!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 14 – “नगर की वो दिव्य भूमि” )
गतांक से आगे –
यत्रान्तर्नगरं यावककुसुम्भरससरसविमलहिंगुलसिन्दूरलेशतेशलपिच्छलकुमकुमपंकाअंगरागवतीव प्रकटपरमानुरागवतीव, वसुमती भाती शोणितमणिमयी ।।
अर्थ – प्रेम नगर की भूमि लाल रंग की है , मणियों से जटित है , यावक ( महावर ) के रस से सरस और स्वच्छ हिंगुल तथा सिन्दूर के अंश से सुन्दर एवं घने कुमकुम के कीच के से निर्मित अंगराग के समान तथा परम अनुरागवती के सदृश ही है ।
अजी ! आनंदित हो जाओ ….नाचो , गाओ ….इससे बाद सौभाग्य और क्या होगा कि आपके पाँव आखिर पड़ ही गए इस प्रेमनगर की पावन से भी पावन भूमि में । क्या सुन्दर भूमि है …थोड़ा निहारो , देखो, आहा ! बड़े बड़े योगियों को इस भूमि के दर्शन दुर्लभ हैं …बड़े बड़े ज्ञानियों के लिए ये भूमि अगम्य है । वहाँ तुम पहुँचे हो । ये विहार स्थली है तुम्हारे प्रिया प्रियतम की …ना , ये तीर्थ नही है …तीर्थ तो बहुत छोटी वस्तु है …पाप पुण्य का हिसाब किताब करने वालों के लिए है तीर्थ …ये तो पाप पुण्य से ऊँची वस्तु है ..अरे मुक्ति से भी ऊँची चीज़ है ये ….इसे साधारण मत समझो । मुक्ति इस भूमि में लोटकर मुक्त होती है ।
“मुक्ति कहे गोपाल सौं , मेरी मुक्ति बताय ,
बृज रज उड़ मस्तक लगे , मुक्ति मुक्त ह्वै जाय “ ।।
अब बताओ – ये भूमि साधारण है ! अजी ! दिव्य भूमि है ….परब्रह्म का सरलीकरण करने की ताकत रखती है ये भूमि ।
देखो ! इस भूमि को देखो । कैसी है प्रेम नगर की भूमि ?
“लाल है”
अनुराग से पुती हुई है ….ये नगर है मेरे प्रीतम का….इस गली में मेरा यार घूमता है ….उसके अनुराग से रंजित है ….इसलिए लाल है । लगता है चूम लूँ ….लगता है इस भूमि में लोट जाऊँ ! आहा ! इससे पवित्रतम और क्या होगा ? कितना आनन्द है यहाँ ।
उस बाबरे अक्रूर को तो देखो …जब वो मथुरा से श्रीवृन्दावन की ओर चला तो उसे श्रीकृष्ण के पद चिन्ह दिखाई दिए …बस फिर क्या था …हाथों से रथ की लगाम छूट गयी ….वो कूद पड़ा …और इस चिन्मय श्रीधाम की भूमि को चूमने लगा …उसमें लोटने लगा ….पूरे देह में बृज रज लगा लिया …आहा ! यार के गली की धूल …उसमें बड़ी मादकता है ….कभी चखी है ? चखो …क्या रस है ….मेरा महबूब यहाँ चलता है ….मेरे प्रीतम के पद रज के कण इसमें मिले हैं ….क्या ये बड़ी बात नही है !
महावर ( जावक ) जैसा भी लगता है ……
लगेगा ही ….क्यों की इस प्रेम नगर का राजा मधुरमेचक ( श्याम सुन्दर ) अभी अभी अपनी प्रिया के पाँव में महावर लगाकर आया है …..वो भी साथ में हैं ….चल रहे हैं ……
उन दिनों पागलबाबा को मैंने साप्ताहिक अनुष्ठान भागवत सुनाई थी ….केवल वो थे और मैं था । जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में उन्हें भागवत सुननी थी …और कोई व्याख्या नही …केवल मूल भागवत ….और उसका शब्दार्थ बस । बड़ा आनंद आया गौरांगी को भी बाद में सम्मिलित कर लिया गया और दो दिन बाद शाश्वत को भी । श्रोता तीन थे …..बड़ी आनन्दमयी कथा हुई थी ….बाबा ने अपना संकल्प नही बुलवाया ….यजमान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को रखा ….कन्हैया मेरी उस कथा के यजमान थे । बाबा उनके प्रतिनिधि के रूप में बैठे थे ।
प्रसंग चला यही कि – अक्रूर जी ने श्रीधाम वृन्दावन की भूमि में प्रवेश करते ही चारों ओर भगवान श्रीकृष्ण के चरण चिन्ह देखे ….तो गौरांगी ने सहज प्रश्न किया ….चरण चिन्ह मिटे नहीं ? हवा आदि से …वो मिट जाते हैं ….मेरे पागलबाबा ने उत्तर दिया …यही तो विशेषता है भगवान की कि उनके चरण जहां पड़ते हैं वो कभी नही मिटते ….आज भी कई महापुरुषों को दर्शन होते हैं बृज में ठाकुर जी के चरण चिन्ह के । यहीं मदन टेर में मुझे दर्शन हुए हैं ….बाबा बोले ..श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के एक महापुरुष हुए श्रीप्रिया शरण बाबा जी ….उनको बरसाने में महावर से युक्त प्रिया जी के चरण चिन्ह के दर्शन हुए …..उन्होंने आगे बढ़कर देखा तो लाल ही लाल उसमें से सिन्दूर की सुगन्ध आ रही थी । ये प्रत्यक्ष बात है । अस्तु ।
“प्रेम पत्तनम्“ काव्य में लिखा है ….कि प्रेम नगर की भूमि लाल रंग के मणियों से जटित है ।
ये प्रत्यक्ष है ।
हमारे बृज में एक कांमा ( काम वन )। नामकी जगह है …जिसे हमारे पुराने बृजवासी लोग “आदि श्रीवृन्दावन” भी कहते हैं ….वहाँ मैंने एक महात्मा के दर्शन किए ….उन्होंने मुझे दिखायी चार लाल मणि ….मैं उन दिन चौरासी कोस की परिक्रमा में था ….रात्रि का समय …मैं था और मेरे साथ एक नया नवेला बाबा जी था …विमल कुण्ड के पास हम लोग रुके थे ..वहीं पड़ाव था यात्रा का ।
हम दोनों का नियम था कि सवा लाख नाम जप नित्य करना ही है । तो रात्रि के समय कर रहे थे ।
उस समय करीब एक या दो बज रहे होंगे …एक महात्मा आये …जटाएँ बड़ी बड़ी थीं …काला देह था ..देह में निम्बार्की तिलक द्वादश लगा रखा था …दिव्य मूर्ति थे ।
मैं युगल मन्त्र का जाप कर रहा था ….मन ही मन जाप था मेरा …तो उन्होंने मेरी ओर देखा ….वो हंसे ….बैठे रहे ….मैंने उन्हें प्रणाम किया ….तो वो बोले …ये विमल कुण्ड है …विरजा सखी हैं ना यमुना जी …..ये विमल कुण्ड यमुना जी का रूप हैं । मैं सुनता रहा ….वो बोले …ये दिव्य हैं …मणियों से खचित हैं इनकी सीढ़ी ….इनके घाट माणिक्य के बने हैं । लाल लाल मणि से श्रीधाम की भूमि निर्मित है ….इस बृज भूमि को साधारण मत समझो ।
आपने देखा है ? मेरे साथ में जो था , उस बाबा ने बीच में ही पूछ लिया ।
मैंने उसे डाँटा ….तो बाबा बोले ….हाँ , मैंने देखा है ….चलो मेरे साथ ….अब वो मेरे साथ वाला बाबा डरने लगा बोला …मत चलो …मैंने कहा …इनकी कितनी प्रेम पूर्ण ऊर्जा है …तुम्हें अनुभव में नही आरही क्या ? हम गये उनकी छोटी सी कुटिया थी …फूस की …ये भी इन्होंने नही बनाई थी …गाँव के बृजवासियों ने ही बनाकर दी थी ….हम वहीं गए ..बैठे । उन्होंने कहना आरम्भ किया …ये बृजधाम चिन्मय है …जड़ नही है ….इससे जो माँगो तुम्हें मिलेगा । झिलमिल करते मणियों के द्वारा निर्मित यहाँ की भूमि है …लाल है …मणि भी यहाँ के नही …मुझे उस दिन दर्शन हुए थे …एक क्षण के लिए सब कुछ मानौं ठहर सा गया था । वो बाबा ये कहते हुए शून्य में तांकने लगे थे …….फिर कुछ देर बाद उन्हें जागृति हुयी तो भीतर से वो चार मणि लेकर आए …उन्होंने दिखाया । लाल थे वो मणि । अलग ही चमक थी उसकी । अविश्वास करने का कोई प्रश्न नही था क्यों की पूर्व में बहुत कुछ देखा जा चुका था ….”चिन्मय बृजमण्डल स्वरूप” का अनुभव हमें भी हो गया था …इसलिये हमने उन्हें प्रणाम किया और वहाँ से निकल गये ।
लाल रंग की भूमि है इस प्रेम नगर की ….इस भूमि में पाँव रखने में भी डर लगता है …क्यों प्रीतम जहां चलें हैं वहाँ हम पाँव कैसे रखें ? ओह ये तो अपराध होगा ।
अब उस दीवाने भरत लाल जी को तो देखिये …..चल पड़े हैं नंगे पाँव ….राजपरिवार रथ आदि में हैं …किन्तु भरत नंगे पाँव । किसी ने कौशल्या जी को कह दिया …भरत तो नंगे पाँव चल रहे हैं …और उनके पाँवों से रक्त बह रहा है ….कंटक से गढ़े हैं पाँव । ये सुनते ही माता कौशल्या रथ से नीचे कूदीं और दौड़ीं ……भरत ने देखा माता मेरी ओर आरही हैं …वो माता के पास आये हाथ जोड़कर बोले …क्या हुआ माता ? आप क्यों इस तरह भाग रही हैं ? भरत ! मत दे अपने देह को इतना कष्ट ! मत दे भैया ! रो पड़ीं …तैने जल भी नही पीया है …और नंगे पाँव ! तू रथ में चल ….नही तो पनही पहन ले । कौशल्या माता जी बहुत बोलीं ….किन्तु भरत ! नेत्रों से अश्रु बह चले …माता ! मेरी आपको इतनी चिन्ता है …तो विचार करो …इस भरत के कारण कोमल से भी कोमल मेरे भैया श्रीरामभद्र की क्या स्थिति होगी ! माता ! भरत को रथ में ? स्वामी नंगे चरण चल रहा है और सेवक रथ में ? माता ! भरत हिलकियों से रो पड़े ….मुझे तो अपने इन पाँवों से चलने में भी अपराध अनुभव हो रहा है …मैं पाप कर रहा हूँ कि जहां मेरे स्वामी के चरण पड़े हैं वहाँ मेरे ये पाँव ….अरे माता ! मेरा वश चले तो मैं सिर के बल चलूँ ! मुझे सिर के बल ही चलना चाहिये । ये है भरत का प्रेम ।।
लाल है प्रेम नगर की भूमि …महावर की तरह चटक लाल है ..लाल मणियों से निर्मित है …सर्वत्र लाल ही लाल है ….देखकर दंग रह जाओगे इस भूमि को …आओ प्रणाम करें इस प्रेम नगर की भूमि को …और आगे बढ़े ।
शेष अब कल –
