!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 149 !!(1),: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!,श्रीमद्भगवद्गीता &!! महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (129) !! : Niru Ashra

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 149 !!
द्वितीय ग्रहण – यात्राद्वितीय ग्रहण – यात्रा
भाग 1
कोई बहुत बड़ा संग्राम हो गया है कुरुक्षेत्र में…….
इसलिये लोग इस सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र नही गए …….सिद्धपुर, द्वारिका के निकट कश्यपाश्रम है ……अब धार्मिक समुदाय इधर ही मुड़ रहा था ……और क्यों न मुड़े……द्वारिकाधीश इधर ही तो थे इन दिनों ।
बहुत समय लगा……..कई दिन लगे इस सिद्धपुर पहुंचनें में ।
( साधकों ! “सिद्धपुर” गुजरात में है…और यह प्रसंग “गर्ग संहिता” में )
श्रीराधारानी अपनी सखियों के साथ बैठी हैं बैल गाडी में ………..
अन्य बैल गाड़ियों में ……नन्द राय जी ………मैया यशोदा, ……..अन्यान्य गाड़ियों में ग्वाल सखा सब थे ।
निरन्तर कृष्ण चिन्तन ही चल रहा है……….हाँ कभी कभी महाभारत की बातें भी छिड़ जाती हैं……..”सुना है बहुत बड़ा युद्ध हो गया कुरुक्षेत्र में …..लाखों हाथी …..लाखों घोड़े…..सब मारे गए ……ललिता सखी बता रही थीं । पर श्रीराधारानी नें कहा – मुझे ये सब हिंसा की बातें अच्छी नही लगतीं ।
कुछ देर बाद फिर बोलीं – इन राजाओं की दिक्कत क्या है ……ये लोग बिना युद्ध किये बगैर रह नही सकते क्या ? श्रीराधारानी को ये सब प्रिय नही हैं …………ये युद्ध करते हैं ……..और बेचारे निरपराध पशुओं को भी मारनें के लिये अपनें साथ ले आते हैं ………हाथी , घोड़े कितनें मरते हैं बेचारे ……मूक पशु ………करुणामयी श्रीराधिका का हृदय भर आता है ये सब सुनकर ।
आज सात दिन हो गए हैं चलते चलते………..
पर आज पहुँच ही जायेंगें………बस अब कुछ ही समय बाकीं है ……गाड़ीवान नें कहा……..ग्वाल बाल प्रसन्नता से झूम उठे थे ।
बस कुछ ही देर में सिद्धपुर पहुँच गए थे सब ग्वाल बाल ।
बाबा ! बहुत भीड़ है यहाँ तो ? कैसे स्नान करेंगें ?
मनसुख नें जब व्यवस्था देखी तो वो घबडा गया था ।
लाखों की भीड़ थी……. सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र जानें वाले समस्त तीर्थयात्री इस बार सिद्धपुर की ओर मुड़ चुके थे ……….
नन्दबाबा के पास मनसुख गया …….बाबा ! कैसे स्नान होगा ? और यहाँ तो कुरुक्षेत्र की तरह खुली जगह भी नही हैं …..जहाँ हम लोग अपना शिविर लगा सकें ! मधुमंगल और तोक आगे आये ……..द्वारिका का शिविर कहाँ लगा है ?
मधुमंगल ! द्वारिका पास में ही है…….उन्हें यहाँ शिविर लगानें की जरूरत नही है ! मनसुख नें समझाया ।
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल-
🌸 राधे🌸
!! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख”- 48 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
तिनहिं प्रिया हरि हितहि करि, नित राखै निजपास ।
नवकिसोर सुखरासि कौ, जिनकें अननि उपास ॥
॥ पद ॥
जिनकें यहै अनन्य उपास ।
तिनकौ प्रिया-लाल नित हित, करि राखें अपने पास ॥
माया त्रिगुन प्रपंच पवन की, अंच न आवैं तास ।
श्रीहरिप्रिया निपट अनुवर्तिनि, है निरखें सुखरास ॥ २२ ॥
ये क्या वस्तु है अनन्यता ! जिसकी भक्ति मार्ग में बहुत चर्चा होती रहती है ?
जी , इस अनन्यता के बिना भक्ति मार्ग में आप फिर भी चल दो, किन्तु “रस मार्ग” में तो एक कदम भी आगे नही बढ़ा सकते । अनन्यता का अर्थ है, अन्य कोई नही है, बस तू , तू ही तू …
इसके बिना प्रेम सम्भव ही नही है ….
हरिप्रिया जी मुझे रस मार्ग का मूल सिद्धान्त बताने लगीं थीं । अनन्य उपासना …”सखी भाव” से भावित होकर …..युगल सरकार की उपासना करनी है …अपने को भाव जगत में ले जाना है ….उस भाव जगत में युगल सरकार को लाड़ लड़ाना है ….युगल सरकार को ही अपना सब कुछ मानना है ….उनके आगे न कोई देवि न कोई देवता न पितर न कोई भगवान । सब कुछ युगल सरकार । हरिप्रिया जी इसी बात को समझा रहीं हैं, वो आगे कहती हैं ….जो इस तरह अपना सब कुछ युगल को मानकर उपासना करते हैं …उनको प्रिया लाल भी अपना मानते हैं …..देखो ! तुम उनको अपना सब कुछ मानोगी तो वो भी तुम्हें अपना मानेंगे ना ! तुम्हारा उनके सिवाय कोई आधार नही रहेगा ….तो वो भी तुम्हें अपने पास , अपने निकट रखेंगे ! हरिप्रिया जी कहती – ये नियम ही है ….तुम उन्हें जिस तरह भजोगे वो भी तुम्हें उसी तरह भजेंगे । इसलिए मूल बात ये है कि ….इनके अनन्य हो जाओ । अच्छा ! अब तुम सोचोगी …कि इनके अनन्य होने पर क्या होगा ? तो सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि ….प्रिया लाल तुम्हें अपने पास रखेंगे ….तुम्हें उनका दुलार मिलेगा ….उनका प्यार मिलेगा । और हाँ , युगल सरकार के पास में तुम आजाओगी …उनके निकट आजाओगी ना …तो यहाँ माया जनित दुःख नही होगा ….जगत प्रपंच की गर्म लू के थपेड़े तुम्हें नही लगेंगे ….तुम बची रहोगी ….और युगल सरकार के कृपा की शीतल छाँयां में तुम आनंदित रहोगी । मुझे करना क्या होगा ? मैंने ये पूछा ….तो हरिप्रिया जी बोलीं ….कुछ नही करना …बस सखीभाव से भावित होकर अपनी गुरु सखी का अनुगमन करते रहना है …..अपनी गुरु सखी की आज्ञा आलस को त्याग कर मानते रहना है …..ये बात जब हरिप्रिया जी ने कही तो मैंने उसी समय उनके चरणों में अपना मस्तक रख दिया था और कहा …मेरी “गुरु सखी” जी तो आप ही हैं ….अब युगल सरकार की शीतल छाँयां मुझे दिलाइए ……हरिप्रिया जी ने मुस्कुराते हुए अपना वरद हस्त मेरे सिर में रख दिया था ।
शेष अब कल –
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 8
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रसोSहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसुर्ययो: |
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु || ८ ||
रसः – स्वाद; अहम् – मैं; अप्सु – जल में; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; प्रभाः – प्रकाश; अस्मि – हूँ; शशि-सुर्ययोः – चन्द्रमा तथा सूर्य का; प्रणवः – ओंकार के अ, उ, म-ये तीन अक्षर; सर्व – समस्त; वेदेषु – वेदों में; शब्दः – शब्द, ध्वनि; खे – आकाश में; पौरुषम् – शक्ति, सामर्थ्य; नृषु – मनुष्यों में |
भावार्थ
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हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ |
तात्पर्य
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यह श्लोक बताता है कि भगवान् किस प्रकार अपनी विविध परा तथा अपरा शक्तियों द्वारा सर्वव्यापी हैं | परमेश्र्वर की प्रारम्भिक अनुभूति उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा हो सकती है और इस प्रकार उनका निराकार रूप में अनुभव होता है | जिस प्रकार सूर्यदेवता एक पुरुष है और सर्वव्यापी शक्ति – सूर्यप्रकाश – द्वारा अनुभव किया जाता है, उसी प्रकार भगवान् अपने धाम में रहते हुए भी अपनी सर्वव्यापी शक्तियों द्वारा अनुभव किये जाते हैं | जल का स्वाद जल का मूलभूत गुण है | कोई भी व्यक्ति समुद्र का जल नहीं पीना चाहता क्योंकि इसमें शुद्ध जल के स्वाद के साथ साथ नमक मिला रहता है | जल के प्रति आकर्षण का कारण स्वाद की शुद्धि है और यह शुद्ध स्वाद भगवान् की शक्तियों में से एक है | निर्विशेषवादी व्यक्ति जल में भगवान् की उपस्थिति जल के स्वाद के कारण अनुभव करता है और सगुणवादी भगवान् का गुणगान करता है, क्योंकि वे प्यास बुझाने के लिए सुस्वादु जल प्रदान करते हैं | परमेश्र्वर को अनुभव करने की यही विधि है | व्यव्हारतः सगुणवाद तथा निर्विशेषवाद में कोई मतभेद नहीं है | जो ईश्र्वर को जानता है वह यह भी जानता है कि प्रत्येक वस्तु में एकसाथ सगुणबोध तथा निर्गुणबोध निहित होता है और इनमें कोई विरोध नहीं है | अतः भगवान् चैतन्य ने अपना शुद्ध सिद्धान्त प्रतिपादित किया जो अचिन्त्य भेदाभेद-तत्त्व कहलाता है |
सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश भी मूलतः ब्रह्मज्योति से निकलता है, जो भगवान् का निर्विशेष प्रकाश है | प्रणव या ओंकार प्रत्येक वैदिक मन्त्र के प्रारम्भ में भगवान् को सम्बोधित करने के लिए प्रयुक्त दिव्य ध्वनि है | चूँकि निर्विशेषवादी परमेश्र्वर कृष्ण को उनके असंख्य नामों के द्वारा पुकारने से भयभीत रहते हैं, अतः वे ओंकार का उच्चारण करते हैं, किन्तु उन्हें इसकी तनिक भी अनुभूति नहीं होती कि ओंकार कृष्ण का शब्द स्वरूप है | कृष्णभावनामृत का क्षेत्र व्यापक है और जो इस भावनामृत को जानता है वह धन्य है | जो कृष्ण को नहीं जानते वे मोहग्रस्त रहते हैं | अतः कृष्ण का ज्ञान मुक्ति है और उनके प्रति अज्ञान बन्धन है |
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] Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (129)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों की चाहत
हमारे भाई-बन्धु, माँ-बाप, सास-ससुर, रिश्तेदार-नातेदार सब इकट्ठे होकर हमारे विरह में छाती पीटेंगे और कहेंगे कि जो कृष्ण भय और आर्तिको मिटाने के लिए आया था उसने सारे व्रज को ही भय और आर्ति में डाल दिया। तो तुम हमारी यदि पुष्टि नहीं करोगे, हम जो लालसा-अभिलाषा लेकर आयी हैं उसको पूरी नहीं करोगे तो तुम्हारी तो अपकीर्ति होगी और व्रज का सत्यानाश हो जायेगा; इस पर भी तुम हमें धर्म का उपदेश करते हो और हमसे कहते हो कि शान्तचित्त से दिमाग ठीक करके हमारा उपदेश सुनो। तो आप जानते हो कि दूसरे घर में आग लगे तो सबलोग उपदेश करने के लिए पहुँच जाते हैं। तुम्हारी दाढ़ी में आग लगे और हमारी दाढ़ी में आग लगे तो तुम पहले किसको बुझाओगे? अपनी तो बुझाओगे न! ठीक ही कहा है करि परोपदेशे पाण्डित्यम्। गोपियों ने कहा- कृष्ण। लेकिन तुम्हारा उदाहरण इसके विपरीत है। क्यों?
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता जब दैत्य बढ़ते हैं और देवताओं का ह्रास होता है, देवता लोग जब पीड़ित होते हैं- तब आपकी शरण में आते हैं; वे ही तो आप हैं। आपके पास जब इंद्र वरुणादि देवता आये और बताया कि दैत्यों ने उनका स्वर्गलोक आदि छीन लिया है और आपसे रक्षा की प्रार्थना की तो आपको उस समय क्या चाहिए था? क्या उस समय आपको यह चाहिए था कि उनको तत्त्वज्ञान का उपदेश करते कि बैठो-बैठो देवताओं! सुनो, यह स्वर्गलोक मिथ्या है, यह अग्नि-वरुणलोक आदि मिथ्या हैं और ये सबके सब अधिष्ठान में कल्पित हैं और तुम तो शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा हो; इसलिए अब यह स्वर्ग की इच्छा तुम लोग छोड़ दो, देवलोक-आधिप्तय की वासना छोड़ो, बहुत बुरी है, और हार और जीत में सम हो जाओ, अब देवताओं की दैत्यों से लड़ाई करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा उपदेश देवताओं की दैत्यों से लड़ाई करने की आवश्यकता नहीं है।
ऐसा उपदेश देवताओं को तुमने क्यों नहीं दिया? तब तो देवताओं की इच्छा पूरी करने के लिए- ‘देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता’ जैसे आदिपुरुषदेव उस समय ज्ञानोपदेश नहीं करता, बल्कि उनके दुःख को दूर करने का उपाय करता है; उसी प्रकार इस समय जब हम एक इच्छा लेकर तुम्हारे पास आयी हैं तुम्हें हमें उपदेश करना उचित नहीं है, उचित यह है कि हमारी इच्छा पूरी करके हमारी रक्षा करो। देखो, जिस समय किसी का फोड़ा दुख रहा हो, उस समय उसको वेदान्त का उपदेश मत करना। उस समय तो उसकी दवा-दारू करनी चाहिए, उसको सुख पहुँचाना चाहिए। वह तो जब अपने को फोड़ा हो तब सोचना चाहिए कि शरीर अधिष्ठान में कल्पित है और इसमें फोड़ा हुए बिना प्रतीत हो रहा है और उसमें दर्द नहीं है। अपने को ही, तब सोचना चाहिए, दूसरे को हो तो उपदेश नहीं करना, नहीं तो तुम्हारे वेदान्त की इज्जत गिर जायेगी भला!+
तो भगवान् भी देवताओं को समता का उपदेश नहीं करते, उल्टे इंद्र के छोटे भाई बन जाते हैं। इंद्र बड़े और वामन छोटे! छोटे बनकर उपेंद्र बन गये। और देखो इतने छोटे बने कि ब्राह्मण बनकर बलि के दरबार में गये और वहाँ भीख माँगी और भीख माँग करके अपने भाइयों को स्वर्गलोक दे दिया। तो बोलीं- वहाँ उपदेश क्यों नहीं करते हो कि ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्म?’ वहाँ तो उनको वाञ्छित वस्तु देते हो। और अब हम जब एक इच्छा लेकर आयी हैं तो हमें उपदेश करतो हो? हमारी इच्छा भी पूरी क्यों नहीं करते? यदि कहो कि तुम्हारी यह इच्छा धर्म के विपरीत है, इसलिए घर में लौट जाओ- तो तुम्हारा ही यह श्रुति-वचन है कि ‘यदहरेव विरजेत्, तदहरेव प्रव्रजेत्’; श्रुति कहती हैं जिस दिन मन में ठीक-ठीक वैराग्य आ जाय, उसी दिन घर छोड़ देना चाहिए क्योंकि वैराग्य का यह क्षण जीव में कभी ही आता है।
ऐसा वैराग्य आज आया है, कल आयेगा इसको कोई ठीक नहीं है। इसलिए बाबा मेरे, क्या करना कि ‘व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो देवोयथाऽऽदिपुरुषः’- जैसे आदिपुरुष नारायण देवलोक की रक्षा के लिए स्वयं अपने को छोटा बना देते हैं, झुक करके भी देवताओं की रक्षा करते हैं, वैसे ही- ‘तन्नो निधेहि’। श्रीकृष्ण ने कहा- गोपियों! क्या करें, बोलो। बोलीं- कि हम तुम्हारे अवतार को सफल करना चाहती हैं- ‘व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातः।’ बोले- हम तो पृथ्वी का भार दूर करने के लिए आये हैं, उससे हमारा अवतार सफल होगा। बोली- यदि तुम न आते, केवल बलरामजी आते, संकर्षण आते, तो भी पृथ्वी का भार दूर हो जाता, क्योंकि सारी पृथ्वी को तो शिर पर संकर्षण लिए रहते हैं, पृथ्वी का भार दूर करने के लिए वही काफी हैं। बोले- फिर वसुदेव-देवकी आदि को संतोष नहीं है तो, इसके लिए मैं आया हूँ। बोलीं- ये तो प्रद्मुम्न कर देते, क्योंकि वे कामरूप हैं, उनको देख करके सबका मिजाज तर रहता है। बोले- धर्मरक्षा का काम कौन करता है, यदि हम न आते? बोलीं- यह काम अनिरुद्ध कर देते क्योंकि अनिरुद्ध तो सप्तद्विपाधिपति हैं, वे धर्म की रक्षा कर देते। फिर हम तुम क्यों आये गोपियों, तुम्हीं बताओ। बोलीं- सुनो तुम तो आये हो हम लोगों के लिए-
कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहांर हरिः ।
तुम हम लोगों के लिए आये हो; यदि हम लोगों को अपने विरह में और उपेक्षा से दुःखी कर डालोगे तो तुम्हारे अवतार का प्रयोजन पूरा नहीं होगा।++
तुम भगवद्भक्ति, प्रकट करने के लिए आये हो न, तो जब लोग सुनेंगे कि गोपियों ने सब कुछ छोड़कर- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, सब छोड़कर- श्रीकृष्ण से प्रेम किया और अंत में बेचारी उपेक्षित होकर तड़फड़ाकर उनके चरणों में बिना पानी की मछली की तरह मर गयीं तो यही मर्यादा तो स्थापित होगी कि जो श्रीकृष्ण से प्रेम करे सो मर जाय। तो कोई प्रेम करेगा दुनिया में? भक्ति का मार्ग चलेगा? भक्ति के मार्ग का लोप हो जायेगा यदि तुम पुष्टि नहीं करोगे। यह तो जैसे बिरवा को, कोमल पौधे को, सिंचाई की जरूरत होती है, इसी का नाम पुष्टि हैं; सूखते हुए पौधों को सींचना, इसका नाम पुष्टि है। सींचे हुए पौधे में खाद डाल देना, इसका नाम पुष्टि है। साधन रहित, निस्साधन जो जीव है, उस जीव को साधन का फल दे देना इसका नाम पुष्टि है।
भगवान बोले- अच्छा गोपियों! तुम बोलो हम करें क्या? बोलीं-
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो तप्तस्नेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम।
गोपियाँ जो बड़ी समझदार थीं, उन्होंने कहा कि देखो सखि! क्या श्रीकृष्ण सचमुच हमलोगों की उपेक्षा करते हैं कि बाहर से बनावट करते हैं? बोलीं- सखि, पता कैसे चले? तो कहा- पता ऐसे चले कि तुम अपने शरीर पर उनका हाथ रखने को कहो और ऐसी जगह हाथ रखने को कहो कि इनको लालच आ जाय; तब पता चल जायेगा कि इनके मन में बनावट है कि असलियत है। बोलीं कि देखेंगी कि इनके शरीर में रोमाञ्च होता है कि नहीं, इनके होठों में मुसकराहट आती है कि नहीं, पकड़े जायेंगे। दूसरी गोपी जो नहीं समझती है, वह कहती हैं- पहले तो नारायण। हमको निर्भय करो; हमें दो चीज चाहिए; एक तो चाहिए निर्भयता और एक चाहिए रसदान। पहले तो जो गरम हवा लगती है उससे बचाव हृदय का भाव प्रकट करती हैं, बिल्कुल खुले।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
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