Niru Ashra: 🦚🌻🦚🌻🦚🌻🦚
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 146 !!
वृन्दावनेश्वरी – श्रीराधा
भाग 2
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कैसा सपना था ? द्वारिकाधीश की रानियाँ……..रुक्मणी !
सुन्दर सुशील है रुक्मणी…….अपना श्यामसुन्दर तो अपना ही सम्भाल कर ले यही बहुत है……पर सपना अच्छा था ।
हाँ हाँ वो सब सपना था …………नही तो नित्य किशोर श्याम सुन्दर और उनकी मैं नित्य किशोरी श्रीराधा ………सखियाँ कितना अनुरोध करती हैं …….मनुहार करती हैं …….ताम्बूल लेलो प्यारे ! पुष्प हार स्वीकार करो प्यारे ! तब जाकर कुछ स्वीकार करते हैं ………उनके पुत्र और पौत्र ? हँसती हैं श्रीराधारानी………चलो मान लो कि द्वारिकाधीश के ही पुत्र और पौत्र इतनें हैं ……..तो मैं कहूँगी कि अपनें श्याम सुन्दर की ही छायाँ द्वारिकाधीश बनकर वहाँ बैठे हैं ……..
मूल स्वरूप से तो कभी वृन्दावन वे भी नही छोड़ते ……..एक चरण भी आगे नही बढ़ाते वे …….फिर वो द्वारिकाधीश कैसे बन सकते हैं ?
मैं तो प्रारम्भ से ही पगली हूँ……..जब से जन्मीं तबसे पगली ……..खूब हँसती हैं श्रीराधारानी ।
वे गोकुल से वृन्दावन आये………मेरे बाबा बृषभान जी नें अपनें बरसानें से उन्हें स्थान दिया ……….तब मैने प्रथम बार उन्हें देखा था ……तब से आज तक………पूरे 112 वर्ष हो गए ……..पर वो लीला अभी भी मेरे चित्त में अंकित है ……..उफ़ ।
लम्बी साँस लेती हैं श्रीराधारानी……..अब सुन रही हूँ कि ……उसी कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध चल रहा है……..हाँ अवतार काल है ……तो दुष्टों का उद्धार तो करते जाना ही है उन्हें ।
अर्जुन के सारथि बन गए हैं…….बड़े उदार मना हैं मेरे श्याम सुन्दर ………सब को अपना बना लेते हैं …….. सारथि बन जाना कोई साधारण बात तो है नही ……….पर “छोटा बड़ा” के झंझट में श्याम सुन्दर कभी पड़े ही नही हैं……..जो आया इनके पास …..सबको अपनाते चले गए…….हाँ ………मुझे ललिता सखी बता रही थी ……कि कुब्जा जैसी को…….जो कंस की दासी थी …….उसे भी अपनी महारानी बना लिया श्याम सुन्दर नें ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल-
🌷 राधे राधे🌷
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (124)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-3
पुराने जमाने में शब्दों के निर्माण की एक यह भी परिपाटी थी। शक्र, रुद्र, परमेष्ठी, ब्रह्मा, ये सब बड़े बूढ़े देवता, समाधि लगाने वाला प्रलय का देवता, सबका दादा-परदादा ब्रह्मा- ये जब तुम्हारी वंशी सुनकर मोहित हो जाते हैं; बड़े-बड़े ऋषि, बड़े-बड़े महात्मा, सनकादि सिद्ध जब तुम्हारी वंशी सुनकर मोहित हो गये, तब हमारी क्या बात? समाधिभंगाय कदानु मे भवेत- एक दिन सनकादि बैठे बैठे ध्यान कर रहे थे तो बीच-बीच में आँख खोलकर देख लें और फिर ध्यान करने बैठ जायँ। नारदजी बहुत देर से यह देख रहे थे, तो आये, और बोले कि क्यों महात्माओं। आज समाधि आपकी कुछ विचित्र ही लग रही है। वारम्वार आँख खोलकर देखते हो, फिर आँख बन्द करते हो, आज आपकी समसाधि कैसी लग रही है? तो बोले- बाबा, हमको आज प्रतीक्षा है, किसी से मिलने की इच्छा है।
श्रीकृष्ण की वंशी-ध्वनि हमको बरबस अपनी ओर खींच रही है। जिसके मन में कहीं जाने की इच्छा होगी, किसी से मिलने की इच्छा होगी, वह आसन बाँधकर नहीं बैठ सकता : प्रयत्न शैथिल्य के बिना आसन जमता ही नहीं। यह योगशास्त्र का नियम है कि जब आदमी यह सोचेगा कि अब हमको कहीं नहीं जाना है, चित्त की समाधि लगाना है, चाहे दिन भर लग जाय, तो आसन स्थिर हो जायेगा वरना यदि वह सोचेगा कि घण्टेभर बाद बाजार में जाना है, तो आसन जमेगा नहीं। तो यह वंशी-ध्वनि जिसमें इन्द्र मोहे, ब्रह्म, मोहे, शंकर मोहे, सनकादि मोहे और नारद मोहे, सब जिसमें मोहित हो गये, बड़े-बड़े ऋषि, महर्षि, महात्मा पुरुष मोहित हो गये अब उससे कोई स्त्री मोहित हो जाय, तो इसमें क्या आश्चर्य है!
देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्नासारा, भ्रश्यत् प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः ।
तो पुरुषों की तो यह हालत है। अब महाराज, देवियों की सुनो- ‘विमानगतयः’ का दो अर्थ है। एक तो विमान पर चढ़कर आना; और दूसरा अर्थ है कि घर में तो देवियाँ रूठी हुई थीं, और देवताजी मना रहे थे; इंद्र, वरुण, कुबेर, अग्नि, वायु, इनकी घरवालियाँ जो हैं वे एक ही दिन सलाह करके सबकी सब रूठ गयीं।+
‘देव्याः’ बहुवचन है ना! बोलीं- सामूहिक आन्दोलन करो कि ये देवतालोग स्वर्ग में अप्सराओं को क्यों रखते हैं? निकाल दें यहाँ से, हमारे स्वर्ग में अप्सरा न रहने पावें, केवल देवी-देवी रहेंगी। अब देवता लोगों की सिट्टी-पिट्टी गुम, किसी की कुछ चले ही नहीं कि क्या करें, कैसे मनावें इनको? इसी बीच वृन्दावन में श्यामसुन्दर की बाँसुरी बजी। अब तो उसे सुनकर देवी लोग तन्मय हो गयीं; और फिर जब देवता आये तो देवता ने कहा कि अब तो मालूम पड़ता है कि कुछ मूड ठीक-ठिकाने है तो बोले कि अरे चलो, वृन्दावन चलें; श्यामसुन्दर का रास होने वाला है, देखते चलोगी?
बाँसुरी बजा रहे हैं। तुम भी चलोगी? बोलीं- हाँ-हाँ, चलेंगे। ‘विमानगतयः’ तुरन्त मान छोड़कर वे बिना श्रृंगार किए और देवताओं के साथ जो चलीं तो वर्णन किया है- भ्रश्यत् प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः । इनके शिर के जो पुष्प, आभूषण, थे वे गिर गये, और यहाँ तक कि उनके कपड़े भी उनके वश में नहीं रहे- स्त्रस्तस्त्रस्तनिबद्धनीवि विलसद् गोपी नीवी उनकी छूट गयी, माने कमर में कपड़ा बाँधने की उनकी जो रस्सी होती है वह खुल गयी! यह अतिशय काम का लक्षण है। तो देवियों की यह दशा हुई।
का स्त्रयंग ने कलपदायतमूर्च्छितेन
सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् ।
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं
यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ।।
नारायण! गोपियाँ कहती हैं कि आप लक्ष्मी की बात सुनकर नाराज हो गये, तो लक्ष्मी के साथ और दो-चार नाम जोड़ देते हैं। सरस्वती, पार्वती, उमा, हेमावती भी मोहित हो गयीं। पुराण में एक ऐसी कथा आती है जिसमें पार्वती को भी वंशी सुनकर मोह हो गया। सरस्वती को भी वंशी सुनकरके मोह हो गया, सरस्वती जी मोहित होकर अंतिम बासुरी बन गयीं। जड़भावपन्न हो गयी, सरस्वती का ज्ञान, ध्यान, लुप्त हो गया, और वह स्वयं बाँसुरी बनने के लिए तत्पर हो गयीं।++
तो बाबा, लक्ष्मीजी, पार्वतीजी, सरस्वतीजी, सतीजी, इंद्राणी सब और मृत्युलोक के देवता, ब्राह्मणों की मेहरारू, वे यज्ञपत्नी, यज्ञशाला में अपने पतियों को यज्ञ करते छोड़कर के भोजन लेकर तुमको खिलाने चली आयीं। और यमराज नागदेश में देखा कि कालिय नाग की जो पत्नी हैं वे तुम्हारी बाँसुरी सुनकर मोहित हो रही हैं। ‘त्रिलोक्यां’- तीनों लोकों में, देवलोक, मृत्युलोक, नागलोक, पाताललोक में कौन ऐसी स्त्री है जो तुम्हारी वंशीध्वनि सुनकर सम्मोहित होकर मुर्च्छित न हो जाय- का स्त्रयंग ने कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम् ।
यह जो गीता-प्रेस से पुस्तक छपने वाली थी तो श्रीमद्भागवत का मूल पाठ ठीक करने के लिए बड़ा प्रयास किया गया। तब बारहवीं शताब्दी की हस्तलिखित पुस्तक मिली। स्वामीदयानन्द ने जो कहा कि बोपदेव ने भागवत बनाया है तो बोपदेव के पहले की हाथ से लिखी हुई यह पुस्तक मिलती है। वह काशी में सरस्वती भवन में सुरक्षित है। बोपदेव तेरहवीं शताब्दी में हुए हैं, हेमाद्रि के समय में। तो यह बड़ी पुरानी श्रीमद्भागवत् की प्राप्ति है। सौ पुस्तक कम से कम हमलोगों ने हाथ में छाँट-छाँटकर ली थीं और उनसे यह पाठ मिलाया गया तो उसमें इस श्लोक के तीन पाठ मिले- कलपदायतवेणुगीत। सम्मोहिता, कलपदामृतवेणुगीत सम्मोहिता, कलपदायतमूर्च्छितेन सम्मोहिता ।
श्यामसुन्दर की वंशीध्वनि क्या है? यह कल है। क्लं माने क्या? जैसे छोटा बालक बोलता है- मम-मम; तो उसके मम-ममका मतलब खीर भी होता है, खिचड़ी भी होता है, नमक भी होता है, पानी भी होता है, परंतु उसको समझता कौन है? उसकी माँ समझती है। उसकी माँ समझती है कि अबकी ‘मम’ कहा तो पानी चाहिए और अबकी मम कहा तो खिचड़ी या सोना चाहिए। उसके मम-मम का मतलब उसकी माँ निकाल लेती है। इसी प्रकार प्रेमी अपने प्रियतम के अस्फुट मधुर ध्वनि को जानता है और उसका अर्थ निकाल लेता है। तो कल कहते हैं- ‘कलं तु मधुरास्फुटे’ मधुर और अस्फुट वाणी को, बोलते हैं कल।
श्रीकृष्ण जब बाँसुरी बजाते हैं तो गोपी को यह नहीं मालूम पड़ता कि हमारी सौत का नाम ले रहे हैं; ललिता को मालूम पड़ता है कि ललिता-ललिता गा रहे हैं, और चंद्रावली को मालूम पड़ता है कि चंद्रावली चंद्रावली गा रहे हैं, राधा को मालूम पड़ता है कि राधा-राधा गा रहे हैं, विशाखा को मालूम पड़ता है कि विशाखा विशाखा गा रहे हैं। क्योंकि वंशी की ध्वनि तो वंशी की ध्वनि है और श्रीकृष्ण अपने मन में मग्न होकर गाते हैं, लेकिन उसमें इतनी मधुरता है और श्रीकृष्ण के प्रेम पर इतना विश्वास है कि उस अस्फुट ध्वनि में सबको अपना-अपना नाम मालूम पड़ता है। और वह स्वर का आलाप महाराज! आयत-कलपदायतमूर्च्छितेन, कलपदामृतमूर्च्छितेन ‘कलपद’* क्या है?
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 43 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
परमातम पर ब्रह्म करि, बिसतारन जग जाल ।
जन पालन जै-जै महा, रासबिहारी लाल ॥
॥ पद ॥
महारस रासबिहारीलाल । बारी जाऊँ जै जै जै जनपाल ॥
निराकार अविकार, परब्रह्म सुद्ध चैतन्य । निर्विसेष व्यापक भयौ, जिहिं चिदंस तै जन्य ॥
जाके एकहि अंस करि, परमातम अवतार । पर इच्छा आधीन है, कीनों सब बिस्तार ॥
अखिल अंड व्यापिक अरु, अखिल अंड आधार । अखिल अंड के ईस है, हरत करत प्रतिपार ॥ एक दोय अरु तीन पुनि, चारि पाँच बहुरूप । धरि-धरि लीला धारहीं, आप अपार अनूप ॥
जा करि ए सब होत हैं, सो ए नित्यकिसोर । श्रीहरिप्रिया सिरोमनी, सदा बसैं निस-भोर ॥ १७ ॥
*वारि जाऊँ , वारि वारि जाऊँ ….
हरिप्रिया जी अतिआनन्द सिन्धु में डूब चुकीं हैं ….वो युगल की बलैयाँ ले रहीं हैं ।
युगल सरकार उत्थापन का भोग आरोग रहें हैं …सखियाँ इस झाँकी को देख देखकर रस निमग्न हो अपने आपको ही वार रहीं हैं । युगल सरकार की सहज चेष्टा में इनका पूरा ध्यान है …प्रिया जी लाल जी को खिला रहीं हैं फिर लाल जी प्रिया जी को ।
आनन्द उमंग में भरी हरिप्रिया जी मुझे कहती हैं …जय हो, महारस रासबिहारी लाल की,जय हो । इनके चरण नख आभा से प्रकट निराकार ज्योति ब्रह्म ही तो सर्वत्र व्याप्त हैं …दूर हैं , इसलिए ज्ञानी-योगी लोग निराकार को ही मानते हैं …क्यों की उनकी यहाँ तक पहुँच ही नही है ….दूर से उन्हें ज्योति दिखाई देती है ….ज्योति का कोई आकार है नही ….तो उन्हें लगता है कि यही हैं , निराकार ही हैं । साकार जैसी कोई वस्तु है नही । हरिप्रिया जी आगे कहती हैं – नख चन्द्र छटा से परब्रह्म का प्राकट्य करके युगल वर इनको लीला विस्तार के लिए आज्ञा करते हैं ….फिर इन्हीं से विष्णु ,शिव ,और ब्रह्मा का प्राकट्य होता है …..सृष्टि का सृजन , पालन और संहार की लीला इन से ही होती रहती है ….हरिप्रिया जी कहती हैं …ये सब युगल सरकार का ही विस्तार है …स्वयं युगलवर रस में निमग्न रहकर निज जन को रस प्रदान करते हैं …सृष्टि में तुम्हें जो रस किंचित भी दिखाई देती है …उनका मूल यही निकुँज ही है यानि श्रीवृन्दावन । हरिप्रिया जी मुझे ये सब बता रहीं थीं कि …..तभी ….
“युगल सरकार की जय”……अष्ट सखियों ने जयकार लगाया । हरिप्रिया जी आनन्द में उछलती हुई बोलीं …जल्दी चलो मेरे साथ । मैंने कहा …क्या हुआ ? तुम चलो …मैं हरिप्रिया जी के पीछे चल दी ….वो कहती चल रहीं हैं …..युगल सरकार अब फूल कुँज में जायेंगे …हम भी वहीं जा रहे हैं ….तभी मैंने देखा युगल सरकार को अष्ट सखियाँ लेकर चल दीं हैं । कोई चँवर ढुरा रहीं हैं …कोई पंखा कर रहीं हैं । सामने ही फूल कुँज है …..मुझे हरिप्रिया जी ने बताया कि …फूल सखी ने इस फूल कुँज का निर्माण किया है ….आज युगल सरकार फूल कुँज में विराजेंगे ।
फिर सन्ध्या आरती ?
हरिप्रिया जी ने कहा …मैं तुमको आगे से सन्ध्या आरती के दर्शन कराने तो लाई हूँ ।
मैंने दर्शन किए …दिव्य फूल कुँज में एक फूलों का सिंहासन है ….ये सिंहासन फूलों से ही बना है …और चारों ओर फूल ही फूल हैं ….सिंहासन के सामने फूलों का फुब्बारा चल रहा है जिसमें से फूल की फुहारी निकल रही थीं । यहाँ पर भी वही असंख्य सखियाँ जहाँ जगह मिली है वहीं बैठी हैं ….और बड़े चाव से युगल सरकार को निहार रही हैं । मुझे सामने बिठाया है हरिप्रिया जी ने …..मैं युगल सरकार के सामने बैठा हूँ ….मुझे उन्हें निहारने की भी हिम्मत नही हो रही ।
श्रीरंगदेवि जी मुझे देख रही हैं …..मैंने उनको देखा तो स्नेह बरस रहा था उनकी कृपा दृष्टि से ।
तभी ….आरती आरम्भ हो गयी …..मैं उठने लगा तो मुझे हरिप्रिया जी ने संकेत करके कहा ….बैठी रहो । मैंने चारों ओर देखा सब सखियाँ बैठी हैं …और बैठकर ही आरती का आनन्द ले रही हैं । बस खड़ी हो कर आरती करने वालीं अष्ट सखियाँ ही हैं । मैं तो अपलक देखती रही …..ऐसा सौभाग्य , ओह ! बस ये सब कृपा है …..मैंने मन ही मन प्रणाम किया ….”श्रीहरिप्रिया सिरोमनि , सदा बसौं निस भोर” । आरती क्या दिव्य हो रही है ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 3
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मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्र्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः || ३ ||
मनुष्याणाम् – मनुष्यों में से; सहस्त्रेषु – हजारों; कश्र्चित् – कोई एक; यतति – प्रयत्न करता है; सिद्धये – सिद्धि के लिए; यतताम् – इस प्रकार प्रयत्न करने वाले; अपि – निस्सन्देह; सिद्धानाम् – सिद्ध लोगों में से; कश्र्चित् – कोई एक; माम् – मुझको; वेत्ति – जानता है; तत्त्वतः – वास्तव में |
भावार्थ
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कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है |
तात्पर्य
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मनुष्यों की विभिन्न कोटियाँ हैं और हजारों मनुष्यों में से शायद विरला मनुष्य ही यह जानने में रूचि रखता है कि आत्मा क्या है, शरीर क्या है, और परमसत्य क्या है | सामान्यतया मानव आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन जैसी पशुवृत्तियों में लगा रहता है और मुश्किल से कोई एक दिव्यज्ञान में रूचि रखता है | गीता के प्रथम छह अध्याय उन लोगों के लिए हैं जिनकी रूचि दिव्यज्ञान में, आत्मा, परमात्मा तथा ज्ञानयोग, ध्यानयोग द्वारा अनुभूति की क्रिया में तथा पदार्थ से आत्मा के पार्थक्य को जानने में है | किन्तु कृष्ण तो केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा ज्ञेय हैं जो कृष्णभावनाभावित हैं | अन्य योगी निर्विशेष ब्रह्म-अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि कृष्ण को जानने की अपेक्षा यह सुगम है | कृष्ण परमपुरुष हैं, किन्तु साथ ही वे ब्रह्म तथा परमात्मा-ज्ञान से परे हैं | योगी तथा ज्ञानीजन कृष्ण को नहीं समझ पाते | यद्यपि महानतम निर्विशेषवादी (मायावादी) शंकराचार्य ने अपने गीता – भाष्य में स्वीकार किया है कि कृष्ण भगवान् हैं, किन्तु उनके अनुयायी इसे स्वीकार नहीं करते,क्योंकि भले ही किसी को निर्विशेष ब्रह्म की दिव्य अनुभूति क्यों न हो, कृष्ण को जान पाना अत्यन्त कठिन है |
कृष्ण भगवान् समस्त कारणों के करण, आदि पुरुष गोविन्द हैं | ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः | अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् | अभक्तों के लिए उन्हें जान पाना अत्यन्त कठिन है | यद्यपि अभक्तगण यह घोषित करते हैं कि भक्ति का मार्ग सुगम है, किन्तु वे इस पर चलते नहीं | यदि भक्तिमार्ग इतना सुगम है जितना अभक्तगण कहते हैं तो फिर वे कठिन मार्ग को क्यों ग्रहण करते हैं? वास्तव में भक्तिमार्ग सुगम नहीं है | भक्ति के ज्ञान में हीन अनधिकारी लोगों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला तथाकथित भक्तिमार्ग भले ही सुगम हो, किन्तु जब विधि-विधानों के अनुसार दृढ़तापूर्वक इसका अभ्यास किया जाता है तो मीमांसक तथा दार्शनिक इस मार्ग से च्युत हो जाते हैं | श्रील रूप गोस्वामी अपनी कृति भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.१०१) लिखते हैं –
श्रुति स्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना |
एकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ||
“वह भगवद्भक्ति, जो उपनिषदों, पुराणों तथा नारद पंचरात्र जैसे प्रामाणिक वैदिक ग्रंथों की अवहेलना करती है, समाज में व्यर्थ ही अव्यवस्था फैलाने वाली है |”
ब्रह्मवेत्ता निर्विशेषवादी या परमात्मावेत्ता योगी भगवान् श्रीकृष्ण को यशोदा-नन्दन या पार्थासारथी के रूप में कभी नहीं समझ सकते | कभी-कभी बड़े-बड़े देवता भी कृष्ण के विषय में भ्रमित हो जाते हैं – मुह्यन्ति यत्सूरयः | मां तु वेद न कश्र्चन – भगवान् कहते हैं कि कोई भी मुझे उस रूप में तत्त्वतः नहीं जानता, जैसा मैं हूँ | और यदि कोई जानता है – स महात्मा सुदुर्लभः – तो ऐसा महात्मा विरला होता है | अतः भगवान् की भक्ति किये बिना कोई भगवान् को तत्त्वतः नहीं जान पाता, भले ही वह महान विद्वान् या दार्शनिक क्यों न हो | केवल शुद्ध भक्त ही कृष्ण के अचिन्त्य गुणों को सब कारणों के करण रूप में उनकी सर्वशक्तिमत्ता तथा ऐश्र्वर्य, उनकी सम्पत्ति, यश, बल, सौन्दर्य, ज्ञान तथा वैराग्य के विषय में कुछ-कुछ जान सकता है, क्योंकि कृष्ण अपने भक्तों पर दयालु होते हैं | ब्रह्म-साक्षात्कार की वे पराकाष्टा हैं और केवल भक्तगण ही उन्हें तत्त्वतः जान सकते हैं | अतएव भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.२३४) कहा गया है –
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः |
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ||
“कुंठित इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण को तत्त्वतः नहीं समझा जा सकता | किन्तु भक्तों द्वारा की गई अपनी दिव्यसेवा से प्रसन्न होकर वे भक्तों को आत्मतत्त्व प्रकाशित करते हैं |”

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