🙏🥰 श्रीसीतारामशरणम्मम _🥰🙏
#मैंजनकनंदिनी…. 2️⃣4️⃣
भाग 2
( #मातासीताकेव्यथाकीआत्मकथा )_
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#भयोपानिगहनुबिलोकिबिधिसुरमनुजमुनिआनंदभरे….._
📙( #रामचरितमानस )📙
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#मैवैदेही ! ……………._
फिर मुझे खोजा जाता था ……………और मै ?
मै तो कभी दूध मति के किनारे………….तो कभी कमला नदी के किनारे …अपनी सखियों के साथ खेलती रहती थी …………
तब रथ आता ……………और मुझे बड़े आग्रह के साथ उसमें बिठाया जाता ……..और जब मेरे पिता मुझे देख लेते …..और पहला भोजन का ग्रास मेरे मुख में देते ……..मुझे अपनी गोद में बिठाते ………..उस समय मै उनकी दाढ़ी से खेलती ……..कभी मूँछों को नीचे कर देती …….कभी ऊपर कर देती ………….उस समय मेरे पिता मुझे देखकर गदगद् होते रहते …………।
आज पाणिग्रहण संस्कार हो रहा था उनकी बेटी का …………
वो भावुक हो उठे थे उस समय ……………….
मेरे पिता में जितनी धैर्यता है ……..उतनी और किसमें है !
पर आज कन्यादान करनें की बारी आयी …….तो मेरे पिता के हाथ काँप रहे थे …………….
अब उनकी बेटी का कुल गोत्र सब कुछ बदलनें वाला था ………
अब पिता के घर की ये बेटी नही रहेगी ……इसका घर सम्बन्ध सब कुछ बदल जाएगा ……………..ऋषि वशिष्ठ जी नें ये कहा था ।
अजी ! ये हृदय किसी कारखानें में तो गढ़ा नही गया !
इसे तो पीड़ा होती ही है ………इसे हूंक सी चुभती ही है …….
जब कोई कह दे …….पिता की अब बेटी नही रही ………….ओह !
मेरी आज तक समझ में नही आया ……..हम बेटियों का धर्म विधाता नें इतना अलग क्यों रचा है ?
जिस आँगन में मै खेली कूदी …….पली बढ़ी जिस धरती के गर्भ से इस भूमिजा नें जन्म लिया ……….उसका मोह क्या एक दिन में छूट सकता है ! चलो ! मेरे मन से छूट भी जाए ………हाँ जगत मेरे रघुनन्दन को ब्रह्म कह रही है …….तो चलो इन्हीं ब्रह्म की प्राप्ति करके मै धन्यता का अनुभव करूँ …………..पर मेरे माता पिता ?
इनके कोमल हृदय में तो ….एक नन्ही सी लाली भी है ………इन्हें कौन समझाये ……….इन्हें कौन सम्भाले !
मै समझती हूँ ……………..मै भी रोना चाहती हूँ …………..अरे ! अपनें कुल परिजनों का एकाएक पराया हो जाना किसे भायेगा !
अब मै निमिवंश की नही …..रघुवंश की होनें जा रही थी ………..पुरानें गोत्र को तिलांजलि देकर …………पुरानें वंश को विसर्जित करके …..
उफ़ ! सच में नारियों का हृदय बहुत बड़ा है ………………।
क्रमशः …..
#शेषचरिञअगलेभाग_में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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Niru Ashra: “अक्रूर का अन्तर्द्वन्द्व“
भागवत की कहानी – 41
अक्रूर भक्त हैं , अक्रूर में भक्ति के गुण हैं , श्रीकृष्ण के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा है । पर संग का , अन्न का दोष तो जीव में आता ही है …कंस के सेनापति जो रहे हैं …तो वो दोष अक्रूर में दिखाई देती है द्वारिका में जाकर …किन्तु ये हैं भक्त इसमें कोई सन्देह नही है । श्रीकृष्ण भगवान हैं , इस पर इनकी अपार निष्ठा है । कंस राजा ने इन्हें भेजा श्रीवृन्दावन …और ये कहकर भेजा कि आप जाओ और श्रीकृष्ण को ले आओ । क्यों ? अक्रूर ने पूछा । क्यों कि उसे बुलाकर मैं मार दूँगा । अक्रूर को क्रोध आया …अपने भगवान के प्रति वो ऐसा कैसे सुन सकते हैं ….उन्होंने इतना ही कहा …”कर्म जीव कर सकता है , फल तो दैव देता है …और क्या फल देगा ये कौन जानता है , क्या पता आप उन्हें मारोगे या वो आपको” ? कंस क्रोध में भरकर बोला …मैं तुम्हें मार दूँ तो ? अक्रूर ने सहज भाव से कहा …मैं जाऊँगा श्रीवृन्दावन , और लेकर आऊँगा श्रीकृष्ण को । हृदय भर आया अक्रूर का …भगवान आयें मथुरा और इस दुष्ट का संहार करें । श्रीकृष्ण भगवान हैं , उनका कोई क्या बिगाड़ पायेगा । अक्रूर कंस से कहते हैं …मैं जाऊँगा ।
अक्रूर ! तुम कल प्रातः वृन्दावन के लिए चले जाना….कंस आज्ञा देता है ।
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करके अक्रूर रथ में बैठ जाते हैं …और रथ श्रीवृन्दावन की ओर ।
रथ में ही ध्यानस्थ हो गए हैं अक्रूर । श्रीकृष्ण उनके ध्यान में आगये हैं । श्रीवृन्दावन की प्रेममयी वायु ने जब अक्रूर का स्पर्श किया तो प्रेम में और डूब गए अक्रूर । ओह ! श्रीकृष्ण मुझे देखेंगे ! यही ध्यान में चल पड़ा है अक्रूर के । वो मुझे काका कहेंगे ! मेरे पैर छुएँगे ! नही नही मैं भगवान से भला पैर कैसे छुवाऊँ ? मेरा परम सौभाग्य हैं कि मैं इन नयनों से भगवान को निहारूँगा ! अक्रूर एकाएक भाव में आजाते हैं …उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के चरण चिन्ह श्रीवन की भूमि में यत्र तत्र सर्वत्र दिखाई देते हैं …वो रथ से कूद पड़ते हैं …वो सब कुछ भूल गए हैं …ओह ! मेरे भगवान के चरण चिह्न ! वो श्रीधाम की अवनी में लोटते हैं …उनके अंग अंग में रज लग गया है ।
अब तो ये स्थिति हो गयी अक्रूर की ….कि उनसे आगे चला भी नही जा रहा ..अश्व रुक गए हैं …श्रीकृष्ण नाम अक्रूर के रोम रोम से निकल रहा है….ये भाव की उन्मत्त दशा में पहुँच गये हैं । तभी सामने से रज उड़ता हुआ दिखाई दिया ..सहस्रों गौएँ लौट रहीं हैं । यानि सन्ध्या हो गयी ! अक्रूर चौंक जाते हैं …मथुरा से श्रीवृन्दावन दूर तो नही है…पर भाव के कारण अक्रूर खो गये ..और उन्हें समय का पता भी नही चला ।
काका !
ओह , ये अमृत से सनी बोली …अमृत भी तुच्छ है इसके आगे तो । सिर उठाकर जब देखा तो सामने पिताम्बर धारण किये मंद मुस्कुराते नन्दनन्दन दिखाई दिये ….नेत्रों से अविरल अश्रुपात अक्रूर के …जैसे तैसे सम्भाला श्याम सुन्दर ने ….फिर रथ में बिठाकर ले आए अपने नन्दभवन । कौन हैं ? ग्वाल-सखाओं ने पूछा …तो उस समय अक्रूर को फिर रोमांच हुआ जब श्रीकृष्ण ने कहा – “काका हैं” । क्यों आए हैं ? सखाओं का प्रश्न था । मथुरा जायेंगे हम …और वहाँ मेला लगा है उसी मेले में जायेंगे ये हमें लेने आए हैं । ये बात सुनते ही अक्रूर को पूर्ण विश्वास हो गया कि भगवान ही हैं श्रीकृष्ण …मेरे बिना कहे ही ये समझ गये । सखाओं ने कहा …हम भी चलेंगे । श्रीकृष्ण बोले ..हाँ , हाँ हाँ …चलना । नन्द महल आगया था …श्रीकृष्ण आवाज लगाने लगे कि …मैया ! बाबा ! देखो कौन आया ? फिर धीरे से अक्रूर के कान में कहा …काका ! मैया बाबा को मत कहना कि कंस ने बुलाया है । ये कहते हुए श्रीकृष्ण …मैया ! देख तो कौन आया ! कहते हुए अपने महल में चले गये । अक्रूर देखते रहे उनकी वो बोली , उनकी वो चितवन , उनका वो मुस्कुराना , खिलखिलाना ….फिर अक्रूर विचार करते हैं ….भगवान हैं ये इसलिए तो इन्हें सब पता है कि – कंस ने बुलवाया है …मुझे मना किया बताने के लिए । मुस्कुराते हुए अक्रूर रथ से उतरते हैं ….सामने खड़े थे बृजपति श्रीनन्द उनके साथ उनकी भार्या बृजेश्वरी यशोदा ।
नही , नही जाएगा मेरा लाला मथुरा । नही जाएगा । सुनिए ना ! अक्रूर को कह दीजिए कि मेरा लाला नही जाएगा । अक्रूर ने भीतर बैठते हुए जल पान किया नन्द जी ने कुशल क्षेम पूछी थी …तभी बातों ही बातों में अक्रूर ने अपने बृज आने का कारण बता दिया था ।
नही , नही जाएगा मेरा लाला मथुरा । मैया यशोदा ने मर्यादा तोड़ दी थी ..पति के सामने वो ऊँची आवाज में बोल उठीं थीं …अरे ! क्या मर्यादा ? जब अपना प्राणधन जा रहा हो तब मर्यादा कौन रखे ? किन्तु नन्द जी ने कुछ सोचकर कहा …लाला मथुरा जाएगा …और मैं भी जाऊँगा ..बलराम सखा सब जाएँगे । ये सुनते ही यशोदा मैया रोती हुई भीतर चली गयीं थीं ।
अक्रूर ने श्रीकृष्ण की ओर देखा तो उन्हें विचित्र लगा कि श्रीकृष्ण के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे । अपने अश्रुओं को पोंछते हुये वो भी अपनी मैया के पास में चले गये थे । आवाज आरही है रोने की भीतर से ….अक्रूर सुन रहे हैं । भगवान रोता है ? नही , भगवान क्यों रोयेगा ? अक्रूर का अंतर्द्वंद्व यहीं से आरम्भ हो गया था ।
रात भर अक्रूर को नींद नही आयी ….बृजरानी का वो करुण क्रन्दन ! श्रीकृष्ण का रोना …अपनी माता को समझाना । यही सब में रात चली गयी थी । सुबह की वेला क्या हुई …भीड़ लग गयी नन्दभवन में तो । गोपियाँ सब रो रहीं थीं …एक बार तो लगा अक्रूर को कि कहीं मुझे ही दोष न दें । हाँ , क्यों न दें मुझे दोष ? दोषी मैं ही तो हूँ ….इन प्रेमियों को उनके प्रिय से दूर करने मैं ही आया । तू अक्रूर नही , क्रूर है …एक गोपी ने तो कह भी दिया था । तभी भीतर से श्रीकृष्ण आये …अक्रूर रथ में है ….वो हाथ जोड़ते आए ….उनके नेत्रों से अविरल अश्रु बह रहे थे …सामने एक गोपी को देखा था अक्रूर ने …अक्रूर को समझते देर ना लगी कि यही हैं श्रीराधिका । क्यों कि श्रीकृष्ण उनके सामने खड़े होकर रो रहे थे …..भगवान क्यों रोंयें ? ये भगवान नही हैं । फिर अक्रूर सोचने लगे – नही श्रीकृष्ण भगवान हैं । अब तो हद्द ही हो गयी …झुक गये थे ..घुटनों के बल बैठ गये थे श्रीराधिका के सामने …और वो उन्हें उठा भी नहीं रहीं थीं । अक्रूर ये सब देख रहे हैं …रो रही हैं गोपीजन , रो रहे हैं पक्षी गण , अरे पूरा श्रीवृन्दावन रो उठा था …श्रीवन की सिसकियाँ कोई भी सुन सकता था । लेकिन ये क्या ! श्रीकृष्ण रो रहे हैं ? भगवान रो रहे हैं …..वो सबको गले लगाकर रो रहे हैं ।
अक्रूर के रथ में अब जाकर श्रीकृष्ण बैठे हैं …अक्रूर देख रहे हैं ….वो मैया ! वो श्रीराधा …वो मेरा श्रीवृन्दावन …यही सब कहकर रो रहे हैं …रथ चल पड़ा है …अक्रूर के समझ में नही आरहा कि ये हो क्या रहा है ? भगवान ऐसा तो नही होता । ओह ! कहीं ये सामान्य ग्वाल तो नही ? कहीं तुम बाल हत्या के दोषी तो नही होगे ? क्यों कि इनको मारने के लिए कंस ने बुलाया है ।
अक्रूर के समझ में नही आरहा क्या करें ? तभी सामने यमुना दिखाई दीं ….अक्रूर ने रथ रोक दिया ….”काका ! भूख लगी है” ये और कह दिया श्रीकृष्ण ने ..अब तो पक्की बात है ….ये भगवान नही है …..इतनी जल्दी भूख ? अभी तो माखन खाकर आया था । अक्रूर तुरन्त यमुना में गए उन्होंने डुबकी लगाई क्योंकी सोच ज़्यादा चल रही थी ….तभी क्या देखते हैं अक्रूर कि यमुना में साक्षात् नारायण प्रकट हो गये हैं ….ये क्या ! जल से निकलकर रथ में देखा अक्रूर ने …तो वहाँ भी चतुर्भुज नारायण विराजे हैं …अच्छा ! अब समझ गये अक्रूर कि …सब लीला है ..भगवान की ही सब लीला है ..अक्रूर के मुखमण्डल में प्रसन्नता फैल गयी और उन्होंने भाव से भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की थी।
Niru Ashra: भक्त नरसी मेहता चरित (42)
दिल की सदा सुन हे जग करता
तेरी दया हो हे दुःख हरता,
मुश्किल में है हम दुखयारी दूर करो प्रभु सब अंधियारे,
कोई तो हल निकाल दे,
आई मुसीबत टाल दे प्रभु आई मुसीबत टाल दे,
तेरी धुप है तेरी छाया अप्रम पार है तेरी माया,
तू करता है सेहरा को दरिया तू देता जीने का जरियाँ,
तेरी दया का हो उजियारा
मिट जाए सारा अँधियारा,
इक नजर डाल दे प्रभु एक नजर डाल दे
आई मुसीबत टाल दे प्रभु आई मुसीबत टाल दे,
भजन प्रभाव से नरसीराम जाति में सम्मलित👏🏵
अन्तराय ने कहा – *”नहीं भाई ऐसी बात नहीं है । ‘नरसिंह राम भगवान श्रीकृष्ण के एकनिष्ठ । सच्चे भक्त है । प्रायश्चित द्वारा हम अन्य पापों से तो कदाचित छूट सकते हैं ; परंतु एक सच्चे भक्त के प्रति किए गए अपराध रूप पाप से गंगा स्नान करने या अन्य प्रायश्चित्र करने से कदापि हमें मुक्ति नहीं मिल सकती ।
यदि मेरी बात पर किंचित भी विश्वास हो तो शीघ्र उन वीतराग महात्मा के चरणों में प्रणाम करके उनसे क्षमा याचना करो तथा उन्हें जाति में मिला कर अपने साथ भोजन कराओ । हमारे अपराध का यही प्रायश्चित है ।”*
अनन्तराय नरसिंह राम के मामा लगते थे । विद्वता , वाकपटुता तथा नम्रता आदि सदगुणों के कारण सम्रग जाति में उनका बड़ा मान था, अतः जाति के सब लोगों को उनके वचनों पर विश्वास हो गया ।
‘जाति के दो चार प्रतिष्ठित पुरुष उसी समय नरसिंह राम के घर गये । उस समय नरसिंह राम भगवान को नैवेद समर्पित कर रहे थे । आगन्तुक जाति-नेताओं ने उन्हें वन्दना करके क्षमा याचना की तथा जाति भोज में सम्मिलित होने की प्रार्थना की ।’
‘भाईयो ! आप इतनी विनय क्यों कर रहे हैं ? ऐसी प्रार्थना तो भगवान से ही करनी उचित है ; मैं तो आपलोगों का एक तुच्छ सेवक हूँ , ‘ मेरे अन्दर कोई विशेषता नहीं ‘ । नरसिंह मेहता ने नम्रता पूर्वक निवेदन किया।
वास्तव में जो सच्चे भक्त होते हैं ,वे भूल करके भी अभिमान नहीं करते ।वे तो -‘-‘-‘
सुह्वन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थ द्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिविंशिष्यते ।।
‘अर्थात जो पुरुष सबका हित करने वाला सुहृद ,मित्र, वैरी ,उदासीन, मध्यस्थ , द्वेषी और बन्धुजनों में तथा धर्मात्माओं में भी समान भाव रखने वाला है , वह अति श्रेष्ठ भक्त है -‘ गीता के इस श्लोक के अनुसार सबमें समान भाव रखते हैं ।’
नरसिंह राम भी सच्चे भगवदभक्त थे उन्होंने तुरंत जाति भोज में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया । जब नरसिंह भी जाकर पंक्ति में बैठ गये तब पहले का दृश्य दूर हो गया और सब लोगों ने प्रसन्नता पूर्वक भोजन किया।
इस प्रकार भगवद भजन प्रभाव से नरसिंह राम जाति- वहिष्कार की विपति से बच गये और उनके विरोधियों को नीचा देखना पड़ा ।
क्रमशः ………………!
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
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श्लोक 10 . 11
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तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः |
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता || ११ ||
तेषाम् – उन पर; एव – निश्चय ही; अनुकम्पा-अर्थम् – विशेष कृपा करने के लिए; अहम् – मैं; अज्ञान-जम् – अज्ञान के कारण; तमः – अंधकार; नाशयामि – दूर करता हूँ; आत्म-भाव – उनके हृदयों में; स्थः – स्थित; ज्ञान – ज्ञान के; दीपेन – दीपक द्वारा; भास्वता – प्रकाशमान हुए |
भावार्थ
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मैं उन पर विशेष कृपा करने के हेतु उनके हृदयों में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ |
तात्पर्य
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जब भगवान् चैतन्य बनारस में हरे कृष्ण के कीर्तन का प्रवर्तन कर रहे थे, तो हजारों लोग उनका अनुसरण कर रहे थे | तकालीन बनारस के अत्यन्त प्रभावशाली एवं विद्वान प्रकाशानन्द सरस्वती उनको भावुक कहकर उनका उपहास करते थे | कभी-कभी भक्तों की आलोचना दार्शनिक यह सोचकर करते हैं कि भक्तगण अंधकार में हैं और दार्शनिक दृष्टि से भोले-भोले भावुक हैं, किन्तु यह तथ्य नहीं है | ऐसे अनेक बड़े-बड़े विद्वान पुरुष हैं, जिन्होंने भक्ति का दर्शन प्रस्तुत किया है | किन्तु यदि कोई भक्त उनके इस साहित्य का या अपने गुरु का लाभ न भी उठाये और यदि वह अपनी भक्ति में एकनिष्ठ रहे, तो उसके अन्तर से कृष्ण स्वयं उसकी सहायता करते हैं | अतः कृष्णभावनामृत में रत एकनिष्ठ भक्त ज्ञानरहित नहीं हो सकता | इसके लिए इतनी ही योग्यता चाहिए कि वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहकर भक्ति सम्पन्न करता रहे |
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आधुनिक दार्शनिकों का विचार है कि बिना विवेक के शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता | उनके लिए भगवान् का उत्तर है – जो लोग शुद्धभक्ति में रत हैं, भले ही वे पर्याप्त शिक्षित न हों तथा वैदिक नियमों से पूर्णतया अवगत न हो, किन्तु भगवान् उनकी सहायता करते ही हैं, जैसा कि इस श्लोक में बताया गया है |
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भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि मात्र चिन्तन से परम सत्य भगवान् को समझ पाना असम्भव है, क्योंकि भगवान् इतने महान हैं कि कोरे मानसिक प्रयास से उन्हें न तो जाना जा सकता है, न ही प्राप्त किया जा सकता | भले ही कोई लाखों वर्षों तक चिन्तन करता रहे, किन्तु यदि भक्ति नहीं करता, यदि वह परम सत्य का प्रेमी नहीं है, तो उसे कभी भी कृष्ण या परं सत्य समझ में नहीं आएँगे | परं सत्य, कृष्ण, केवल भक्ति से प्रसन्न होते हैं और अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे शुद्ध भक्त के हृदय में स्वयं प्रकट हो सकते हैं | शुद्धभक्त के हृदय में तो कृष्ण निरन्तर रहते हैं और कृष्ण की उपस्थिति सूर्य के समान है, जिसके द्वारा अज्ञान का अंधकार तुरन्त दूर हो जाता है | शुद्धभक्त पर भगवान् की यही विशेष कृपा है |
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करोड़ो जन्मों के भौतिक संसर्ग के कल्मष के कारण मनुष्य का हृदय भौतिकता के मल (धूलि) से आच्छादित हो जाता है, किन्तु जब मनुष्य भक्ति में लगता है और निरन्तर हरे कृष्ण का जप करता है तो यह मॉल तुरन्त दूर हो जाता है और उसे शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है | परं लक्ष्य विष्णु को इसी जप तथा भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है, अन्य किसी प्रकार के मनोधर्म या तर्क द्वारा नहीं | शुद्ध भक्त जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए चिन्ता नहीं करता है, न तो उसे कोई और चिन्ता करने की आवश्यकता है, क्योंकि हृदय से अंधकार हट जाने पर भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् स्वतः सब कुछ प्रदान करते हैं | यही भगवद्गीता का उपदेश-सार है | भगवद्गीता के अध्ययन से मनुष्य भगवान् के शरणागत होकर शुद्धभक्ति में लग जाता है | जैसे ही भगवान् अपने ऊपर भार ले लेते हैं, मनुष्य सारे भौतिक प्रयासों से मुक्त हो जाता है |
