Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 46 )
गतांक से आगे –
॥ पद ॥
निर्गुन सगुन कहत जिहिं बेद ।
निज इच्छा विसतारि बिबिधि बिधि, बहु अन बहौ दिखावत भेद ॥
आप अलिप्त लिप्त लीला रचि, करत कोटि ब्रह्ममंड बिलास ।
सुद्ध सत्व पर के परमेस्वर, जुगलकिसोर सकल सुखरास ॥
अनंत सक्ति आधीस अचिंतक, ऐश्वर्यादि अखिल गुनधाम ।
सब कारन के कारन कर्ता, नित्य निमित्त नियंता स्याम ॥
सकल लोक चूडामनि जोरी, बोरी रस माधुर्य असेष ।
कोटि-कोटि कंदर्प दर्प दल-मलन, मनोहर बिसद सुवेस ॥
परावरादि असत सत स्वामी, निरवधि नामी नाम निकाय ।
नित्य सिद्ध सर्वोपरि हरिप्रिया, सब सुखदायक सहज सुभाय ॥ २० ॥
वन विहार करने युगलवर चले गए हैं …इस समय वो एकान्त में विहार करते हैं ।
हरिप्रिया सखी वहीं एक सुन्दर सरोवर की सीढ़ी में बैठ गयीं हैं ….मुझे मुड़कर बैठने का संकेत किया ….मैं उनसे एक सीढ़ी नीचे यानि उनके चरणों में बैठा । तुम क्या सोचते हो …..तुम्हारा जगत त्रिगुण से संचालित है ….है कि नही ? हरिप्रिया जी मेरी अब बौद्धिक क्षुधा को मिटाने में लगीं हैं ….ये सब जानती हैं …कि मैं इस “निकुँज रहस्य” को कैसे समझूँगा …मुझे मेरे स्तर पर अब समझाया जाएगा ….मैं समझ गया हूँ ….इसलिए मैं भी तन्मय होकर सुन रहा हूँ । त्रिगुण यानि सत्व गुण , रजो गुण और तमोगुण ….विशुद्ध सत्वगुण का ही नाम है “वसुदेव” और उस विशुद्ध सत्व में ही भगवान वासुदेव का प्राकट्य होता है …है ना ? ये कहकर हरिप्रिया जी मुझ से ही पूछने लगीं थीं ….मैंने सिर “हाँ” में हिलाया । यानि आधार शुद्ध सत्वगुण , उसमें विराजमान हैं भगवान वासुदेव ….और याद रहे …इन्हीं भगवान वासुदेव से ही समस्त ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है ….इन्हीं विशुद्ध सत्व से प्रकट वासुदेव को ही वेद सगुण और निर्गुण कहकर बखान करते रहते हैं ….क्यों की वेद भी समझ नही पाते ….ये वासुदेव तो सर्वतन्त्र स्वतन्त्र हैं ….एक से अनेक होते हैं ….फिर शून्य …शून्य से फिर विराट …ये लीला इनकी चलती ही रहती है …इसका पार और कौन कहें , वेद भी नही पाते । हरिप्रिया मेरी ओर ही देखकर बोल रहीं थीं….अच्छा , मायातीत होने से वासुदेव सबसे निराले हैं …यही सृष्टि का विस्तार भी करते हैं ….और अनेकानेक अवतार भी धारण करके लोक में धर्म की स्थापना करते हैं ….ये कहकर हरिप्रिया जी मेरी ओर बड़े ध्यान से देखने लगीं थीं …मानों वो जानना चाहती थीं ….कि मैं ये बातें अच्छे से समझ रहा हूँ या नही । जब वो आश्वस्त हुईं कि मैं समझ रहा हूँ तो वो आगे बोलीं ….अनन्त शक्ति अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न भगवान वासुदेव हैं किन्तु उनके भी मूल कारण हैं बृजेंद्र नन्दन नन्दनन्दन श्रीकृष्ण , लेकिन जानते हो …नन्दनन्दन के भी मूल स्वरूप हैं श्रीकुँज बिहारी श्यामा श्याम । क्यों की ये सत्व से भी परे हैं …..इनको हृदय में प्रकटाने के लिए सत्व नही …प्रेम आवश्यक है ….विशुद्ध प्रेम इनका स्वरूप है ….रस प्रदान करना ही इनका कार्य है …..स्मरण रहे ….रस ही इन निकुँज बिहारी का स्वरूप और स्वभाव है ….और समस्त अवतारों के भी अवतारी यही हरिप्रिया जी ने मुझे बड़ी सरलता से ये सिद्धान्त समझा दिया था कि ….त्रिगुण से भी परे प्रेम है ….विशुद्ध सत्वगुण से भी परे “रस” है …जो यहीं है…..श्रीवृन्दावन में , और यहाँ के नायक और नायिका उसी रस में स्वयं डूबे रहते हैं और हम सखियों को भी डुबाये रहते हैं ….सखियाँ यानि जो इस रस की चातक बनी हैं ….और स्वाति बूँद रूप युगल के रूप जल की अभिलाषा करती रहती हैं ….निरन्तर पान करती हैं ….फिर भी प्यासी की प्यासी रहती हैं ……ये रस किसी काल में प्रवाहित हुआ था ऐसा नही है ….किसी काल में प्रवाहित होगा ऐसा भी नही है ….इस रस की धारा शाश्वत बह रही है ….अनादिकाल से श्रीवृन्दावन में …..यही रासेश्वरी रासेश्वर ही सबके मूल में हैं ….यानि रस ही सबका मूल है ।
हरिप्रिया जी बोलीं – समझीं ? मैंने अपना सिर सखी जी के चरणों में रख दिया था ।
] Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (127)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों की चाहत
ध्वनि है महावाक्य, कलपद, और बाँसुरी है ब्रह्मविद्या और गुरु हैं स्वयं श्रीकृष्ण- कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्। यह ऐसी ध्वनि है। तो बोलीं- यह ध्वनि नहीं, यह तुम्हारा रूप भी तो सर्व संहारक है। भगवान् का रूप विचित्र है। कल बताया था- यह जड़ पदार्थ के धर्म को नहं रहने देता और पशु के धर्म को भी नहीं रहने देता। वृक्ष झुक जाते हैं फल-फूल लेकर के श्रीकृष्ण के चरणों में; पत्ते हवा करते हैं और वृक्षों के शरीर से मधुक्षरण होता है।
वृन्दावन में एक वृक्ष था। अभी थोड़े दिन पहले तक वह मधु-क्षरण करता था। नन्दगाँव और बरसाने के बीच एक द्विमिलवन पड़ता है; जहाँ दोनों मिले उसका नाम द्विमिल। उस वन में एक वृक्ष था; वृक्ष तो था काला-काला, उसका नाम किसी को मालूम नहीं था; उसमें एक सफेद-सफेद लता लिपटी हुई थी; वृक्ष भी बड़ा प्रबल था और लता भी मोटी थी। उसके जड़ में एक जगह से रस टपकता था; तो पहले महात्मा लोग अपना कमण्डल उसमें लगा देते थे और रस लेते और पी लेते थे।
जब तक महात्मालोग पीते रहे तब तक तो वह रस देता रहा, पर जब पण्डे-पुजारियों ने उसे घेर लिया और उस पर दक्षिणा आदि चढ़ने लगी तब उसने मधुदान करना बंद कर दिया। अभी वह वृक्ष है, भला! वंशीध्वनि सुनकर वृक्षों से मधुक्षरण होता था, गाय के थन से दूध गिरने लगता था, बछड़े की आँख से आँसू-गिरने लगते थे, मोर नाचने लगते थे, विचित्र है सब! बोले- यह क्या? तो देखो, हम कोई शास्त्रपुराण नहीं जानते हैं, कोई दर्शनशास्त्र का अनुसंधान नहीं करते। श्रीकृष्ण के प्रेम में प्रमाण की प्रवृत्ति नहीं है।
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्यरूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ।
वंशी-ध्वनि सुनकर इंद्रियाँ मोहित हो गयीं और अमृतपान करके प्राण तृप्त हो गये और कलपद सुनकर के अंतःकरण तन्मय हो गया और अव्यक्त ने जीव को परमात्मा से एक कर दिया। गोपी और श्रीकृष्ण एक में मिल गये।+
सारे प्रमाण किसलिए हैं, आप जानते हैं? धर्म किसके लिए हैं? श्रीमद्भागवत में तो इसका बड़ा विचार है-
त्यक्त्वा स्वधर्म चरणाम्बुजं हरेर्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि ।
यत्र क्वा वाभद्रमभूदमुष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ।।
एक आदमी ने अपना धर्म तो छोड़ दिया और वृन्दावन में रहता है। तो बाह्यधर्म का तो लोप हो गया लेकिन वह भगवच्चरणारविन्द का भजन कर रहा है- त्यक्त्वा स्वधर्म चरमाम्बुज हरेर्भजन्। अभी भजन परिपक्व नहीं हुआ और मर गया तो क्या होगा उसका? देखो- धर्म छोड़ दिया इसलिए क्या वह नरक में जायेगा? और भजन पूरा नहीं हुआ इसलिए भगवान् उसे मिलने नहीं चाहिए। तो उसकी क्या गति होगी? नारायण!! वह नरक में नहीं जायेगा क्योंकि उसने भगवान् के चरणारविन्द का भजन किया है-
नहि कल्याणकृत्कश्चित् दुर्गतिं तात गच्छति ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।
जो भगवद्भजन करता है, उसका अकल्याण अमंगल कभी नहीं हो सकता; इस लोक में, परलोक में, जीवन में, मरण में, कहीं उसका अमंगल नहीं है। अब समझो, एक आदमी है, वह भक्ति तो करता है लेकिन बाह्य आचार-विचार पर उसकी आस्था नहीं है तो क्या उसका अमंगल हो जायेगा? बोले- नहीं। और बहुत आचार-विचार किया लेकिन भगवान् की भक्ति नहीं की, तो क्या पाया? अगर मालिक तुमसे खुश नहीं हुआ तो तुमने दिनभर पाँव पीटकर, शिर पीटकर किया क्या? जितना धर्म-कर्म है सब परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए है क्योंकि परमेश्वर की प्रसन्नता के बिना धर्म-कर्म अपना फल देने में समर्थ नहीं है यह वेदान्त का सिद्धांत है : ‘फलमत उपपतेः’। कर्म जड़ है, वह स्वयं फल नहीं दे सकता; ईश्वर देखता है कि इसने हमारे सम्मुख होकर के कर्म किया है कि विमुक होकर कर्म किया? जो सम्मुक होकर कर्म करता है उसको ईश्वर अपने पास बुला लेता है और जो विमुख होकर कर्म किया? जो सम्मुख होकर कर्म करता है उसको ईश्वर अपने पास बुला लेता है और जो विमुख होकर कर्म करता है उसको ईश्वर संसार में भेज देता है, और विमुखता में भी अच्छा कर्म करें तो स्वर्ग भेज देता और बुरा कर्म करे तो नरक में भेज देता है। और जो सम्मुख करके कर्म करे तो उससे ईश्वर प्रसन्न होता है। ईश्वर को रिझाने के लिए करता है न!++
भगवान के सामने चाहे नाचें, चाहे गावें, चाहे तान तोड़े, जैसे मौज हो वैसे रहें, पर भगवान के सामने रहें। सब धर्मों का फल यह है कि भगवान के चरणों में भक्ति हो, भगवान के चरणों में प्रीति बढ़े।
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वसेनकथासु यः ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ।।
एक आदमी ने धर्म तो खूब किया- खूब दान किया, कृच्छ्र- चांद्रायणादि बड़े-बड़े व्रत किये और खूब होम किए, यज्ञ किये, लेकिन भगवान की कथा नहीं सुनी और भगवान के चरणों में प्रीति नहीं हुई, तो वह धर्म क्या है? कि- ‘श्रम एव हि केवलम्’ वह केवल श्रम ही है। उसने केवल मेहनत- मजदूरी की, क्योंकि जो रस जीवन में आना चाहिए था वह रस तो जीवन में आया नहीं। इसी से श्रीमद्भागवत में बताया कि सब धर्मों से बड़ा धर्म क्या है कि-
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः ।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ।।
इस मनुष्य-जीवन में, इस लोक में इतना ही धर्म है कि यह जीव भगवान के सामने आरती की लौ की तरह भगवान के चरणों में निछावर हो जाय। बड़प्पन बढ़ने में जीवन की सफलता नहीं; अभिमान पर तो कभी न कभी चोट लगेगी ही, चाहे मूढ़तावश अभिमान हो, चाहे राग का अभिमान हो, चाहे धर्म का अभिमान हो, चाहे योग का या ज्ञान का अभिमान हो। संसार की प्रकृति को बदल देने का सामर्थ्य भगवान के रूप में, भगवान की वंशीध्वनि में-
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ।
ऐसा वर्णन मिलता है और हमने देखा भी है कि जो लोग भगवान का ध्यान करते हैं और यदि उनका ठीक-ठीक ध्यान लग जाता है, तो उनका शरीर बदल जाता है।+++
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
श्लोक 7 . 6
🌸🌸🌸🌸
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय |
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा || ६ ||
एतत् – ये दोनों शक्तियाँ; योनीनि – जिनके जन्म के स्त्रोत, योनियाँ; भूतानि – प्रत्येक सृष्ट पदार्थ; सर्वाणि – सारे; इति – इस प्रकार; उपधारय – जानो; अहम् – मैं; कृत्स्नस्य – सम्पूर्ण; जगतः – जगत का; प्रभवः – उत्पत्ति का करण; प्रलयः – प्रलय, संहार; तथा – और |
भावार्थ
🌸🌸🌸
सारे प्राणियों का उद्गम इन दोनों शक्तियों में है | इस जगत् में जो कुछ भी भौतिक तथा आध्यात्मिक है, उसकी उत्पत्ति तथा प्रलय मुझे ही जानो |
तात्पर्य
🌸🌸🌸
जितनी वस्तुएँ विद्यमान हैं, वे पदार्थ तथा आत्मा के प्रतिफल हैं | आत्मा सृष्टि का मूल क्षेत्र है और पदार्थ आत्मा द्वारा उत्पन्न किया जाता है | भौतिक विकास की किसी भी अवस्था में आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती, अपितु यह भौतिक जगत् आध्यात्मिक शक्ति के आधार पर ही प्रकट होता है | इस भौतिक शरीर का इसीलिए विकास हुआ क्योंकि इसके भीतर आत्मा उपस्थित है | एक बालक धीरे-धीरे बढ़कर कुमार तथा अन्त में युवा बन जाता है, क्योंकि उसके भीतर आत्मा उपस्थित है | इसी प्रकार इस विराट ब्रह्माण्ड की समग्र सृष्टि का विकास परमात्मा विष्णु की उपस्थिति के कारण होता है | अतः आत्मा तथा पदार्थ मूलतः भगवान् की दो शक्तियाँ हैं, जिनके संयोग से विराट ब्रह्माण्ड प्रकट होता है | अतः भगवान् ही सभी वस्तुओं के आदि कारण हैं | भगवान् का अंश रूप जीवात्मा भले ही किसी गगनचुम्बी प्रासाद या किसी महान कारखाने या किसी महानगर का निर्माता हो सकता है, किन्तु वह विराट ब्रह्माण्ड का कारण नहीं हो सकता | इस विराट ब्रह्माण्ड का स्त्रष्टा भी विराट आत्मा या परमात्मा है | और परमेश्र्वर कृष्ण विराट तथा लघु दोनों ही आत्माओं के कारण हैं | अतः वे समस्त कारणों के कारण है | इसकी पुष्टि कठोपषद् में (२.२.१३) हुई है – नित्यो नित्यानां चेतनश्र्चेतनानाम् |
Niru Ashra: 🌲☘️🌲☘️🌲☘️🌲
!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 147 !!
“श्रीदामा भैया” का महाभाव
भाग 2
🙇♀️🙇♀️🙇♀️🙇♀️🙇♀️🙇♀️
मेरी बहन राधा ………जब जा रही थी ……….तो वो एक बार बोली …..भैया ! आप चलो ………..पर मैं बस रो गया ……….लाली ! कन्हैया को कहना……..श्रीदामा ही अपराधी है तुम दोनों का ……
आज जो तुम इतना रो रही हो, विरहाग्नि में जलती हो …………उसका दोषी अगर कोई है तो ये तेरा श्रीदामा भैया ही है………..
वो दिन ! ………..गोलोक की लीला…….मैं श्रीदामा खो गया था …….मेरी बहन बोलती रही श्रीदामा भैया ! श्रीदामा भैया ।
बैल गाड़ियाँ चल दीं थीं………………
मैं गोलोक से “कुञ्ज” में गया था………..
श्रीदामा खड़े खड़े उस गोलोक – कुञ्ज में घटी घटना का स्मरण कर रहे हैं ।
कन्हैया ! कन्हैया !
चारों ओर आवाज देता हुआ कुञ्ज में प्रवेश किया था मैने ...........पर मुझे कोई नही दीखा .........हाँ दूर तमाल वृक्ष के नीचे..........श्रीराधा और कन्हैया बैठे थे ।
पर मैं जब वहाँ पहुँचा ………..तो मुझे अच्छा नही लगा ………मेरा कन्हैया श्रीराधा के चरणों में झुका हुआ था ………और श्रीराधा मुँह फेर कर मानिनी बनीं बैठीं थीं ।
मैं कुछ देर तक खड़ा ही रहा…………हा हा खाते रहे कन्हैया ……..पर श्रीराधा कि अपनी ठसक ………….
मुझ से रहा नही गया …….मैने कहा ………राधे ! तुमको कन्हैया से इतना मान …..बात बात में मान करना उचित नही है ………देखो ! बेचारे कितनें दुःखी हो रहे हैं………ऐसा भी क्या मान ?
पर श्रीराधा नें मेरी बात का कोई उत्तर नही दिया ………….
कुछ देर बाद भी जब यही सब चलता रहा ………….
तब मैने क्रोध में आकर कह दिया………..कभी सौ वर्ष का वियोग होगा ना …….तब पता चलेगा कि कन्हैया का विरह क्या होता है ?
मेरे मुँह से ये क्या निकल गया था ! मेरी ओर देखा श्रीराधा नें और
कन्हैया नें भी ……….तब मुझे अपराध बोध हुआ …………..मैंने क्षमा माँगीं ………….पर कन्हैया मुस्कुरा कर बोले ……….अब तो लीला होगी ……….अवतार काल में यह लीला होगी ……सौ वर्ष का वियोग हम दोनों का होगा ।
मैं पश्चाताप की अग्नि में झुलसता रहा…………पर ।
मैं ही हूँ अपराधी………अपनी बहन राधा का अपराधी ……..कन्हैया का अपराधी………इस वृन्दावन का अपराधी ………यहाँ के प्रत्येक जीव जन्तु का अपराधी….. डुबो दिया मैने इस सम्पूर्ण वृन्दावन को विरहकुण्ड में ।
श्रीदामा प्रेमोन्माद से भर जाते हैं ।
बैठक में जाता हूँ …….वहाँ मन नही लगता………मुखिया बना दिया है मुझे……….यहीं से गहवर वन दिखाई देता है………कल एक गोप कह रहा था कि गहवर वन में अभी भी सखियाँ और राधा लाली बैठती हैं ……..उनकी आवाज सुनी है मैने ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल-
🦜 राधे राधे🦜


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877