तब उस सुगन्ध के कारण मेरा भी ध्यान विचलित सा हो उठता था ………।
मैने एक दिन जाकर देखा……….श्रीराधारानी के देह में सखियाँ उबटन लगा देती थीं…….चन्दन , केशर गुलाब इनका उबटन …….फिर हल्के हाथ से उसे छुड़ातीं………श्रीजी के अंग का उबटन आहा ! हे वज्रनाभ ! मैं आनन्दित हो उठा………मैने उस समय उस तालाब से छुप कर श्रीजी के अंग की उबटन लेकर अपनें माथे पर लगाया था …….बस उसके बाद तो बड़े बड़े ऋषि मुनि ……सब लोग इसी तालाब का चन्दन अपनें माथे में……..अपनें देह पर लगानें लगे थे ।……..इसे “गोपी तालाब” कहेंगें …….मैने ही “नाम करण” कर दिया……..स्वयं कृष्ण चन्द्र खड़े थे उस समय …….तब मैने कहा था …….इस तालाब को गोपी तालाब के नाम से जाना जायेगा ……….इसकी महिमा अद्भुत होगी ……..जो इस तालाब के रज को अपनें माथे पर लगाएगा ………अपनें देह पर लगाएगा ………यानि गोपी चन्दन को जो अपनें मस्तक पर “हरि मन्दिर” बनाकर धारण करेगा ……उससे गोविन्द अत्यन्त प्रसन्न होंगें ……..।
इतना कहते हुए मैं आनन्दित हो उठा था ………..
हाँ उस समय मेरी बातों को सुनते हुए श्याम सुन्दर नें आगे बढ़कर गोपी तालाब को प्रणाम किया ………..और गोपी चन्दन की महिमा स्वयं गानें लगे थे …………हे वज्रनाभ ! …….
( “गोपी तालाब” द्वारिका के पास में है….और वैष्णव जन जो ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं…वो गोपी तालाब का ही रज है …..पदम् पुराण इत्यादि में इसकी महिमा बहुत गाई गयी है ……इस रज का तिलक करनें से पराभक्ति प्राप्त होती है क्यों की ये रज श्रीराधा जी के अंग का उबटन है )
शेष चरित्र कल-
🌹 राधे राधे🌹
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 53 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
नवरंग भीनी सखी सँग, महल टहल अनुकूल ।
नित बिहरें श्रीहरिप्रिया, सकल सुखनि के मूल ॥
॥ पद ॥
स्यामा-स्याम सकल सुख मूल ।
नित्य बिहार करत बृन्दावन, कलकलिंदजा जू कैं कूल ॥
सखी संग नवरंगरंगीली, महल टहल फूली उर फूल।
श्रीहरिप्रिया प्रतिछिन प्रमुदावत, गावत गुन मिलि टूलनि टूल ॥ २७ ॥
*ये राह प्रेम की है ….इसमें सब लोग कहाँ चल पाते हैं …..इसमें तो वही चलते हैं जिन्हें -“खड़ी खड्ग की धार” में चलने का अभ्यास हो या जिसे चलना प्रिय हो …ये कोई साग भाजी तो है नही …कि मोल दिया और ख़रीद कर ले आए ….इसमें तो मोल भी देना है तो अपने सिर का ही देना पड़ता है ….इससे कम में सौदा पटने वाला है नही । अब देखिए ना , भाव राज्य में विचरण करने वाले भावुक भक्त अन्वेषण करते करते थक गए हैं ….इन्होंने वेद को खंगाल डाला है …उपनिषद को पचा डाला ….पुराण और शास्त्रों को घोट कर पी चुके ….किन्तु “वो” मिला नही …जिसके लिए बेचैन थे ….और आज से बेचैन नहीं …अनादि काल से …..तो अब क्या करें ? “भाव” में ही चलना आरम्भ किया ……क्यों की पढ़ना स्वाध्याय सब करके देख लिया । भाव में डूबने लगे …किन्तु ये क्या …..चलते चलते उस स्थान पर पहुँच गये जहाँ सेवा के लिए सब उत्सुक हैं …..प्रेम मयी सेवा , भाव मयी सेवा …अपनत्व की सेवा ..निजत्त्व की सेवा ……सब सेवामय था वहाँ ……सखियाँ सेवा रस में डूबी हुयी ….सखियाँ ही नहीं ….वहाँ की यमुना , वहाँ के वृक्ष , वहाँ की लताएँ …वहाँ के पशु पक्षी , वहाँ की भूमि ….सब सेवा में लगे हुए थे …..और आश्चर्य तब अधिक हुआ जब देखा कि स्वयं आनन्द ब्रह्म अपनी आल्हादिनी की सेवा मिले इसके लिए लालायित है ……वो सखियों से ही कह रहा है ….थोड़ी सेवा हमें भी दे दो ……तुम हट जाओ …..मुझे ही सखी रूप धारण करने दो …और अपनी प्रिया के चरण ! ओह ! ये तो अद्भुत प्रेम नगर है ….यहाँ सब प्रेममय हैं …प्रेम ही प्रेम ।
प्यारी के वदनारविंद की , लेत बलैयाँ लाल ।
पुनि पुनि परम प्रसंसत प्रीतम , प्रिया प्रेम प्रतिपाल ।।
“ये श्यामा श्याम ही समस्त सुखों के मूल हैं”……क्या ये बात तुम्हारी समझ में आती है ?
हरिप्रिया जी मुझे समझा रहीं थीं ।
“ये सदा सनातन हैं”…..पहली बात , दूसरी बात “ये आनन्द और आह्लाद की परिसीमा हैं”…..तीसरी बात ….”इनका प्रेम नित नूतन है” । ये रस सिद्धों की योग पीठ है ……निकुँज वन में ये विहरते रहते हैं …..ये स्वयं सुख रूप हैं इसलिए सबको सुख ही प्रदान करते हैं …..किन्तु ऐसे सुखराशि से भी सुख न माँग कर इन्हें भी सुख प्रदान की इच्छा से सेवा दे रहीं हैं ये सखियाँ ।
देखो तो सही कितनी मत्त हैं ….हरिप्रिया जी कहती हैं ….युगल की सहेली हैं …इस बात का गर्व हैं हमें , इसी गर्व से गर्वित ये अपनी यूथ में प्रेम रस में उन्मत्त हो चलती हैं । कभी युगलवर के यश का गान करती हैं तो कभी महल की सेवा में लग जाती हैं ….या कभी सेवा और गान दोनों साथ साथ करती हैं …..ये युगल को प्रसन्न करती हैं …..सेवा ही इनका धर्म है …..और एक दिन तो इन्होंने देखा कि सेवा करने के लिए स्वयं श्यामसुन्दर सखी भाव से भावित हो अपनी प्रिया जी के चरण दबा रहे थे । हरिप्रिया कहती हैं …इस निकुँज में प्रेम की कभी कभी ऐसी बतास चलती है कि …श्याम सुन्दर भी भूल जाते हैं कि मैं श्याम सुन्दर हूँ । हरिप्रिया जी यहाँ कुछ इतराते हुये बोलती हैं कि ….ऐसा है हमारा ये निकुँज ! और हम हैं यहाँ की सखियाँ ! राधा दासी ! अपने आपको “राधा दासी” कहते हुये कितने आनन्द में भर जाती हैं हरिप्रिया जी ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 13
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त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् |
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् || १३ ||
त्रिभिः – तीन; गुण-मयैः – गुणों से युक्त; भावैः – भावों के द्वारा; एभिः – इन; सर्वम् – सम्पूर्ण; इदम् – यह; जगत् – ब्रह्माण्ड; मोहितम् – मोहग्रस्त; न अभिजानाति – नहीं जानता; माम् – मुझको; एभ्यः – इनसे; परम् – परम; अव्ययम् – अव्यय, सनातन |
भावार्थ
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तीन गुणों (सतो, रजो तथा तमो) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता |
तात्पर्य
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सारा संसार प्रकृति के तीन गुणों से मोहित है | जो लोग इस प्रकार से तीन गुणों के द्वारा मोहित हैं, वे नहीं जान सकते कि परमेश्र्वर कृष्ण इस प्रकृति से परे हैं |
प्रत्येक जीव को प्रकृति के वशीभूत होकर एक विशेष प्रकार का शरीर मिलता है और तदानुसार उसे एक विशेष मनोवैज्ञानिक (मानसिक) तथा शारीरिक कार्य करना होता है | प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत कार्य करने वाले मनुष्यों की चार श्रेणियाँ हैं | जो नितान्त सतोगुणी हैं वे ब्राह्मण, जो रजोगुणी हैं वे क्षत्रिय और जो रजोगुणी एवं तमोगुणी दोनों हैं, वे वैश्य कहलाते हैं तथा जो नितान्त तमोगुणी हैं वे शुद्र कहलाते हैं | जो इनसे भी नीचे हैं वे पशु हैं | फिर ये उपाधियाँ स्थायी नहीं हैं | मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या कुछ भी हो सकता हूँ | जो भी हो यह जीवन नश्र्वर है | यद्यपि यह जीवन नश्र्वर है और हम नहीं जान पाते कि अगले जीवन में हम क्या होंगे, किन्तु माया के वश में रहकर हम अपने आपको देहात्मबुद्धि के द्वारा अमरीकी, भारतीय, रुसी या ब्राह्मण, हिन्दू, मुसलमान आदि कहकर सोचते हैं | और यदि हम प्रकृति के गुणों में बँध जाते हैं तो हम उस भगवान् को भूल जाते हैं जो इन गुणों के मूल में है | अतः भगवान् का कहना है कि सारे जीव प्रकृति के इन गुणों द्वारा मोहित होकर यह नहीं समझ पाते कि इस संसार की पृष्ठभूमि में भगवान् हैं |
जीव कई प्रकार के हैं – यथा मनुष्य, देवता, पशु आदि; और इनमें से हर एक प्रकृति के वश में है और ये सभी दिव्यपुरुष भगवान् को भूल चुके हैं | जो रजोगुणी तथा तमोगुणी हैं, यहाँ तक कि जो सतोगुणी भी हैं वे भी परमसत्य के निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप से आगे नहीं बढ़ पाते | वे सब भगवान् के साक्षात् स्वरूप के समक्ष संभ्रमित हो जाते हैं, जिसमें सारा सौंदर्य, ऐश्र्वर्य, ज्ञान, बल, यश तथा त्याग भरा है | जब सतोगुणी तक इस स्वरूप को नहीं समझ पाते तो उनसे क्या आशा की जाये जो रजोगुणी या तमोगुणी हैं? कृष्णभावनामृत प्रकृति के तीनों गुणों से परे है और जो लोग निस्सन्देह कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे ही वास्तव में मुक्त हैं |


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