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August 30, 2025 10:59 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 64 !!-हंसदूतम्भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 64 !!-हंसदूतम्भाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 64 !!

हंसदूतम्
भाग 1

मूर्च्छा कैसे टूटे ?

क्यों की  यमुना में ही  कृष्ण को याद करते हुए मूर्छित हो गयी थीं  श्रीराधारानी ।

उनके रोम रोम से “कृष्ण” कृष्ण” कृष्ण” बस यही ध्वनि आरही थी ।

आकाश से एक हंस उतरा था उसी समय ………..

वो सीधे श्रीराधारानी के पास आकर खड़ा होगया ।

जाओ ! जाओ यहाँ से ! सखियों नें उसे भगाना चाहा ………पर नही वो तो श्रीराधारानी को ही देखे जा रहा था ।

कौन है ये ? सखी ! किस दिशा से आया है ? और हमारी लाडिली को ही देखे जा रहा है …….!

ललिता सखी नें सबको कहा – ये मथुरा से आया है ………कृष्ण का संगी साथी होगा….तो क्या वहाँ मथुरा में कृष्ण हंस से खेलते हैं ?

और क्या “मथुराधीश” हैं ……….यहाँ की तरह “गोपेश” थोड़े ही हैं …..

बन्दर बछड़े गाय यही तो थे यहाँ उनके संगी साथी …………

पर वहाँ, राजसी ठाट बाट है……हंस से खेलता है हमारा कन्हैया ।

ललिता उठीं ……..पकड़नें को बढ़ीं आगे ……….ये भागा नही …..न हीं उड़ा ……..ललिता सखी के पास प्रसन्नता से चला आया था ।

देख हंस ! ………तू क्या सच में उस छलिया का खिलौना है ?

हंस ! हमसे झूठ मत बोलना ………….देख ! क्या ये सच है कि हमारे नन्दनन्दन नें तुम्हे दूत बनाकर भेजा है यहाँ ?

अगर ये सच है …….तो तुम्हे यहाँ कुछ दिन रहना होगा …….नन्दगाँव और बरसानें को देखना होगा ………यहाँ के लोग कितनें बेचैन हैं …..देखना होगा तुम्हे यहाँ के लोगों की बैचैनी को ……तभी तो तुम जाकर सुनाओगे ना अपनें स्वामी को ……………

ललिता सखी हंस को देखती हैं …………..फिर अपनी स्वामिनी श्रीराधा रानी को ……..देख ! हंस देख ! यहीं हैं तेरे स्वामी की स्वामिनी …….देख इन्हें ……….कैसी दशा बना दी है इनकी तेरे स्वामी नें ……..कहना उससे जाकर ……………।

हे वज्रनाभ ! इस तरह ललिता सखी नें अपनें पास उस हंस को सात दिन तक रखा…..वही लेकर जाती थीं नन्दगाँव ……यशोदा को दिखातीं ……..नन्दराय को दिखातीं …….ग्वाल बालों की दिनचर्या …….गोपियों का क्रन्दन…….और श्रीराधारानी का वो महाभाव ।

वो हंस मथुरा का था ……..कृष्ण को यमुना में रोते हुये “राधा राधा राधा” कहते हुए वो सुन रहा था…….हंस ये सब देखकर विचलित हो उठा और वहीं से उड़ता हुआ वृन्दावन पहुँच गया था ।

सात दिन तक रहा वृन्दावन में वो हंस…….ललिता सखी नें अब उस हंस को विदा करते हुए कहा …..हे मथुरा के राजहंस ! मेरी एक प्रार्थना है अब ……..तुमनें जो जो देखा है…….जो दशा है इस वृन्दावन की कृष्ण के वियोग में , वो सब जाकर कहना ।

लो ………मेरे हाथों मोती खाओ । मोतियों का आहार देकर ललिता सखी नें उसे उड़ा दिया मथुरा के लिये ।

ओह ! वो हंस बदल गया था वृन्दावन में ………उसको बस अब “वृन्दावन और श्रीराधा” यही सूझ रहा था…..वो बोल भी रहा था “राधा राधा राधा” ।


साँझ का समय हो गया है …..सूर्य अस्ताचल की ओर जा रहे हैं……

गौधूली वेला हो रही है……….

गवाक्ष में खड़े कृष्ण वृन्दावन की ओर निहार रहे हैं ।

रोमांच हुआ कृष्ण को …….जब हंस उठता हुआ कृष्ण के सामनें आकर खड़ा हो गया ……रोमांच इसलिये हुआ कि ‘अपनें लोगों” की खुशबु से सरावोर था ये…….

कृष्ण भाव विभोर हो उठे थे ……..जब “राधा राधा राधा” नाम उच्चारण करनें लगा था वो हंस………

ओह !
अपनी गोद में रख लिया उस हंस को कृष्ण नें ………और बड़े प्रेम से मोती खिलानें लगे थे ……………

हंस ! मेरे मित्र ! क्या तुम सच में मेरे वृन्दावन हो आये ?

क्या मेरी राधा तुमसे मिलीं ? बताओ ना ! वो ठीक तो हैं ना ?

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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