Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 44 )

गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
रजधानी मानी मनहिं, बृन्दावन बिबि भूप।
सुखदायक नायक सखी, सचिदानंद स्वरूप ॥
॥ पद ॥
सखीरी सचिदानंद स्वरूप, सकल सुखदायक नायक भूप।
श्रीबृन्दावन रजधानी मनमानी परम अनूप ॥
आदि अनादि एकरस अद्भुत सदा सनातन रूप।
श्रीहरिप्रिया सुधाकर दिनहिं विदारन दारन धूप ॥१८॥
*सन्ध्या आरती हो गयी है …जय जयकार भी हो गया है । हरिप्रिया जी ने अपना मस्तक युगल के चरणों में रख दिया है । और फिर जय जयकार कर रही हैं । मैं ही हूँ जो हरिप्रिया जी के निकट खड़ी हो गयी हूँ ….तो वो मुझे कहती हैं …गदगद भाव से कहती हैं …सुन ! ये युगलवर हैं ….सर्व सुख प्रदाता हैं …सच्चिदानन्द श्रीधाम के ये रस सम्राट हैं …जिनके रूप गुण लीला की कोई उपमा नही है ….हरिप्रिया जी आनन्द मग्न हैं …वो आनन्द सिन्धु में डूबी हुयी हैं ….उनसे कहते नही बन रहा है । ये श्रीवृन्दावन है यहाँ दो चन्द्रमा हैं ….एक प्रिया जी और एक लाल जी , ये चन्द्रमा अनादि काल से हैं , और अनादि काल तक रहेंगे ।
हरिप्रिया जी ये कहते हुए रस सिन्धु में डूब जाती हैं …वो आगे कुछ बोल नहीं पातीं ।
तभी उस “फूल कुँज”में नृत्य आरम्भ हो गया था …सखियाँ स्तोत्र गाने लगीं थीं …हाँ , ये सन्ध्या आरती के बाद निकुँज में गाया जाने वाला स्तोत्र है ..अद्भुत स्वर लहरी थी इसकी । एक ताल था एक स्वर । लताओं की तरह झूमती असंख्य सखियाँ । वो सब गा रहीं थीं ….हमारी श्यामा जू गोरी हैं …और नित्य किशोरी हैं ….ये किशोर अवस्था से कभी बड़ी हुई ही नहीं । और हमारे श्याम सुन्दर जिनके अंग अंग में टोना है …और सरस हैं ….हंसती हुई कहतीं हैं …नमकीन से भी हैं ….ये कहते हुए बलैयाँ लेती हैं । फूलों को उछाला जा रहा है ….युगल सरकार मुस्कुरा रहे हैं ….उनकी मुस्कुराहट देख कर सब मुग्ध हैं ….मैं तो अपनी दशा क्या कहूँ !
हरिप्रिया जी अब – “जय राधे जय राधे राधे , जय राधे जय श्रीराधे । ये कहते हुए नाच रहीं हैं …..उन्मुक्त सरस नृत्य चल रहा है निकुँज में ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: 🦚🌻🦚🌻🦚🌻🦚
!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 146 !!
वृन्दावनेश्वरी – श्रीराधा
भाग 3
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अर्जुन के सारथि बन गए हैं…….बड़े उदार मना हैं मेरे श्याम सुन्दर ………सब को अपना बना लेते हैं …….. सारथि बन जाना कोई साधारण बात तो है नही ……….पर “छोटा बड़ा” के झंझट में श्याम सुन्दर कभी पड़े ही नही हैं……..जो आया इनके पास …..सबको अपनाते चले गए…….हाँ ………मुझे ललिता सखी बता रही थी ……कि कुब्जा जैसी को…….जो कंस की दासी थी …….उसे भी अपनी महारानी बना लिया श्याम सुन्दर नें ।
हद्द है……….ललिता तो यहाँ तक कह रही थी कि ……….रुक्मणी को जो स्थान दिया है श्याम सुन्दर नें वही स्थान इस दासी कुब्जा को भी दिया है ………वाह रे ! द्वारिकाधीश !
अब महाभारत का युद्ध छेड़ रखा है……….ललिता कह रही थी कि युद्ध अब समाप्त होनें को आ रहा है……….लाखों लोग मरे हैं …….अभी कुछ दिन ओर हैं ………पता नही कितनें और मरेंगें ……..
मुझे ये सब प्रिय नही……….सब हमारे ही तो जीव हैं……….फिर हम उनके प्रति इतनी आक्रामकता क्यों दिखाएँ ………नही मुझे ये सब प्रिय नही हैं………….
कह रही थी ललिता कि ……….महाभारत युद्ध के बाद फिर सूर्यग्रहण पड़नें वाला है …………एक युग में दो दो सूर्यग्रहण ?
हाँ ……….द्वापरयुग का अंत भी तो है ………….कलियुग में सबसे ज्यादा ग्रहण पड़ते हैं ………………द्वापर में दो या तीन …….त्रेता में एक और सत्ययुग में भी मुश्किल से मात्र एक ………….
सूर्य ग्रहण में फिर जाएंगे कुरुक्षेत्र ?
मैं ललिता सखी से ये कहते हुए हँसी……..नही, इस बार कुरुक्षेत्र नही जायेंगें ………….
आपको स्मरण नही हैं स्वामिनी ! निमन्त्रण दिया है द्वारिकाधीश नें द्वारिका के निकट ही “सिद्धपुर” में स्नान करनें के लिये, ……इसी बहानें से उनकी द्वारिका में आपके चरण पड़ जाएँ ।
पर मैं वृन्दावन छोड़कर कहीं नही जाती……..मैं नही जाऊँगी ।
हाँ अगर प्यारे की ज्यादा ही इच्छा हो तो मेरी छायाँ जा सकती है ।
विलक्षण उन्माद से भर गयीं थीं श्रीराधारानी ।
जब से कुरुक्षेत्र से लौटीं हैं…….तब से वृक्षों को गले लगाती हैं …लताओं को सींचती हैं ……….कुञ्जों के बतियाती हैं ………….सरोवर में बैठी रहती हैं अनमनी सी ………..खोई खोई ………….कभी हँस पड़ती हैं तो कभी एकाएक रोनें लगती हैं ………………..
हे वज्रनाभ ! महाभाव स्वरूपा हैं श्रीराधारानी ।
ये वृन्दावन की हैं………ये वृन्दावन में ही रहती हैं …..वृन्दावन छोड़कर कहीं नही जातीं………हाँ यही सच है …..वैसे श्याम सुन्दर भी नही जाते वृन्दावन छोड़कर तो……..पर अवतार लीला है ……नारायण रूपी वासुदेव जाते हैं …….पर “राधा बिहारी” कहीं नही जाते अपनी श्री राधा को छोड़कर ……यही सत्य है और यही शाश्वत भी ।
शेष चरित्र कल-
🌷 राधे राधे🌷
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (125)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का हेतु-3
अमृत है। भगवान् जब बाँसुरी बजाते हैं तो उनके हृदय में जो अमृत भरा हुआ है, वह मुखारविन्द में आ जाता है, होंठों से ऐसा अमृत नहीं आ सकता। खाने-पीने में हम समझते हैं कि सिन्धी लोगों को पकौड़ों में जो स्वाद मालूम पड़ता है, वह अमृत है, जो प्याज-लहसुन खाते हैं महाराज, उनको उनमें अमृत मालूम होता है; गुजराती, काठियावाड़ी को लाल मिर्च और तेल की बनी हुई सब्जी में अमृत है बिल्कुल अमृत है; अच्छा, देवतालोग जो स्वर्ग में पीते होंगे आँख बन्द करके वह कैसा अमृत होगा, बेहोश हो जाओ तब भी उनकी असली स्वाद नहीं मालूम पड़ेगा सोचते सोचते पागल हो जाओ तब भी नहीं मालूम पड़ेगा; पर यह बाँसुरी में जो अमृत है वह न प्राणियों के द्वारा भोग्य अमृत है, न देवताओं वाला अमृत है; यह भगवद्भोग्य अमृत है। श्री वल्लभाचार्यजी महाराज ने यह प्रश्न उठाया कि भगवान् गोपियों का जो रस लेते हैं तो गोपियों में इतना रस आया कहाँ से?
क्या मनुष्य का रस भगवान् लेता है? क्या मनुष्य में ऐसा रस है, जो भगवान् को आनन्दित करे? बोले- नहीं, भगवान् अपने रस को, अपने आनन्द को, हृदय से अधरों में लाकर, अधरों में बाँसुरी में भरकर, और बाँसुरी से गोपियों के कान में डालकर के भगवदीय अमृत को, भगवद्-भोग्य अमृत को, गोपियों के भीतर डाल देते हैं। तो यह वंशीवादन क्या है? यह सामने वाले के हृदय में अमृत भर देने की प्रक्रिया है, अमृत भरने की शैली है, अमृत भरने की धारा है। इससे क्या हुआ? तो बोले- सम्मोहिता। बोले- बाबा, कृष्ण के साथ तो यह जादू है, बड़ा जादू है; न होता, तो शिवजी मोहित होते!
जादू न होता तो ब्रह्माजी मोहित होते! इन्द्र मोहित होते! इसी को बोलते हैं, माया। सम्मोहन जादू माने हिप्नोटिज्म। ये श्रीकृष्ण भी सम्मोहन-क्रिया करते हैं। जैसे जादूगर हाथ किसी की तरफ घुमा देता है, ऐसे श्रीकृष्ण के पास बाँसुरी है, बाँसुरी का जादू है। वह दीर्घकाल तक आलाप। वह सम्मोहिनी मुरली। बोले- बाबा, ऐसी कौन सी स्त्री है, त्रिलोकी में नाम तो लो उसका जो आपसे सम्मोहित न हो जाय! हमने एक लक्ष्मी का नाम ले लिया तो नाराज होने लगे।+
कौन सी ऐसी स्त्री है त्रिलोकी में जो आपकी वंशीध्वनि को सुनकर आर्यपथ से विचलित न हो जाये- आर्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम्। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए सुव्यवस्थित जीवन के लिए, आर्यचरित्र बहुत श्रेष्ठ वस्तु हैं, क्योंकि आर्यचरित्र से धर्म, अर्थ, भोग मिलें और अंततोगत्वा मोक्ष मिले। सालोक्य, सायुज्य, आदि भगवद्धाम की प्राप्ति होवे, ऐसा है आर्यचरित्र। लेकिन यह बाँसुरी इस आर्य-सत्य को गिरा देती है, विचलित कर देती हैं-
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं- त्रैलोक्यसौभगं यस्मात-
संसार में जितनी सुन्दरता देखने में आती है, शब्द में, स्पर्श में, रूप में, रस में, गंध में, जो भी सौन्दर्य मालूम होता है, वह कहाँ से आया?
यह सब भगवान में से आया है; यदि मूल उपादान में सौन्दर्य नहीं होगा तो कार्य में सौन्दर्य कहाँ से आवेगा? यह ईश्वर का ही सौन्दर्य है जो कहीं कोयल की आवाज में प्रकट होता है, तो कहीं मोर के गले में प्रकट होता है। वही ईश्वर आप में स्वाद होकर आया है तो कमल, गुलाब, बेला, चमेली में सुगन्ध होकर आया है। जैसे चुम्बक को देखकर लोहा खिंचता है, वैसे नीबू के रस को देखकर जीभ खिंचती है। तो जैसे जीभ को खींचने वाला चुम्बक नीबू में है, वैसे ही कान को खींचने वाला एक चुम्बक होता है, और त्वचा को खींचने वाला एक चुम्बक होता है। चुम्बक तो तरह-तरह का होता है। तो श्यामसुन्दर का रूप त्रिलोक के प्राणियों के लिए चुम्बक है।
‘त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं’ वे श्रीकृष्ण तो हमारी आँख के सामने हैं। जब तक भगवान सामने नहीं आवेंगे, तब तक प्रेम कैसे होगा? जिन्दगीभर भगवान को सातवें आसमान में रखोगे तो प्रेम नहीं होगा। जब साधारणीकरण हो, सातवें आसमान से भगवान धरती पर आवें, हमारे ध्यान का विषय बनें, हमारे नेत्र का बिषय बनें, तब वह हमारे प्रेम का विषय बने। यद्गोद्विजद्रुममृगाः- गोपियाँ कहती हैं- अरे! ब्रह्मा आदि की तो बात छोड़ो। तुम्हारे रूप को गायें देखती हैं तो ठगी सी देखती रह जाती हैं। गाय के मुँह में ग्रास और कान में वंशीध्वनि और आंख में श्यामसुन्दर का रूप और शरीर में रोमाञ्च। अब मुँह का ग्रास न भीतर जाता है, न बाहर जाता है।++
बछड़े के मुँह में दूध, कान में वंशीध्वनि और आँख में श्यामसुन्दर का रूप और शरीर में रोमाञ्च; अब वह न दूध को उगलता है और न निगलता है। और ये वृक्ष? महाराज, जब श्यामसुन्दर इनके पास से निकलते हैं या वृक्ष की छाया में बैठते हैं तो ये वृक्ष, फूल और फल की टोकरी अपने शिर पर लिये हुए खड़े रहते हैं। जब श्यामसुन्दर आते हैं- तो डालियाँ झुक जाती हैं- भगवान् के चरणों में फूल और फल चढ़ाते हैं और मधुधाराः प्रेमहृततरवः तस्त्यजिस्म- वृक्षों को रोमाञ्च होता है और उनसे मधुधारा क्षरण होती है। गोद्विजद्रममृगाः मोर नाचने लगता है कृष्ण को देखकर, कोयल कुहू-कुहू करने लगती है, सारस-हंस-विहंग शान्ति से बैठ जाते हैं और वृक्ष पर प्रायो बाताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन्- जैमिनिजी महाराज, कणादजी महाराज, बड़े बड़े दार्शनिक पक्षी, द्वैतवादी, अद्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी, विशुद्धद्वैतवादी, ये सबके सब महाराज पक्षी बन-बनकर बोलते हैं।
पक्षी क्यों बने? अरे। तुम्हारे बारे में ही तो चर्चा करते हैं, एक-एक पक्ष लेकर ये चर्चा करते हैं। भगवान् में यह सब द्वैतअद्वैत कुछ नहीं होता है, भला! न द्वैत और न अद्वैत, न द्वैताद्वैत न विशुद्धद्वैत न अचिन्त्याद्वैत। बोले- ‘किसी बहाने परमेश्वर की चर्चा करते हैं सब। जैसे- किसी के चार भगत हैं- और कोई पाँव का वर्णन करने लगे, कोई हाथ का वर्णन करने लगे, कोई मुखारविन्द का वर्णन करने लगे, तो उसमें क्या कोई लड़ाई है, द्वैष है? अरे! एक ही के सौन्दर्य का वर्णन कर रहे हैं। एक ने कहा दाहिनी आँख बड़ी सुन्दर, एक ने कहा बायीं आँख बड़ी सुन्दर! हो गयी लड़ाई, लेकिन दोनों ने लड़कर के भी यही सिद्ध किया कि दोनों आँखें बड़ी सुन्दर हैं। पक्षी हैं माने एक दक्षिणपक्षी है, एक वामपक्षी है; लेकिन ये दोनों पक्षी हैं। वेदरूपी वृक्ष की जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं उनके ऊपर बैठ करके- ग्यारह सौ इक्कीस शाखाएँ हैं और उनके ऊपर एक-एक शाखा के ऋषि जो हैं वे पक्षी बन-बनकर बैठे हैं और श्यामसुन्दर के सौन्दर्य को देख रहे हैं। शृण्वन्ति अमीलितदृशो विगतान्यवाचः आँख खुली है’ (अमीलितदृशः), वंशीध्वनि सुन रहे हैं और श्यामरूप देख रहे हैं; ये पक्षी हैं- द्विज हैं द्विज और हरिण महाराज?
धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता
या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम् ।
*आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः *
पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ।।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
🪻🪻🪻🪻🪻🪻
श्लोक 7 . 4
🪻🪻🪻🪻
भूमिरापोSनलो वायु: मनो बुद्धिरेव च |
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा || ४ ||
भूमिः – पृथ्वी; आपः – जल; अनलः – अग्नि; वायुः – वायु; खम् – आकाश; मनः – मन; बुद्धिः – बुद्धि; एव – निश्चय ही; च – तथा; अहंकार – अहंकार; इति – इस प्रकार; इयम् – ये सब; मे – मेरी; भिन्ना – पृथक्; प्रकृतिः – शक्तियाँ; अष्टधा – आठ प्रकार की |
भावार्थ
🪻🪻🪻
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार – ये आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना (अपर) प्रकृतियाँ हैं |
तात्पर्य
🪻🪻🪻
ईश्र्वर-विज्ञान भगवान् की स्वाभाविक स्थिति तथा उनकी विविध शक्तियों का विश्लेषण है | भगवान् के विभिन्न पुरुष अवतारों (विस्तारों) की शक्ति को प्रकृति कहा जाता है, जैसा कि सात्वततन्त्र में उल्लेख मिलता है –
विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरूषाख्यान्यथो विदुः |
एकं तु महतः स्त्रष्टृ द्वितीयं त्वण्डसंस्थितम् |
तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते ||
“सृष्टि के लिए भगवान् कृष्ण का स्वांश तीन विष्णुओं का रूप धारण करता है | पहले महाविष्णु हैं, जो सम्पूर्ण भौतिक शक्ति महत्तत्व को उत्पन्न करते हैं || द्वितीय गर्भोदकशायी विष्णु हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट होकर उनमें विविधता उत्पन्न करते हैं | तृतीय क्षीरोदकशायी विष्णु हैं जो समस्त ब्रह्माण्डों में सर्वव्यापी परमात्मा रूप में फैले हुए हैं और परमात्मा कहलाते हैं | वे प्रत्येक परमाणु तक के भीतर उपस्थित हैं | जो भी इस तीनों विष्णु रूपों को जानता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो सकता है |”
यह भौतिक जगत् भगवान् की शक्तियों में से एक का क्षणिक प्राकट्य है | इस जगत् की सारी क्रियाएँ भगवान् कृष्ण के इन तीनों विष्णु अंशों द्वारा निर्देशित हैं | ये पुरुष अवतार कहलाते हैं | सामान्य रूप से जो व्यक्ति ईश्र्वर तत्त्व (कृष्ण) को नहीं जानता, वह यह मान लेता है कि यह संसार जीवों के भोग के लिए है और सारे जीव पुरुष हैं – भौतिक शक्ति के कारण, नियन्ता तथा भोक्ता हैं | भगवद्गीता के अनुसार यह नास्तिक निष्कर्ष झूठा है | प्रस्तुत श्लोक में कृष्ण को इस जगत् का आदि कारण माना गया है | श्रीमद्भागवत में भी इसकी पुष्टि होती है | भगवान् की पृथक्-पृथक् शक्तियाँ इस भौतिक जगत् के घटक हैं | यहाँ तक कि निर्विशेषवादियों का चरमलक्ष्य ब्रह्मज्योति भी एक अध्यात्मिक शक्ति है, जो परव्योम में प्रकट होती है | ब्रह्मज्योति में वैसी भिन्नताएँ नहीं, जैसी कि वैकुण्ठलोकों में हैं, फिर भी निर्विशेषवादी इस ब्रह्मज्योति को चरम शाश्र्वत लक्ष्य स्वीकार करते हैं | परमात्मा की अभिव्यक्ति भी क्षीरोदकशायी विष्णु का एक क्षणिक सर्वव्यापी पक्ष है | आध्यात्मिक जगत् में परमात्मा की अभिव्यक्ति शाश्र्वत नहीं होती |अतः यथार्थ परमसत्य तो श्रीभगवान् कृष्ण हैं | वे पूर्ण शक्तिमान पुरुष हैं और उनकी नाना प्रकार की भिन्ना तथा अन्तरंगा शक्तियाँ होती हैं |
जैसा की ऊपर कहा जा चुका है, भौतिक शक्ति आठ प्रधान रूपों में व्यक्त होती है | इनमें से प्रथम पाँच – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश स्थूल अथवा विराट सृष्टियाँ कहलाती हैं, जिनमें पाँच इन्द्रियविषय, जिनके नाम हैं – शब्द, स्पर्श, रूप, रस, तथा गंध – सम्मिलित रहते हैं | भौतिक विज्ञान में ये ही दस तत्त्व हैं | किन्तु अन्य तीन तत्त्वों को, जिनके नाम मन, बुद्धि तथा अहंकार हैं, भौतिकतावादी उपेक्षित रखते हैं | दार्शनिक भी, जो मानसिक कार्यकलापों से संबंध रखते हैं, पूर्णज्ञानी नहीं है, क्योंकि वे परम उद्गम कृष्ण को नहीं जानते | मिथ्या अहंकार – ‘मैं हूँ’ तथा ‘यह मेरा है’ – जो कि संसार का मूल कारण है इसमें विषयभोग की दस इन्द्रियों का समावेश है | बुद्धि महत्तत्व नामक समग्र भौतिक सृष्टि की सूचक है | अतः भगवान् की आठ विभिन्न शक्तियों से जगत् के चौबीस तत्त्व प्रकट हैं, जो नास्तिक सांख्यदर्शन के विषय हैं | ये मूलतः कृष्ण की शक्तियों की उपशाखाएँ हैं और उनसे भिन्न हैं, किन्तु नास्तिक सांख्य दार्शनिक अल्पज्ञान के कारण यह नहीं जान पाते कि कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं | जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, सांख्यदर्शन की विवेचना का विषय कृष्ण की बहिरंगा शक्ति का प्राकट्य है |

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Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877