Niru Ashra: 🌲☘️🌲☘️🌲☘️🌲
!!”श्रीराधाचरितामृतम्” 147 !!
“श्रीदामा भैया” का महाभाव
भाग 3
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मैं ही हूँ अपराधी………अपनी बहन राधा का अपराधी ……..कन्हैया का अपराधी………इस वृन्दावन का अपराधी ………यहाँ के प्रत्येक जीव जन्तु का अपराधी….. डुबो दिया मैने इस सम्पूर्ण वृन्दावन को विरहकुण्ड में ।
श्रीदामा प्रेमोन्माद से भर जाते हैं ।
बैठक में जाता हूँ …….वहाँ मन नही लगता………मुखिया बना दिया है मुझे……….यहीं से गहवर वन दिखाई देता है………कल एक गोप कह रहा था कि गहवर वन में अभी भी सखियाँ और राधा लाली बैठती हैं ……..उनकी आवाज सुनी है मैने ।
पागल हो गए हैं सब लोग……….मैनें उससे कहा……..राधा तो द्वारिका गयी है …….सखियाँ सब गयीं हैं………….
तो कहनें लगा ………..नही भैया ! आपको विश्वास न हो तो चलिए मेरे साथ……….वहीँ बैठक होती है सखियों की ……..अपनी राधा लाली भी वहीँ बैठी रहती हैं ।
मैं कुछ नही बोला ……..पर मुझे पदचाप सुनाई देते हैं राधा के ।
राधा की पायल बजती हुयी………..फिर एकाएक खिलखिलानें की आवाज………फिर दूर से “भैया ! श्रीदामा भैया !
पर ये आवाज रूकती है ……..तो दूसरी शुरू हो जाती है …………
श्रीदामा ! कहाँ गया तू ? कन्हैया की पुकार ……….
रात में कभी नींद नही आती तो बाहर निकल जाता हूँ …………..
तब – नींद नही आरही ? कन्हैया पीछे से आकर आँखें बन्द कर देता है ………मैं कैसे कहूँ कि – मेरा भ्रम है………ये कमल का पुष्प उसी नें दिया है मुझे ………क्या ये कमल का फूल नही है ?
सब कहते हैं ……है …………फिर इसका मतलब ………कि दोनों मेरे प्राण यहीं हैं ………….वो नही गए कहीं ……….यही सच है ।
हाँ ……बाहर के लोगों को बतानें के लिये …..मथुरा द्वारिका ……..पर सच्चाई यही है कि …….ये दोनों युगल यहीं हैं …………..
वो ग्वाला कह रहा था………..कि सखियों की मण्डली अभी भी गहवर वन में चलती रहती हैं………………
मुझे अब उस ग्वाले की बातें सत्य लगनें लगी है …………..
कह रहा था कल – विश्वास करो भैया ! कन्हैया और राधालाली यहीं हैं ……………
हाँ ……….मुझे भी कल अन्धकार में से कन्हैया की आवाज सुनाई दे रही थी……..उसकी हँसी ………उसकी खनकती आवाज ……
श्रीदामा ! मेरे साथ ही साथ तो चल रहा था वो………….
तू भी यही समझता है कि …….मैं वृन्दावन छोड़कर चला गया ! अरे ! मैं वृन्दावन कैसे छोड़ सकता हूँ श्रीदामा ! ……….मैं यहीं हूँ …………मैं वृन्दावन की रज में , लताओं में , यहाँ की हवाओ में ……..सर्वत्र मैं ही मैं हूँ …………फिर मैने ध्यान से देखा तो उसके बाम भाग से बहन राधा प्रकट हो गयी……..भैया ! मैने उसे छूकर देखा ………नही मेरा कोई भ्रम नही था………वो सच में यहीं हैं……….वो वृन्दावन छोड़कर जाते नही हैं ……….ये कुछ लीला कर रहे हैं ……..दोनों मिलकर लीला कर रहे हैं ……..लीला धारी जो हैं …………….
हा हा हा हा हा ………..श्रीदामा हँसते हैं अकेले अकेले ………….
दूर महल से कीर्ति मैया अपनें पुत्र को देखती हैं ……..उनकी स्थिति देखती हैं …….तो बस रो देती हैं ।
शेष चरित्र कल-
🦜 राधे राधे🦜
Niru Ashra: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 47 )
गतांक से आगे –
॥ दोहा ॥
तिहिं समानि बड़भाग को, सो सबकें सिरमोर ।
मन बच क्रम सर्बस सदा, जिनकें जुगलकिसोर ॥
॥ पद ॥
जिनकें सर्बस जुगलकिसोर ।
तिहिं समानि अस को बड़भागनि, गनि सबकें सिरमोर ॥
नित्यबिहार निरंतर जाकौ, करत पान निसभोर ।
श्रीहरिप्रिया निहारत छिन-छिन, चितै चखिन की कोर ॥ २१ ॥
*मुझे हरिप्रिया सखी जी ने उठाकर अपने हृदय से लगा लिया था …..तू बहुत भाग्यशाली है …और सच ये है जिनके युगल सरकार सर्वस्व हैं …उनके समान और कोई भाग्यशाली हो नही सकता । ये कहते हुए गदगद हो रहीं थीं ……देखो ! संसार में सबसे ज़्यादा भाग्यशाली वो है जिसके मन में मुमुक्षा ने जन्म लिया है ….यानि जिसके मन में मुक्ति की कामना जाग गयी है ….किन्तु उससे भी ज़्यादा भाग्यशाली तो वो है …जो भक्ति के पथ पर चल चुका है ….भक्ति मुक्ति से ऊँची वस्तु है …..हरिप्रिया जी कहती हैं ….भक्ति से भी ऊँचा है …विशुद्ध रूप से हरि चरण का आश्रय ले लेना ….उन चरणों के सामने त्रिभुवन की सम्पदा भी तुच्छ लगे …ये स्थिति उससे भी ऊँची है …..भगवत्चरणारविन्द को छोड़कर जिसे और कुछ नही चाहिए ….पर ये ध्यान रखना इसमें भी भगवान द्वारिकानाथ के चरणों की भक्ति करने वाला महाभाग्यशाली कहलाता है …किन्तु – द्वारिकाधीश के प्रेमियों से भी ऊँची स्थिति है …नन्दनन्दन के प्रेमियों की …..मनसुख आदि सखाओं का प्रेम …ये सबसे ऊँचा है …..हरिप्रिया जी आगे बोलीं …लेकिन मनसुख आदि से भी प्रशंसनीय प्रेम है ….गोपियों का ….जो पूर्ण निष्काम की धनी है …पर स्मरण रहे ……इन सबसे भाग्यवान वो प्रेमी है …जो नित्य विहार की उपासना में लीन रहता है ….विशुद्ध सखीभाव धारण करके अपने युगल किशोर को रिझाता है ….वही साधक अन्य समस्त साधकों का शिरमौर है ….यानि सबसे ऊँचा है ।
ऐसा क्यों ? मैंने भी ये पूछ लिया ।
इसलिए कि …..मनसा , वाचा , कर्मणा तीनों प्रकार से ये साधक अपने आराध्य को रिझाता है …और रिझाने में कोई कामना भी नही रखता …..अरे ! हम सखियाँ तो ये कामना भी नही रखतीं कि युगल सरकार हमें देखें ….ये आपस में ही देखते रहें …और प्रसन्न रहें । इनकी प्रसन्नता में ही हमारी प्रसन्नता है …ये साधना और कहीं नही मिलेगी तुम्हें । मैं कह रही थी ….हरिप्रिया आगे बोलीं ….ये सखीभाव की उपासना में ….मन से ध्यान है युगल सरकार का ….कहीं एकान्त में बैठ जाओ …और निकुँज की भावना में खो जाओ …..इसके वाणी से उनके गुणों का गान करो ….कुछ नही तो युगल मन्त्र को गाओ …जपो ….नामाकार हो जाओ ….युगल का मधुर नाम तुम्हारे साँस साँस में उतर आए …..ये वाणी की उपासना है ….इसके बाद कर्म से युगल को रिझाओ …भोग लगाओ ….आरती करो ….उनको सजाओ …..दर्पण दिखाओ ….प्रिया जी को कुछ देर और दिखाते रहो दर्पण …..ये पूर्ण हुआ ….ये पूर्णतम हुई साधना ….इसे करो …..जब भी इधर उधर मन जाए जाने दो किन्तु कुछ ही देर में उसे वापस ले आओ निकुँज में ….और भावना करो कि युगल सरकार विराजमान हैं …हम उन्हें निहार रहे हैं …निहारते हुए डूब रहे हैं उनकी रूप माधुरी में । उनको बीच बीच में टेढ़ी नज़र से देखते रहो ….तुम धन्य हो । जो ऐसा कर ले …वो धन्य है …जिनके जीवन में युगल सरकार आगये ….जिनके जीवन ही युगल सरकार बन गये वो धन्य हैं धन्य हैं धन्य हैं ….ये कहते हुए हरिप्रिया जी के नेत्रों से करुणा बरस रही थी ।
शेष अब कल –
Niru Ashra: महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (128)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों की चाहत
शास्त्र में लिखा है- जातिपरिवृत्तिः प्रकृत्यापूरात्- हमने ध्यान करते-करते पुरुष को स्त्री-सरीखा देखा है, ध्यान करते-करते बुड्ढे को जवान होते देखा है। भीतर का जो मन है, वह जब सूक्ष्म शरीर बदल गया और रासलीला हो गया, वह आनन्द से, ज्ञान से, सत्ता से तृप्त हो गया, वह श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि और उनके रूप-सौन्दर्य और उनकी रूप-माधुरी से परिपूर्ण हो गया, वह सूक्ष्म शरीर जब तृप्त हो गया, तब स्थूल शरीर तृप्त हो जाय इसमें आश्चर्य क्या है?
गाय बदल जाय, पेड़ बदल जाय, चिड़िया बदल जाय, हरिणी पशु बदल जाय; दूसरे शब्दों में जो प्रमेय के धर्म में परिवर्तन कर दे, तो आश्चर्य ही क्या है! तो आओ, गोपियों ने कहा कि न हम लक्ष्मी को दोष लगाते हैं बाबा! न दुनिया में किसी सती-सावित्री को दोष लगाते हैं; परंतु हमने तो तुम्हारी वंशीध्वनि सुनी है। क्या कभी किसी सती-सावित्री ने, जिनकी बड़ी महिमा है सृष्टि में, वंशी-ध्वनि सुनी थी? दोष तो है सारा तुम्हारी वंशीध्वनि का। तुमने अपनी वंशी के द्वारा प्रणय-निमंत्रण देकर हमको अपने पास बुला लिया और अब कहते हो कि लौट जाओ। जो तुम्हारे पास आकर लौट जाती होंगी वे स्त्री कोई दूसरी होंगी। ये गोपी हैं गोपी, ये लौटना नहीं जानती हैं।
अब इसका नतीजा क्या होगा- मालूम है? गोपियों के अंदर दैन्य आ गया, शरणागति का भाव आ गया। उनके मन में आया कि हमारे प्रयत्न से कुछ नहीं होगा, हमारे साधन से कुछ नहीं होगा, इनकी कृपा से ही सब कुछ होगा। अब मर्यादा नहीं, पुष्टि। श्रीरामानुज-सम्प्रदाय में बोलते हैं- एक क्रियायोग और एक प्रपत्ति। क्रियायोग माने दिनभर पूजा करते हैं, न्यास आदि करते हैं, चन्दन लगाते हैं, माला पहनाते हैं, आरती करते हैं, वारम्बार स्नान करते हैं- यह सब क्रियायोग है। मूर्ति में न्यास करते हैं, अपने शरीर में भी न्यास करते हैं। और भगवान् मिलते हैं कब?+
कि प्रपत्ति के द्वारा। इसमें भी शरणागति और प्रपत्ति- ये दो शब्द हैं उनके; चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय में बोलते हैं- साधनभक्ति और प्रेमलक्षणा भक्ति या वैधीभक्ति और प्रेमलक्षणा भक्ति। श्रीवल्लभ- सम्प्रदाय में बोलते हैं- मर्यादा और पुष्टि। तो बोलीं कि हम मर्यादा में तो तुम्हारी ओर चल रही थीं लेकिन बाँसुरी बजाकर मर्यादा को तो तुमने भंग कर दिया। अब पुष्टि देना तुम्हारे हाथ में है। लड़ाई-झगड़े से तो कोई काम बनने वाला नहीं है। लेकिन तुम्हारे अवतार का प्रयोजन ही व्यर्थ जाता है यदि तुम हमको स्वीकार नहीं करते-
व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो,
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ताः ।
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो तप्तस्तनेषु
च शिरसस्सु च किंकरीणाम् ।।
यह प्रेम जो है न, वह आचार को छोड़ देता है। प्रेम का ऐसा निरूपण आता है कि प्रेम का एक समुद्र है। राधा और कृष्ण इसमें दो तरंगें हैं, प्रेम ही राधा को राधा बनाता है और कृष्ण को कृष्ण बनाता है, और फिर दोनों को लाकर मिलाता है; फिर कृष्ण साँवरेपन को छोड़कर गोरे हो जाते हैं और राधा अपने गोरेपन को छोड़कर साँवरी हो जाती हैं। फिर कृष्ण जब राधा से मिलने के लिए चलते हैं तो मिलन के वेग में देखो- मिलन नहीं होता- कृष्ण के मन में जब मिलन का वेग उदित होता है तो वे राधा हो जाते हैं और जब राधा के मन में मिलन का वेग हो जाता है तो वे कृष्ण हो जाती हैं। ये दोनों कौन हैं? कि प्रेम हैं। राधाकृष्ण दोनों का कोई मालिक है? बोले- हाँ, है। कौन? कि प्रेम। सबके मालिक हैं राधाकृष्ण और राधाकृष्ण का मालिक है प्रेम। वह राधाकृष्ण की सृष्टि करता है, उनको नया-नया रूप देता है, उनको पुष्ट करता है, उनको अपने अन्दर मिला लेता है और वे अपने आपको भूलकर प्रेमरूप हो जाते हैं। प्रेम है अखण्ड सच्चिदानन्दरस, रसघन, आनन्दघन और उसमें दो आकृति हैं- एक राधा और एक कृष्ण और उसमें भी नियत आकृति नहीं है- राधा कृष्ण और कृष्ण राधा।
न आदि न अन्त विलास करैं दोउ, लाल प्रिया में भयी न चिह्नारी ।
सदा एक रस एक अखण्डित आदि अनादि अनूप ।
कोटि कलप बीतत नहिं जानत, विहरत युगल स्वरूप ।।
राधा और कृष्ण- ये आदिदम्पति हैं, अनादियुगल, अनादिदम्पति हैं; उपादान दोनों का एक है प्रेम और उसमें कभी स्त्री-आकृति पुं-आकृति हो जाती है और कभी पुरुष-आकृति स्त्री-आकृति हो जाती है।++
प्रेम में अहं नहीं होता; अहं कठोर है और प्रेम कोमल है। ज्ञान जो है वह तो कठोर है, वह कठोपनिषद् है; और प्रेम जो है यह तो कोमल है, यह कमलोपनिषद् है। तो यह जो अहं है- मैं-मैं, वही कठोर है, ब्रह्म कठोर नहीं है, यह अहं नहीं छूटता, पकड़कर बैठ जाता है। तो-
व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो,
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ताः ।
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो
तप्तस्तनेषु च शिरसस्सु च किंकरीणाम् ।।
देखो कृष्ण! इतनी बात तो स्पष्ट है, इसमें कोई तर्क-वितर्क- युक्ति की जरूरत नहीं है। भवान् व्रज भयार्तिहरोऽभिजातः- आप व्रज के भय और आर्ति इन दोनों का नाश करने के लिए पैदा हुए हो, क्योंकि व्रज में कंस आदि की जो पीड़ा है, आर्ति है इन दोनों को तुमने मिटा दिया; फिर हमें जो तुम्हारे विरह का भय हो गया है कि कहीं तुम हमें छोड़ न दो और इस समय तुम्हारी उपेक्षा से जो हमको पीड़ा हो रही है- विरह का भय और उपेक्षा से पीड़ा, आर्ति- उसको तुम दूर क्यों नहीं करोगे! अर्थात् करोगे ही, करना तुम्हारा दायित्व है। यहाँ गोपी ने अपना नाम लिया है- व्रज का नाम लिया है- व्रजभयार्तिहरः। जैसे राय अपनी होती है और बोलते हैं सबकी यही राय है। आप लोग नेताओं का भाषण सुनते होंगे; वे कहते हैं- यह आप लोगों की माँग है, आप लोगों की आवाज है, मैं अपनी बात थोड़े ही कह रहा हूँ।
इसी प्रकार गोपियाँ कहती हैं- ‘व्रजभयार्तिहरोऽभिजातः’ व्रज में जब-जब भय आया, जब-जब कोई आर्ति आयी, पीड़ा आयी, उस भय और पीड़ा को तुमने दूर किया। गोपी बोल रही हैं व्रज की बात लेकिन उसे अपने लिए बोल रही हैं। कहती हैं- इस समय जो तुम उपेक्षा कर रहे हो उससे इस समय हमारे प्राण पीड़ित हो रहे हैं और आगे कहीं छोड़ न दो। उससे भय है रहा है। यदि तुम हमारे भय और पीड़ा को दूर नहीं करते तो तुम्हारी बड़ी बदनामी होगी, क्योंकि सारा व्रज जानता है कि तुम व्रजवासियों के भय और आर्ति को मिटाने के लिए आये हो और यदि तुम हमारी उपेक्षा कर ही दोगे या हमको विरह दे दोगे तो हम सब मर जायेंगी। और मर जायेंगी तो कल सबेरे क्या होगा जानते हो?
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
[] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
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श्लोक 7 . 7
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मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव || ७ ||
मत्तः – मुझसे परे; पर-तरम् – श्रेष्ठ; न – नहीं; अन्यत् किञ्चित् – अन्य कुछ भी; अस्ति – है; धनञ्जय – हे धन के विजेता; मयि – मुझमें; सर्वम् – सब कुछ; इदम् – यह जो हम देखते हैं; प्रोतम् – गुँथा हुआ; सूत्रे – धागों में; मणि-गणाः – मोतियों के दाने; इव – सदृश |
भावार्थ
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हे धनञ्जय! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है | जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है |
तात्पर्य
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परमसत्य साकार है या निराकार, इस पर सामान्य विवाद चलता है | जहाँ तक भगवद्गीता का प्रश्न है, परमसत्य तो श्रीभगवान् श्रीकृष्ण हैं और इसकी पुष्टि पद-पद पर होती है | इस श्लोक में विशेष रूप से बल है कि परमसत्य पुरुष रूप है | इस बात की कि भगवान् ही परमसत्य हैं, ब्रह्मसंहिता में भी पुष्टि हुई है – ईश्र्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः – परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण ही हैं, जो आदि पुरुष हैं | समस्त आनन्द के आगार गोविन्द हैं और वे सच्चिदानन्द स्वरूप हैं | ये सब प्रमाण निर्विवाद रूप से प्रमाणित करते हैं कि परं सत्य पुरुष हैं जो समस्त कारणों का कारण हैं | फिर भी निरीश्र्वरवादी श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१०) उपलब्ध वैदिक मन्त्र के आधार पर तर्क देते हैं – ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयं | य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति – “भौतिक जगत् में ब्रह्माण्ड के आदि जीव ब्रह्मा को देवताओं, मनुष्यों तथा निम्न प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है | किन्तु ब्रह्मा के परे एक इन्द्रियातीत ब्रह्म है जिसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता और वो समस्त भौतिक कल्मष से रहित होता है | जो व्यक्ति उसे जान लेता है वह भी दिव्य बन जाता है, किन्तु जो उसे नहीं जान पाते, वे सांसारिक दुखों को भोगते रहते हैं |”
निर्विशेषवादी अरूपम् शब्द पर विशेष बल देते हैं | किन्तु यह अरूपम् शब्द निराकार नहीं है | यह दिव्य सच्चिदानन्द स्वरूप का सूचक है , जैसा कि ब्रह्मसंहिता में वर्णित है और ऊपर उद्धृत है | श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् के अन्य श्लोकों (३.८-९) से भी इसकी पुष्टि होती है –
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् |
तमेव विद्वानति मृत्युमति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ||
यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद् यस्मान्नाणीयो नो ज्यायोऽति किञ्चित् |
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ||
“मैं उन भगवान् को जानता हूँ जो अंधकार की समस्त भौतिक अनुभूतियों से परे हैं | उनको जानने वाला ही जन्म तथा मृत्यु के बन्धन का उल्लंघन कर सकता है | उस परमपुरुष के इस ज्ञान के अतिरिक्त मोक्ष का कोई अन्य साधन नहीं है |”
“उन परमपुरुष से बढ़कर कोई सत्य नहीं क्योंकि वे श्रेष्ठतम हैं | वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं और महान से भी महानतर हैं | वे मूक वृक्ष के समान स्थित हैं और दिव्य आकाश को प्रकाशित करते हैं | जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ें फैलाता है, ये भी अपनी विस्तृत शक्तियों का प्रसार करते हैं |”
इस श्लोकों से निष्कर्ष निकलता है कि परमसत्य ही श्रीभगवान् हैं, जो अपनी विविध परा-अपरा शक्तियों के द्वारा सर्वव्यापी हैं |


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