श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! श्रीकृष्ण के मथुरा आगमन से भयभीत कंस !!
भाग 1
तात ! कंस, …..इस पृथ्वी का महापराक्रमी राजा कंस, ….मल्लयुद्ध का व्यसनी …..अजेय, श्री परशुराम का शिष्य …..मगध नरेश जरासन्ध का जामाता ……….मथुरानरेश राजा कंस ।
.गवाक्ष से यमुना कि तरंगों को देख रहा था । ….”अक्रूर अभी तक नही पहुँचा ……..कहीं अक्रूर भी इन देवों से मिला तो नही है ……….कल चर मुझे बता रहे थे कि अक्रूर के रथ के चिन्ह उन्हें कहीं दिखाई नही दिए …….तो ? कंस विचार कर रहा है …………विचार क्या वो अंदर से भयभीत है ।
कहीं कृष्ण को लेकर अक्रूर भाग तो नही गया ?
पर वो भाग के जायेगा कहाँ ……..इस पृथ्वी में जहाँ छुपेगा मैं उसे पकड़ लूँगा ……..हँसता है कंस ………पर ये हँसी अपनें भय को छुपानें के लिये है । उद्धव विदुर जी को ये प्रसंग सुना रहे थे ।
कल पुरोहित से पूछा था अपनें स्वप्न का फलादेश, तो वो कुछ नही बोला……….डर गया होगा ………पर मेरे स्वप्न का फलादेश क्या है ?
मुझे डर लग रहा है ……..और सबसे बड़ा डर तो ये कि …….परछाईं में अब मुझे मेरा सिर दिखाई नही देता ………..कहीं .ये मृत्यु के आगमन का संकेत ! न हीं ….कंस चिल्ला उठता है ।
फिर अपनें आपको मजबूत दिखानें के लिये अट्टहास करता है ……..वो देवकी के पुत्र मुझे मारेंगे ? मैं मसल दूँगा उन्हें .।
तभी – महाराज की जय हो !
एक चर नें आकर प्रणाम किया कंस को ।
हाँ , बोलो ! क्या समाचार है ? अक्रूर कहाँ हैं ?
वो आगए हैं……..चर नें कहा ।
क्या ! प्रसन्नता हुयी ? या डरा कंस ? डरा ।
उसके साथ समस्त ग्वाल बाल हैं ……….बृजराज भी हैं …….कुछ बैलगाड़ियाँ भी हैं…….चलो अच्छा हुआ …….जाओ !
लम्बी साँस लेकर कंस फिर यमुना कि तरंगों को देखनें लगा था उसके पैर काँप रहे थे………वो डरा हुआ था ।
संध्या कि बेला है ………मथुरा के राजपथ पर कई बैलगाड़ियाँ दौड़ रही थीं आज…….जिसके कारण धूल का गुबार मथुरा के नभ तक पहुँच रहा था ।
बृजराज ग्वालों के साथ मथुरा पहुँच गए थे ………..
कन्हैया कहाँ है ? मनसुख पथ में दृष्टि गड़ाये हुये है ……उसे पीछे कन्हैया का रथ नही दिखाई दिया ……तो पूछ रहा है ।
मथुरावासी सब देखते हैं बैलगाड़ियों को ……………आपस में हँसते हैं ………..”आगये वृन्दावन वाले …………बृजराज लाये होंगे इन गाड़ियों में माखन, दही दूध, और देंगे ये उपहार के रूप में राजा कंस को ………और यही खा खाकर तो कंस के राक्षस हमें मारते हैं” …………मुँह बना रहे हैं बृजवासियों को देखकर मथुरा के नर नारी ।
तभी – वो देखो, आगया हमारा कन्हैया ! मनसुख और अन्य सखा प्रसन्नता से उछल पड़े थे ।
अक्रूर का रथ आया …………कन्हैया रथ से उतर कर सीधे अपनें बाबा के पास गए………..अब मनसुखादि सब सखा श्रीकृष्ण के साथ ।
हे बृजराज जी ! मेरी अभिलाषा है कि आप मेरी कुटिया में चलें …….वहीं रहें ……..वहीं से भ्रमण और मेला दर्शन सब हो जाएगा ……..
अक्रूर नें बृजराज नन्द जी से विनती की थी ।
नही काका ! श्रीकृष्ण नें तुरन्त अक्रूर को मना कर दिया ।
यमुना के किनारे ये उद्यान हमें अच्छा लग रहा है………हम सब यहीं रहेंगे……क्यों बाबा ? अपनें नन्दबाबा कि और देखकर पूछते हैं ।
पर यहाँ कक्ष नही है …………..बस उद्यान है ………..आप लोग कैसे रहेंगे यहाँ ? अक्रूर के माथे पर चिन्ता साफ दीख रही थी ।
काका ! हम वनवासी लोग हैं ………हम वन में रहना ही पसन्द करते हैं ……हम सब यहाँ प्रसन्न रहेंगे.।……..सन्ध्या से कुछ घडी आगे ही समय गया था……..”अक्रूर ! मेरा लाला ठीक कह रहा है …..हम सबको यहाँ स्वतन्त्रता का अनुभव भी होगा……..लाला ! सूर्यास्त हो रहा है …….मैं यमुना स्नान करके ….सन्ध्या करके आता हूँ ………अक्रूर ! तुम निश्चिन्त होकर अपनें घर में जाओ ………..हम यहाँ प्रसन्न हैं ……यमुना जाते जाते नन्दबाबा अक्रूर को कहते चले गए थे ।
अक्रूर अपनें भवन कि ओर चले गए ।
क्रमशः…
