!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( नित्यविहार का उपास्य रूप – “आजु सखी वन में”)
गतांक से आगे –
हमारा उद्देश्य नित्य विहार के दर्शन को प्राप्त करना है । किन्तु वो दर्शन सामान्य तो नही है …प्रथम तो उसके लिए स्व प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी । पर स्वयं का प्रयास कुछ ही दूर तक ….जैसे – नाम जाप , लीला चिन्तन के लिए एकान्त में बैठना , वाणी जी आदि का पाठ , रसिक जनों का संग आदि आदि । किन्तु ये ज़्यादा दूर तक नही चलेगा …..हाँ ये उस रस के लिए तुम्हारे अन्दर पात्रता का निर्माण अवश्य कर देगा ….पर आगे जाने के लिए तो “कृपा” ही चाहिये ।
“देह का विस्मरण हो जाये”।
ज्ञान के क्षेत्र में जिसे “जीवन्मुक्त” दशा कहा जाता है …..वहीं तक आपको चलना है ….अब इस रस मार्ग में कैसे देहातीत अवस्था तक पहुँचे ? इसके लिये ….ज़्यादा से ज़्यादा लीला चिन्तन पर बल दीजिए ….ठाकुर जी से प्रेम रखिये ….कृत्रिम ही सही …अकेले में बातें कीजिये …अपनी दिन चर्या को रात्रि में सोते समय अपने प्रिय से शेयर कीजिये ….नियम बना लीजिये कि नित्य सोने से पहले पूरे दिन की चर्या अपने इष्ट को सुनाऊँगी , सुनाऊँगा । इस नियम का कठोरता से पालन कीजिये …कभी भूल हो गयी तो रोईए ….उस दिन अपने आपको दण्ड दीजिये ।
आप कहोगे इन सब से क्या होगा ?
अपनत्व बढ़ेगा ….अपनापन होगा …और जब यही अपनापन बढ़ने लगता है …तो मन को फिर लगाना नही पड़ता , अपने आप लगता है। और जब अपने आप मन लगने लगे तब समझना हमारी साधना पूरी हुयी ….बस , अपने दम पर आपको यहीं तक आना है ….फिर आगे “वही”ले चलेंगे ….फिर जब उनकी याद चलेगी ….तब आप देह को भूलने लगेंगे ….जो एक सामान्य प्रेम में भी होता है …वो प्रेमी से बतियाते सब कुछ भूल जाता है …अपने आपको भी । इसके बाद आपके मन में उन्हें देखने की इच्छा होगी ….छूने की इच्छा होगी …उनकी पीताम्बर सूँघने की इच्छा होगी …आहा ! फिर आपको ये लगेगा कि हे श्याम सुन्दर ! अब तो अपना नित्य धाम दिखा दीजिए ….वो दिखा देंगे – फिर नित्य विहार । नित्य विहार का दर्शन ! यहाँ तक कि बात है ।
मैंने क्रम दे दिया है …यही क्रम है उस नित्य विहार दर्शन करने का ।
उसके लिए तो दिव्य नेत्र चाहियें ? या इन्हीं चर्म चक्षुओं से दर्शन हो जायेगा ? शाश्वत ने पूछा ।
बाबा बोले – इन्हीं से ही होगा …इसी आँख से , इसी हाथ से तुम उसे छु सकते हो ।इसी नाक से तुम उनके श्रीअंग की सुगन्ध ले सकते हो …कोई दिव्य नेत्र या दिव्य देह नही चाहिये । बाबा बड़े स्पष्ट बोले थे ।
आजु सखी ! वन में जु बने प्रभु , नाँचत हैं बृज मण्डन ।
वैस किशोर जुवति अंशनि पर , दियैं विमल भुज दंडन ।।
कोमल कुटिल अलक सुठि शोभित , अवलंवित जुग गंडन ।
मानहुँ मधुप थकित रस लंपट , नील कमल के खंडन ।।
हास विलास हरत सबकौ मन , काम समूह विहंडन ।
श्रीहित हरिवंश करत अपनौं जस , प्रगट अखिल ब्रह्मंडन । 61 ।
आजु सखी ! वन में जु बने प्रभु……..
“राग गौरी” में गौरांगी ने इसका गान किया गया था …अद्भुत राग रंग छा गया राधा बाग में ।
इस “इकसठवें” पद गायन पश्चात पागलबाबा ने अब ध्यान करवाया था ।
!! ध्यान !!
सुन्दर श्रीवृन्दावन है …ऋतु शरद है …इस शरद कालीन रात्रि में शीतल हवा चल पड़ी है ।
नाना मल्लिका आदि पुष्प खिले हैं …उनका सुगन्ध-सौरभ चारों ओर फैल चुका है । शान्त यमुना में पूर्ण चन्द्रमा की परिछाई से शोभा और बढ़ गयी है ।
सुन्दर रास मण्डल बना है ….मणिमाणिक्य का मंडप है …चारों ओर सखियाँ हैं …उन सखियों का सौंदर्य देव स्त्रियों को भी मोहित करने वाला है । कुछ सखियाँ मण्डप में आगयी हैं ….वो आनंदित हैं ….उनको मंडप में खड़ा देख श्रीजी प्रसन्न हो जाती हैं और उनको नृत्य करने के लिए प्रेरित करती हैं । वो सब शरमाती हुयी नाचती हैं ….नृत्य अच्छा दिखाती हैं । कुछ देर के बाद वो प्रणाम करती हुयी मंडप से उतर जाती हैं । अब तो युगलवर दोनों मंडप पर उतर आते हैं ….ये देखकर सखियाँ करतल ध्वनि करती हैं …और हर्षोन्माद से भर जाती हैं …सखियाँ ही नही पूरा श्रीवन हर्षित हो उठता है । पर श्रीजी रास मंडप में श्याम सुन्दर को पहले नृत्य दिखाने के लिए कहती हैं तो श्याम सुन्दर और प्रसन्न होते ही हैं …विचित्र हैं ये श्याम सुन्दर भी श्रीजी को प्रणाम करते हुए नृत्य प्रारम्भ करते हैं …ताल , बंधान , उरपि द्वारा वो श्रीजी को ये संकेत करते हैं कि “मेरा सर्वस्व आप ही हो” । ये भावुक पल थे …ये नृत्य द्वारा संकेत करने पर श्रीजी अपने प्रीतम पर रीझ उठती हैं …और वो भी नृत्य करने लगती हैं ….सखियों के आनन्द का ठिकाना नही है ।
इस रास विलास की झाँकी का वर्णन हित सखी अपनी सखियों के सामने कर रही हैं ।
अरी सखियों ! देखो देखो ! आज इस सुन्दर वन श्रीवृन्दावन में रसिक युगल कैसे रास कर रहे हैं …ये दोनों इस रस राज्य के राजा रानी हैं और इनमें रस ही रस है , ये रस बरसाते हैं देखो ना ! कैसा रसमय नृत्य इनके द्वारा हो रहा है । हित सखी कहती हैं ।
देखो तो ! कैसे एक दूसरे के स्कन्ध पर भुज दंड रखकर खड़े हो रहे हैं ।
अब देखो ! ये भी नृत्य की विधा है …
जिसमें दोनों कपोल से कपोल मिलाकर अब नृत्य करने लगे हैं ।
हित सखी कहती है – देखो तो ….इस समय प्रिया जी श्याम सुन्दर की ओर झुकी हुयी हैं …जिसके कारण उनकी लटें श्याम सुन्दर के मुख चन्द्र पर पड़ रही हैं । कैसी लग रही है ये झाँकी सखी ? हित सखी के पूछने पर सब कहती है इसका वर्णन तो आप ही कर सकती हो।
हित सखी आनंदित होकर कहती है……..
इस झाँकी का वर्णन तो क्या करें ….प्रिया जी की लटें ऐसी लग रही हैं जैसे ये भ्रमर हैं ….हंसते हुए कुछ रुक कर कहती है हित सखी कि …लोभी भ्रमर नील कमल के ऊपर मंडरा रहा है …मंडराते मंडराते रस को पी रहा है …और अब पीकर थक गया है , अब उड़ने की भी हिम्मत उसमें नही हैं । ये अद्भुत शोभा है ….देखो सखी ! हित सखी का वर्णन सुनकर सब सखियाँ आनंदित हो गयी हैं । सखियाँ ही नही पूरा ब्रह्माण्ड रसमय हो उठा है ….ये रस परम गोप्य है ….इसका तो कोई कृपापात्र ही पान कर सकता है ….अन्यथा ये योगियों को भी दुर्लभ रस है । यहाँ तक पहुँचना सबके लिए अगम्य है …..कृपा , कृपा से ही ये प्राप्त होता है ।
तभी हजारों सखियाँ भी उस रास मंडप में चढ़ गयीं …और युगलवर की परिक्रमा करते हुए थिरकने लगीं …उस समय चन्द्रमा पूर्ण था और उस पूर्ण चन्द्र ने अपना प्रकाश भी बढ़ा दिया था ।
पागलबाबा आनंदित हैं ….वो रस सिक्त हैं इस समय ।
गौरांगी फिर इसी पद का गायन करती है ।
“आजु सखी ! वन में जु बने प्रभु , नाँचत हैं बृज मंडन”
शेष चर्चा कल –


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