!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( रस गर्विली श्रीराधा – “खेल्यौ लाल चाहत रवन” )
गतांक से आगे –
प्रेम की अटपटी चाल है …..यहाँ रूठना भी प्रेम का ही एक अंग है ..और मनाना भी ।
श्रीराधा निकुँज में रस गर्विली हैं ….ये मान कर बैठती हैं …रूठने का कोई कारण ? ना जी प्रेम में कारण खोजो ही मत …प्रेम तो अहैतुक होता है ….उसका हेतु थोड़े ही है । बस “रस में रिस और रिस में रस” यही प्रेम का पागलपन है । रस को बढ़ाना , और और बढ़ाना यही रिस का हेतु है । रिसाय जाती हैं जब श्रीराधा तब श्याम सुन्दर के हृदय का प्रेम उमड़ पड़ता है …उनकी व्याकुलता देखते ही बनती है ….यही रस का उफान है ….ये नही हो तो “रस केलि” खिलेगी नही ।
ना , विरह नही …निकुँज में क्या विरह ? यहाँ विरह को स्थान ही नही है । यहाँ का विरह तो बस इतना मान लीजिए की श्रीराधिका और श्याम सुन्दर दोनों मिल रहे हैं ….मिल गए हैं …अंग अंग , मन मन , प्राण प्राण …पर उस समय अगर नेत्र बन्द हो जायें तो यही विरह है ….दोनों के एक होने के बाद भी “नेत्रों से निहारना आवश्यक है”, नेत्रों का वियोग उस मिलन को फीका कर देगा । अगर पल के लिए भी पलक गिरे तो यही महा विरह है …एक पल भी देख नही पाये ! ओह ! इस सूक्ष्म प्रेम को आप अनुभव कर सकते हैं ? ये है हमारी रस पगी जोरी की बानगी । ये श्रीराधा प्रतिपल नई कान्ति लिए हैं …और श्याम सुन्दर का नेह प्रतिपल नवीन नवीन है । ऐसी दशा में क्षण वियोग कल्प के वियोग समान प्रतीत होता है । नही समझ में आये ये अटपटी प्रीति तो छोड़ो , ध्यान करो उस लीला का …इन युगल को खेलने दो …तुम तो बस देखो , निहारो ।
पागल बाबा ने आज सीधे पद गायन की आज्ञा दे दी थी ..क्यों की लोग समय से पूर्व ही आगये थे ….वातावरण इतना रसपूर्ण था की सब मत्त लग रहे थे …अति मत्त । श्रीराधा नाम जाप ..और निरन्तर लीला चिन्तन ने इन्हें उच्च स्थिति में पहुँचा दिया था । ओह !
वीणा लिए गौरांगी पद गायन करने लगी ….सारंगी भी और उसके साथ बाँसुरी भी …अद्भुत राग रंग तैयार था आज तो । श्रीहित चौरासी का उन्तालिसवाँ 39 पद था आज । मधुर कण्ठ से गौरांगी ने गायन किया । पीछे से सबने गायन किया था ।
खेल्यौ लाल चाहत रवन ।
रचि रचि अपने हाथ सवार्यौ , निकुँज भवन ।।
रजनी शरद मन्द सौरभ सौं, शीतल पवन ।
तो बिनु कुँवरि काम की वेदन , मेटत कवन ।।
चलहि न चपल बाल मृगनैंनी , तजिव मवन ।
श्रीहित हरिवंश मिलव प्यारे की , आरति दवन ।39!
खेल्यौ लाल चाहत रवन ………….
इसमें भी प्रिया जी की प्रेम गर्व से भरी झाँकी है …और लाल जी की उनके लिए व्याकुलता है ।
पागलबाबा इस पद का ध्यान कराते हैं ….जो अद्भुत है । साधकों ! कीजिए ध्यान ।
!! ध्यान !!
पूर्णिमा की रात्रि है….चन्द्रमा खिले हैं …उसकी चाँदनी पूरे श्रीवन को भिगो रही है …यमुना निर्मल बह रही हैं …उसका जल अत्यन्त निर्मल है ….चाँदनी में यमुना की निर्मलता का भी स्पष्ट दर्शन हो रहा है ….युगलवर दोनों यमुना में अपने चरण रखकर बैठे हैं …चन्द्र उजियारी में , यमुना में युगल का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है ..दोनों अपने ही प्रतिबिम्ब को निहार रहे हैं ….फिर एक दूसरे के प्रतिबिम्ब को निहारने लगते हैं …दोनों एक दूसरे को जल में निहारते हुये खो गये हैं ….यमुना भी अब जल में हलचल प्रकट नही करतीं …मानों वो एक प्रकार से रुक सी गयी हैं ….हलचल के कारण प्रतिबिम्ब नही दिखाई देगा ना ! फिर एकाएक ध्यान श्याम सुन्दर का जल में ही चन्द्रमा की ओर चला जाता है …फिर अपनी प्यारी को देखते हैं ….फिर चन्द्रमा को । जल में ही देखते हुये प्यारी कहती हैं …किसे देख रहे हो …मुझे देखो प्यारे ! ये रस गर्विली बोल उठती हैं । प्यारे कहते हैं चन्द्रमा को देख रहा था …सुन्दर लग रहा है ना ! बस इतना क्या कहा ….श्रीराधा तो रिसाय गयीं । पर श्याम सुन्दर को पता नही हैं ….वो अभी भी जल में ही देख रहे हैं ….और चन्द्रमा को ही देख रहे हैं । मान और बढ़ गया कि मेरे अब जल में न देखने के बाद भी प्यारे क्या देख रहे हैं ! पर प्यारे के मन में आया …मेरी चन्द्रवदनी के लिए क्यों न आज रात्रि विहार के लिए कुँज बनाऊँ ….सामने अनेक मोर हैं …श्याम सुन्दर उठे और यमुना के जल ही जल में वो उस पार चले गये ….चलते हुए गये …प्रिया जी का मान और बढ़ गया । वो एक कुँज की रचना करने लगे …चन्द्रमा की तरह ….उसमे मात्र मोतियों का अद्भुत प्रयोग किया ….शुभ्र मोती ..उसके ही झालर …उसकी ही जाली , ऊपर झज्जा मोतियों का ही …शैया वेला के फूलों की …अब तो उस मोतियों के कुँज में जब चाँदनी पड़ी तो जगमग हो उठा …शीतलता से और भर गया । अब परम प्रसन्न श्याम सुन्दर कुँज को तैयार करके बाहर आये ..और उस किनारे से मुस्कुराए ..और हाथ हिलाकर संकेत किया …पधारिये । किन्तु यहाँ तो मान कर बैठी थीं श्रीराधा , गर्वोन्मत्त थीं । मुँह फेर लिया ।
ओह ! उसी क्षण अपार दुःख के सागर में डूब गये श्याम सुन्दर ।
हित सखी समझ गयी …इस पार प्रिया जू मुँह फेरकर बैठी हैं और उस पार अब लालन दुखी हैं ।
सखी श्याम सुन्दर के पास आयी…श्याम सुन्दर ने हाथ जोड़ा सखी को …और कहा …तू जैसे भी हो मेरी प्यारी को मना, आप मनाइये लालन ! हित सखी से श्याम सुन्दर बोले …मुझ में अब हिम्मत नही है …मैं टूटा हुआ बैठा हूँ ….हे हितू सखी ! तू मेरा इतना काम कर दे …तू सब जानती है …प्यारी के बिना मेरा कौन है ! ऐसी विरह दशा देख । श्याम सुन्दर की बात सुनकर सखी यमुना के इस पार आयी ..और प्रिया जी को हाथ जोड़कर कहने लगी …चलो प्यारी ! चलो …..
चलो प्यारी , चलो ,
आपको प्रसन्न करने के लिए वो रस क्रीड़ा करना चाहते हैं …आप चलो ।
हित सखी कह रही है ।
प्यारी सखी ! देखो ना आपके लिए उन्होंने कितना सुन्दर कुँज सजाया है …अपने हाथों से सजाया है…..रच पचकर सजाया है ….चलो ! हाथ पकड़ लेती है हित सखी …पर श्रीराधा जी नही मानतीं । हे लाड़ली ! देखो ना पवन भी कितना सुन्दर बह रहा है ….कुछ बोलो ना ! मौन मत रहो …वो कितने अधीर हो रहे हैं …देखो तो ! हित सखी ये कहते हुए हाथ जोड़ने लगती है ….तब श्रीजी उसकी ओर देखकर संकेत से पूछती हैं …क्या ? हित सखी कहती है …एक बार सामने तो देखो ….और जैसे ही प्रिया जी सामने देखती हैं …उस पार प्रीतम श्याम सुन्दर बिलख रहे हैं …..अपने प्यारे को बिलखते उनसे अब देखा नही गया ….वो यमुना जल में ही दौड़ पड़ीं हैं ….पीछे सारी सखियाँ …श्याम सुन्दर ने जब देखा मेरी प्यारी आरही हैं तो वो भी दौड़ पड़े और यमुना के मध्य में ही दोनों का मिलन हो गया ।
यमुना अब तो परमप्रसन्न हो बहने लगीं ,यमुना में कमल खिलने लगे ,हंस हंसिनी के जोड़े उन्मत्त हो गये , ऊपर से चन्द्र की चाँदनी दोनों युगलों के ऊपर बरसने लगी । आनन्द रस छा गया था ।
जय जय श्रीराधे , जय जय श्रीराधे , जय जय श्रीराधे , श्याम , श्याम , श्याम ।
पागल बाबा भी खड़े हो गये और श्रीराधा नाम की जयकारा लगाने लगे थे …
गौरांगी ने फिर इसी पद को नित्य की तरह गाया ।
“खेल्यौ लाल चाहत रवन”…….
आगे की चर्चा अब कल –


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