!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 144 !!
श्रीराधारानी द्वारा द्रोपदी को “प्रेमतत्व” की शिक्षा
भाग 3
🌹🙏🌹🙏🌹
कौन सी आफ़त आगयी थी……..जो अपनें प्रेमास्पद को इतना कष्ट दिया तुमनें……….श्रीराधारानी भाव में बोल रही थीं ।
क्या होता ? ये शरीर ही तो नग्न होता………फिर क्या फ़र्क पड़ता है ………..ये शरीर तो एक दिन राख बनेगा …..या फेंक देंगें तो कुत्ते खा जायेगें………ऐसे शरीर के लिये तुमनें कष्ट दिया अपनें प्रियतम को ? श्रीराधारानी बोलीं ………हे द्रोपदी ! ये प्रेम है ….ये प्रेम का मार्ग है ………….प्रेम इतना सरल नही है ………..प्राणों की बलि देकर भी प्रेम अगर मिलता है द्रोपदी ! तो सस्ता है ……..ले लो प्रेम ।
पर सच्चे प्रेम में स्वसुख की किंचित् भी वाँछा नही होती …….सच्चा प्रेम तो प्रियतम का सुख देखता है ………बचाओ ! बचाओ ! ये सच्चे प्रेमी की पुकार नही है……..सच्चा प्रेमी तो कोई कष्ट भी दे तो मुस्कुराता है…….और प्रियतम से कहता है ………कोई बात नही ……मुझे कुछ नही हो रहा ……आप चिन्ता मत करो मेरी ……मैं ठीक हूँ …….पर प्यारे ! आप तो ठीक हो ना ?
श्रीराधारानी द्रोपदी को प्रेम तत्व की दीक्षा दे रही हैं आज ।
हे द्रोपदी ! ये प्रेम तत्व सबसे बड़ा तत्व है ………….इसके पथ टेढ़े मेढे हैं …………इसलिये बहुत सम्भल कर चलनें की जरूरत है ……..
प्रेमी के जीवन का “अथः” और “इति” ये मात्र आत्मबलिदान में ही है ……..प्राणों का मोह सबको होता है ………पर प्रेमी इस व्यापक नियम के अपवाद में आगया ……….प्रेमी को किसी का मोह नही होता ……अपनें प्राणों का मोह तो होता ही नही है ……..अगर है ……तो अभी पूर्ण प्रेमी वो है नही ।
हँसी श्रीराधारानी …………हे द्रोपदी ! ये सिर जब तक धड़ में है …..तब तक प्रेम , सच्चा प्रेम प्रकट कैसे होगा ………..इस सिर को प्रियतम के चरणों में चढ़ा दो …………यानि “मैं” को चढ़ा दो ।
इसलिये तो सच्चा शूर वीर प्रेमी को ही कहा गया है ………..जिसे अपनें प्राणों का भी मोह नही है ……..वह कितना ऊंचा और सच्चा पराक्रमी होगा ………..विचार करो द्रोपदी !
अपनें अहंकार की होली जलाकर जो निकल पड़ा है प्रेम के रस्ते ……….क्या उससे बड़ा कोई वीर इस दुनिया में है ?
हे द्रोपदी ! थोड़े में ही घबडा जाना ………ये प्रेमी के लक्षण हो ही नही सकते ………..हमें देखो ! श्रीराधारानी नें द्रोपदी को कहा …….हमें देखो द्रोपदी ! सौ वर्ष के बाद मिले हैं ……….पर कोई शिकायत नही है …….क्यों हो शिकायत ? क्या वे प्रसन्न रहें हम नही चाहते ?
अगर चाहते हैं ……तो उनकी राजी में ही हम राजी क्यों नही ?
द्रोपदी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे ………..द्रोपदी मात्र श्रीराधारानी के चरणों को ही देख रही थीं……….उनके हृदय में गुरुभाव की जागृति हुयी श्रीराधारानी के प्रति…….प्रेम को तत्वतः समझा दिया था श्रीराधा नें……अहोभाव से भर गयीं द्रोपदी ………और अत्यन्त भावुक हो श्रीराधारानी की वन्दना करनें लगी थीं ।
पर वन्दना करते हुए ……..उन्हें कुछ विशेष दर्शन हुए थे ।
श्रीराधा के दाहिनें स्कन्ध से श्याम सुन्दर प्रकट हो गए ……….
इस दृश्य को देखकर आनन्दित हो उठीं द्रोपदी ।
“आपही सर्वेश्वरी हो ……हे राधिके ! आप के गुन गन को गाना कोई साधारण बात तो है नही ……..आप ब्रह्म की आल्हादिनी, हम साधारण विषयी जीवों को प्रेमतत्व की शिक्षा देनें के लिये ही आप का आविर्भाव होता है………आप दो नही हैं ……..जो श्रीराधा और श्याम सुन्दर को दो मानते हैं ……..वो अपराध ही करते हैं ……आप दो नही …….आप एक ही हैं ……..कृष्ण ही राधा हैं और राधा ही कृष्ण हैं ।
इतना कहते हुए चरणों में वन्दन किया द्रोपदी नें ………..श्रीराधारानी के साथ अब यहाँ श्याम सुन्दर भी खड़े थे ………युगल की झाँकी का दर्शन करके द्रोपदी के आनन्द का कोई पारावार न रहा ।
शेष चरित्र कल-
☘️ राधे राधे☘️
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 38 )
गतांक से आगे –
- मंजुमेधिका जू की *
बनि रहि रसआनंद माधुरि मोदनी मदनालसा ।
चारुचूड़ा चित्रनी चतुरा सुचंदरकांतिका ॥
- सुमेधिका जू की *
चकोरी कामाकिसोरी केतकी अरु कोमला ।
कामरस कंदला सहचरि चंचला कस्तूरिका ॥
- तनमेधा जू की *
सुभरवा अरु दिव्यगंधा रत्नकलिका विस्वभा।
बिलासावलि अरु अनंदा सुरंगांगा गौरिका ।।
- गुणचूड़ा जू की *
केलिकौमुदि कर्निका अलबेलि सोभविचित्रका ।
कामकंदर्पा सुखंजा सुष्टिका विजयंतिका ॥
- वरांगदा जू की *
किसोरि धन्यसुमाग सोभाजयति आनंदसिंधुका।
चित्रमुख्या मुक्तमाला लहरि मालार्कविंदुका ॥
- मधुस्यंदा जू की *
ललितआननि टहलतत्परि मारमोहनि संकरी ।
सौबीरि चंद्रजु सालिसेव्या सर्बतोषनि सहचरी ॥
- मधुरा जू की *
सानुकूला सरदससिका स्वस्तिदा सरदोत्सुखा ।
रसपरज्ञा नवकिसोरी नित्यसिद्धा ससिमुखा ॥
- मधुरेक्षना जू की *
प्रनयप्रचुरा परमप्रवरा प्रिया प्रीतिप्रदायिका ।
चारु-वक्षा चारु-दक्षा चारु-ईक्षा अंमृता ॥
उस महल में उपस्थित सखी श्रीतुंगविद्या जी ने वीणा वादन आरम्भ किया था …उनके साथ उनकी अष्ट सखियाँ भी थीं उन सबने भी वीणा ले ली थी ….सब बैठी हैं …अपना दाहिना पाँव बायें जंघा पर रखकर , वीणा सबने पकड़ी थी …और एक साथ नौ वीणाएँ बज उठीं थीं …अद्भुत लग रहा था …पूरा निकुँज झंकृत हो उठा था ….उन सब सखियों की बड़ी बड़ी और पतली उँगलियाँ वीणा के तारों में मानौं नृत्य कर रहीं थीं । अवर्णनीय था ये सब तो । मैं स्वयं झूम रहा था ….संगीत की वो स्वर लहरी ! शायद भगवती शारदा भी सुनतीं तो वो भी इन सखियों के पाद पद्म को पाना चाहतीं …किन्तु यहाँ कहाँ उनका प्रवेश ! दिव्य संगीत , दिव्य स्वर लहरी , दिव्य राग रागिनी ….मानों राग रागिनी साक्षात यही लग रही थीं । मैं वीणा को सुन रहा था ….श्रीतुंगविद्या जी की उन पवित्र उँगलियों को भी देख रहा था ….वो नेत्र बन्दकरके वीणा बजा रहीं थीं …उनके नेत्रों के कोरों से जल विंदु झर रहे थे ।
तभी – श्रीतुंगविद्या जी की प्रथम जो सखी थीं ….”मंजुमेधिका”जी । ये भी वीणा बजा रहीं थीं ….इनके पीछे उन्मद होती हुईं ….इनकी अष्ट सखियाँ और आगयीं किन्तु ये सब मधुर मधुर मंजीरा बजा रहीं हैं….इनके नाम मुझे हरिप्रिया जी ने ही बताये …..रसानन्दा जी , माधुरी जी , मोदिनी जी , मदनालसा जी , चारु चूड़ा जी , चित्रिनी जी , चतुरा जी और चन्द्रकान्ता जी ।
ये सब मंजीरा बजाती हुई अपनी सखी जी के पीछे खड़ी हो गयीं थीं ।
श्रीतुंगविद्या जी की दूसरी सखी ….सुमेधिका जी । वीणा बजाने में ये भी तन्मय थीं ….तभी इनके पीछे मृदंग लेकर इनकी अष्ट सखियाँ आगयीं ….मृदंग की थाप की ध्वनि गम्भीर और विलक्षण लग रही थी ….इनके नाम भी मुझे हरिप्रिया जी ने ही बताये थे ….चकोरी जी , कामा किशोरी जी , केतकी जी , कोमला जी , काम रसा जी , कंदला जी , चंचला जी और कस्तुरिका जी । ये सब मृदंग में पारंगत थीं । ये सब क्यों बजा रहीं हैं ? हरिप्रिया जी ने मुस्कुराते हुए कहा …उत्थापन में जब युगल जागेंगे तब ये सब संगीत से उनकी सेवा करेंगी ।
तभी स्वर बदल गया था …राग बसन्त चल पड़ा था …श्रीतुंगविद्या जी ने राग बसन्त छेड़ दिया था ।
तो उनकी सखियों ने भी मुस्कुराकर अपनी सखी जी को देखा और उन्हीं का अनुगमन करती हुयी राग बसन्त में तारों को झंकृत करने लगीं ।
ये तीसरी सखी हैं …..श्रीतुंगविद्या जी की तीसरी सखी …तनमेधा जी । ये पूर्ण रागमय तो थीं हीं अनुराग में भी डूबी हुयी थीं । इनके पीछे आकर खड़ी हुई ….इनकी अष्ट सखियाँ ….जिनका नाम था …..सुभरवा जी, दिव्य गंधा जी , रत्नकला जी , विश्वाभा जी , विलासा वलि जी , आनंदा जी , सुर गंगा जी और गौर मुखी जी । ये सब सखियाँ झाँझ बजा रहीं थीं ….मधुर मधुर स्वर में ।
हरिप्रिया जी ने कहा …अब श्रीतुंगविद्या जी की चौथी सखी जी का दर्शन करो …चौथी सखी हैं …..”गुण चूड़ा” जी । ये बसंत राग में लीन हो गयीं थीं वीणा बजाते हुए …तभी …इनकी अष्ट सखियाँ खिलखिलाती इनके पास, इनके पीछे आ कर खड़ी हो गयीं थीं । इनके नाम हैं …..केलिकौमुदी जी , कर्णकांतिका जी , अलबेलि केलि जी , विचित्र शोभा जी , कंदर्प कामा जी , खंजनाक्षी जी , सुष्ट सुन्दरी जी और वैजयन्तिका जी । ये सब तमुरा लेकर स्वर दे रहीं थीं ।
अब पाँचवी सखी थीं …श्रीतुंगविद्या जी की पाँचवी सखी , जो पूरे मनोयोग से वीणा वादन कर रहीं थीं ….इनका नाम था ….”वरांगदा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ ….जो करतल से ताल देती हुयी इनके पीछे खड़ी होकर झूमने लगीं थीं …..इनके नाम हैं …हरिप्रिया जी ने बताये …..किशोरी सुन्दरी जी , धन्यभागा जी , जयति शोभना जी , आनन्द सिन्धु जी , चित्र मुखी जी , मुक्तमाला जी , माला लहरी जी और अर्क विंदा जी । मैंने इन सबके दर्शन किए ….इनके दर्शन से वासना दूर होती है और नाम लेने से प्रेम हृदय में प्रकट होता है । ये मेरा अनुभव था ।
ये छठी सखी हैं …श्रीतुंगविद्या जी की …छठी सखी …”मधुस्पंदा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ …..ललिता नना जी , टहल तत्परा जी , मार मोहिनी जी , संकरा भरनी जी , सौविरा जी , चन्द्रा जी , सालिसेव्या जी और सर्व तोषनी जी ।
सातवीं सखी जी ….श्रीतुंगविद्या जी की सातवीं सखी ….”मधुरा” जी । इनकी अष्ट सखियाँ हैं ….सानुकुला जी , शरद शशिका जी , स्वस्तिदा जी , शरदोत्सुका जी , रस प्रज्ञा जी , नव किशोरी जी , नित्य सिद्धा जी और शशिमुखी जी ।
इसके बाद मेरी दृष्टि गयी श्रीतुंगविद्या जी की आठवीं सखी पर, इनका नाम था …”मधुरेक्षणा” जी । इनकी अष्ट सखियाँ नृत्य कर रहीं थीं …..मैंने दर्शन किए सब एक वय की थीं लताओं की तरह झूमती झूलती सी । इनके नाम सुनो …हरिप्रिया जी ने कहा ….प्रणय प्रचुरा जी , परमावलि जी , प्रवरा जी , प्रिया प्रीति जी , प्रदायका जी , चारु वक्षा जी , चारु दीक्षा जी चारु इच्छा जी और अमृता जी । ये सब उन्मत्त नृत्य कर रहीं थीं …बासंती रागरंग मय वातावरण हो गया था चारों ओर ….मैंने सबको अवनी में मस्तक रखकर प्रणाम किया था ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (121)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-2
सरोवर में सारस हंस और वृक्ष पर विहंग बैठे हैं, श्रीकृष्ण को एकटक देख रहे हैं, मानो उनकी आराधना कर रहे हैं। मोर नाच रहा है, कोयल कुहुक-कुहुक कर रही हैं। गोपी कहती है- जिसको पशु-पक्षी भी इतने प्रेम से देख रहे हैं, उसको हम मानवीय न देखें, यह कैसे सम्भव है! अरे, हम तो मानती नहीं- मानवीय तो चीन-जापान में भी होंगे; मानवीय तो यूरोप-अमेरिका में भी होंगे, हम मानवीय नहीं भारतीय है और बाबा, भारतीय नहीं व्रजवासी, और व्रजवासिनी नहीं, वृन्दावन की ग्वालिनी- हम कृष्ण को ना देखें यह कैसे सम्भव है। तो हमने तुमको देखा और क्या देखा? अलकावृतमुखं तव कुण्डलश्रीगण्डस्थलाधरसुधं-
‘अलकावृतमुखं’ काले-काले घुँघराले बाल मुखारविन्द पर लटक जाते हैं, इसलिए मुख का साँवरापन है वह कम हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जो रंग है, वह नीलोज्ज्वल है- ऊपर से देखने में नीला है, परंतु भीतर से उज्ज्वल कान्ति निकलती है, जैसे हीरे में चिलक निकलती है वैसी। इसलिए श्रीकृष्ण का एक नाम है, नीलोज्ज्वल-मणि। उनके काले-काले घुँघराले बाल हैं और उनके शरीर में ऐसी दिव्यगन्ध है कि भौंरे उनके पीछे-पीछे दौड़ते हैं; सारूप्य को प्राप्त भ्रमर और सारूप्य को प्राप्त बाल, ऊपर नहीं रहना चाहते। वारम्बार श्रीकृष्ण उनको ऊपर करते हैं कि चलो-चलो, तुम सिर पर रहो पर वे कहते हैं कि नहीं-नहीं; हम तो तुम्हारा कपोल छुएँगे इसलिए नीचे गिर पड़ते हैं। मानो बालों को भी यह लोभ है कि हम श्रीकृष्ण के कपोल का स्पर्श करें, उन्हें सालोक्य नहीं चाहिए सेवा चाहिए।
‘तव कुण्डलश्रीगण्डस्थलं’ कैसा है तुम्हारा मुखारविन्द? बोले- कुण्डल में आकर ‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी बैठ गयीं। साङ्ख्य और योग दोनों का बहिष्कार कर दिया। जब समुद्र-मन्थन हुआ तो उसमें से लक्ष्मीजी निकलीं, तो उन्होंने कहा कि हमको एक वाहन भी चाहिए।+
आपको मालूम होगा कि लक्ष्मीजी कई तरह से चलती हैं- लक्ष्मीजी जब भगवान के साथ चलती हैं तब गरुड़ पर उनके साथ बैठकर चलती हैं, लेकिन जब अकेले जाती हैं तब गरुड़ पर नहीं, उल्लू पर बैठकर चलती हैं। जिसको दिन में बिल्कुल नहीं सूझता, जिसको रोशनी नहीं दिखती। लेकिन महाराज। भगवान् के पास जाना है तो उन्होंने कहा कि भगवान् तो समुद्र में रहते हैं तो वहाँ चिड़िया पर चढ़कर जाना कैसे बनेगा? इसलिए, अपने प्रियतम के पास जाने के लिए जो वाहन उन्होंने चुना वह थी एक बड़ी सुन्दर मछली। अब वह मत्स्यवाहना हो गयीं। लेकिन भगवान् के कान में पहले से योग और साङ्ख्य लगे हुए थे।
आप जितने बड़े लोग होते हैं उनका कान भरने वाले कुछ लोग जरूर होते हैं; भगवान् भी बड़े हैं, तो उनके कान में लगे एक ओर साङ्ख्य और एक ओर योग। साङ्ख्य माने विवेक और योग माने एकाग्र मन। विवेक और एकाग्रता भगवान् से सिफारिश करते हैं इस आदमी की ओर जरा आँख उठाके देखो तो, यह विवेकी है, यह एकाग्रचित्तवाला है; ये दोनों लगे। अब लक्ष्मीजी ने क्या किया कि एकाग्रता और विवेक दोनों को वहाँ से हटा दिया, और स्वयं काम की जो ध्वजा है मछली, उसका सहारा लिया, और आकर कान के पास लग गयीं और वारम्वार अपने प्रतिबिम्ब से श्रीकृष्ण के कपोल का स्पर्श करती हैं। दूसरी जगह भी भागवत में आया है- ‘मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्मया’ कनककुण्डल में जो लक्ष्मी है, शोभा है, वह भगवान् के कपोल को वारम्बर स्पर्श करती है।
अब भगवान् के कान कौन भरेगा? तो बोले कि यह काम की सूचक जो मछली है, वह भरेगी। जिसके हृदय में भगवान् के प्रति कामना होगी, मिलन की तीव्र आकाङ्क्षा होगी, उसकी ओर भगवान् देखेंगे। भक्ति में विवेक और एकाग्रता की जरूरत नहीं है। भक्ति में भगवत्-प्राप्ति की लालसा आवश्यक है। नारायण, जीव में चिकीर्षा और लिप्सा दोनों होती हैं, माने जीव करना भी चाहता है और पाना भी चाहता है और भगवान् जो हैं उनमें चिकीर्षा तो होती है, लेकिन लिप्सा नहीं होती, वे करते हैं परंतु पाना नहीं चाहते। और ब्रह्म जो होता है उसमें न चिकीर्षा होती है और न लिप्सा होती है; ब्रह्म न करता है, न करना चाहता है, वह न तो पाता है और न पाना चाहता है।++
तो भगवान ने कहा कि जीव इतना नीचे चला गया है कि चिकीर्षा और लिप्सा है और वे उसके दोनों कान पकड़कर संसार में लगाये हुए हैं, इसलिए अब हम भी वही चलेंगे तभी इसको उठा पावेंगे। कैसे कि जैसे एक आदमी कुएँ में गिर जाय, तो उसको बाहर निकालने के लिए निकालने वाले को कुएँ में घुसना पड़ता है। तो नाम-रूप के जंजाल में जीव फँस गया है, उसके लिए भगवान को नामरूप ग्रहण करना पड़ता है; भगवान को भी चिकीर्षु और लिप्सु बनकर आना पड़ता है। चोर के साथ चोर बनकर जाते हैं चोरी करने के लिए। ‘अधर सुधं’- पहले सुधा स्वर्ग में रहती थी और निकली कहाँ से? समुद्र मन्थन से। तो एक बार इसको दैत्यों ने छीन लिया, एक बार देवताओं ने छीन लिया;सुधा के लिए तो बड़ी छीनाझपटी हुई। फिर भगवान आये, मोहिनीरूप धारण करके; तब उन्होंने इसको सम्हाला।
सुधा ने कहा- मैं दैत्य के हाथ में भी नहीं रही, देवता के हाथ में भी नहीं रही। और ऋषि और मनुष्य के हाथ में भी नहीं रही; मैं तुम्हारे हाथ में रही। हमारा पाणिग्रहण-संस्कार तो केवल तुम्हारे साथ हुआ है , हम तुम्हें छोड़कर और कहीं रहेंगी नहीं। इसलिए सुधा आकर श्रीकृष्ण के मुख में, अधर में बस गयी। सामीप्य मिला कुण्डल को और सारूप्य मिला केश को और सालोक्य मिला सुधा को। भगवान के होठों में अमृत का निवास है ‘अधरसुधं’ उसी को बाँसुरी से फूँक-फूँककर सबके कानों में पहुँचाते हैं, और सबको अपनी ओर खींचते हैं। एक बात और विचित्र है; भगवान के कान में जो कुण्डल हैं वो चंचल होकर चपल होकर वारम्वार विवेकशून्य होकर भगवान के कपोलों का स्पर्श करते हैं। और बाल अपनी उच्चता छोड़कर वारम्वार नीचे उतर आते हैं कि हमको उच्चता नहीं चाहिए। यह बड़प्पन प्रेम में बहुत बाधक है, बाल सिर पर नहीं रहना चाहते, नीचे आते हैं।
प्रेम में स्थिरता, धीरता, गम्भीरता, काम नहीं देती हैं, अपनी धीरता-गम्भीरता छोड़कर कुण्डल चञ्चल हो रहे हैं। और सुधा है वह अपने बाप का घर क्षीरसागर छोड़कर, उसके कलश को छोड़कर जिसमें लेकर धन्वन्तरि निकले थे, और जिन देवता, दैत्यों ने बहुत चाहा, उनको छोड़कर और बाँटने वाली मोहिनीरूप को भी छोड़कर, वह श्रीकृष्ण के अधर में आकर बस गयी। उसने कहा कि बस, हमारे रहने की जगह तो यही है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
💙💙💙💙💙💙
श्लोक 6 . 45
💙💙💙
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संश्रुद्धकिल्बिषः |
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् || ४५ ||
भावार्थ
💙💙
और जब योगी कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है, तो अन्ततोगत्वा अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि-लाभ करके वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है |
तात्पर्य
💙💙
सदाचारी, धनवान या पवित्र कुल में उत्पन्न पुरुष योगाभ्यास के अनुकूल परिस्थिति से सचेष्ट हो जाता है | अतः वह दृढ संकल्प करके अपने अधूरे कार्य को करने में लग जाता है और इस प्रकार वह अपने को समस्त भौतिक कल्मष से शुद्ध कर लेता है | समस्त कल्मष से मुक्त होने पर उसे परम सिद्धि-कृष्णभावनामृत – प्राप्त होती है | कृष्णभावनामृत ही समस्त कल्मष से मुक्त होने की पूर्ण अवस्था है | इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (७.२८) हुई है –
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ||
“अनेक जन्मों तक पुण्यकर्म करने से जब कोई समस्त कल्मष तथा मोहमय द्वन्द्वों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तभी वह भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में लग पता है |”
Niru Ashra: 🌲🍁🌲🍁🌲🍁🌲
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 144 !!
श्रीराधारानी द्वारा द्रोपदी को “प्रेमतत्व” की शिक्षा
भाग 3
🌹🙏🌹🙏🌹
कौन सी आफ़त आगयी थी……..जो अपनें प्रेमास्पद को इतना कष्ट दिया तुमनें……….श्रीराधारानी भाव में बोल रही थीं ।
क्या होता ? ये शरीर ही तो नग्न होता………फिर क्या फ़र्क पड़ता है ………..ये शरीर तो एक दिन राख बनेगा …..या फेंक देंगें तो कुत्ते खा जायेगें………ऐसे शरीर के लिये तुमनें कष्ट दिया अपनें प्रियतम को ? श्रीराधारानी बोलीं ………हे द्रोपदी ! ये प्रेम है ….ये प्रेम का मार्ग है ………….प्रेम इतना सरल नही है ………..प्राणों की बलि देकर भी प्रेम अगर मिलता है द्रोपदी ! तो सस्ता है ……..ले लो प्रेम ।
पर सच्चे प्रेम में स्वसुख की किंचित् भी वाँछा नही होती …….सच्चा प्रेम तो प्रियतम का सुख देखता है ………बचाओ ! बचाओ ! ये सच्चे प्रेमी की पुकार नही है……..सच्चा प्रेमी तो कोई कष्ट भी दे तो मुस्कुराता है…….और प्रियतम से कहता है ………कोई बात नही ……मुझे कुछ नही हो रहा ……आप चिन्ता मत करो मेरी ……मैं ठीक हूँ …….पर प्यारे ! आप तो ठीक हो ना ?
श्रीराधारानी द्रोपदी को प्रेम तत्व की दीक्षा दे रही हैं आज ।
हे द्रोपदी ! ये प्रेम तत्व सबसे बड़ा तत्व है ………….इसके पथ टेढ़े मेढे हैं …………इसलिये बहुत सम्भल कर चलनें की जरूरत है ……..
प्रेमी के जीवन का “अथः” और “इति” ये मात्र आत्मबलिदान में ही है ……..प्राणों का मोह सबको होता है ………पर प्रेमी इस व्यापक नियम के अपवाद में आगया ……….प्रेमी को किसी का मोह नही होता ……अपनें प्राणों का मोह तो होता ही नही है ……..अगर है ……तो अभी पूर्ण प्रेमी वो है नही ।
हँसी श्रीराधारानी …………हे द्रोपदी ! ये सिर जब तक धड़ में है …..तब तक प्रेम , सच्चा प्रेम प्रकट कैसे होगा ………..इस सिर को प्रियतम के चरणों में चढ़ा दो …………यानि “मैं” को चढ़ा दो ।
इसलिये तो सच्चा शूर वीर प्रेमी को ही कहा गया है ………..जिसे अपनें प्राणों का भी मोह नही है ……..वह कितना ऊंचा और सच्चा पराक्रमी होगा ………..विचार करो द्रोपदी !
अपनें अहंकार की होली जलाकर जो निकल पड़ा है प्रेम के रस्ते ……….क्या उससे बड़ा कोई वीर इस दुनिया में है ?
हे द्रोपदी ! थोड़े में ही घबडा जाना ………ये प्रेमी के लक्षण हो ही नही सकते ………..हमें देखो ! श्रीराधारानी नें द्रोपदी को कहा …….हमें देखो द्रोपदी ! सौ वर्ष के बाद मिले हैं ……….पर कोई शिकायत नही है …….क्यों हो शिकायत ? क्या वे प्रसन्न रहें हम नही चाहते ?
अगर चाहते हैं ……तो उनकी राजी में ही हम राजी क्यों नही ?
द्रोपदी के नेत्रों से अश्रु बह रहे थे ………..द्रोपदी मात्र श्रीराधारानी के चरणों को ही देख रही थीं……….उनके हृदय में गुरुभाव की जागृति हुयी श्रीराधारानी के प्रति…….प्रेम को तत्वतः समझा दिया था श्रीराधा नें……अहोभाव से भर गयीं द्रोपदी ………और अत्यन्त भावुक हो श्रीराधारानी की वन्दना करनें लगी थीं ।
पर वन्दना करते हुए ……..उन्हें कुछ विशेष दर्शन हुए थे ।
श्रीराधा के दाहिनें स्कन्ध से श्याम सुन्दर प्रकट हो गए ……….
इस दृश्य को देखकर आनन्दित हो उठीं द्रोपदी ।
“आपही सर्वेश्वरी हो ……हे राधिके ! आप के गुन गन को गाना कोई साधारण बात तो है नही ……..आप ब्रह्म की आल्हादिनी, हम साधारण विषयी जीवों को प्रेमतत्व की शिक्षा देनें के लिये ही आप का आविर्भाव होता है………आप दो नही हैं ……..जो श्रीराधा और श्याम सुन्दर को दो मानते हैं ……..वो अपराध ही करते हैं ……आप दो नही …….आप एक ही हैं ……..कृष्ण ही राधा हैं और राधा ही कृष्ण हैं ।
इतना कहते हुए चरणों में वन्दन किया द्रोपदी नें ………..श्रीराधारानी के साथ अब यहाँ श्याम सुन्दर भी खड़े थे ………युगल की झाँकी का दर्शन करके द्रोपदी के आनन्द का कोई पारावार न रहा ।
शेष चरित्र कल-
☘️ राधे राधे☘️
[3/2, 9:14 PM] Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 38 )
गतांक से आगे –
- मंजुमेधिका जू की *
बनि रहि रसआनंद माधुरि मोदनी मदनालसा ।
चारुचूड़ा चित्रनी चतुरा सुचंदरकांतिका ॥
- सुमेधिका जू की *
चकोरी कामाकिसोरी केतकी अरु कोमला ।
कामरस कंदला सहचरि चंचला कस्तूरिका ॥
- तनमेधा जू की *
सुभरवा अरु दिव्यगंधा रत्नकलिका विस्वभा।
बिलासावलि अरु अनंदा सुरंगांगा गौरिका ।।
- गुणचूड़ा जू की *
केलिकौमुदि कर्निका अलबेलि सोभविचित्रका ।
कामकंदर्पा सुखंजा सुष्टिका विजयंतिका ॥
- वरांगदा जू की *
किसोरि धन्यसुमाग सोभाजयति आनंदसिंधुका।
चित्रमुख्या मुक्तमाला लहरि मालार्कविंदुका ॥
- मधुस्यंदा जू की *
ललितआननि टहलतत्परि मारमोहनि संकरी ।
सौबीरि चंद्रजु सालिसेव्या सर्बतोषनि सहचरी ॥
- मधुरा जू की *
सानुकूला सरदससिका स्वस्तिदा सरदोत्सुखा ।
रसपरज्ञा नवकिसोरी नित्यसिद्धा ससिमुखा ॥
- मधुरेक्षना जू की *
प्रनयप्रचुरा परमप्रवरा प्रिया प्रीतिप्रदायिका ।
चारु-वक्षा चारु-दक्षा चारु-ईक्षा अंमृता ॥
उस महल में उपस्थित सखी श्रीतुंगविद्या जी ने वीणा वादन आरम्भ किया था …उनके साथ उनकी अष्ट सखियाँ भी थीं उन सबने भी वीणा ले ली थी ….सब बैठी हैं …अपना दाहिना पाँव बायें जंघा पर रखकर , वीणा सबने पकड़ी थी …और एक साथ नौ वीणाएँ बज उठीं थीं …अद्भुत लग रहा था …पूरा निकुँज झंकृत हो उठा था ….उन सब सखियों की बड़ी बड़ी और पतली उँगलियाँ वीणा के तारों में मानौं नृत्य कर रहीं थीं । अवर्णनीय था ये सब तो । मैं स्वयं झूम रहा था ….संगीत की वो स्वर लहरी ! शायद भगवती शारदा भी सुनतीं तो वो भी इन सखियों के पाद पद्म को पाना चाहतीं …किन्तु यहाँ कहाँ उनका प्रवेश ! दिव्य संगीत , दिव्य स्वर लहरी , दिव्य राग रागिनी ….मानों राग रागिनी साक्षात यही लग रही थीं । मैं वीणा को सुन रहा था ….श्रीतुंगविद्या जी की उन पवित्र उँगलियों को भी देख रहा था ….वो नेत्र बन्दकरके वीणा बजा रहीं थीं …उनके नेत्रों के कोरों से जल विंदु झर रहे थे ।
तभी – श्रीतुंगविद्या जी की प्रथम जो सखी थीं ….”मंजुमेधिका”जी । ये भी वीणा बजा रहीं थीं ….इनके पीछे उन्मद होती हुईं ….इनकी अष्ट सखियाँ और आगयीं किन्तु ये सब मधुर मधुर मंजीरा बजा रहीं हैं….इनके नाम मुझे हरिप्रिया जी ने ही बताये …..रसानन्दा जी , माधुरी जी , मोदिनी जी , मदनालसा जी , चारु चूड़ा जी , चित्रिनी जी , चतुरा जी और चन्द्रकान्ता जी ।
ये सब मंजीरा बजाती हुई अपनी सखी जी के पीछे खड़ी हो गयीं थीं ।
श्रीतुंगविद्या जी की दूसरी सखी ….सुमेधिका जी । वीणा बजाने में ये भी तन्मय थीं ….तभी इनके पीछे मृदंग लेकर इनकी अष्ट सखियाँ आगयीं ….मृदंग की थाप की ध्वनि गम्भीर और विलक्षण लग रही थी ….इनके नाम भी मुझे हरिप्रिया जी ने ही बताये थे ….चकोरी जी , कामा किशोरी जी , केतकी जी , कोमला जी , काम रसा जी , कंदला जी , चंचला जी और कस्तुरिका जी । ये सब मृदंग में पारंगत थीं । ये सब क्यों बजा रहीं हैं ? हरिप्रिया जी ने मुस्कुराते हुए कहा …उत्थापन में जब युगल जागेंगे तब ये सब संगीत से उनकी सेवा करेंगी ।
तभी स्वर बदल गया था …राग बसन्त चल पड़ा था …श्रीतुंगविद्या जी ने राग बसन्त छेड़ दिया था ।
तो उनकी सखियों ने भी मुस्कुराकर अपनी सखी जी को देखा और उन्हीं का अनुगमन करती हुयी राग बसन्त में तारों को झंकृत करने लगीं ।
ये तीसरी सखी हैं …..श्रीतुंगविद्या जी की तीसरी सखी …तनमेधा जी । ये पूर्ण रागमय तो थीं हीं अनुराग में भी डूबी हुयी थीं । इनके पीछे आकर खड़ी हुई ….इनकी अष्ट सखियाँ ….जिनका नाम था …..सुभरवा जी, दिव्य गंधा जी , रत्नकला जी , विश्वाभा जी , विलासा वलि जी , आनंदा जी , सुर गंगा जी और गौर मुखी जी । ये सब सखियाँ झाँझ बजा रहीं थीं ….मधुर मधुर स्वर में ।
हरिप्रिया जी ने कहा …अब श्रीतुंगविद्या जी की चौथी सखी जी का दर्शन करो …चौथी सखी हैं …..”गुण चूड़ा” जी । ये बसंत राग में लीन हो गयीं थीं वीणा बजाते हुए …तभी …इनकी अष्ट सखियाँ खिलखिलाती इनके पास, इनके पीछे आ कर खड़ी हो गयीं थीं । इनके नाम हैं …..केलिकौमुदी जी , कर्णकांतिका जी , अलबेलि केलि जी , विचित्र शोभा जी , कंदर्प कामा जी , खंजनाक्षी जी , सुष्ट सुन्दरी जी और वैजयन्तिका जी । ये सब तमुरा लेकर स्वर दे रहीं थीं ।
अब पाँचवी सखी थीं …श्रीतुंगविद्या जी की पाँचवी सखी , जो पूरे मनोयोग से वीणा वादन कर रहीं थीं ….इनका नाम था ….”वरांगदा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ ….जो करतल से ताल देती हुयी इनके पीछे खड़ी होकर झूमने लगीं थीं …..इनके नाम हैं …हरिप्रिया जी ने बताये …..किशोरी सुन्दरी जी , धन्यभागा जी , जयति शोभना जी , आनन्द सिन्धु जी , चित्र मुखी जी , मुक्तमाला जी , माला लहरी जी और अर्क विंदा जी । मैंने इन सबके दर्शन किए ….इनके दर्शन से वासना दूर होती है और नाम लेने से प्रेम हृदय में प्रकट होता है । ये मेरा अनुभव था ।
ये छठी सखी हैं …श्रीतुंगविद्या जी की …छठी सखी …”मधुस्पंदा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ …..ललिता नना जी , टहल तत्परा जी , मार मोहिनी जी , संकरा भरनी जी , सौविरा जी , चन्द्रा जी , सालिसेव्या जी और सर्व तोषनी जी ।
सातवीं सखी जी ….श्रीतुंगविद्या जी की सातवीं सखी ….”मधुरा” जी । इनकी अष्ट सखियाँ हैं ….सानुकुला जी , शरद शशिका जी , स्वस्तिदा जी , शरदोत्सुका जी , रस प्रज्ञा जी , नव किशोरी जी , नित्य सिद्धा जी और शशिमुखी जी ।
इसके बाद मेरी दृष्टि गयी श्रीतुंगविद्या जी की आठवीं सखी पर, इनका नाम था …”मधुरेक्षणा” जी । इनकी अष्ट सखियाँ नृत्य कर रहीं थीं …..मैंने दर्शन किए सब एक वय की थीं लताओं की तरह झूमती झूलती सी । इनके नाम सुनो …हरिप्रिया जी ने कहा ….प्रणय प्रचुरा जी , परमावलि जी , प्रवरा जी , प्रिया प्रीति जी , प्रदायका जी , चारु वक्षा जी , चारु दीक्षा जी चारु इच्छा जी और अमृता जी । ये सब उन्मत्त नृत्य कर रहीं थीं …बासंती रागरंग मय वातावरण हो गया था चारों ओर ….मैंने सबको अवनी में मस्तक रखकर प्रणाम किया था ।
शेष अब कल –
[3/2, 9:14 PM] Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (121)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-2
सरोवर में सारस हंस और वृक्ष पर विहंग बैठे हैं, श्रीकृष्ण को एकटक देख रहे हैं, मानो उनकी आराधना कर रहे हैं। मोर नाच रहा है, कोयल कुहुक-कुहुक कर रही हैं। गोपी कहती है- जिसको पशु-पक्षी भी इतने प्रेम से देख रहे हैं, उसको हम मानवीय न देखें, यह कैसे सम्भव है! अरे, हम तो मानती नहीं- मानवीय तो चीन-जापान में भी होंगे; मानवीय तो यूरोप-अमेरिका में भी होंगे, हम मानवीय नहीं भारतीय है और बाबा, भारतीय नहीं व्रजवासी, और व्रजवासिनी नहीं, वृन्दावन की ग्वालिनी- हम कृष्ण को ना देखें यह कैसे सम्भव है। तो हमने तुमको देखा और क्या देखा? अलकावृतमुखं तव कुण्डलश्रीगण्डस्थलाधरसुधं-
‘अलकावृतमुखं’ काले-काले घुँघराले बाल मुखारविन्द पर लटक जाते हैं, इसलिए मुख का साँवरापन है वह कम हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जो रंग है, वह नीलोज्ज्वल है- ऊपर से देखने में नीला है, परंतु भीतर से उज्ज्वल कान्ति निकलती है, जैसे हीरे में चिलक निकलती है वैसी। इसलिए श्रीकृष्ण का एक नाम है, नीलोज्ज्वल-मणि। उनके काले-काले घुँघराले बाल हैं और उनके शरीर में ऐसी दिव्यगन्ध है कि भौंरे उनके पीछे-पीछे दौड़ते हैं; सारूप्य को प्राप्त भ्रमर और सारूप्य को प्राप्त बाल, ऊपर नहीं रहना चाहते। वारम्बार श्रीकृष्ण उनको ऊपर करते हैं कि चलो-चलो, तुम सिर पर रहो पर वे कहते हैं कि नहीं-नहीं; हम तो तुम्हारा कपोल छुएँगे इसलिए नीचे गिर पड़ते हैं। मानो बालों को भी यह लोभ है कि हम श्रीकृष्ण के कपोल का स्पर्श करें, उन्हें सालोक्य नहीं चाहिए सेवा चाहिए।
‘तव कुण्डलश्रीगण्डस्थलं’ कैसा है तुम्हारा मुखारविन्द? बोले- कुण्डल में आकर ‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी बैठ गयीं। साङ्ख्य और योग दोनों का बहिष्कार कर दिया। जब समुद्र-मन्थन हुआ तो उसमें से लक्ष्मीजी निकलीं, तो उन्होंने कहा कि हमको एक वाहन भी चाहिए।+
आपको मालूम होगा कि लक्ष्मीजी कई तरह से चलती हैं- लक्ष्मीजी जब भगवान के साथ चलती हैं तब गरुड़ पर उनके साथ बैठकर चलती हैं, लेकिन जब अकेले जाती हैं तब गरुड़ पर नहीं, उल्लू पर बैठकर चलती हैं। जिसको दिन में बिल्कुल नहीं सूझता, जिसको रोशनी नहीं दिखती। लेकिन महाराज। भगवान् के पास जाना है तो उन्होंने कहा कि भगवान् तो समुद्र में रहते हैं तो वहाँ चिड़िया पर चढ़कर जाना कैसे बनेगा? इसलिए, अपने प्रियतम के पास जाने के लिए जो वाहन उन्होंने चुना वह थी एक बड़ी सुन्दर मछली। अब वह मत्स्यवाहना हो गयीं। लेकिन भगवान् के कान में पहले से योग और साङ्ख्य लगे हुए थे।
आप जितने बड़े लोग होते हैं उनका कान भरने वाले कुछ लोग जरूर होते हैं; भगवान् भी बड़े हैं, तो उनके कान में लगे एक ओर साङ्ख्य और एक ओर योग। साङ्ख्य माने विवेक और योग माने एकाग्र मन। विवेक और एकाग्रता भगवान् से सिफारिश करते हैं इस आदमी की ओर जरा आँख उठाके देखो तो, यह विवेकी है, यह एकाग्रचित्तवाला है; ये दोनों लगे। अब लक्ष्मीजी ने क्या किया कि एकाग्रता और विवेक दोनों को वहाँ से हटा दिया, और स्वयं काम की जो ध्वजा है मछली, उसका सहारा लिया, और आकर कान के पास लग गयीं और वारम्वार अपने प्रतिबिम्ब से श्रीकृष्ण के कपोल का स्पर्श करती हैं। दूसरी जगह भी भागवत में आया है- ‘मण्डयन् कनककुण्डललक्ष्मया’ कनककुण्डल में जो लक्ष्मी है, शोभा है, वह भगवान् के कपोल को वारम्बर स्पर्श करती है।
अब भगवान् के कान कौन भरेगा? तो बोले कि यह काम की सूचक जो मछली है, वह भरेगी। जिसके हृदय में भगवान् के प्रति कामना होगी, मिलन की तीव्र आकाङ्क्षा होगी, उसकी ओर भगवान् देखेंगे। भक्ति में विवेक और एकाग्रता की जरूरत नहीं है। भक्ति में भगवत्-प्राप्ति की लालसा आवश्यक है। नारायण, जीव में चिकीर्षा और लिप्सा दोनों होती हैं, माने जीव करना भी चाहता है और पाना भी चाहता है और भगवान् जो हैं उनमें चिकीर्षा तो होती है, लेकिन लिप्सा नहीं होती, वे करते हैं परंतु पाना नहीं चाहते। और ब्रह्म जो होता है उसमें न चिकीर्षा होती है और न लिप्सा होती है; ब्रह्म न करता है, न करना चाहता है, वह न तो पाता है और न पाना चाहता है।++
तो भगवान ने कहा कि जीव इतना नीचे चला गया है कि चिकीर्षा और लिप्सा है और वे उसके दोनों कान पकड़कर संसार में लगाये हुए हैं, इसलिए अब हम भी वही चलेंगे तभी इसको उठा पावेंगे। कैसे कि जैसे एक आदमी कुएँ में गिर जाय, तो उसको बाहर निकालने के लिए निकालने वाले को कुएँ में घुसना पड़ता है। तो नाम-रूप के जंजाल में जीव फँस गया है, उसके लिए भगवान को नामरूप ग्रहण करना पड़ता है; भगवान को भी चिकीर्षु और लिप्सु बनकर आना पड़ता है। चोर के साथ चोर बनकर जाते हैं चोरी करने के लिए। ‘अधर सुधं’- पहले सुधा स्वर्ग में रहती थी और निकली कहाँ से? समुद्र मन्थन से। तो एक बार इसको दैत्यों ने छीन लिया, एक बार देवताओं ने छीन लिया;सुधा के लिए तो बड़ी छीनाझपटी हुई। फिर भगवान आये, मोहिनीरूप धारण करके; तब उन्होंने इसको सम्हाला।
सुधा ने कहा- मैं दैत्य के हाथ में भी नहीं रही, देवता के हाथ में भी नहीं रही। और ऋषि और मनुष्य के हाथ में भी नहीं रही; मैं तुम्हारे हाथ में रही। हमारा पाणिग्रहण-संस्कार तो केवल तुम्हारे साथ हुआ है , हम तुम्हें छोड़कर और कहीं रहेंगी नहीं। इसलिए सुधा आकर श्रीकृष्ण के मुख में, अधर में बस गयी। सामीप्य मिला कुण्डल को और सारूप्य मिला केश को और सालोक्य मिला सुधा को। भगवान के होठों में अमृत का निवास है ‘अधरसुधं’ उसी को बाँसुरी से फूँक-फूँककर सबके कानों में पहुँचाते हैं, और सबको अपनी ओर खींचते हैं। एक बात और विचित्र है; भगवान के कान में जो कुण्डल हैं वो चंचल होकर चपल होकर वारम्वार विवेकशून्य होकर भगवान के कपोलों का स्पर्श करते हैं। और बाल अपनी उच्चता छोड़कर वारम्वार नीचे उतर आते हैं कि हमको उच्चता नहीं चाहिए। यह बड़प्पन प्रेम में बहुत बाधक है, बाल सिर पर नहीं रहना चाहते, नीचे आते हैं।
प्रेम में स्थिरता, धीरता, गम्भीरता, काम नहीं देती हैं, अपनी धीरता-गम्भीरता छोड़कर कुण्डल चञ्चल हो रहे हैं। और सुधा है वह अपने बाप का घर क्षीरसागर छोड़कर, उसके कलश को छोड़कर जिसमें लेकर धन्वन्तरि निकले थे, और जिन देवता, दैत्यों ने बहुत चाहा, उनको छोड़कर और बाँटने वाली मोहिनीरूप को भी छोड़कर, वह श्रीकृष्ण के अधर में आकर बस गयी। उसने कहा कि बस, हमारे रहने की जगह तो यही है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[3/2, 9:14 PM] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
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श्लोक 6 . 45
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प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संश्रुद्धकिल्बिषः |
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् || ४५ ||
भावार्थ
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और जब योगी कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है, तो अन्ततोगत्वा अनेकानेक जन्मों के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि-लाभ करके वह परम गन्तव्य को प्राप्त करता है |
तात्पर्य
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सदाचारी, धनवान या पवित्र कुल में उत्पन्न पुरुष योगाभ्यास के अनुकूल परिस्थिति से सचेष्ट हो जाता है | अतः वह दृढ संकल्प करके अपने अधूरे कार्य को करने में लग जाता है और इस प्रकार वह अपने को समस्त भौतिक कल्मष से शुद्ध कर लेता है | समस्त कल्मष से मुक्त होने पर उसे परम सिद्धि-कृष्णभावनामृत – प्राप्त होती है | कृष्णभावनामृत ही समस्त कल्मष से मुक्त होने की पूर्ण अवस्था है | इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (७.२८) हुई है –
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ||
“अनेक जन्मों तक पुण्यकर्म करने से जब कोई समस्त कल्मष तथा मोहमय द्वन्द्वों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तभी वह भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में लग पता है |”


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