Explore

Search

August 30, 2025 11:02 am

लेटेस्ट न्यूज़

કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

Advertisements

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( विरह विलास – “वेगि चलहि उठि गहर करत कत”) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!-( विरह विलास – “वेगि चलहि उठि गहर करत कत”) : Niru Ashra

!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!

( विरह विलास – “वेगि चलहि उठि गहर करत कत”)

गतांक से आगे –

निकुँज में विरह विलास के पदों को जब गोसाईं श्रीहित हरिवंश जू गाते हैं ….तब बड़ा भला करते हैं ….हम लोगों का बड़ा भला करते हैं …जब वो नित्य विहार की सनातन जोरी को यदा कदा विरह सिंधु में अवगाहन कराते हैं …तब हमारे कठोर चित्त को पिघला देते हैं ….सरस हो उठता है हमारा चित्त ….उस सरस हुए चित्त में फिर अंकित कर देते हैं रस केलि की दिव्य झाँकी को ।

इस रस को जाने बिना सब जानना व्यर्थ नही लगता आपको ?

मिलन में वियोग वियोग में मिलन की जो रस , खेल करता है ….वो बड़े बड़ों को चमत्कृत कर देता है ….ऐसा रस का स्वरूप कहाँ दिखाई देता है ! मान करना श्रीराधिका का अधिकार है …और मनाना श्याम सुन्दर का कर्तव्य । पर यहाँ बात अधिकार और कर्तव्य की कहाँ हो रही है …ये तो इन दोनों से परे की बात है ….प्रिया जी का मान करना श्याम सुन्दर के लिए अतिशय कष्ट कारक है ….पर ये सब क्या प्रिया जी जानबूझकर कर सकती हैं ? ना , ये सब सहज रस केलि का अंग है ….नायिका विरहिणी है …ये सामान्य शृंगार रस में आता है ….नायिका की तड़फ, ये भी सामान्य शृंगार रस की बात है …पर नायक तड़फ उठे …नायक बिलखने लगे …वो हां पिया , हां पिया , कहकर कुसुम शैय्या में अकेले रोते हुए पुकारने लगे …तो ये शृंगार रस का सर्वोच्च भाव है । पूर्ण अहं की शून्यता का दर्शन है । श्रीहित हरिवंश गोसाईं जू ने जिस झाँकी को खींचा है , रसिक शेखर के विरह विलास की अद्भुत झाँकी को …वो अद्वितीय है ….हाँ , गीत गोविन्द में अवश्य इसका वर्णन आता है …पर श्रीहित चौरासी में जो इस रस की वर्णनात्मक शैली है वो दूसरी जगह मिलती नही है ।

ये ब्रह्म का विरह विलास अपनी आल्हादिनी के प्यार के लिए है …….इसे सुनोगे ना , तो तुम्हारे पाप ताप तो नष्ट होंगे ही ……पर वो भीतर की प्यास भी जाग उठेगी …….जागी तो है ही …पर तुम्हें भी पता चल जाएगा कि प्यास किसके लिए थी । बेटों के लिए नहीं , धन के लिए नहीं , यश कीर्ति के लिए नही …ये सब मिलने पर भी प्यास ज्यों की त्यों बनी रही है ना ? फिर प्यास किसकी ? अपने अन्दर विराजे “रस” से मिलने की …..वो तड़फ , वो विरह , इसे समझो ।

बड़ा पुण्य करते हैं श्रीहित हरिवंश गोसाईं जी ….हम लोगों को श्रीहित चौरासी देकर ।


बरसाना में रस बरस रहा है …यहाँ नित्य अखण्ड रस बरसता ही है ….फिर उस बरसाना में राधा बाग …..ये बाग श्रीजी का अपना बाग है ….यहाँ रात्रि में सखियों के साथ श्रीजी क्रीड़ा करने आती हैं ….रसिकों को श्रीजी के दर्शन हुए हैं …..मेरे पागल बाबा ने दर्शन किए हैं ….ये भूमि अद्भुत है …प्रेममयी है …..रस की ही भूमि है ये ….इस भूमि में श्रीहित चौरासी की रसमयी चर्चा और हो रही है ….रसिक जन आनन्द ले रहे हैं …पागलबाबा स्वयं आनन्द मूर्ति हैं ….उनकी वाणी से जो रस बरस रहा है ….वो दिव्यातिदिव्य है । उनको शब्दों में कह पाना कठिन ही है ।

आज बाबा भावावेश में है ….रात्रि से ही उन्होंने कुछ खाया नही है न जल पीया है ….बस राधा राधा राधा …पुकार रहे हैं ….और जोरों से पुकार रहे हैं । मुख मण्डल लाल हो गया है , कण्ठ की नसें फूल गयी हैं । शाम होने आई तो रसिक जन पधारे ……पर बाबा की ये स्थिति ….तुरन्त श्रीजी मन्दिर में गोसाईं परिकरों को पता चला तो वो श्रीजी की प्रसादी ठंडाई और फल लेकर आगये ….बाबा को कहा …श्रीजी ने भिजवायो है । बस फिर क्या था बाबा ने ठंडाई भी ली और फल भी बड़े प्रेम से ग्रहण किया । अब जाकर रसिकों के हृदय में कुछ ठंडक पहुँची थी ….इसके बाद बाबा सहज हुये ….उन्होंने श्रीहित चौरासी के पद गायन की आज्ञा दी ….गौरांगी ने वीणा लेकर राग “वृन्दावनी सारंग” में अडतिसवें 38 , पद का गायन किया । बाबा इस पद में भी रोने लगे थे …..रसिक समाज रो रहा था । विरह विलास में डूबे रसिक शेखर की दशा का वर्णन था इस पद में । गाइये , आप सब भी गाइये ।


             वेगि चलहि  उठि गहर करत कत , निकुंज बुलावत लाल ।
            हा राधा ! हा राधा ! पुकारत ,  निरखि मदन गज ढाल ।।

           करत सहाइ शरद शशि मारुत , फूटी मिली उर माल ।
          दुर्गम तकत समर अति कातर , करहि न पिय प्रतिपाल ।।

          श्रीहित हरिवंश चली अति आतुर , श्रवन सुनत तिहि काल ।
           लै राखे गिरी कुच बिच सुंदर , सुरत सूर बृजबाल ।38 !

वेगि चलहि उठि गहर करत कत , निकुंज बुलावत लाल …………

बाबा आधे घण्टे तक कुछ नही बोले …वो ध्यान मग्न ही रहे ….पर आश्चर्य , दो मोर बाबा के ही पास में आकर बोलने लगे तो बाबा का ध्यान खुला ….बाबा मुस्कुराये मोरों को देखकर …फिर उन्होंने बोलना आरम्भ किया था ।

ध्यान , इस पद का ध्यान , बाबा बोले मैं इसी रस चिन्तन में लीन था ।


                                   !! ध्यान !! 

वो कुँज कुटीर छोटा था जिसे श्याम सुन्दर ने अपने हाथों से सजाया था ….पर छोटा होने के बाद भी था बड़ा सुन्दर , मणियों के झालर लगाये थे …नील मणि और पीत मणि से उस कुँज की अलग ही शोभा हो रही थी …आँगन में फुल वारी थी ….उसमें फूल खिले हुए थे । कुँज के ऊपर हीरों की जाली थी जिसमें से चन्द्रमा की चाँदनी जब भीतर पड़ती तब वो कुँज जगमगा उठता था ….श्वेत कमल के पल्लवों से मध्य में एक शैया सजायी थी ….वो अद्भुत शोभा बिखेर रही थी ….प्रिया जी ने अपने अंक से लगाया है अपने प्रीतम को …और पुचकार रही हैं ..उनके घुंघराले केशों को सहला रही हैं ….बाहर से सखियाँ इस झाँकी को देखकर गदगद हैं …आनन्द सिंधु में वो सब भी हिलोरें ले रही हैं । कुछ समय बाद प्रिया जी ने श्याम सुन्दर से कहा …अब चलो , प्रीतम ! तुमने कैसा सजाया है कुँज …दिखाओ । श्याम सुन्दर न चाहने के बाद भी प्रिया जी से अलग हुए और प्रिया के कोमल कर पकड़े चल दिये …..कुँज देख रही हैं प्रिया जी , मणियों की सज्जा अद्वितीय है प्यारे ! ये कहते हुए चूम लेती हैं प्रीतम के कपोल को , श्याम सुन्दर बड़े प्रसन्न होते हैं और आगे कुँज की बारिकियाँ दिखाते हैं …क्यों की स्वयं ने सज्जा की है इसलिये इन्हें आनन्द आरहा है । मध्य में खड़ी हो गयीं हैं अब प्रिया जी । पर चारों ओर मणियों की झिलमिलाहट …ऊपर हीरों की चमक ….श्याम सुन्दर ने देखा मणियों में प्रिया जी दिखाई दे रही हैं …हीरों में प्रिया जी दीख रही हैं …झालर में प्रिया जी । श्याम सुन्दर मुग्ध हो गये …मेरे चारों ओर प्रिया जी …आहा ! वो अंतर्मुखी हो उठे …मेरे दायें मेरे बायें , मेरे ऊपर सब जगह मेरी प्यारी ।

प्यारे श्याम सुन्दर !

किन्तु अब श्याम सुन्दर का ध्यान चारों ओर है …मणियों में झिलमिलाती श्रीराधा , हीरों में चमकती श्रीराधा ।

प्रीतम !

दूसरी बार फिर पुकारा झकझोरा श्रीराधा ने …पर नही …वो तो खो गये हैं …उन्हें अब चारों ओर राधा ही राधा दीख रही हैं ।

तो मैं जाऊँ ? मान उठ गया फिर प्रिया जी में ।

इसका भी कोई उत्तर नही दिया श्याम सुन्दर ने …क्यों की वो अपने में ही नही हैं ।

चली गयीं उस कुँज से बाहर प्रिया जी और यमुना के तट पर जाकर बैठ गयीं ।

प्रिया जी के जाते ही …प्रतिबिम्ब दिखाई देना बन्द हो गया मणियों में …..ये क्या हुआ …व्याकुल हो उठे लालन , चारों ओर देखने लगे …बाहर सखियाँ खड़ी थीं ….वो दुखी हो उठीं …श्याम सुन्दर विरह सागर में डूब गये …कहाँ राधिके ! वो पुकारने लगे …अब बाहर जाने की भी उनमें शक्ति नही रही …वो पछाड़ खाकर गिर पड़े ।

हित सखी से ये दृश्य देखा नही गया …वो वहाँ से दौड़ कर श्रीराधा के पास गयी …और सख्य रस से भरकर अधिकार पूर्ण शब्दों में ..’सखी’ कहकर ही सम्बोधन करने लगी ….अन्य सखियाँ भी हित सखी की बातों को सुन रही हैं ….श्याम सुन्दर के “विरह विलास” को बताने लगी हित सखी ….


हे सखी ! चलो । हित सखी ने श्रीराधिका जू का हाथ पकड़ कर कहा ।

कहाँ ? लालन के पास । क्यों ? वो बुला रहे हैं …हित सखी कहती है ।

नही , कहकर यमुना को निहारने लगीं फिर प्रिया जी ।

रात्रि हो रही है …रात्रि में विलम्ब क्यों करना !

रात्रि हो रही है तो ? प्रिया जी प्रश्न करती हैं ।

अकेले कामदेव लालन को सता रहा है …कामदेव अपनी पूरी सेना के साथ पहुँच गया है उनके पास …वो कामदेव को देखकर डर रहे हैं और आपको पुकार रहे हैं …हा राधा , हा राधा बोल रहे हैं …..उनको बचाने के लिए तो चलो ।

श्रीराधारानी कुछ नही बोलीं …और नभ में देखा खिले पूर्ण चन्द्र को ..फिर उसी चन्द्र को यमुना में देखने लगीं ……

यही सब कामदेव की सहायता कर रहे हैं ….श्याम सुन्दर का पक्ष लेने वाला कोई नही है इस समय ….ये चन्द्रमा कामदेव से मिल गया है …और ये शीतल पवन भी ….सब उसी की सहायता कर रहे हैं …बेचारे श्याम सुन्दर को कौन बचायेगा ! अरी राधिके ! यहाँ तक कि गले में पड़ी मोतीयों की माला भी श्याम सुन्दर की शत्रु बन गयी है …वो भी कामदेव के साथ मिलकर उन्हें सता ही रही है …क्यों की मोतीयों की माला में आपकी सुगन्ध जो उन्हें मिल गयी ।

तो मैं क्या करूँ ? अकेले छोड़ दोगी ? वो कहाँ जायेंगे ! आपके सिवाय उनका है कौन ? किससे कहेंगे वो ? हित सखी की बात सुनकर प्रिया जी प्रीतम को स्मरण करने लगीं …प्रीतम का विरह से व्याकुल मुख चन्द्र उनके चिन्तन में आया …ओह ! वो एकाएक उठ गयीं ….और अत्यन्त आकुल व्याकुल हो कुँज की ओर चल पड़ीं ….श्याम सुन्दर ने देखा मेरी प्रिया आगयीं हैं ….वो उठ गये …प्रिया जी ने तुरन्त अपने दोनों उरोज रूपी पर्वतों के मध्य अपने इन प्यारे को छुपा लिया , अब तो कामदेव को वहाँ से भागना ही था ….वो भाग गया ।

सखियों के आनन्द का कोई ठिकाना नही है ……

बोलो रसिक रसिकनी प्यारी प्यारे की …….जय जय जय ।

सब बोल उठी थीं ।


पागल बाबा फिर रस सिंधु में डूब गये थे …..

गौरांगी ने फिर इसी पद का गायन किया ।

“वेगि चलहि उठि गहर करत कत”

जय जय श्रीराधे , श्याम ।

आगे की चर्चा अब कल –

admin
Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

Leave a Comment

Advertisement
Advertisements
लाइव क्रिकेट स्कोर
कोरोना अपडेट
पंचांग
Advertisements