!! श्रीराधाचरितामृतम्” 151 !!
लीला संवरण
भाग 1
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क्या ललिता ठीक नही कहती ……कि मैं इन दिनों कुछ ज्यादा ही उन्मादिनी हो गयी हूँ ………मैं तो द्वारिका गयी थी …….फिर यहाँ वृन्दावन में कैसे आगयी ?
ललिता कहती है ………कि श्याम सुन्दर ले आये ………..
आपको कुछ स्मरण नही है क्या स्वामिनी ?
नही ….मुझे कुछ स्मरण नही …….हाँ इतना पता है ……..पर सपना जैसा लगता है ……कि सागर किनारे भ्रमण के लिये श्याम सुन्दर ले गए थे ………..पर मैं वृन्दावन कैसे पहुँची ? और मैं ही नही …..मेरे साथ मेरी सखियाँ भीं ……..और समस्त ग्वाल बाल …..मैया यशोदा और नन्द बाबा ………हम सब कैसे आगये ?
श्याम सुन्दर ही ले आये , हम सबको वही ले आये……आपको क्या याद नही है…….ललिता याद दिलाती हैं …….हाँ ……कुछ कुछ याद आरहा है……..वो अर्जुन आया था….जब श्याम सुन्दर और हम सागर किनारे थे………रथ लेकर……श्रीराधा जी सोचती हैं ।
द्वारिका में कुछ अच्छा नही हो रहा ……….मुझे ऐसा लगता है ।
कृष्ण सन्तति उद्दण्ड हो उठी है एकाएक ………।
मुझे आज्ञा दी है श्याम सुन्दर नें कि मैं आप लोगों को वृन्दावन पहुँचा दूँ……..रथ तैयार है…….आप लोग बैठिये ।
मैं उस समय मुस्कुराई थी……..क्यों की मैं समझ गयी थी कि.. …श्याम सुन्दर अब लीला को समेट रहे हैं……..
मैं रथ में बैठ गयी………मेरे साथ समस्त वृन्दावन वासी भी अर्जुन के रथ में ही बैठ गए थे ।
मैं देखती रही द्वारिका को……..सुवर्ण की द्वारिका अब डूबनें की तैयारी में थी……..श्याम सुन्दर अब आजाओ ! मेरे पास आजाओ ……….सब देखतो लिया तुमनें…….अब क्या देखना शेष है ? लाखों बालक हो गए ……..लाखों पौत्र प्रपौत्र हो गए……..महाभारत का युद्ध भी करवा ही दिया ……अब आजाओ !
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल-
🦚 राधे राधे🦚
: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 56 )
गतांक से आगे –
।। दोहा ।।
साधन करि नाकादि फल, नस्वर पावत जोय ।
एक कृपा ही करि कछू, सिद्धि होय सो होय ॥
॥ पद ॥
एक कृपा करि होय सो होईं। साधन सिद्ध रह्यौ नहिं कोई ॥
नाकादिक नस्वर फल पावैं। जाय आय में आयु बितावैं ॥
जितनैं साधन उर में धरहीं। तितनैं या बिच अंतर करहीं ॥
सब तजि सदा मनावै याही। औरन तैं मनधरि अवग्याही ॥
श्रीहरिप्रिया परम-पद चाहैं। तो या बिना न आन उमाहैं ॥ ३० ॥
*यहाँ तक पहुँचने का साधन क्या है ? निकुँज में हमारा प्रवेश कैसे हो , क्या साधना करें हम ? ये प्रश्न इस बार मैंने फिर पूछ लिया था । तो हरिप्रिया जी मुस्कुराते हुए बोलीं ….ना , कोई साधना ऐसी नही है , जो करें , और निकुँज में प्रवेश मिल जाये ।
फिर ? मैंने हरिप्रिया जी की ओर देखकर पूछा ।
कृपा ….बस …कृपा । कृपा से ही यहाँ तक पहुँचा जा सकता है । फिर कुछ सोचकर हरिप्रिया जी बोलीं ….साधना से तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा ….या मुक्ति मिल जाएगी ….किन्तु ये प्रेम धाम निकुँज साधना से नही मिला करते ….ये याद रखना । मैं उनकी एक एक बात बड़ी गम्भीरता से सुन रहा था । देखो …पुण्य साधन करो …..लोग करते हैं ….उससे स्वर्ग मिलता है…..स्वर्ग जाओ ….स्वर्ग में पुण्य साधन के कारण तुम्हें सुख भोग करने को मिलेगा ….वो करो ….किन्तु पुण्य खतम तो वापस आना पड़ेगा मर्त्यलोक में …मर्त्य लोक में आकर फिर पुण्य करो …फिर स्वर्ग जाओ …भोगो सुख-भोग को …..फिर वापस मर्त्य लोक में …..बस यही क्रम चलता रहता है मनुष्य का । हाँ , थोड़ी उच्च साधना करो ….जैसे मुक्ति आदि के लिए ….वासना को हटाओ , कामनाओं का जो झंझावात तुम्हारे अन्दर है …उसे पूर्ण रूप से मिटाओ …इसके प्रयास में लगो तो तुम्हें मुक्ति-मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी । हरिप्रिया जी कहती हैं …लेकिन “दिव्य श्रीवृन्दावन निकुँज” में प्रवेश साधन साध्य नही है ….कृपा साध्य है ।
तो क्या करें ? मैंने मुस्कुराते हुए पूछा ।
हरिप्रिया जी बोलीं …..कृपा मनाओ । सदैव उनकी कृपा मनाओ । इसी से निकुँज में प्रवेश मिलेगा ।
कैसे कृपा मनायें ? मैंने फिर पूछ लिया ।
इस पर हरिप्रिया जी बोलीं …..अन्य साधनों पर जो भरोसा है उस भरोसा को पहले हटाओ ….तनिक भी आकर्षण न रहे अन्य साधनों पर …..और उन साधनों के फल पर ….क्यों भरोसा है ? ये सब स्वर्ग आदि जो फल हैं वो तो मिथ्या हैं ना ! तुम्हें भोगों को भोग कर वापस यहीं तो आना है ….फिर क्यों बेकार में मिथ्यात्व के पीछे भाग रहे हो । हरिप्रिया यहाँ कुछ देर के लिए मौन हो जाती हैं ….फिर आगे कहती हैं ……पहले तो अन्य साधनों के प्रति आकर्षण कम हो जाये ….फिर उन साधनों से मिलने वाले फल की भी कोई कामना न रहे ….फिर युगल सरकार के एक मात्र चरणों का आश्रय रह जाए । हमारे देवता यही हैं , हमारे पितर यही हैं ….हमारे भगवान यही हैं …हमारी मुक्ति यही हैं , बन्धन यही हैं । अरे ! हमारे नाते रिश्तेदार भी यहीं हैं …..सब कुछ इन्हीं से है , और इन्हीं में है । जब तुम चातक की तरह युगल सरकार की ओर ही निहारते रहोगे ..मन वचन कर्म से तो बस …कृपा बरस ही जाएगी । और जब कृपा बरसेगी तब तुम इस निकुँज को सहज पा लोगे । हरिप्रिया जी ने मुझे ये सब कहकर बाद में पूछा भी …..समझी ? जी , मैंने मुस्कुराकर उनके सामने सिर झुका दिया था ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: 🙏🙏🌹🙏🙏
!! श्रीराधाचरितामृतम्” 151 !!
लीला संवरण
भाग 1
🍃☘️🦜🦜🍃☘️
क्या ललिता ठीक नही कहती ……कि मैं इन दिनों कुछ ज्यादा ही उन्मादिनी हो गयी हूँ ………मैं तो द्वारिका गयी थी …….फिर यहाँ वृन्दावन में कैसे आगयी ?
ललिता कहती है ………कि श्याम सुन्दर ले आये ………..
आपको कुछ स्मरण नही है क्या स्वामिनी ?
नही ….मुझे कुछ स्मरण नही …….हाँ इतना पता है ……..पर सपना जैसा लगता है ……कि सागर किनारे भ्रमण के लिये श्याम सुन्दर ले गए थे ………..पर मैं वृन्दावन कैसे पहुँची ? और मैं ही नही …..मेरे साथ मेरी सखियाँ भीं ……..और समस्त ग्वाल बाल …..मैया यशोदा और नन्द बाबा ………हम सब कैसे आगये ?
श्याम सुन्दर ही ले आये , हम सबको वही ले आये……आपको क्या याद नही है…….ललिता याद दिलाती हैं …….हाँ ……कुछ कुछ याद आरहा है……..वो अर्जुन आया था….जब श्याम सुन्दर और हम सागर किनारे थे………रथ लेकर……श्रीराधा जी सोचती हैं ।
द्वारिका में कुछ अच्छा नही हो रहा ……….मुझे ऐसा लगता है ।
कृष्ण सन्तति उद्दण्ड हो उठी है एकाएक ………।
मुझे आज्ञा दी है श्याम सुन्दर नें कि मैं आप लोगों को वृन्दावन पहुँचा दूँ……..रथ तैयार है…….आप लोग बैठिये ।
मैं उस समय मुस्कुराई थी……..क्यों की मैं समझ गयी थी कि.. …श्याम सुन्दर अब लीला को समेट रहे हैं……..
मैं रथ में बैठ गयी………मेरे साथ समस्त वृन्दावन वासी भी अर्जुन के रथ में ही बैठ गए थे ।
मैं देखती रही द्वारिका को……..सुवर्ण की द्वारिका अब डूबनें की तैयारी में थी……..श्याम सुन्दर अब आजाओ ! मेरे पास आजाओ ……….सब देखतो लिया तुमनें…….अब क्या देखना शेष है ? लाखों बालक हो गए ……..लाखों पौत्र प्रपौत्र हो गए……..महाभारत का युद्ध भी करवा ही दिया ……अब आजाओ !
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल-
🦚 राधे राधे🦚
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 17
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तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |
प्रियो हि ज्ञानिनोSत्यर्थमहं स च मम प्रियः || १७ ||
तेषाम् – उनमें से; ज्ञानी – ज्ञानवान; नित्य-युक्तः – सदैव तत्पर; एक – एकमात्र; भक्तिः – भक्ति में; विशिष्यते – विशिष्ट है; प्रियः – अतिशय प्रिय; हि – निश्चय ही; ज्ञानिनः – ज्ञानवान का; अत्यर्थम् – अत्यधिक; अहम् – मैं हूँ; सः – वह; च – भी; प्रियः – प्रिय |
भावार्थ
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इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है |
तात्पर्य
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भौतिक इच्छाओं के समस्त कल्मष से मुक्त आर्त, जिज्ञासु, धनहिन् तथा ज्ञानी ये सब शुद्धभक्त बन सकते हैं | किन्तु इनमें से जो परमसत्य का ज्ञानी है और भौतिक इच्छाओं से मुक्त होता है वही भगवान् का शुद्धभक्त हो पता है | इन चार वर्गों में से जो भक्त ज्ञानी है और साथ ही भक्ति में लगा रहता है, वह भगवान् के कथनानुसार सर्वश्रेष्ठ है | ज्ञान की खोज करते रहने से मनुष्य को अनुभूति होती है कि उसका आत्मा उसके भौतिक शरीर से भिन्न है | अधिक उन्नति करने पर उसे निर्विशेष ब्रह्म तथा परमात्मा का ज्ञान होता है | जब वह पूर्णतया शुद्ध हो जाता है तो उसे ईश्र्वर के नित्य दास के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति की अनुभूति होती है | इस प्रकार शुद्ध भक्त की संगति में आर्त, जिज्ञासु, धन का इच्छुक तथा ज्ञानी स्वयं शुद्ध हो जाते हैं | किन्तु प्रारम्भिक अवस्था में जिस व्यक्ति को परमेश्र्वर का पूर्णज्ञान होता है और साथ ही जो उनकी भक्ति करता रहता है, वह व्यक्ति भगवान् को अत्यन्त प्रिय होता है | जिसे भगवान् की दिव्यता का शुद्ध ज्ञान होता है, वह भक्ति द्वारा इस तरह सुरक्षित रहता है कि भौतिक कल्मष उसे छू भी नहीं पाते |


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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877