महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (008) : Niru Ashra

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महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (008)


(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )

रास की भूमिका एवं रास का संकल्प -भगवानपि०-

रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति ।

अरे! तुमको रस चाहिए कि नहीं! आनन्द चाहिए कि नहीं? सोता रस चाहिए कि जागता रस? शान्ति की उपाधि से जो रस मिलता है वह सोत रस है और भक्ति की उपाधि से प्रीति की उपाधि से जो रस मिलता है वह जागता रस है। और परमात्मा कौन है? बोले सोते में भी रस वही है जागते में भी वही रस है। जिन लोगों ने सोते का ही नाम परमार्थ रख लिया वे परमात्मा को जानते थोड़े ही हैं। उनकी जान-पहचान नहीं है ईश्वर से! शान्ति हो चित्त में तब तो परमात्मा और विक्षेप हो तब कौन? सपाधि लग जाय तब तो परमात्मा और काम करें तब कौन?

अरे! परमात्मा तो नाच रहा है। स्फुरणात्मक, विमर्शात्मक, विस्फुरणात्मक लालसात्मक, क्रियात्मक और द्रव्यात्मक- छह रूपों में परमात्मा प्रकट हुआ। स्वयं प्रकाश रूप एक और स्फूरणरूप द्वितीय, स्पर्श रूप तृतीय और इच्छारूप चतुर्थ और क्रियारूप पञ्चम और द्रव्यरूप षष्ठ, इन रूपों में परमात्मा प्रकट हो रहा है, द्रव्य परमात्मा है, सब क्रिया परमात्मा है, सब इच्छा परमात्मा है, सब विमर्श परमात्मा है, सब स्फुरण परमात्मा है। यह देखो, यह रासलीला क्या है? यह वही स्वयं प्रकाश है-

अंगनामंगनामन्तरे माधवो, माधवं माधवं चान्तरेणांगना ।

गोपी है कृष्ण हैं, गोपी है कृष्ण हैं, फिर गोपी है कृष्ण हैं। शिर कभी किधर झुकाते हैं कभी किधर झुकाते हैं। कभी दाहिनी तरफ मुकुट झुक जाता है तो कभी बायीं तरफ। दायें स्थित जो राधा रानी हैं- उनको देखने के लिए शिर दाहिनी तरफ झुका लेते हैं और उनके ऊपर छाया करने के लिए बायें झुकते हैं।

पर दोनों में एक बात समान होती है। जो नकबेसर या बुलाक है, जो नाक में पहनी जाती है, वह दोनों ही हालत में अधरों से, नासिका से सीधे लटकती है, दाहिने घूमो तो भी और बायें घूमो तो भी, दोनों में ही बुलाक है, उसको बीच में से हटाकर गोपियों को हाथ से बुलाते हैं। नृत्य आकर्षण है। हट जाओ, आ जाओ। यह नहीं-नहीं जो है न, वह नखरे के अंतर्गत है, हाव है। अवहित्था, मोटाई इसके बहुत सारे भेद होते हैं। यह तो आपको भाव-शास्त्र बताना पड़ेगा। यह श्रीकृष्ण की लीला है। आप सूक्षमता से देखोगे तो आपका मन कृष्ण में चला जाएगा।

बिहारी ने एक दोहा लिखा है-

अजहुँ तन्यो नाही रह्यो श्रुति सेवत एक अंग ।
नाक वास बेसर लह्यो रहि मुकुतन के संग ।।

अजहुँ तन्यो नाही रह्यो- अभी तक तुम तरे नहीं हो! अरो ओ! कान के आभूषण! क्यों ? बोले- श्रुति सेवत एक अंग। तुम केवल अक अंग का, कान का ही सेवन करते हो, इसलिए तर्यो नहीं, रह गये। ‘अजहुँ तन्यो नाही’- अरे ओ मनुष्य! अभी तक तू तरा नहीं, यहीं रह गया? क्यों? कहा- तुम श्रुति के, वेद के एक अंग का सेवन करते हो, इसलिए। ‘श्रुति सेवत एक अंग।’ ख़ाली कर्मकाण्ड में लग गये कि, ख़ाली वेदान्त में लग गये, कि उपासना में लग गये। बोले – नाकवास बेसर लहयो, देखो! वेसर को नाकवास मिल गया, स्वर्ग मिल गया। नाक माने स्वर्ग होता है संस्कृत मं। कैसे – मिल गया बेसर को स्वर्ग? तो कहा कि वह तो बे- सर है; उसने अपना सिर कटा दिया है। वह कैसे? कि रहि मुकुतन के संग- मोतियों के साथ रहकर। अथवा ‘रहि मुकुतनके संग’- मुक्त पुरुषों का सत्संग करके वह बेसिर होकर स्वर्ग- बास कर रहा है।
बिहारी के दोहों के बारे में है कि-

सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर ।
देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर ।।

तो सिर झुकाने का एक अर्थ हुआ कि देवि गोपी! तुम्हारे सामने अभिमान नहीं करते, शिर झुकाकर बैठे हैं। प्रेम को बुलाने के लिए छोटा बन जाना पड़ता है।

बिना अभिमान छोड़े कोई प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम का स्वभाव क्या है? रस है ही द्रव पदार्थ। हृदय की द्रवता ही प्रेम है। तो कहा- गीली चीज कहाँ जाती है? नीचे की ओर जाती है। जिनकी तरफ शिर तान दें उनकी तरफ प्रेम नहीं हो पायेगा। श्रद्धा की जा सकती है, पूजा की जा सकती है, हाथ जोड़ सकते हैं, लेकिन शिर तानकर कोई खड़ा हो तो उससे प्रेम नहीं किया जा सकता। प्रेम तो तब आता है जब शिर जरा झुकता है। प्रेम-रस का स्वभाव है; निरभिमान की ओर जाना। प्रेम का स्वभाव अभिमानी के आश्रित होना नहीं है। तो कृष्ण को देखो न !

राधाचरणविलोडितरुचिरशिखण्डं हरिं वन्दे ।

श्रीकृष्ण का जो मयूर-पिच्छ है वह राधा रानी के पैर छू जाता है मगर गोपियाँ समझती हैं कि वह नाच रहा है। अब वह मयूर-नृत्य किया कि महाराज। राधारानी भी मयूर की तरह नृत्य करती हैं और कृष्ण भी मयूर की तरह नृत्य करते हैं। मयूर-मयूरी का जैसा नृत्य होता है वैसा। आपलोग कभी व्रज गये हों तो बरसाने में ‘मयूर कुटी’ देखी होगी। बरसाने में एक मयूर कुटी है तो वहाँ दोनों मयूर के रूप में एक मोर और एक मोरनी के रूप में दोनों नाच रहे हैं। प्रेम में शिर झुकाना पड़ता है।

यह रास क्या है? अभिमान का जो पत्थर है, अभिमान की जो कठोरता है वह जब तक गल नहीं जाएगी। तब तक द्रवता- रूप रस की उत्पत्ति कैसे होगी? इसीलिए इसको रास बोलते हैं। अच्छा, बिना अभिमान छूटे समाधि लगेगी? असंप्रज्ञात समाधि- द्रष्टा का स्वरूप में अवस्थान, अभिमान टूटे बिना लगेगा? अभिमान टूटे बिना सद् वस्तु की प्राप्ति हो सकती है? अच्छा तो अभिमान टूटे बिना द्रष्टा साक्षी अपने को चेतनस्वरूप ब्रह्म अनुभव कर सकते हैं? अभिमान टूटे बिना रसरूप, प्रेम की प्राप्ति हो सकती है? चीज तो वही है, रस है। इसी को द्रवावस्था कहते हैं।

क्रमशः …….

🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹

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