!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 71 !!
सन्देसो देवकी सौं कहियो…
भाग 2
बहुत भूलनें लगी हूँ मैं आजकल……..मैं भी ! फिर अपना माथा पीटती हैं……..कन्हाई के लिये माखन निकालना भूल गयी ।
उद्धव का सिर चकरानें लगा………इनको कैसे समझाऊँ ?
क्या कहकर समझाऊँ ? इन्हें तो बारबार आवेश आरहा है …..जैसे इनका कन्हाई यहीं कहीं हो ! मैं कैसे समझाऊँ इनको ?
मैं उद्धव ! किसी को भी समझा सकता हूँ ………..किसी को भी !
मैं बृहस्पति का शिष्य हूँ …….मेरे ऊपर उनकी कृपा है ………
मेरा जैसा ज्ञानी और बुद्धिमान कौन होगा ?
पर यहाँ मेरी बुद्धि काम नही कर रही ……….शब्दों का कितना अभाव होगया है आज मेरे पास …………मैं इनको क्या कहूँ ?
क्या ऐसा बोलूँ जिससे इनका वियोग कुछ तो कम हो ……….इनको इस विरह के दुःख से कुछ तो राहत मिले ………पर क्या कहूँ !
उद्धव ! बारबार बोलनें की कोशिश करते हैं ……………पर मैया यशोदा और बृजपति नन्द को देखते ही ………..वो कुछ बोल ही नही पा रहे हैं ………..।
गिर गयी थीं मैया यशोदा ……………माखन निकालनें की जिद्द करते हुये गिर गयी थीं …………….
यशोदा ! रो गए नन्द जी ……सम्भाला यशोदा को ………..
हाथ में चोट लग गयी थी ……………..अपना उत्तरीय फाड़ कर यशोदा के हाथों में बाँध दिया ………….
“तेरा लाला मथुरा गया है …..यहाँ नही है” …………….कान में जाकर जोर से बोले थे नन्द जी……. यशोदा के कान में ……।
क्या ? क्या सच में ही वो मथुरा गया है !
फिर टूट गयीं …………और बैठ गयीं ।
कुछ देर तक रोती रहीं ………….बृजपति नें जल पिलाया ।
ये कौन है ? मेरे कन्हाई जैसा ?
उद्धव को देखकर फिर पूछनें लगी थीं ।
उद्धव की बुद्धि फिर चकराई ………..मैं इनको क्या समझाऊँ ?
ये श्याम का सखा है …….इसका नाम उद्धव है ……..बृजपति नें फिर परिचय दिया …….।
मथुरा से आया है ये ? यशोदा उद्धव की ओर खिसकीं ……….
हाँ …..मथुरा से आया है ……………उद्धव नाम है इसका ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल …..


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